Skip to main content

Full text of "Puraanaa Lakhanuu"

See other formats


पुराना लखनऊ 


अतभ्ररितीय पुस्तकमाला 


पुराना लखनऊ 


(गुज़िश्ता लखनऊ) 


अब्दुल हलीम 'शरर' 


अनुवाद 


नूर नवी अब्बासी 











नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया 


[58!४ 8-237-525-0 

पहला संस्करण : ]97 

चोंथी आवृत्ति : 4995 (शक 97) 

6, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, 97] 

रू. 45.00 

(गराएमशव/ ९ :; एपफरटडा93 ०६70५ ((/०४) 





4क्दाउ/दवा।ता ; रिपादाव43 पर्ंव0फ (शा) 
निदेशक, नेशनल बुक टस्ट, इंडिया, ए-5 प्रीन पार्क, 
नयी दिल्ली-0 06 द्वारा प्रकाशित 


भूमिका 


व्यक्तित्व 


अब्दुल हलीम 'शररः 860 में पैदा हुए। उनके पिता हकीम तफ़ज्जुल 
हुसेन अरबी और फ़ारसी के विद्वान और मशहूर हकीम थे | नौ साल की 
उम्र में शरर' मटियाबर्जं, कलकत्ता गये जहां वाजिद अली शाह अपदस्थ होने 
के बाद रखे गये थे । शाही खानदान से संबद्ध होने के कारण 'शरर' का खान- 
दान भी वहीं रह रहा था। ग्ररबी, फ़ारसी, और तकंशास्त्र के अलावा कुछ 
अंग्रेज़ी भी पढ़ी और लखनऊ के मशहूर 'अवघ अ्खबार' के संवाददाता के रूप 
में खबरें भेजते रहे । 9 साल की उम्र में वापिस लखनऊ श्राये और यहीं 
भ्रखबार अवध के पंच' के प्रसिद्ध लेखक एहमद अली कसमंडवी के संगतिलाभ से 
उन्हें गद्य लेखन की प्रेरणा मिली । 880 में मुशी नवलकिशोर ने उन्हें 'प्रवघ 
अख़बार के संपादक मंडल में शामिल कर लिया । कुछ समय बाद अपने 
दोस्त अबदुल बासित के नाम से साप्ताहिक पत्र 'महशर' निकाला जिसकी 
सुंदर गद्य-शली बड़ी प्रसिद्ध हुई । 
अवध अखबार' के विशेष संवाददाता के रूप में कुछ महीने हैदराबाद 
रहे, मगर आख़िर नौकरी छोड़कर अलग हो गये । उसी जमाने में उन्होंने 
अपना पहला उपन्यास दिलचस्प लिखा जो दो भागों में प्रकाशित हुआ । 
उसके दो साल बाद 'शरर' ने पहली बार वंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास 
'दुर्गंशनंदिनी का अनुवाद करके उनका परिचय उर्द्वालों से कराया ! 887 
में उन्होंने अपनी पत्रिका ' दिलगृदाज जारी की। यह पत्रिका अपने ढंग की 
पहली पत्रिका थी, जिसमें सरल, प्रवाहमय कितु बहुत सदर गद्य में लेखादि 
प्रकाशित होते थे । इसी पत्रिका में उन्होने अपने उपन्यास धारावाहिक 
रूप में प्रकाशित करने शुरू किये। उनके मदाहूर ऐतिहासिक उपन्यास 
मलिकुल अज़ीजव्जिना', हसन-एंजिलना', “मंसूर-मोहना' वगैरा इसी 
पत्रिका में प्रकाशित हुए । 
890 में “मुहज्जब' नामक अखबार जारी किया, जिसमें इस्लाम धर्म के 


छः भूमिका 


विद्वानों की जीवनियां प्रकाशित होती थीं । 89] में 'शरर दुबारा हैदराबाद 
गये और वहां नौकर हुए और एक नवाबज़ादे के ट्यूटर को हैसियत से 895 में 
इंग्लेंड पहुंचे । वहां चोदह-पंद्रह मास ठहरे जिसमें उन्होंने फ्रांसीसी भ्रनुसंघाता 
मोस्यो कोरबे से फ्रच' भाषा सीखी । वापिसी पर 898 में 'दिलगुदाज' 
हैदराबाद से दुबारा जारी हुआझ्ा मगर जल्दी ही बंद हो गया । 900 मे 
लखनऊ वापिस, आकर उन्होंने यह पत्रिका तीसरी बार जारी की । 

'शरर पत्रकार, उपन्यासकार भौर गद्यकार, समाज-सुधा रक और सत्यनिष्ठ 
लेखक हैं । उन्होंने प्रचलित साधारण पक्षपात झऔौर विश्वासों की चिता किये 
बिना ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है । यही कारण है कि 
सकीना बिन्स इमाम हुसन की जीवनी प्रकाशित करने पर उनके विरुद्ध भारी 
हो हल्ला मचा । उन्होंने मुसलमान स्त्रियों में पर्द की प्रथा समाप्त करने के 
लिए एक पत्रिका 'इस्मत' निकाली जिसने बड़ी समाज सेवा की । उसके लिए 
उहोंने भारी विरोध का सामना किया, लेकिन ग्रपना संघर्ष बराबर जारी 
रखा । 904 में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के उत्देष्य से पाक्षिक पत्र 
“'इजिहाद' निकालना शुरू किया । गद्यकार, पत्रकार और उपन्यासकार के रूप 
में 'शरर का व्यक्तित्व युगांतरकारी है । 

पत्रकार के रूप में उनकी ऐसी प्रतिष्ठा थी कि 9]2 में खिलाफ़त 
आंदोलन के प्रख्यात नेता मौलाना मुहम्मद अली ने अपने उर्द दैनिक 'हमदर्द 
के संपादक के लिए पहले 'शरर को ही चुना । उनका देहांत 926 में हुआ । 
उनकी क्ृतियां 02 से भी भ्रधिक हैं और उनमें अधिकतर ऐसी है जो अपने 
समय में बहुत लोकप्रिय थीं और जिनके कई-कई संस्करण प्रकाशित हुए थे । 

'शरर के उपन्यासों के अलावा उनकी बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि 
'मशरिकी तमहन का आखिरी नमूना या गुजिश्ता लखनऊ है जिसका अनुवाद 
अगले पष्ठों में आपके सामने झ्ायेगा । बहुमूल्य और महत्वपूर्ण जानकारी के 
ग्रतिरिक्त (जो इस पुस्तक में एकत्र कर दी गयी है,) मूल पुस्तक शरर' के 
सरल और आकर्षक गद्य का भी नमूना है जिसमें निशचयात्मकता, प्रवाह झ्ौर 
व्यवस्था के वे गण पाये जाते हैं जो गद्य के लिए आवश्यक हैं । 
शररकालीन लखनऊ 

ग्रब्दुल हलीम 'शरर' ने जो जमाना देखा वह रंगीनी और रंगारंगी का 
ग्राखिरी जमाना था। अंग्रेजों का देश पर अधिकार हो चुका था और वे 


भूमिका सात 


अपने राजनीतिक आ्राधिपत्य को स्थिरता प्रदान करने के लिए देश के अंदर 
ग्रौर बाहर यह प्रचार करने लगे थे कि अंग्रेजों के आने से पहले हिंदुस्तान के 
लोग बहुत ही असम्य और जंगली थे और अंग्रेज उन्हें सम्य और सुसंस्कृत 
व्रनान का प्रयत्न कर रहे है। लार्ड मेकाले ने हिंदुस्तान और पूर्वी साहित्य 
तथा कलादि के भंडार को पाइ्चात्य ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों की एक अलमारी 
को तुलना में भी हेय समझा था और लाड डलहोजी के समय में ग्रवध पर 
अधिकार करने के लिए जो वहाने ढूंढें गये थे उनमें नवाबी अवध को मात्र 
विलासिता का केंद्र दिखाया गया था। और लखनवी सम्यता का बहुत ही 
गलत और भ्रामक चित्र प्रस्तुत किया गया था । 

'झरर' उन लोगों में से थे जिन्हें भारतीय सम्यता पर गे था और वे 
ग्रपने देशवासियों में गौरव की भावना जगाना चाहते थे ताकि उनमें आत्म- 
विश्वास पैदा हो और वे अपने ग्रतीत का ठीक रूप देख सके । इसीलिए एक 
ग्रौर तो उन्होंने ऐतिहासिक उपन्यास लिखे जिनमे प्राचीन घटनाओं के जरिए 
इसी प्रकार का आत्म-विश्वास पैदा करने की कोशिश की गयी थी, दूसरी 
ग्रोर उन्होंने यह पुस्तक लिखी जो इस समय आपके सामने है । इ सका नाम 
है 'गुजिश्ता लखनऊ या 'मशरिकी तमह_न का आखिरी नमूना । इस पुस्तक 
में 'शरर' ने लखनवी सम्यता और सस्क्ृति के विभिन्‍न पक्षों का वर्णन किया 
है जिनके कारण उसे हिंदुस्तान, बल्कि समस्त पूर्व में गौरव और प्रतिष्ठा 
प्राप्त हुई । 
सस्कृति 

मानव सम्यता को एक विशेषता यह रही कि वह कभी देश-काल की सीमाओं 
में आवद्ध नहीं रही । चिराग से चिराग जलते आये है और इसी आधार पर 
एक क्षेत्र की सम्यता यद्यपि उस क्षेत्रविशेष के नाम से प्रसिद्ध हो जाती है, 
लेकिन वह दूसरे क्षेत्र की समभ्यताओं से भी बहुत कुछ लेती है और इस प्रकार 
विश्व सभ्यता का रूप ग्रहण करती जाती है। इसी तरह एक युगविद्येष की 
सभ्यता यद्यपि उसी युग तक सीमित समभी जाती है लेकिन उसका संबंध 
प्राचीन काल से भी होता है और वह सामयिक होते हुए भी अपने अंदर 
शाश्वत गुण रखती है । 

लखनऊ में जो सम्यता पनप्री और परवान चढ़ी उसमें भी ये दोनों 
विशेषताएं मौजूद थीं। इसकी जड़े हमारे देश में बहुत पहले से मोजूद थीं । 


भ्राठ भूमिका 


जो लोग लखनवी सम्यता को केवल “तकल्लुफ़' और “पहले आप' जैसी छिछली 
बातों तक सीमित जानते हैं वे इसकी नफ़ासत, शास्तगी और खूबसूरती पर 
नजर नहीं रखते। सम्यता का मज़ाक़ उड़ाना आसान है लेकिन सभ्यतागओं की 
विभिन्‍न परतें पहचानना और उनकी आत्मा तक पहुंचना प्रासान नहीं । 
सम्यता सिर्फ़ रखरखाव, अभिवादन, रस्म-रिवाज और शिष्टाचार का नाम 
नहीं, वेषभूषा, खानपान या मनोरंजन के साधन और मेले-ठेले भी सम्यत+ 
नहीं--ये तो मात्र सम्यता के बाह्य लक्षण हैं और इनके माध्यम से किसी युग 
की सम्यता की आत्मा तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए । 

लखनऊ तक जो सम्यता पहुंची वह भारत की सदियों के प्रयासों का फल 
थी, उसमें झ्रार्यों का सौंदयं भी था और स्थानीय विशेषताएं भी । फिर 
अरब, ईरानी और तुक यहां आये तो अपनी 'सांस्कृतिक्र विरासत साथ लाये । 
उनमें ईरानी सम्यता की लय ज़्यादा तेज थी और इसीलिए दक्‍्खन और दिल्ली 
दोनों जगह भारतीय सम्यता ने इन दोनों से बहुत कुछ सीखा और बहुत कुछ 
सिखाया | ग्रब इस युग में भारतीय सभ्यता की स्वरसंगति में श्ररबी लय भी 
आ मिली । यही कारण है कि सम्यता या संस्कृति का कोई अंग हो, ललित 
कलाओं की कोई शाखा हो, हर जगह यह सांस्कृतिक मिश्रण बड़े विलक्षण 
सोंदर्य के साथ दिखायी देता है । इसका सबसे सुंदर प्रदर्शन ताज महल के 
स्थापत्य में हुआ है जो अरब झौर हिंदुस्तान की कलाओ्रों का एक अनुपम 
उदाहरण प्रस्तुत करता है । 

इस सम्यता के लखनऊ पहुंचने के समय अंग्रेज हिंदुस्तान में कदम जमा 
रहे थे और मिली-जुली सभ्यता का यह सुखद युग समाप्त होने को था। 
राजनीतिक दुरवस्था फैल चुकी थी। ग्राथिक संकट छा रहा था ऐसी परि- 
स्थिति में भिली-जुली सम्यता का यह कोमल पौधा दिल्‍ली से लखनऊ आया । 
अवध में अस्थायी शांति थी, वह संपन्‍न भी था, फिर हर सभ्यता की तरह यह 
सभ्यता भी अपने योवन काल में प्रवेश कर चुकी थी, इसलिए लखनऊ में इस 
सभ्यता को जिसमें हिंदुस्तान और ईरान का सौंदय्य शामिल था, नया जीवन 
ग्रौर नया सौंदय प्राप्त हुआ । चुनांचे इस सभ्यता के किसी अंग पर दृष्टि 
डालिये आपको पुराने तौर-तरीकों, फिर दिल्‍ली के रंग-ढंग और खासकर 
मुहम्मद शाह के शासन काल का उल्लेख ज़रूर मिलेगा। उदाहरण के लिए 
लिबास के संबंध में इस पुस्तक में नीमा और अ्ंगरखा का वर्णन है और 


भूमिका नौ 


सर-तफ़रीह के सिलसिले में इंदर सभा' का जिक्र देखें । 

यह सभ्यता किसी विशेष सभ्यता से संबद्ध नहीं थी बल्कि इस संबंध में 
यह प्रयास भी किया गया कि इस पर कट्टरता या धामिक संकीणंता की छाया 
न पड़े । चुनांचे सलाम के बारे में यह बात स्पष्ट है यानी 'सलाम अलैक' या 
सलाम अलेकुम' को लखनवी सभ्यता ने 'आदाब', 'तसलीम और “कोरनिश' 
जेसे गेरमजहबी अभिवादन से बदल दिया। यही नहीं वल्कि धामिक रस्म- 
रिवाज और संस्कारों को भी अधामिक और सामान्य बनाने की कोशिश की 
गयी । मिसाल के तौर पर मुहरंम मुसलमानों का और वसंत हिंदुश्नों का त्यौहार 
था मगर मुहरंस और वसंत को इस तरह मनाया गया कि उनका स्वरूप 
सामान्य सामाजिक समारोहों का-सा हो गया । नफ़ासत और रखरखाव किसी 
सम्यता के गुण मान जाते हैं और दोनों हैसियतों से लखनवी सम्यता, जिसका 
विस्तृत और सुदर चित्रण शरर' ने किया है, स्मरणीय थी जिससे आज भी 
बहुत कुछ सीखा जा सकता है । 

यह सभ्यता कैसी थी और कहां से आयी थी ? इस पर चर्चा करने से 
पहले यह याद रखना जरूरी है कि इंसानों की तरह सम्यताएं भी पैदा होती 
है, परवान चढ़ती हैं और मर जाती हैं। कोई समभ्यश चाहे कितनी ही भव्य 


न 


क्यों न हो हमेशा हर युग की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती । इसीलिए 
बदली हुई परिस्थितियों में किसी सभ्यता को भी इस दृष्टिकोण से नहीं परखा 
जा सकता कि वह आज के युग में उपयोगी और कारगर होगी या नहीं । हर 
सम्यता अपन युगविद्येष में बढ़ती है और इस दृष्टि से उसका अपना दायरा 
ग्रौर अपनी उम्र होती है और उसी के अनुसार उसे परखा जाना चाहिए । 
लखनवी सभ्यता को भी इसी पृष्ठभूमि में देखना आवश्यक है। शुरू के 
पृष्ठों स लकर झंत तक इस सभ्यता की एक विशेषता आपको बार-बार 
मिलेगी और वह यह कि इसमे देशी और विदेशी तत्वों का संगम हुआ है। 
सम्यताएं कभी विशुद्ध नहीं होती चिराग से चिराग सदा जलता आया है । 
लखनवी सभ्यता ने अपना चिराग इस तरह जलाया कि विभेन्‍न रौशनियां 
उसके फानूस में एक हो गयीं । यहां का लिबास, यहां के खाने, पेय, रस्म- 
रिवाज़, रहन-पहन, सभ्यता का कौन-सा ऐसा पक्ष है जिसमें देशी और विदेशी 
तत्वों ने मिल कर एक अद्भुत ग्राकरषंण पैदा न किया हो ! मजहब के बारे में 
कहा जाता है कि वह इंसान को बांटता है मगर यहां वे सम्यताएं और प्रतीक 


दस भूमिका 


भी जो किसी घ॒र्म से संबद्ध हों, प्री सम्यता का अंग बन जाते हैं झौर घमम 
के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। मसलन मातमदारी झ्नौर ताज़ियों के मामले में 
पूरा लखनऊ एक रंग में रंगा नजर आता है। इसी तरह वसंत का त्यौहार 
मनाने का सवाल हो या हिंदू पौराणिक कथाझ्रों के राजा इंद्र का जिक्र हो 
इसमें लखनऊ के सभी लोग बिना किसी धामभिक या सांप्रदायिक भेदभाव के 
इन्हें अपनाते हैं। 'इंदर सभा' उर्दू के प्रारंभिक नाटकों में माना जाता है और 
उसके विभिन्न रूप हैं लेकिन हरेक इंदर' सभा में राजा इंद्र की जो तसवीर 
पेश की गयी है वह हमारी मिली-जुली भारतीय सभ्यता का प्रतिनिधित्व 
करती है । उसका नाम इंद्र है और सिहासन पुराने ढंग का है । मगर पोशाक 
नवाबी भ्रवध की-सी है । उसके दरबार में परियां ब्रज की ठुमरियां गाती हैं 
प्रौर संदर तथा प्रवाहमयी उर्दू में बातचीत करती है मानो वे हमारी मिली- 
जुली सम्यता का सच्चा रूप हैं । 

यह मिलाप दरअसल इसलिए और भी सुखद हो गया है कि मिलने वाली 
सम्यताएं एक-दूसरे से बुनियादी तौर पर बहुत निकट हैं | ईरानी सभ्यता भी 
ग्रा्यं सम्यता थी|झआऔर इसीलिए जब ईरानी सम्यता का प्रभाव भारत पर 
पड़ा और यहां की आर्य सभ्यता से उसकी भेंट हुई तो वह मिलाप दो 
ग्रजनवियों का मिलाप नहीं था बल्कि दो बिछड्े हुए रिश्तेदारों का मिलाप 
था--ऐसे रिश्तेदार जो नस्ल की दृष्टि से एक थे और जिन्होंने अपनी 
ऐतिहासिक यात्रा में मूल्यवान वस्तुएं एकत्र की थीं। अब ये दोनों मिले तो 
एक रूप हो गये और भारत की प्राचीन सभ्यता में मध्य एशिया की सम्यताग्रों 
के संदर तत्वों का समावेश हो गया । 

प्रो" स्पियर ने [७॥9॥: ० 6 ै"९)।9]5 में लिखा है कि अंतिम 
मुगल सम्राट योरुप के छोटे राज्यों के व्रैधानिक शासक होने के लिए उपयुक्त- 
तम इंसान थे ; “&त्वा व | ए0फपा0त ॥8५6 00६॥ 3 ४८४ ५/07(॥% 


20079 एटाशावा लेजाए ला।एशा0ए५४५७ 0ा ]90]65" 80४०६९. 3947 
80 5$॥9॥7 [[ ए00]08 ॥9ए6 एछहला 4 ९एटरा। 2८०॥5७079] *॥77. 
[06॥॥, कहा, एव विवाजा शैंदादा रात (50309 235 ॥स्‍5$ (50८(॥6 
73997 ४000 ॥30९ एछ९ला 8 तांज्ञातीएव एल णएणी & 707 (07737. 
68९ जता #5५ 0ए6 0 ए०लाए बात जञा050ए0ए, श्शी 85 €५८07$075 
(0 ६70॥9,... ... [5 70॥500॥ एॉ५5$ 70 ै८॥।४७ ]।., ॥5 [298707 982८ 
ठ ९३003  3270 ?िशा9 िश४व/ 270 070॥655 णा (0५९5 3270 
]00ए९ 0 पाएडईींटांगा. 


भूमिका ग्यारह 


यह बात अवध के बारे में और अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती 
है । इतिहास ने झ्रवधघ पर स्वायत्त राज्य का भार रख दिया और उतन्नीसवीं 
शती की परिस्थितियों में यह संभव न था कि अपनी कमज़ोर झाथिक स्थिति 
और जंग खायी हुई तलवारों के बल पर ईस्ट इंडिया कंपनी के हमले का 
सामना किया जाता । लेकिन राजनीतिक कमज़ोरियों को यदि छोड़ दिया 
जाये तो अवध में जो सांस्कृतिक उपलब्धियां हुई थीं उन पर कोई भी राष्ट्रीय 
सभ्यता गव॑ कर सकती है। इस सभ्यता की झात्मा लताफ़त (कोमलता) 
ओऔ,र शाइस्तगी (शिप्ठता) है। इसमे हर क्षण दूसरों की भाषनाओं का ख्याल 
रखा जाता है और रहन-सहन का वह रूप अपनाया जाता है, जिसमें जीवन- 
ग्रानंद और शिप्ठता को प्रोत्साहन मिले । इस सभ्यता में गहराई और शक्ति 
दृष्टिगत नहीं होती और शायद ग्राज बहुत लोग इसे खोखलेपन की संज्ञा दें 
लेकिन इस सभ्यता ने अपने विशिष्ट दायरे में रहकर किस तरह के गुल-चूटे 
खिलाये हैं उन्‍हें जानना-पहचानना हमारे लिए एक नयी दुनिया की खोज से 
कम नहीं -- एक ऐसी नयी दुनिया जो प्राचीन सभ्यता के पृष्ठों में छिपी हुई है 
ग्रौर जिससे परिचय होने से जीवन ग्रधिक सुखद और ग्रथंपूर्ण बन जाता है । 

'शरर' ने अपनी पुस्तक को तीन भागों में विभक्त किया है : पहले भाग 
में अवध और लखनऊ का संक्षिप्त इतिहास है, उसके बाद अवध के नवाबों 
का संक्षिप्त इतिहास दिया गया है । बुरहान-उल-मुल्क से लेकर उस खानदान 
के आखिरी बादशाह वाजिद अली शाह तक का इतिवत्त संक्षेप में दिया गया 
है । यह तो स्पष्ट है कि वाजिद अली शाह के जीवन का विवरण अधिक है और 
यह आधार उन्होंने दिल लगाकर बडी ददंमंदी से लिखा है : प्रंग्रेजों और उनके 
एजेंटों की साजिश, वाजिद अ्रली शाह की बेवसी और अंत में एक रुगणण विलासिता 
का शिकार हो जाना और अपने मुसाहिबों के प्रभाव में आकर फंसले कर बेठना 
बड़ी खूबसूरती के साथ अंकित हुआ है । तीसरा भाग जो इस पुस्तक का वास्त- 
विक उद्देश्य है लखनऊ में सम्यता के विभिन्नअ्रंगों की प्रगति से संबद्ध है उसमें 
'शरर ने विभिन्‍न शीर्ष कों के माध्यम से मानव जीवन के सभी महत्वपूर्ण ग्रंगों को 
समेटने की कोशिश की है । लिबास, खान-पान, शालीनता, रहन-सहन, रस्म- 
रिवाज, घधामिक विश्वास और मान्यताएं, मेले-ठेले, मनोरंजन और खेल-क्द, 
हथिया र, ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, शिष्टाचार और इसी प्रकार के विभिन्न सांस्कृ- 
तिक पक्षों पर बहुमूल्य जानकारी प्रस्तुत की गयी है। उनका महत्व केवल 


बारह भूमिका 


ऐतिहासिक ही नहीं है बल्कि उनसे आज भी हम जीवनयापन का ढंग सीख 
सकते हैं, क्योंकि यह नफ़ासत और लताफ़त किसी भी संस्कृति के लिए गवं 
का विषय बन सकती है । 

'शरर' के दो और रूप भी हैं। एक यह कि जब वाजिद अली शाह को 
ईस्ट इंडिया कंपनी ने कैद करके लखनऊ से मटियाबुर्ज भेज दिया तो उनका 
मुक़दमा लंदन में मलका विक्टोरिया और ब्रिटिश साम्राज्य के सामने पेश 
करने के लिए अब्दुल हलीम शरर' के नाना लंदन गये थे । इससे अंदाज़ा हो 
सकता है कि उनका खानदान अवध के नवाबों से कितना निकट था। अवध 
के अ्रंतिम दिनों की कहानी को जितने ददंनाक और प्रभावशाली ढंग से 'शरर' 
ने बयान किया है वह खुद अपनी जगह एक क्लासिक है। और पुस्तक का 
वह अध्याय मात्र ऐतिहासिक वर्णन नहीं बल्कि एक महान त्रासदी का ग्रंश 
है । उनकी महाहूर पत्रिका “दिलगुदाज” मुद्दतों तक उर्दू साहित्य की सेवा 
करती रही और उसकी यह सेवा असाधारण महत्व की रही है। यह पूरी 
पुस्तक भी पहले फुटकर लेखों के रूप में इसी पत्रिका में क़िस्तवार प्रकाशित 
हुई थी । ऐतिहासिक उपन्यासकार के रूप में यों भी उन्हें इतिहास से गहरी 
दिलचस्पी थी, इसलिए इस पुस्तक में इतिहासकार की व्यापक दृष्टि, पत्रकार 
की शैली का रस, संस्कृति के सभी पक्षों से गहरी जानकारी रखने वाले एक 
सम्य व्यक्ति की नफ़ासत और लताफ़त प्रकट होती है। 

इस पुस्तक का इस दृष्टि से भी बड़ा महत्व है कि आज तक भारतीय 
संस्कृति के किसी भाग का इतना भरपूर और विस्त॒त चित्र प्रस्तुत नहीं 
किया गया । यह सच है कि सम्यता और संस्कृति, खानपान, वेषभूषा, 
शिष्टाचार, मनोरंजन के साधन, शादी-गमी के रस्म-रिवाज आदि का ही 
नाम नहीं है लेकिन इन सब चीजों का ज़िक्र, यदि न किया जाये तो भी 
सम्यता और संस्कृति का चित्र अघूरा रहेगा। आधुनिक युग में मनुष्य जीवन 
की झापाधापी में फंसकर जीवन का आनंद खो बेठा है श्रौर व्यस्तता तथा 
जीवन की तीक़ गति में उसे ढंग से जीने के अलावा और हर चीज की फुसंत 
प्राप्त है। इस पुस्तक का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक मुद्दत हुई लिन 
यू टांग की प्रसिद्ध पुस्तक ]गर7097०8 ०0 |,शं॥8 प्रकाशित हुई थी जिसमें 
जीवनानंद के इसी पहलू पर प्रकाश डाला गया था । 'शरर' की पुस्तक उससे 
भी कहीं झआगे जाती है और एक ऐसी सभ्यता का चित्र प्रस्तुत करती है जिसे 


भूमिका तेरह 


हिंदुस्तान के एक प्रदेश के रहने वालों ने जन्म दिया । इस दृष्टि से वह एक 
महान सभ्यता का महान इतिहास ही नहीं है बल्कि हमारी राष्ट्रीय विरासत 
का एक महत्वपूर्ण अंग है । 

ग्रब्दुल हलीम 'शरर अपने अनेक लोकप्रिय ऐतिहासिक उपन्यासों के लिए 
याद रखे जायेंगे जिनमें 'फिरदौसे-बरी “मंसूर-मोहना, 'मलिक-उल-अ्रजीज- 
वर्जिना', 'फ्लोरा-फ्लोरिडा' आदि उनके जीवन काल में ही ख्याति प्राप्त 
कर चुके थे । शरर युगप्रवतंक पत्रिका दिलगुदाज़ के संपादक के रूप में 
याद किये जायेंगें। जिसने उर्दू पत्रकारिता को एक नयी दृष्टि और उर्दू 
साहित्य को नयी दिऔख्ा प्रदान की। वे अपने उन सुंदर लेखों के लिए भी 
याद किये जायेंगे जिन्होंने उर्दू साहित्य को सम्‌द्ध किया। वे अपने चमत्कृत 
निबंधों के कारण भी सदा जीवित रहेंगे। लेकिन 'गुजिशता लखनऊ उन्हें 
ग्मर रखने के लिए काफ़ी है । यह एक ऐसी पुस्तक है जो इतिहास के गम 
ग्रौर चहकते हुए खून की तरह वतंमान और भविष्य तक जीवन झौर 
ग्रानंद का संदेश लेकर जाता है और संस्कृतियों को अतीत का नया रूप 
ग्औजौर भविष्य का नया विजन प्रदान कर देता है। इस दृष्टि से इस पुस्तक 
पर उर्द वालों का ही नहीं पूरे भारत का अधिकार है । हर भारतवासी को 
इसमें ग्रपने संदर ग्रतीत का चित्र दिखायी देगा और वह इसके विभिन्‍न अंगों 
में जीवन के सुख और झग्लानंद की भलक पा सकेगा | 

इसीलिए 'शरर' की यह पुस्तक केवल छपे हुए शब्दो का संग्रह ही नहीं 
एक जीताजागता अनुभव है जो इंसान को नयी दृष्टि प्रदान करता है और 
उसे बेहतर बनाता है । 


ग्रध्पक्ष, उद विभाग, मुहम्मद हसन 
जवाहरलान नेहरू विश्वविद्यालय, 
नई दिल्‍ली । 


इस बात के मानने में शायद किसी को आपत्ति न होगी कि हिंदुस्तान में पूर्वी 
सम्यता भौर संस्कृति का जो आखिरी नमूना नज़र आया वह अवघ का 
पुराना दरबार था। पिछले जमाने की यादगार के तौर पर और भी कई 
दरबार मोजूद हैं मगर जिस दरबार के साथ पुरानी तहज़ोब श्रौर संस्कृति 
खत्म हो गयी वह यही दरबार था जो बहुत ही आखिर में कायम हुश्रा भौर 
प्रजीब-प्रजोब तरक्क़ियां दिखा कर बहुत ही जल्दी नष्ट हो गया। लिहाजा 
हम इस दरबार का संक्षेप में वर्णन करना चाहते हैं ओर उसकी विश्येषताएं 
बताना चाहते हैं। 

यह मान लेने में भी शायद किसी को आपत्ति न होगी कि जिस प्रदेष्टा में 
पिछला दरबार क़ायम हुझ्ला उसका महत्व हिंदुस्तान के दूसरे सभी प्रांतों से 
बढ़कर है । 

पुराने चंद्रवंशी परिवार विशेषकर राजा रामचंद्र जी के महान झ्लौर 
बेमिसाल कारनामे इतने प्रधिक हैं कि इतिहास उन्हें अपने अ्रंदर समोने में 
प्रसमर्थ है और यही कारण है कि उन्होंने इतिहास की सीमाएं लांघ कर 
घाधिक पवित्रता का रूप धारण कर लिया है। ञ्राज हिंदुस्तान का शायद हो 
कोई ऐसा श्रभागा गांव होगा जहां उनकी याद हर साल रामलीला के धामिक 
नाटक के माध्यम से ताज्ञा न कर ली जाती हो । लेकिन अवध के इस सबसे 
प्राबोन दरबार का वर्णन और अयोध्या का उस युग का वेमव वाल्मीकि ने 
ऐसी चमत्कृत शैली में किया कि वह आस्थावान व्यक्ति के हृदय पर अंकित 
हो गया । लिहाज़ा हम उसे यहां दोहराना नहीं चाहते । जिन लोगों ने 
पझ्योध्या के उस वेभवशाली युग का चित्रण वाल्मीकि की कलाक्ृति में देखा 
है वे उसी शुभ स्थान पर आज “दिल गुदाज” में फैज़ाबाद की तस्वीर देखें । 
हम घटनाक्रम को उस समय से शुरू करते हैं जब उस आखिरी दरबार को 
बुनियाद पड़ी जिसे नष्ट हुए कुछ ऊपर पचास साल से ज्यादा जमाना नहीं हुआ । 

लेखक द्वारा संपादित पत्रिका जिसमें अस्तुत पुस्तक क़िस्तवार प्रकाशित 

हुई थी । ( 887-935 ई०) । 


2 गुज़िश्ता लखनऊ 


जब नवाब बुरहान-उल-मुल्क भ्रमीन उद्दीन खां नैशापुर दिल्‍ली के शहंशाही 
दरबार की तरह से भ्रवघ के सूबेदार नियुक्त होकर आये तो लखनऊ के शेख- 
जादों को परास्त करके अवध की प्राचीन राजघानी यानी पवित्र नगरी 
प्रयोध्या पहुंचे और भ्राबादी से फासले पर यानी घाघरा नदी के किनारे एक 
ऊंचे टीले पर अपना शिविर बनाया | चुंकि वे प्रांत के प्रबंध में व्यस्त थे भौर 
उन्हें आलीशान इमारतें बनाने की फुसंत न थी और न ही सीधा स्वभाव होने 
के नाते इस तरह की भूठी शान दिखाने का उन्हें शौक़ था इसलिए एक 
ज़माने तक वे तंबुओं में रहते रहे और जब कुछ दिन के बाद उन्हें बरसात 
में तकलीफ हुई तो थोड़ी दूर हटकर एक मुनासिब जगह पर अपने लिए 
एक छप्पर! बनवाया । फिर उसके बाद उस छप्पर के प्लासपास कच्ची दीवार 
का एक बहुत लंबा-चौड़ा वर्गाकार घेरा खिंचवा लिया जिसके चारों कोनों 
पर किलेबंदी की शान से चार कच्चे बुर्ज बनवा दिये ताकि इर्द-गिर्द के इलाके 
की निगरानी की जा सके। यह अहाता इतना विशाल था कि उसके श्रंदर भ्रसंख्य 
घुड़सवार, पलटनें, तोपखाने, भ्रस्तबल और भ्रन्य जरूरी कारखाने आसानी से 
रह सकते थे । बुरहान-उल-मुल्क को चूंकि इमारत का शौक़ न था इसलिए 
उसके जनाने और बेगमों के रहने के लिए भी कच्चे मकान ही बना लिये गये । 
ग़रज़ यह कि कच्चे बंगले में उस समय का गवध-नरेश जब जिलों के दोरे भोर 
सरकारी यात्राओं से फ़ुसंत पाता तो ऐश-ग्राराम के साथ रहता था ओर उसे 
किसी बात की शिकायत न थी और उसका यह शासन-केंद्र कुछ ही दिन में 
'बंगला' के नाम से मशहूर हो गया । 

बुरहान-उल-मुल्क के देहांत के बाद जब नवाब सफ़दरजंग का जमाना 
शुरू हुआ तो यह बस्ती फ़ैजाबाद मशहूर हुई। यह है बुनियाद शहर फ़ैजाबाद 
की जिसने अपने बनने और बिगड़ने की तेजी में लखनऊ को भी मात कर 
दिया । भ्रब उन दिनो इन कच्ची चारदीवारी के गिर्द फ़ौज के श्रधिकतर मुगल 
सरदारों ने अपनी दिलचस्पी के लिए बाग और ह॒वादार तथा ग्रानं दप्रद रंग- 
महल बनाये और शहर की रोौनक़ बढ़ने लगी । इस कच्चे श्रहाते का एक 
“उक्ष्ज़ाबाद के सभी हालात मुंशी मुहम्मद फैजबख्श की 'तारीख-ए-फरह 
बख्श' से लिए गए हैं। मूल पुस्तक हमने नहीं देखी मगर उसका अंग्रेजी प्रनुवाद 
(प्रनुवादक : विलियम हुई) जो 889 में गवर्नमेंट प्रेस, इलाहाबाद में 
छपा है हमारे पास मौजूद है । 


गुजिक्ता लखनऊ 3 


फाटक 'दिल्ली दरवाज़ा कहलाता था जो पश्चिम की ओर था | उसके बाहर 
दीवान ग्रात्माराम के बेटों ने एक शानदार 'बाज़ार बनवाया और उसी के 
सिजसिले में रहने के लिए मकान भी बनवाये। इसी तरह इस्माईल खां 
रिसालदार ने भी एक बाज़ार बनवाया श्रौर चारदीवारी के श्रंदर ख्वाजा- 
सराप्नों (महल रक्षक) भौर विभिन्‍न फ़ौजी लोगों के बहुत से मकान भी तैयार 
हो गये | 

नवाब सफ़दर जंग की मृत्यु के बाद इस नयी बस्ती पर कुछ रोज के 
लिए तबाही बरस गयी । जिसकी वजह से इतने दिनों में जो कुछ बना था 
ज़माने ने बिगाड कर रख दिया इसलिए कि उनके बेटे नवाब शुजाउद्दोला ने 
ग्रपने रहने के लिए लखनऊ को पसंद किया था और वहीं रहते थे । झ्लबत्ता 
साल में दो-एक रातें अपने बाप-दादा के इस पुराने मकान में जरूर बसर कर 
लिया करते । यहां तक कि 746 ई० में उन्हें बक्सर की लड़ाई में श्रंग्रेजों 
से हार हुई। उस समय उनके पास कुछ भो तो न रहा था और वे उसी 
हालत में भागते हुए फ़ैजाबाद में ग्राये और वहां के क़िले में जो कुछ साज- 
सामान मौजूद पाया लेकर रातों-रात चल खड़े हुए और लखनऊ पहुंचे । यहां 
भी एक ही रात ठहर कर जो कुछ हाथ आया. लिया और दिल्‍ली की राह 
ली ताकि रुहेलखंड के पठानों के पास जाकर शरण लें। लड़ाई क्रे नौ महीने 
बाद अंग्रेजों से उनकी सुलह हो गयी जिसके अनुसार शुजाउद्दोला के जिम्मे 
यह वाजिब था कि प्रदेश की आमदनी में से रुपये में पांच आने अंग्रेजों को 
प्रदा करे ; 

संधि होने सं पहले इस सफर में इत्तिफाक़ से शुजाउद्दोला का गुज़र फ़रुंखा- 
बाद शहर में भी हुआ था जहां एहमद बंगश से मुलाक़ात हुई जो उस जमाने 
: के पुराने तजुर्बेकार बहादुरों में माने जाते थे । उन्होंने शुजाउह्दौला को सलाह 
दी कि ग्रव जो एुश जाकर हुकूमत की बागडोर हाथ में लेना तो मेरी इन दो 
बातों को न भूलना : एक तो यह कि मुगलों का कभी एतबार न करना 
बल्कि श्रपने दूसरे नौकरों श्र ख्वाजासराग्रों से काम ली। दूसरे यह कि 
लखनऊ का रहना छोड़ो और फ़ैजाबाद को अपनी राजधानी बनाझो । 

ये बातें शुजाउद्दोला के दिल पर बंठ गयीं और भंग्रेजों से समभोता होने 
के बाद 779 ई० में जो उन्होंने ग्रपनी सल्तनत की राह ली तो सीधे फ़ैजाबाद 
प्राये और उसी को ग्रपनी राजधानी बना दिया। प्रब यहां उन्होंने नयी 


4 गुज़िश्ता लखनऊ 


फ़ौज भर्ती करना शुरू की, नये घुड़सवार तैयार किये झौर नयी इमारतों की 
बुनियाद डाली | पुराने हिसार को एक मलबूत परकोटे की शान से दुबारा 
बनवाया जो भ्रव क़िला कहलाता,था | मुगलों के जो मकान श्रंदर बने हुए 
ये ढहा दिये और भपने झ्क्सर निजी नौकरों को हुनबम दिया कि वे परकोटे के 
बाहर मकान बनवाएं । इस हिसार के इदं-गिदें हर तरफ दो-दो मी लफका 
मंदान छोड दिया गया जिसके गिद-ं गहरी खाई खोद कर उसे किलाबंदी 
के रूप में दुरुस्त किया गया | सरकारी नौकरों भ्ौर फौज के अफसरों को 
इजाजत हुई कि शभ्रपनी हैसियत और हालत के मुनोसिब जमीन के टुकड़े 
लेकर उसी मंदान में मकान बनाएं | ज॑से ही यह खबर मशहूर हुई कि शुजा- 
उहला ने फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया है, एक दुनिया का रुख उघर 
फिर गया । हजारों लोग आ-आकर आबाद होना शुरू हुए । शाहजहानाबाद 
में यह हालत थी कि जिसे देखिए फंज़ाबाद जाने के लिए तैयार है। चुनांचे 
दिल्ली के श्रधिकतर शिल्पकारों ने अपना वतन छोड़ा और पूरब की झओर चल 
पड़ें । दिन-रात लोगों के आने का तांता बंधा रहता था और क़ाफ़िले चले 
झाते थे जो ग्रा-पआकर यहां बसते और फैज़ाबाद के आसपास खपते चले जाते 
थे। चंद ही रोज के अंदर हर धमं और जाति के सुखो-संपन्‍न साहित्यकार, 
तलवार के घनी, व्यापारी, शिल्पी श्रौर हर वर्ग तथा हर श्रेणी के लोग यहां 
जमा हो गये । श्रौर जो श्राता, ग्राते ही इस फ़िक्र में पड़ जाए कि कोई 
जमीन का टुकड़ा हासिल करके मकान बना ले । 

चंद ही साल के अंदर इस पहले हिसार के श्रलावा दो झौर फसीलें बन 
गयीं: एक जो पहले वर्गाकार अहाते के दक्षिणी सिरे से मिली हुई थी उसकी 
लंबाई-चौडाई दो-दो मील की थी, और दूसरा हिसार एक मील के फंलाव में 
था जो किले और बाहर की प्राचीर के दरम्यान था। इसी जमाने में त्रिपो- 
लिया और घचौक बाजार बने जिनकी सड़क क़िले के दक्षिणी फाटक से शुरू हो 
कर इलाहाबाद की सड़क के नुककड़ तक चली गयी थी और इतनी खुली हुई 
थी कि बराबर-बराबर दस छकड़े आसानी से गुजर सकते थे । शहर की फसील 
का 'प्रासार जमीन के पास चाहे जितना हो दरम्यान में दस गज से कम न था 
जो ऊपर पहुंच कर पांच-पांच गज रह गया था। इस फ़सील पर कायदा और 
बेकायदा दोनों तरह की फ़ोजों के दस्ते रात भर रौंद फिरा करते और जा-बजा 
पहरा देते । वाकायदा सिपाहियों की वर्दी लाल थी और बेकायदा सिपाहियों 


गुजिश्ता लखनऊ 5 


की वर्दी काली । इन्हीं सिपाहियों की जरूरत से बरसात में जा-बजा छप्पर ढाल 
दिये जाते, मगर बरसात के खत्म होते ही आग लगने के अं देशे से वे लाजिमी 
तौर पर उतार डाले जाते | चुनांचे सिफं प्राचीर की दीवारों के लिए हर साल 
लगभग एक लाख छप्पर छाये जाते और चार महीने के बाद नोच के फेक दिये 
जाते । 

शहर के श्रासपास दो चरागाहें शिकार के लिए नियत कर दी गयी थीं 
जिनमें से एक पश्चिम की ओर गुरजी बेग खां की मस्जिद से गुप्तार घाट तक 
चली गयी थी जो एक लंबा फ़ासला है। उसके दोनों और कच्ची दीवारें थीं 
और तीसरी ओर घाघरा बहती थी । उसमें अनेक हिरन, चीतल, बारसिघे, 
नील गायें वगेरा शिकार के जानवर छोड़े गये थे जो बड़ी आज़ादी के साथ 
छुटे-छुटे फिरते ग्रोर भड़कते ही चौकड़ियां भरने लगते । दूसरी शिकारगाह शहर 
से पूरव की तरफ गांव जनौरा और छावनी गोसाईं से नदी के किनारे तक थी 
जिसका फ़ैलाव छह मील का था। इसके रकबे में ग्यारह गांव और उनकी 
जमीन आ गयी थी। लेकिन यह शिकारगाह अधूरी हो रही श्रौर इसकी 
नौबत न ग्राने पायी कि उनमें जंगली जानवर छोड़ जाएं । 

खास शहर के हलके के प्रंदर तीन ऐसे सुखद बाग़ थे जो इस योग्य थे कि 
ग्रमीर ग्रौर शहज़ादे आकर इनमें सर करें झौर उनकी बहार और हरियाली 
का आनंद उठाएं । एक पअंग्री बाग जो क़िले के श्रंदर स्थित था श्रौर उसके 
रक़बे के नोथाई हिस्से पर छाया हुआ था । दूसरा मोतीबाग़ जो कि चौक के 
ग्रंदर स्थित था। तीसरा लालबाग जो सब बाशों से श्रधिक विद्याल था। इसमें 
बड़ी सुंदरता से पेड़-पोधे लगाये गये थे और हर तरह के नाजुक और दिल- 
फरेब फूल बड़े सलीके से लगाये गये थे । सारे सूब में इसकी शोहरत थी और 
दूर-दूर के लोगों को तमन्ना थी कि कोई खुशनसीबी को शाम उस रूहश्रफ़ज़ा बाग 
में बसर करें । शहर के नौजवान दरीफ़ज़ादों के भुंड रोज तीसरे पहर को 
इसमें गइत लगाते और दिल बहलाते नज़र झाते । यह बाग कितना सुखद और 
सुहावना था इसकी ख्याति यहां तक थी कि दिल्‍ली के शंहशाह शाहगभ्रालम जब 
इलाहाबाद से पलटे तो इसी बाग की सर के शौक में फ़ज़ाबाद होते हुए दिल्‍ली 
गये और कुछ जमाने तक वे इसी के अंदर रहे । इन तीन बागों के अलावा 
आसफ़बाग़ श्रौर बुलंदबाग़ भी शहर के ग्रासपास लखनऊ के रास्ते में स्थित 
थे। 


6 गुज़िह्ता लखनऊ 


नवाब शुजाउद्दौला बहादुर को शहर की दुरुस्‍्ती का ऐसा शौक था कि हर 
सुबह-शाम सवार होकर सड़कों श्लौर मकानों का मुप्नायना करते । मजदूर 
फड़वे और कुदालें लिए हुए साथ होते, जहां कहीं किसी मकान को टेढ़ा और 
अपनी हद से बढ़ा पाते या किसी दुकानदार को देखते कि उसने सड़क की 
जमीन बालिश्त भर भी दबा ली है, फौरन उसे खुदवाकर बराबर श्रौर सीधा 
करा देते । 

फ़ौज के सुधार की तरफ भी शुजाउद्दोला का विशेष ध्यान था । रिसाले 
के बड़े सरदार ग्रब मुतंज़ा खां बरीज और हिम्मत बहादुर और उमरावगीर 
नामक दो-गोशाई थे । उनके मातहत इतने सवार थे कि इन तीन के ग्ललावा 
और जितने छोटे-छोटे जमादार थे सबकी फ़ोज की कुल तादाद से उनमें से 
हरेक की टुकड़ी ज़्यादा थी। फ़ौज के दूसरे सरदार एहसान कंबोही, गुरजी 
बेग खां, गोपाल राव मराठा, मीर जुमला के दामाद नवाब जमालउद्दीन खां 
मुजफ्फ़र उद्दौला, बहुर जंग वरुशी अबुल बरकात खां काकोरीनिवासी और 
मुहम्मद मुइजउद्दीन खां लखनऊ के एक शेखज़ादे । इनमें से कोई ऐसा न था जिसके 
मातहत हजार-पांचसौ सिपाहियों का गिरोह न हो । इनके अलावा ख्वाजासरा 
और वे नौजवान ख्वाजासरा जो उनकी निगरानी में ट्रेनिंग पाते, चेले और 
नौकर-चाकर थे । बसंतग्रली खां ख्वाजासरा के मातहत दो डिवीज़न फ़ौज 
यानी चौदह हजार बाकायदा सिपाही थे जिनको वर्दी लाल थी । एक दूसरा 
बसंत ख्वाजासरा था जिसकी कमान में एक हजार बाकायदा भाले चलाने वाले 
सवार और एक पलटन थी । अंबर अली खां ख्वाजासरा की श्रफ़्सरी में पांच 
सौ सवार और एक पलटन थी जिनकी वर्दियां काली थीं। महबूब श्रली खां 
ख्वाजासरा से ट्रेनिंग लेने वाले पांच सो सवार थे और चार पलटने थीं। इतनी 
ही फ़ोज लताफत अली खां के मातह॒त थी । रघुनाथ सिंह और प्रसाद सिह में 
से हरंक की कमान में तीन-तीन सौ सवार ओर चार-चार पलटनें थीं। इसी 
तरह मक़बूल अली खां प्रथम और द्वितीय, यूसुफ अली खां के साथ पांच-पांच 
सौ मुगल सवारों और पेदलों की टुकड़ी थीं और तोपखाने की तो कोई हद थी 
न हिसाब | : 

लिहाजा कुल फ़ौज जो शुजाउद्दौला के कब्जे में बो और फ़ंज़ाबाद में 
मौजूद रहा करती थी उसकी कुल तादाद यह थी: लाल वर्दीवाले तीस हजार 
बाकायदा और काली वर्दीवाले चालीस हजार बेकायदा प्यादे । उनके बड़े 


गुजिइता लखनऊ 7 


सिपहसालार संयद एहमद थे जो “बांसीवाला'” के उपनाम से मशहूर थे। जल्दी 
भरने और फ़ायर करने के एतबार से उनकी तौड़ेदार बंदुकों के मुकाबिलले में 
ग्रंग्रेज फौज की बंदूर्के कोई अहमियत न रखती थीं । 

इस टुकड़ी के अलावा शुजाउद्दौला के पास बाईस हज़ार हरकारे और मुख- 
बिर थे जो हर सातवें रोज़ पूना से और हर पंद्रहवें दिन काबुल से खबरें लाते। 
दरबार में हमेशा दूर-दूर के शहरों के शासकों के नायब मौजूद रहा करते । 
एक नायब मराठों का था, एक दक्‍क्खिन के शासक निज्ञाम अली खां का, एक 
जाब्ते खां और एक नवाब जुल्फ़िक्रा रठह्दौला नजफ़ खां का जिनके साथ उनके 
दफ्तर श्रौर सिपाही भी थे | उन लोगों के अलावा श्रौर भी बहुत से फ़ौजी 
प्रफसर अपनी-प्रपनी फ़ौजी टुकड़ियों के साथ यहां मौजूद रहते-जैसे मीर 
नईम खां जिनके भडे के नीचे साबितखानी, बंदेलखंडी, चंदेला और मेवाती 
सिपाहियों का समूह था । 

मुहम्मद बशीर खां क़िलेदार थे। शहर की फसीलों और फाटकों पर उन्हीं 
के सवार और प्यादे फंले रहते और क़िले के अदर ही उनके रहने और दफप- 
तर के लिए अच्छे मकान और उनके सिपाहियों की वारकें बनी हुई थीं | जब 
बाहरी दीवारों में भी जगह बाक़ी न रहो तो सैयद जमालउद्दीन खां और 
गोपाल राव मराठा ने बाहर निकल कर नौराही नामक गांव के पास ही रहना 
शुरू कर दिया और अपने मकान तथा कैप वहां बनाए और इसी जगह की 
तंगी की वजह से नवाब मुरतज़ा खां बारीज, मीर एहमद बांसीवाला, मीर अबुल 
बरकात ओर शेख एहसान अयोध्या ओर फ़ैजाबाद के दरम्यान तंबुओं में रहते 
थे । 

पग्रादमियों की बहुतायत और सिपाहियों की भीड़ से शहर के भ्रंदर--- 
खासकर चौक में--ऐसा जमघटा-सा लगा रहता कि वहां से गुज़रना दूभर था 
झ्ोर नामुमकिन था कि कोई व्यक्ति बिना अटके हुए सीघा चला जाए | फैज़ा- 
बाद न था इसांनों का जंगल था। बाज़ार में देखिए तो मुल्क्रों का माल ढेर 
था और खबर सुनकर कि फ़ंज़ाबाद में अच्छी रुचिवाले रुईसों श्रौर शौक़ीन 
ग्रमीरों का चुनिदां समुह है हर तरफ से व्यापारियों के काफ़िले लदे-फंदे चले 
ग्राते थे श्रोर चूंकि चाहे कैसा ही कीमती माल हो हाथों हाथ बिक जाता, 
अच्छी-से-अच्छी चीज़ों के आने का सिलसिला बंध गया था। जब देखिए ईरानी 
काबुली, चीनी और फ़िरंगी सौदागर बहुत ही बहुमूल्य और भारी माल लिये 


8 गुजिक्ता लखनऊ 


हुए मौजूद रहते और ज्यों-ज्यों नफ़ा उठाते, हवस बढ़ती और वे अ्रधिक 
कोशिश झौऔर मेहनत से नया माल ले आते | मोस्यो जां तेल, मोस्यों सोन सोन 
ओऔ्रौर मोस्यो पेट्रोज वगरा जैसे दो सौ फ्रांसीसी जो यहां रहने लगे थे, सरकार 
में मुलाजिम थे । श्रौर शुजाउद्दोला की सल्तनत से अपना संपर्क बनाये रखते थे 
जो सिपाहियों को सेनिक शिक्षा देते और तोपें, बंदूक और अन्य अस्त्र-दस्त्र 
झपनी देखरेख में तंयार कराते । 

मुंशी फेज बख्श जो “तारीख-ए-फरहबरूश'' के लेखक थे, जिनकी मेहर- 
बानी से हमें ये घटनाएं मालूम हुई हैं, खुद उस ज़माने में मौजद थे और 
उन्होंने जो कुछ लिखा है अभ्रपने ग्नुभव के आधार पर लिखा है । वे कहते हैं 
कि मैं जब पहले-पहल घर छोड़ कर फ़ैजाबाद में गया हूं मुम्ताजनगर ही तक 
पहुंचा था, जो शहर के पश्चिमी फाटक से चार मील की दूरी पर है, मैंने 
देखा कि एक पेड़ के नीचे भांति-भांति की मिठाइयां, गरमागरम खाना, कबाब- 
सालन, रोटियां और पराठे वग्रेरा पक रहे हैं। सबीलें रखी हुई हैं, नान 
खत्ताइयां, तरह-तरह के शबंत और फ़ालूदा भी बिक रहा है और सैकड़ों प्रादमी 
खरीददारी के लिए उन दुकानों पर गिरे पड़ते हैं। मुझे खयाल गृज़रा कि. मैं 
शहर के अंदर दाखिल हो गया और खास चौक में हूं। मगर हैरान था कि 
भ्रभी तक शहर का फाटक तो आ्राया ही नहीं, मैं भ्रंदर कैसे पहुंच गया ? 
लोगों से पूछा तो एक राहगीर ने कहा, “जनाब, शहर का फाटक यहां से चार 
मील है, आप किस खयाल में हैं ? ” 

इस जवाब पर हैरान होता हुआ शहर में दाखिल हुआ तो ग्रजब चहल- 
पहल नजर प्रायी । रंगीनियां थीं और दिलच््पियां, जिधर देखता हूं नाच हो 
रहा है | मदारी तमाशा कर रहे हैं और लोग तरह-तरह के सेर-तमाशों में 
व्यस्त हैं। मैं यह रोनक और शोर हंगामा देखकर दंग रह गया । सुबह से 
शाम तक और शाम से सुबह तक कोई वक्त न होता जब फ़ौजों और पलटनों 
के नक्कारों की झ्रावाज न सुनी जाती हो । पहरों और घड़ियों के बताने के लिए' 
बारबार नोबत बजती झौर घड़ियों पर मूगरियां पड़तीं जिनके शोर-गुल से 
कान उड़े जाते । सड़कों पर देखिए तो हर दम घोड़ों, हाथियों, ऊंटों, खंच्चरों, 
शिकारी क॒त्तों, गाय-भंसों, बलों, छकड़ों और त्तोपों के गुजरने का सिलसिला 
जारी रहता जिनकी गिनती हिसाब श्रौर प्रंदाज़ो से बाहर थी, रास्ता चलना 
दुश्वार था । 


गुजिश्ता लखनऊ 9 


एक अ्रजीब रोनक़ और दबदबे का शहर नज़र आझाया जिसमें दिल्ली के 
वज़ादार लोगों में से खुश पोशाक शरीफ़ज़ादे, यूनानी हकीम, ऊंचे दर्जे के मर्द 
और झौरत, बंइ्याएं, हर शहर श्रौर हर जगह के मशहूर और दक्ष गायक 
सरकार में मुलाजिम थे और बड़ी-बड़ी तनख्वाहें पाकर ऐश-इशरत की जिंदगी 
बसर करते । छोटे-बड़े सबकी जेबे रुपयों और अशरफियों से भरी हुई थीं श्रौर 
ऐसा नज़र आता था जैसे यहां कभी किसी ने ग़रीबी और मोहताजी को ख्वाब 
में भी नहीं देखा है। नवाब वजीर (शुजाउद्दौला बहादुर) शहर की सरसब्जी, 
रौनक और रिआ्राया की उन्‍नति में पूरी तरह व्यस्त हैं और मालम होता था 
कि चंद ही रोज में फ़जाबाद दिल्‍ली से होड करने का दावा करेगा । 

चूंकि किसी राज्य और किसी शहर का रईस इस शान शौकत से नहीं 
रहता था जिस तरह कि नवाब शुजाउद्दोला रहते थे और इसके साथ ही यह 
नजर झ्आराता था कि कहीं के लोग इस बेजिंगरी से हर काम में और हर मौक़े 
पर घन खर्च करने को नहीं तंयार हो: जाते थे इसलिए हर किस्म के और 
हर जगह के बड़े-बड़े दस्तकारों, कारीगरों और विद्यार्थियों ने ग्रपने-अपने प्रांत 
छोड़ कर फ़ेज़ाबाद को ही अपना घर बना लिया और यहां हर ज़ामाने में 
ढाका, बंगाल, गुजरात, मालवा, हैदराबाद, शाहजहानाबाद, लाहौर, पेशाव (, 
काबुल, कश्मीर और मुल्तान के विद्याथियों का एक बड़ा भारी गिरोह मौर द 
रहता जो विद्वानों की पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करते और उस ज्ञान-स्रोत से 
जो फ़ज़ाबाद में जारी था पूरी तरह तृप्त होकर अपने घरों को वापस जार । 
काश नवाब वजीर और दस बारह बरस जी जाते तो घोंघरा के किनारे एक 
नया शाहजहानाबाद आबाद हो जाता और दुनिया एक नई जिंदा दिल्ली 
की सूरत देख लेती ! 

यह नवाब शुजाउदोला के सिर्फ नो साल के निवास का नतीजा था जिसने 
फंजाबाद को ऐसा बना दिया, ओर इन नौ साल में भी सिर्फ बरसात के चार 
महीने वे शहर में विराजमान रहते, बाक़ी जमाना अपने राज्य के दोरे और 
सेर व शिकार में बोतता था। शुजाउद्दोला को स्वभाव से ही सुंदर स्त्रियों 
और नृत्य-गान से लगाव था जिसकी वजह से बाज़ारी औरतों और नाचने 
वाली वेश्याओ्रों की प्रसिद्धि इतनी घढ़ गयी कि कोई गली-क्चा उनसे खाली न 
था और नवाब के इनाम वेग़रा से वे इतनी खुशहाल झऔर धनवान थीं कि 
ग्रक्सर रंडियों के डरे लगे रहते थे जिनके साथ दो-दो, तीन-तीन श्रालीशान 


0 गुजिएता लखनऊ 


तंबू रहा करते श्रौर नवाब साहब जिलों का दौरा करते और सफर में होते तो 
नवाबी खेमों के साथ-साथ-उनके खेमे भी शाही शान-शौकत से छकड़ों पर 
लद॒-लद कर रवाना होते और उनके गिर्दे दस-दस, बाहर-बारह तेलंगों का 
पहरा रहता और जब दासक का यह ढंग था तो तमाम ग्रमीरों श्ौर सरदारों 
ने भी बंभिकक यही तरीका अपना लिया और सफ़र में सबके साथ रंडियां 
रहने लगीं । हालांकि इससे ग्रनेतिकता और बेशर्मी बढ़ गयी लेकिन इसमें शक 
नहीं कि उन वेद्याओं की बहुतायत और पमीरों की शौकीनी से शहर की 
रौनक बहुत अधिक बढ़ गयी थी और फैज़ाबाद दुलहन बन गया था । 

सन्‌ 773 इं० में शुजाउद्दोला ने पश्चिम को प्रस्थान किया । इस यात्रा 
में शाही कंप की रौनक़ और चहल-पहल का वर्णन नहीं किया जा सकता । 
मालूम होता था कि नवाबी भंडे के साथ-साथ एक बड़ा भारी शहर सफर 
कर रहा है । लखनऊ होते हुए इटावा पहुंचे जिस पर मराठों का कब्जा था । 
एक ही हमले में उसे उनसे छीनकर अपने क़ब्जे में किया और एहमद खां 
बंगश के राज्य में दाखिल होकर कौडियागंज और कासगंज में डेरे डाले । 
यहां से उन्होंने बरेली के शासक हाफ़िज़ रहमत खां को लिखा । 

“पिछले साल मैंने एक करोड़ रुपये महादजी सिंधिया मराठे को भेजे थे 
जिसने आप का वह तमाम इलाक़ा जो दो अरब के दरम्यान है आपसे छोन 
लिया था । वह रक़म अदा करके मैंने आपका वह इलक़ा उसके कब्जे से 
छूड़ाया और श्रापके हवाले कर दिया | लिहाजा अब पचास लाख की रक़म 
जो आपकी तरफ से भैंने अदा की थी फौरन अदा कीजिए । 

हाफ़िज रहमत खां ने ग्रपने तमाम अफ़गान सरदारों और भाई-बंदों को 
जमा करके कहा : 

“शुजाउद्दौला लड़ाई के लिए कोई बहाना ढूंढ़ रहे हैं । मुनासिब यह है कि 
उन्होंने जो रक़म मांगी -है वह अदा कर दी जाए। बीस लाख मैं अपने पास से 
देता हुं और बाक़ी तीस लाख तुम जमा कर दो |” 

अदूरदर्शी पठान सरदारों ने जवाब दिया, “शुजाउद्दोला के आदमी देखने 
ही के हैं वे भला हमसे क्‍या मुक़ांबिला करेंगे ? बाक़ी रही श्रंग्रेज फौज जो 
उनके साथ है, तो उनकी तोपों पर जिस वक्‍त हम तलवारें सूत-सूतकर जा 
पड़ेंगे सबके हवास जाते रहेंगे । देने-लेने की कुछ ज़रूरत नहीं । 

हाफ़िज़ रहमत खां ने यह सुनकर कहा, “तुम्हें इस्तियार है। मगर मैं 


गुज़िहता लखनऊ ] 


प्रभी से कहे रखता हूं कि अ्रगर लड़ाई का रंग बदला तो मैं मंदान से जिंदा 
न आऊंगा और इसका जो कुछ अंजाम होगा वह तुम्हीं को भुगतना पड़ेगा ।” 

कहना न होगा कि शुजाउहौला को अपनी इच्छा के अनुसार जवाब न 
मिला, वे फ़ौज लेकर चढ़ गये । लड़ाई हुई और लड़ाई का अंजाम वही हुआा 
जिसे तक़दीर ने हाफ़िज्ञ रहमत खां की जुबान से पहले ही सुनवा दिया था । 
हाफ़िज़ रहमत खां शहीद हुए और उनकी हुकूमत का खात्मा हो गया | मगर 
जीत शुजाउद्दीला को भी रासन झ्राई। 3 सफरा 88 हिजरी (774 
ई०) को लड़ाई हुई थी ]! शावान* को शुजाउदहौला बरेली से कूच करके 
लखनऊ झ्ाये । माह रमजान” लखनऊ में बसर किया, 8 शब्वाल! को लख- 
नऊ से क्च करके 4 को फ़ंज़ाबाद में दाखिल हुए और जीत को 9 महीने 
0 दिन ही हुए थे और घर में पूरे डेढ़ महीने भी श्राराम करने का मौक़ा 
नहीं मिला था कि 23 जीक़ाद” ]88 हि. (774 ई०) को स्वगंवासी 
हुए । और अफ़सोस उनकी मौत ही के साथ फ़ंज़ाबाद की तरक्की का दौर भी 
खत्म हो गया। 

उस वक्‍त अवध की हकमत में सबसे बड़ा असर नवाब शुजाउदहोला बहा- 
दुर की बीवी बह बेगम साहिबा का था जो बहुत ही घतवान भी समभी जाती 
थी । उनकी मंजूरी से नवाब ग्रासफ़ठद्दोला राजगद्दी पर बंठे । मगर उनकी 
नेतिक अवस्था बहुत ही बुरी थी और यह देखकर उनके मुसाहिबों ने यह 
उचित समभ कि मां बेटे को अलग रखें । कुछ दिन तक सेर व शिकार में 
व्यस्त रहने के बाद नवाब ग्रासफउद्दोला बहादुर लखनऊ में रहने लगे और 
यहीं बंठ-बेठ मां को सताया करते और बार-बार उनसे रुपये मांगते थ । 

बह बेगम साहिबा के मौजूद रहने से फैज़ाबाद को उनकी जिंदगी तक 
थोड़ी-बहुत रोनक़ हासिल रही । हालांकि उनकी जिंदगी में भी नवाब आसफ़- 
उद्दोला की नालायक्रियों ने बेगम साहबा के संतोष में और उसी कारण फ़ंज़ा- 
बाद की शांति और व्यवस्था में बाधा डाली लेकिन उस आदरणीय महिला की 
जिंदगी तक वे भगड़े और हंगामे भी एक तरह से वहां की रोनक़ को बढ़ाया 
ही करते थे । उनके निधन के साथ ही फ़ैजाबाद का इतिहास समाप्त हो गया 
ग्रोर लखनऊ का दौर शुरू हुआ जिसका हाल हम आगे लिखेंगे । 

।.०इस्लामी महीनों के नाम (सफ़र-दूसरा महीना; शाबान-आराठवां महीना; 
रमज्ञान-नवां महीना; शबव्बाल-दसवां महीना ; जीक़ाद-ग्यारहंवां मद्दीना ) 


[2] 


ठीक किसी को नहीं मालूम कि लखनऊ की आबादी की बुनियाद कब पड़ी ? 
इसका संस्थापक कौन था ? और इसका यह नाम क्‍यों पड़ा ? लेकिन विभिन्‍न 
परिवारों की राष्ट्रीय परंपराओं और ग्रनुमान से काम लेकर जो कुछ बताया 
जा सकता है यह है : 

कहते हैं कि राजा रामचंद्रजी लंका को जीतकर और अपने बनवास का 
समय पूरा करके जब राजसिहासन पर बंठ तो यह प्रदेश उन्होंने जागीर के 
रूप में वन में अपने साथी और हमदरदद भाई लक्ष्मण को दे दिया । चुनांचे उन्हीं 
के निवास या ग्रागमन से यहां नदी के किनारे एक ऊंचे टेकरे पर एक बस्ती 
ग्राबाद हो गयी जिसका नाम उस समय से लक्ष्मणपुर रखा गया श्रौर वह टीला 
लक्ष्मण टीला' मशहूर हुग्ना । इस टीले में एक बहुत ही गहरी गुफा या कुग्नां 
था जिसकी किसी को थाह न मिलती थी झौर लोगों में मशहूर था कि वह 
शेषनाग तक चला गया है । इस विचार से लोगों में आस्था के भाव जागे और 
हिंदू लोग भक्ति-भाव से उसमें फूल-पानी डालने लगे । 

यह भी कहा जाता है कि महाराजा युधिष्ठिर के पोते राजा जन्मेजय ने 
यह इलाक़ा तर्पास्वयों और ऋषियों-मुनियों को जागीर में दे दिया था जिन्होंने 
यहां चप्पे-चप्पे पर अपने आश्रम बनाये और भगवान के ध्यान में लीन हो गये । 
एक मुहत के बाद उनको कमजोर देखकर दो नयी जातियों ने हिमालय को 
तराई से झाकर इस प्रदेश पर अधिकार कर लिया । ये जातियां आपस में 
मिलती-जुलती श्रौर एक ही नस्ल की दो श्ाखाएं मालूम होती थीं : एक “भर' 
भर दूसरी 'पांसी । 

इन्हीं लोगों से संबद सालार मसूद गाज़ी का 030 ई० में मुक़्ाबिला 
हुआ और शायद उन्हीं पर बख्तियार खिलजी ने [202 ई० में चढ़ाई की थी। 
लिहाजा इस प्रदेश में जो मुसलमान परिवार पहले-पहल आकर आबाद हुए 
वे इन्हीं दोनों हमलावरों खासकर सैयद सालार मसूद गाजी के साथ आनेवालों 
में से थे । 

भर झोर पांसियों के अलावा ब्राह्मण और कायस्थ भी यहां पहले से मौजूद 


गुजिदता लखनऊ 83 


थे | इन सब लोगों ने मिलकर यहां एक छोटा-सा शहर बसा लिया और अमन- 
चैन से रहने लगे। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि इस बस्ती का नाम 
'लक्ष्मणपुर' से बदलकर 'लखनऊ' कब हो गया । इस आखिरी नाम का पता 
सम्राट ग्रकबर से पहले नहीं चलता, लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता 
कि हिंदू-मुसलमानों की काफ़ी श्राबादी पहले से मौजूद थी जिसका सबूत उस 
घटना से मिल सकता है जो लखनऊ के शेखों की पारिवारिक परंपराशओंं में 
बहुत पहले से मोजूद है श्रोर वह यह कि सन 540 ई० में जब बादशाह 
हमायं को शेरशाह के हाथों जौनपुर में हार हुई तो वह मंदान छोड़कर सुल्तान- 
पुर, लखनऊ, पीलीभीत होता हुआ भागा था। लखनऊ में उसने सिर्फ चार 
घंटे दम लिया था प्रौर यद्यपि वह पराजित होकर आया था और उसके पास 
कोई सत्ता या शक्ति नहीं थी मगर लखनऊ के लोगों ने केवल इसानी हमदर्दी 
ग्रौर अतिथि-परायणता के विचार से उन चंद घंटों ही में दस हज़ार रुपये और 
पचास घोड़े उसको भेंट दिये थे | इतने थोड़े जमाने में उस सामान के जुट जाने 
से श्रनुमान क्या जा सकता है कि उन दिनों यहां काफो आबादी मौजूद थी 
झऔर उन दिनों का लखनऊ श्राजकल के ज्यादातर क़स्बों से ज़्यादा बारौनक 
श्रौर ख़्शहाल था । 

इसी पुराने जमाने के श्रानेवालों में शाह मीना का परिवार भी है जिनका 
मज़ार आजतक सर्वंसाघारण का शरणस्थल है । ग्रौर शायद इसी समय के 
ग्रानेवालों मे शाह पीर मुहम्मद भी थे जिन्होंने खास लक्ष्मण टीले पर निवास 
किया और वही उसका देहांत भी हुआ । उन्हीं के वहां रहने के कारण वह 
पुराना टेकरा लक्ष्मण टीले से शाह पीर मुहम्मद का टीला' हो गया और 
समय बीतने के साथ वह गहरी गुफा भी पट गयी । उस पर बाद के जमाने में 
शहंनशाह श्रौरंगजेब ने जो खुद वहां आया था एक बढ़िया, मज़बूत, खूबसूरत 
ग्रौर शानदार मस्जिद बनाकर खडी कर दी । 

सन 590 ई० में सम्राट अकबर ने जब सारे हिंदुस्तान को बारह प्रांतों 
में बांटा तो अ्रवध प्रांत के सूबेदार या शासक की राजघानी पहले-पहल लखनऊ 
ही करार पायी थी ।.उन दिनों संयोग से ज़िला बिजनौर के शेख अब्दुरंहीम 
नामक एक गरोब और परेशानहाल बुजुर्ग रोजगार की तलाश में दिल्‍ली पहुंचे । 
वहां दरबार के अमीरों से संपर्क स्थापित करके सम्राट के दरबार में पहुंचे । 
आखिरकार उन्हें शाही मंसबदारों में हामिल कर लिया गया और उन्हें लखनऊ 


4 गुजिदता लखनऊ 


में जागीर भी मिल गयी । कुछ दिन बाद वे बड़ी शान-शोकत श्रौर घृमधाम के 
साथ अपनी जागीर में भ्रा गये श्रोर वहीं रहने लगे । यहां खास लक्ष्मण टीले 
यां शाह पीर मुहम्द के टीले को ध्रपना निवास स्थान बनाकर उन्होंने अपना: 
पंच मुहल्ला बनवाया, शेखन दरवाज़ा बनवाया और लखनऊ में ही दफ्न हुए । 
उनका मक़बिरा 'तनादान महल' के नाम से भ्राज तक मशहूर है जिसकी इमारत 
को भ्रभी चंद रोज़ हुए गवनेंमेंट श्राफ़ इंडिया ने पसंद करके ग्रपने संरक्षण में 
ले लिया है । 

इसी ज़माने में यहां शेख अब्दुरंहीम ने लक्ष्मण टीले के पास एक दूसरी 
बुलंदी पर एक छोटा किला बनावया जो ग्रासपास की गढ़ियों में से ज़्यादा 
मज़बूत था और वहां के लोगों पर उसका बड़ा अग्रसर पड़ता था या तो इस- 
लिए कि शेख अब्दुरंहीम को शाही दरबार से 'इल्मे-माही मरातिब' (मत्स्य 
ज्ञान विशारद) की उपाधि प्राप्त हुई थी या इसलिए कि इस क़िले के एक 
मकान में छब्बीस मेहराबें थीं और .हर मेहराब पर शिल्पी ने दो-दो मछलियां 
बनाकर बावन मछलियां बना दी थीं। इस क़िले का नाम “'मच्छी भवन' मश- 
हर हो गया । 'भवन' शब्द या तो क़िले के श्रथ में प्रयुक्त हुआ है या 'बावन' 
से बिगड़ कर बन गया है। जिस शिल्पी ने इस क़िले को बनाया वह लखना 
नामक एक ग्रहौर था और कहते हैं कि उसी के नाम से शहर का नाम लखनऊ 
हो गया। कुछ लोगों का रुयाल है कि लक्ष्मणपुर ही बिगड़कर लखनऊ बन 
गया है । इनमें से जो बात हो मगर इस श्राबादी ने यह नाम शेख भ्रब्दुरही म के 
ग्राने के बाद पाया । 

चंद रोज़ बाद अब्दुरंहीम के खानदानवालों यानी शेखज़ादों के श्रलावा 
यहां पठानों का एक गिरोह श्रा गया जो दक्षिण की ओर आ बसा भ्रौर वे 
पठान राभनगर के पठान मशहूर हुए | उन्होंने श्रपनी जमींदारी की हद उस 
जगह तक क़रार दी थी जहां अ्रव “गोल दरवाजा' स्थित है | क्योंकि वहां से 
नदी की तरफ बढ़िए तो शेखज़ादों की ज़मीन शुरू होती थी । इन पठानों के 
बाद शेखों का एक नया गिरोह आकर पूरब की तरफ बस गया जो 'शुयूख- 
नबहरा कहलाते हैं। उन लोगों की ज़मीन वहां पर थी जहां अब रेजिडेसी के 
खंडहर पड़ हैं । 

इन तीनों गिरोहों का अपने-पपने इलाक़ों पर क़ब्ज। था और वे श्रपने- 
झपने हल्कों के शासक थे लेकिन शेखज़ादों का असर सब पर हावी था भौर 


गुजिब्ता लखमऊ 5 


शासपास के लोगों पर उनका दबाव पड़ता था जिसका कारण यह था कि इन 
लोगों का दिल्‍ली के दरबार से संबंध थ।, उनमें से कई व्यक्ति पूरे भ्रवध प्रांत 
के दुबेदार मुक़रंर हो गये थे। भौर उनके क़िले मच्छी भवन की मज़बूती की 
इतनी शोहरत थी कि जमता की ज़बान पर था, जिसका मच्छी भवन उसका 
लखनऊ' । 

भ्रकवर ही के ज़मामे में लखनऊ तरकक्री करने लगा था श्रोर उसकी 
प्रावादी बढ़ती शौर फंलती जाती थी । यह सही है कि भ्रवघ के सूबेदार उन्हीं 
झँखजादों में चुने गये लेकिन पभ्राम रिवाज्ञ यह था कि इस काम पर दिल्‍ली के 
प्रतिष्ठित व्यक्ति ही नियुक्त होते जो सालों-साल श्रपने घर बेठे रहते । सिर्फ 
मालगुज़ारी भ्ादि की वसूली के ज़माने में एक दौरा-सा करते और उनके 
सहायक यहां रहा करते। लिहाज़ा उनसे शहर की तरकक्‍क़ी की कोई उम्मीद न 
की जा सकती थी । हां, यहां के दो-एक झेखज़ादे जो सूबेदार मुक़रर हो गये 
तो उनकी नियुक्ति से अलबत्ता लखनऊ को फ़ायदा पहुंचा । 

लेकिन मालूम होता है कि प्रकबर का लखनऊ की तरफ़ खास ध्यान था । 
युनांचे उसने वहां के ब्राह्मणों को वाजपेय यज्ञ के लिए एक लाख रुपये दिये 
थे ग्रोर उसी वक्त से लखनऊ के वाजपेयी ब्राह्मण मशहूर हुए । इसी से पता 
चलता है कि प्राचीनत्तम हिंदू मुहल्ले जो भ्रकबर के समय में मौजूद थे वे वाज- 
पैयी टोला, कटारी टोला, सोंधी टोला, बाजारी टोला और ग्रहीरी टोला हैं 
झौर ये सब चौक ही के प्रासपास हैं । 

मिर्जा सलीम ने जो तरुत पर बैठकर न्रउद्दीन जहांगीर के नाम से मशहूर 
हुए, बाप की जिंदगी शौर प्रपने युवराजत्व काल में मिर्जा मंडी की बुनियाद 
डाली जो मच्छी भवन से परद्चिम की ओर स्थित है | ग्रकबर के समय में यहां 
के सूबेदार जवाहर खां थे । वह तो दिल्‍ली में रहते मगर उनके नायब क्राज़ी 
महमूद बिलग्रामी ने चोक के दक्षिण में उससे मिले हुए दाहिनी तरफ़ महमूद 
नगर श्र वायीं तरफ़ शाहगंज प्राबाद किये और उनके भर चोक के दरम्यान 
में बादशाह के नाम से भ्रकबरी दरवाज़ा बनवाया। 

प्रकबर के शासन-काल में जबकि ये इमारतें बच रही थीं और ये मृहल्ले 
भ्राबाद हो रहे थे लखनऊ एक अच्छी मंडी बन गया था और तरकक्‍क़ी के इस 
दर्जे को पहुंचा हुआ था कि एक फ्रांसीसी व्यापारी ने, जो घोड़ों का व्यापार 
करता था, यहां रहकर मुनाफ़ा कमाने की कोशिश की और शाही दरबार से 


॥6 गुणजिक्ता लखनऊ 


लखनऊ में रहने की सनदे मुस्तामिनी' हासिल करके यहां अपना भ्रस्तवल कायम 
किया और पहले ही साल में इतना फ़ला-फूला कि चौक के पास बार झालीक्षान 
मकान बनवा लिये । साल खत्म होने पर जब उसने मुस्तामिनी के परबाने का 
नवीकरण कराना चाहा तो उसे ज़्यादा रहने की इजाज्ञत न मिली | इस पर 
भी उसने जबरदस्ती ठहरने का इरादा किया तो शहंशाह के हुक्म के भ्रनुसार 
झहर के ब्रधिकारियों ने उसके मकान ज़ब्त करके सरकार के सुपुर्द कर दिये 
झौर उसे वहां से निकाल दिया । वे चारों मकान मुहृत तक सरकार के कब्खजे 
में रहे यहां तक कि शहंशाह औरंगज्ञेब झ्नालमगीर के शासन-काल में जब 
मुलला निज़ामउद्दीन सिहालवी ने अपने क़स्बे के उपद्रवों से तंग श्राकर लखनऊ 
में जा बसने का निउ्चय किया तो सरकार की ओर से उपहारस्वरूप वे चारों 
मकान उन्हें दे दिये मये और उन्होंने अपने पूरे परिवार के साथ श्राकर उन 
मकानों में निवास किया जो अपने इदं-गिदं के बहुत से मकानों के साथ ब्राज 
तक 'फ़िरंगी महल' कहलाते हैं। मुल्ला साहब के शुभागमन का यह सुखद 
परिणाम निकला कि लखनऊ ज्ञान-विज्ञान का केंद्र और विद्यार्थियों का 
शरणस्थल बन गया और इस ज्ञानपीठ की ऐसी प्रगति हुई कि मुल्ला निज्ञाम- 
उद्दीन का तेयार किया हुग्ना पाठ्यक्रम, जो 'सिलसिला-ए-निजामिया' कहलाता 
है, एक मुद्दत से हिंदुस्तान ही का नहीं सारे एशिया का पाठ्यक्रम है और इसमें 
ज्ञान-संबंधी विशेषताओं के साथ कुछ बरकतें भी शामिल समभी जाती हैं ग्लौर 
इससे बड़ी श्रासानी से यह अंदाज़ा किया जा सकता है कि उस ज़माने में कहां- 
कहां और कितनी-कितनी दूर के विद्यार्थी लखनऊ में जमा रहते होंगे । 
योरुपीय पर्यटक लेकेट जो 63] ई० यानी शाहजहां बादशाह के शासन- 
काल के आरंभ में हिंदुस्तान की सर कर रहा था, लखनऊ के बारे में लिखता 
है, यह शानदार मंडी है । शाहजहां के समय यहां के सूबेदार सुल्तान अली 
शाह कुली खां थे। उनके दो बेटे थे मिर्जा फ़ाज़िल और मिर्जा मंसूर । इन्हीं 
/मुस्तामिन का अर्थ है शांति चाहनेवाला। यूरोपवालों को चूंकि 
मुसलमानों और हिंदुओं में श्रपने लिए खतरा नज़र ग्राया करता था इसलिए 
जहां ठहरना चाहते वहां के लिए दिलली-दरबार से मुस्तामिनी को सनद हासिल 
कर लिया करते थे ताकि अधिकारी और जनता उन्हें न सताएं। इस सनद 
से चुंकि सलतनत पर जिम्मेदारियां आ जाती है इसलिए एक साल से ज़्यादा 
की सनद कम ही दी जाती थी । 


गुजिश्ता लखनऊ 7 


दोनों के नाम से उन्होंने महमूदनगर से दक्षिण की तरफ़ आगे बढ़कर दो नये 
कस्बे फाज़िलनगर और मंसूरनगर श्राबाद किये । 

उस ज़माने में यहां श्रश रफ़ अली खां नामक एक रिसालदार थे। उन्होंने इसी 
सिलसिले में श्रशरफ़ाबाद बसाया और उनके भाई मृशरंफ़ अली खां ने नाले के 
दूसरी तरफ श्रपना घर बनाकर मुशरंफ़ाबाद नामक एक और मुहल्ला क़ायम 
किया जिसका नाम घिस-घिसकर अब नौबस्ता हो गया है। उन्हीं दिनों 
पोर खां नामक एक और फ़ौजी अ्रफसर थे जिम्होंने इन सब मुहल्लों से पश्चिम 
की ग्रोर दूर जाकर अ्रपनी गढ़ी बनाई जो जगह श्राज तक पीर खां की गढ़ी' 
कहलाती है । 

शहंशाह श्रौरंगजेब आलमगीर ने किसी जरूरत से अयोध्या की यात्रा की 
थी | वापसी पर लखनऊ में ठहरता हुम्ना दिल्‍ली गया । इस मौके पर उसने 
शाह पीर मुहम्मद के टीलेवाली मस्जिद बनवाई जो खास लक्ष्मण टीले पर 
टोने की वजह से इतनी ऊंचाई पर स्थित है जिससे ज़्यादा मुनासिब जगह 
मस्जिद के लिए लखनऊ में नहीं हो सकती और शायद इसी मौक़ पर उसने 
फ़िरंगी महल के मकान तत्कालीन विद्वान मुल्ला निजामउद्दीन को उपहार के 
रूप में दे दिये होंगे । 

मुहम्मद शाह रंगीले के ज़माने में लखनऊ का सूबेदार गिरधा नांगा नामक 
एक बहादुर हिंदू रिसालदार था। उसका चचा छबीले राम दिल्‍ली की तरफ 
से इलाहाबाद का शासक नियुक्त हुआ था | छबीले राम के मरने पर गिरधा 
नांगा ने विद्रोह कर दिया और यह इरादा किया कि चचा की जगह जबरदस्ती 
इलाहाबाद का शासक वन जाये | मगर फिर खुद ही कुछ सोचकर उसने 
प्रपनी वफ़ादारी और ग्राज्ञाकारिता प्रकट की श्रौर दरबार से उसे ग्रवध की 
सूबेदारी का खिलग्नत! दिया गया । वह यहीं रहने लगा और उसकी 
बीवी ने जो रानी कहलाती थी रानी कटरा ग्राबाद किया । 

मगर यहां का हाकिम और सूबेदार चाहे कोई हो शेखज़ादों का ऐसा 
जोर था कि किसी शासक को चाहे कंसा ही जबरदस्त हो और सरकार की 
और से चाहे कैसी ही सनद लेकर झ्ाया हो यह साहस न हो सकता था कि 
उनके हलक में क़दरम रखे । मच्छी भवन को हालांकि अमीरों के महल की 
टैसियत हासिल थी लेकिन शेखज़ादों ने उसे भ्रपनी मौरूसी जायदाद बना लिया 
.. बादशाह की श्रीर से सम्मानाथ्थ दिये गये वस्त्र । 


8 गुजिदता लखनऊ 


ब्या और दिल्‍ली से जो भी भ्रधिकारी श्राता उसके पास फटकने न पाता । 
उन्होंने मच्छी भवन के पास दो और इमारतें बना ली थीं जिनमें से एक का 
नाम मुबारक महल' था और दूसरी का नाम पंच महला' था । पंच महले के 
बारे में कोई कहता है कि पांच मंजिला इमारत थी और कोई कहता है कि 
एक दूसरे के पास पांच महल बने हुए थे श्र उनके दक्षिण में एक बड़ा 
मेहराबदार फाटक था जो 'शेखन दरवाज़ा' कहलाता था । शहर से जो लोग 
शेखजादों की इन इमारतों में जाना चाहते उसी फाटक में से होकर गुजरते थे । 

इस फाटक के मेहराब में बांके शेख़ज़ादों ने एक नंगी तलवार लटका रखी 
थी और हम था कि जो कोई यहां झ्राना चाहे कोई हो और कितना ही बड़ा 
शख्श हो फ्ले उस तलवार को भरुककर सलाम करे, फिर आगे क़दम बढ़ाए । 
किसी की मजाल थो कि इस हुक्म की तामील में संकोच करे ? यहां तक कि 
जो शासक दिल्‍ली से नियुक्त होकर आते थे और शेखों से मिलने जाते तो उन्हें 
भी जबरदस्ती उस तलवार के श्रागे ज़रूर सिर भुका देना पड़ता था । 

लखनऊ की यह हालत थी कि 732 ई० में नवाब सम्मादत खां बुरहान- 
उल-मुल्क दिल्‍ली दरबार से ग्रव० के सूबेदार नियुक्त होकर गआ्राये जिनसे 
हिंदुस्तान के इस आराख़िरी पूर्वी दरबार की बुनियाद पड़ी जिसके उत्तकर्ष को 
हम पूर्वी संस्कृति का श्रंतिम नमूना मानकर चलना चाहते हैं। पहले हमने 
फ़ैजाबाद का वर्णन किया जो इसी संस्कृति का पहला चिह्न और इसी पूर्वी 
लखनवी दरबार का एक परिशिष्ट था। इस श्रंक में इस दरबार के कायम 
होने से पहले के लखनऊ का चित्रण किया और आगे कुछ अंकों में हम उस 
नेशापुरी परिवार के शासन का इतिहास प्रस्तुत करेंगे और उसके बाद दिखा- 
येंगे कि वह संस्कृति क्या और कसी थी । 


[3] 


नवाब बुरहान-उल-मुल्क छह बरस हो अवध और लखनऊ में रहने पाये थे *क 
735 ई० में नादिरशाह ने हिंदुस्तान पर हमला कर दिया और वे बड़े 
आ्राग्रह के धाथ दिल्‍ली बुलाये गये । उस उपद्रवकारी युग में जो घटनाएं घटीं 
उनका लखनऊ से कोई संबंध नहीं । लखनऊ में ग्रपता सहायक और प्रति- 


गुजिइता लखनऊ 9 


निधि बनाकर वे अपने भानजे ग्रौर दामाद सफदरजंग को छोड गये थे । 
नादिर दिल्‍ली को लूट चुका था और क़त्ले ग्राम करा चुका था मगर ग्रभी 
वहीं था कि नवाब बुरहान-उल-मुल्क का दिल्‍ली में निधन हो गया । उनके 
भतीजे शेरजंग ने नादिरशाह से सिफ़ारिश उठवाई कि नवाब के बाद अवध 
की सूबेदारी उन्हें दी जाये लेकिन राजा लक्ष्मी नारायण ने जो बुरहान-उल- 
मुल्क के विश्वासपात्र ग्रोहदेदारों में था, नादिर की सेवा में इस आशय का एक 
प्रार्थनापत्र भेजा कि, "नवाब बुरहान-उल-मुल्क शेरजंग से खुश न थे और इसी- 
लिए उन्होंने अपनी बेटी उनको छोड़कर सफदरजंग को दी । वे उनका प्रति- 
निधित्व करते थे. और इस वक्‍त भी उनकी तरफ से वहां मौजूद हैं। बुरहान- 
उल-मुल्क के मालग्रपतबाब की मालिक सरकार है जिसे चाहे दे, इसलिए कि 
यह कोई विरसा नहीं है। यह भी निवेदन है कि सफ़दरजंग गंभीर स्वभाव, 
ईदवरभकत, योग्य और वायदे के सच्चे हैं और फ़ौज उनसे खुश है। इसके 
अलावा हुजूर के लिए बुरहान-उल-मुल्क ने दो करोड़ रुपये की रक़म का वायदा 
किया था उसके अदा करने का इंतिज्ञाम सफदजंग ने कर लिया है। जिस 
समय हुक्म हो हाजिर किये जायें। इन्हीं बातों के कारण श्राशा है कि हुजूर 
उन्हीं की सिफारिश करेंगे।' 

यह आवेदन देखते ही नादिरशाह ने सफ़दरजंग के लिए मुहम्मद शाह से 
खुद ही सूवेदार का ख़िलग्रत ले लिया और अपने एक मुसाहिब और सौ 
सवारों के साथ अवध में सफ़दरजंग के पास भेजे | यों सूबंदारी का खिलग्रत 
पहनकर सफ़दरजंग ने वह दो करोड़ का नजराना नादिर के पास भिजवा दिया 
ग्रौर अपने इलाक़ पर हुकमत करने लगे । 

सफ़दरजंग का पूरा नाम मिर्जा सक़ीम गअबुलमंसूर खां सफ़दरजंग था । 
गो इनमे बूरटान-उल-मुल्क की-सी सच्ची बहादुरी, सादगी, ईमानदारी और 
उद्यमशी लता न थी मगर वे बहुत ही दानवीर, साहसी, दयालु, प्रजा का ध्यान 
रखने वाले और अच्छे शासक थे । शहर से तीन मील की दूरी पर उन्होंने 
जलालाबाद का क़िला बनवाया और मच्छी भवन के अंदर पंच महल की जो 
पुरानी इमारत थी उसे भी शेखज़ादों से ले लिया और उसके एवज में दो गांवों 
में 700 एकड़ ज़मीन शेखजादों को रहने और बसने के लिए प्रदान की 
जिससे हालांकि शेखजादों पर जुल्म हुआ मगर लखनऊ की आबादी की तरक्की 
हुई और उसका विस्तार भी। मच्छी भवन को सफ़दरजंग ने दुबारा बनवाया 


20 गुजिइ्ता लखनऊ 


ग्रोर उसे बेहतर कर लिया ! 

लेकिन सफ़दरजंग पांच ही बरस अपने सूबे में रहने पाये थे कि दिल्ली से 
उनका बुलावा श्राया और राजा नवल राय को अपना प्रतिनिधि बनाकर लख- 
नऊ में छोड़कर वे दिल्‍ली चले गये । नवल राय विद्याप्रेमी, समय का पाबंद 
मेहनती, बहादुर और वहुत बडा घासक था। इसके साथ उसे खदा ने प्रपने 
मालिक का-सा उत्साह और दानशीलता भी दी थी । उसने इरादा किया कि 
मच्छी भवन के सामने नदी पर एक पुल वनवाए | पायों की वनियाद डालने 
के लिए गहरे कुएं खुदवाए लेकिन पाये बनना शुरू नहीं हुए थे कि अपने 
मालिक के बुलाने पर उसे एट्मद खां बंगश के मुक़ाबिल के लिए जाना पड़ा । 
इस अभियान में वह बड़ी जबरदस्त फ़ौज लेकर गया मगर मारा गया और 
पुल का काम जा छिड़ा था गअधृरा रह गया । 

एहमद खा बगश उस जप्राने का बड़ा पराक्रमी व्यक्ति था उसके मक़ा- 
बिले के लिए बुरहान-उल-मुल्क की ज़रूरत वी । सफ़दरजंग उसके प्रतिद्वन्द्दी 
न हा सकत थ। नताजा यह हुआ कि एह्मद खां की और उसके त्ाथ अफ- 
गानों की ताक़त बढ़ती गया । लफदरजंग ने लाख हाथ-पाँत + .हे लुद दिल्‍ली 
के शहंशाह को उसके मुक़ाबिल एर लाकर खड़ा कर दिया, मगर उसका कुछ 
बिगाड़ न सके और उसके इल्चारे से हाफ़िज़ सहमत खां ने अ्रवध के शहरों और 
कैसवा मे लूट-सार शुरू कर दा | खराबाद पर कब्जा कर लिया और खुद एह- 
मद खा बगठा का बटा महमूद खा फ्रोड लेकर चला कि लखनऊ पर कब्जा कर 
ले। 

[750 ई० में पठनों न मनीहाब।द में ग्रपना थाना क्रायम किया और 
!75] ई० में महमूद खां का कोई रिइतदार बीस हज़ार फ़ौज लेकर लखनऊ 
को तरफ चला । इडर के बाहर पड़ाव डाला और अपना एक कोतवाल मुक़- 
रर करके शहर मे भजा लाॉकन सफ़दरजग के आदम्यों से शहर खाली था । 
जो चंद थे भी पटानों के आने की खबर सुनकर भाग खड़े हुए औऔर पठानों के 
कातवाल न शहर मं झ्राकर अप्टाचार फंलाना शुरू कर विया । 

उन दिनों लखनऊ के शेखजादों में सबसे ज़्यादा प्रतिष्ठित और सम्मानित 
शेख मुइजउद्दीन थे। वे भ्रफगानों के सरदार से शहर के बाहर जाकर मिले । 
उसी वक्‍त किसी ने उससे जाकर दिवायत्त की कि शहरबवाले झापके कोतवाल 
का अपमान करते हैं थ्रोर कोई उसका हुइम नहीं मानता । शेख मुइजउद्दीन 


गुजिश्ता लखनऊ 2] 


बोले, 'क्या मजाल है कि काई ऐसी गुस्ताखी करे। मैं जाता हूं उपद्रवियों को 
दंड दूंगा । यह कह कर वापस आये श्ौर सारे भाई-बंदों को बुलाकर कहा, 
'पठानों की कथनी-करनी का एतबार नहीं । बेहतर यह है कि हम नवाब सफ़- 
दरजंग का साथ दें और मुक़ाबिला करके पठानों को यहां से निकाल दें ।! 
उसके बाद शेख मुदजउद्दीन ने घर का जेवर बेचकर फ़ौज जमा की श्रौर सारे 
शेखज़ादों को लेकर कोतवाल पर हमला किया । वह अपनी जान लेकर भागा 
और शेख साहव ने किसी मुगल को दरवारी लिबास पहनाकर अपने मकान 
में बिठा दिया और मनादी करादी कि सफ़दरजंग ने अपनी तरफ से इस मुगल 
को कोतवाल बनाकर भजा है उसके साथ ही अली के नाम का एक हरा भंडा 
खड़ा किया और लोग उसके नीचे ग्रा-आकर जमा होने लगे । 

यह ख़बर सुनकर पठानों ने हमला कर दिया। शेखज़ादों ने जान तोड़कर 
मुक़ाबिला किया और ग्रपनी पुरानी बहादुरी दिखा दी । पठान उस मुक़ाबिले 
. बत बर्दाइत न कर सके । पंद्रह हजार फ़ौज के साथ भागे और मौक़ा पाकर 
शेखज़ादों ने पठानों को सारे ग्रवध प्रांत से निकाल बाहर किया । 

दो साल बाद जब एहमद खां बंगश से सुलह हो गयी तो 753 ई० में 
नवाब सफ़दरजंग फिर लखनऊ आये और मेहदी घाट पर आकर ठहरे । एक 
खास मकान अपने रहने के लिए बनवाया और सजाया और फ़ौज के सुधार में 
व्यस्त हो गये लेकिन उसकी मोहलत न मिली। उसी साल सुल्तानपुर के 
क़रीब पापड़घाट में पड़ाव था कि उनका निधन हो गया। लाश पहले फ़ंज़ा- 
वाद को गुलाब बाड़ी में ले जाकर दफ्न की गयी, फिर थोड़े दिनों बाद हड्डियां 
दिल्‍ली में ले जाकर दफ्न की गयी जिन पर बहुत ही शानदार मककबिरा 
मोजूद है। संसार के पर्यटक उस झ्राज तक आदर की दृष्टि से देखते हैं। 


[4] 


सफ़दरजंग मंसूर अली खां के देहांत के बाद 753 ई० में उनके बेटे नवाब 
शुजाउद्दोला गद्दी नशीन हुए जिनके कुछ हालात इस लेख के पहले हिस्से 
में दिये जा चुके है। वे एक धीराद्धत, चंचल स्वभाव लेकिन साहसी शासक 
थे। लेकिन दुर्भाग्य से उनके शासन-काल म बड़े-बड़े उपद्रव और भगड़े 


22 गुजिश्ता लखनऊ 


फ़िसाद हुए | दुनिया की दो जबरदस्त ऐतिहासिक जातियों और शक्तियों के 
भाग्य का निर्णय उन्हीं की आंखों के सामने हुआ । पहले पानीपत की भयानक 
लड़ाई हुई जिसमें एहमद शाह दुर्रानी, शुजाउद्दौला और नजीबउद्दोला के साथ 
रुहेलखंड के पठानों की तमाम जबरदस्त फ़ौजें एक तरफ थीं और मराठों का 
टिह्ठी दल दूसरी तरफ। उसके बाद बक्सर में घमासान युद्ध हुम्मा जिसमें 
प्ंग्रेजों की बाक़ायदा फ़ोज एक तरफ थी और शुजाउद्दौला का भारी लद्दकर 
दूसरी तरफ। इस लड़ाई ने पानीपत की लड़ाई के चार साल बाद 763 इं» में 
चौबीस घंटे के अंदर इस बात का फंसला कर दिया कि हिंदुस्तान अब मुसल- 
मानों का नहीं अंग्रेजों का है । क्‍ 

इन लड़ाइयों से पहले शुजाउह्दौला हालांकि लखनऊ ही में रहे मगर 
बड़े-बड़े अभियानों, राजनीतिक व्यस्तताग्रों और सैनिक हथियारों से उन्हें 
इतनी मोहलत ही न मिली कि शहर की तरक्‍क़ी और सजावट की तरफ 
ध्यान दें। उन्होंने क़िलि बनवाए, गढ़ियां क्रायम कीं, फ़ोजी सामान और लड़ाई 
के हथियार जुटाए, इसकी फुसंत न मिली कि अपने घर को दुरुस्त और अपने 
शहर को सजाएं । बक्सर की लड़ाई के बाद जैसा कि हम कह चुके हैं वे फ़ैज़ा- 
बाद में जाकर बस गये इसलिए लखनऊ उनकी कृपा से वंचित रह गया । 
775 में उनकी मृत्यु हुई और नवाब ग्रासफ़ठद्दौला उनके उत्तराधिकारी बने । 

प्रासफउद्दौला ने राजसिहासन पर बैठते ही मां से नाराज होकर लखनऊ 
की राह ली और यही वह जमाना है जब से अवध के दरबार की शासन-शक्ति 
घटने और लखनऊ की बाहरी रोनक बढ़ने लगी | बक्सर का मैदान जीतने के 
बाद अंग्रेजों ने ग्रवध के दरबार में हस्तक्षेप के बहुत से अ्रधिकार प्राप्त कर 
लिये थे जिनके कारण यहां फ़ौजी तरक्क़ियों की रोक-टोक की जाती और 
हमेशा बड़ी ग़ौर से इस बात की निगरानी की जाती कि ग्रवध की हुकमत 
को फिर ऐसी ताक़त न मिल पाये कि उसकी फ़ौजें दुबारा अंग्रेज लश्कर के 
सामने खड़ी हो सकें। फिर भी शुजाउद्दौला जब तक फंज़ाबाद में जिंदा रहे 
सेना के सुधार में ही व्यस्त रहे और रात-दिन इसी बात की घुन थी कि जिस 
तरह बने अपनी शक्ति को बढ़ाएं। चुनांचे मुंशी फ़ैज़ बख्श अपने इतिहास 
तारीख-ए-फ़रहबस्श' में इस ज़माने का आंखों देखा हाल बयान करते हैं, 
जल्दी भरने और फायर करने की दृष्टि से शुजाउद्दौला की फ़ौज को बंदुकों 
के मुकाबिले में भ्रग्रेज फ़ौज की बंदूक कोई महत्व न रखती थीं।' 


गुज्ञिततता लखनऊ 23 


लेकिन श्रासफ उद्दोला का युग शुरू होते ही ये सब बातें जाती रहीं । 
प्रग्रेजों ने बडी होशियारी के साथ श्रपने हस्तक्षेप के श्रधिकार बढ़ाने शुरू कर 
दिये श्रौर बहुत ही चालाकी से आासफ़उद्दौला को इस बात के लिए राजी कर 
लिया कि सैनिक सुधार की श्रोर से बिल्कुल निश्चित होकर दूसरे कार्ये- 
कलाप में दिल बहलाएं । आसफ़उद्दौला को खुद भी फ़ौज का ज़्यादा शौक़ न 
था | उन्हें लुटाने श्रौर मज़े उड़ाने के लिए रुपये की ज़रूरत थी जो फ़ौज 
को समाप्त किये बिना पूरी न हो सकती थी। इसलिए उन्होंने थोड़ी-सी फ़ौज 
रख ली, बाक़ी सबको नौकरी से हटा दिया श्रौर ऐश-इशरत में गर्क हो गये । 
वे भ्रपने अ्रपदस्थ मित्रों के श्राज्ञाकारी मित्र थे जो उनके इशारों पर चलते 
भ्रौर उनके मशविरों के आगे किसी की न सुनते । 

इस निष्ठा श्रौर स्नेह के बदले में अंग्रेजों ने रूलखंड पर उनका क़ब्ज़ा 
करा दिया । श्रपनी मां बहू बेगम साहबा के सताने श्रौर लूटने के लिए जब 
उच्होंने अंग्रेजों से मदद मांगी तो बड़ी उदारता के साथ उन्हें नैतिक सहायता 
दी गयी और उनका समर्थन किया गया । लेकिन इस पर भी उनके ज़माने तक 
उन्हें या लखनऊ की रिग्राया को बहुत ही कम महसूस हो सका कि हमारे 
शासन प्रबंध में किसी बाहरी शक्ति का हाथ है जिसका श्रधिकतर कारण यह 
था कि श्रासफ़उद्दौला की सामान्य उदारता श्र विलासिता ने सारी प्रजा को 
भी वेसा ही विलासी बना दिया था झ्लरौर किसी को अपने ऐश-आराम के श्रागे 
इस पर ध्यान देने की जरूरत महसूस न होती थी कि श्राखिर इसका नतीजा 
क्या निकलेगा । ह 

इसी विलासिता का नतीजा था कि जाहिरी तौर पर उन दिनों लखनऊ 
के दरबार में ऐसी शान-शौकत पैदा हो गयी जो कहीं पश्रौर किसी दरबार में न 
थी । श्रौर भोग-विलास की ऐसी सामग्री जुटायी गयी जो अन्यत्न नहीं दिखाई 
देती थी । उन दिनों लखनऊ शहर की ऐसी रौनक़ थी कि हिंदुस्तान ही नहीं 
शायद दुनिया का कोई शहर लखनऊ के उत्कषं और उन्नति के सामने नहीं 
टिक सकता होगा। शुजाउद्दौीला जो रुपया फ़ौज और लड़ाई की तैयारियों 
पर खर्च करते थे उसे आ्रासफ़उहौला ने अपनी विलासिता की पूर्ति और नगर 
की सजावट तथा संपन्‍्न॒ता में रूचं करना शुरू कर दिया और कुछ ही दिन के 
अंदर सारी दुनिया की धूम-घाम अपने यहां जमा कर ली । उनका हौसला 
बस यही था कि निज्ञाम हैदराबाद हों या टीपू सुल्तान, किसी दरबार का 


24 गुज़ितता लखनऊ 


दबदबा और किसी की शान-शौकत मेरे दरबार से ज़्यादा न हो सके । 

अपने बेटे वजीर अली की शादी में उन्होंने ऐसा हौसला दिखाया कि 
बरात का ठाठ-बाट इतिहास में और कहीं _न देखा गया होगा | बरात के 
जुलूस में बारह सौ हाथी थे, दुलहा जो शाही ख़िलञ्मत पहने था उसमें बीस 
लाख के जवाहिरात टंक हुए थे। नृत्य-गान की सभा के लिए दो बड़े ही 
शानदार और सुसज्जित शिविर बनवाये गये जिसमें हरेक 60 फुट चौड़ा, 
]200 फुट लंबा और 60 फुट ऊंचा था । और उनमें ऐसा बढ़िया सुंदर श्रौर 
कीमती कपड़ा लगाया गया था कि उन दोनों की तंयारी में सल्तनत के दस 
लाख रुपये खर्च हो गये । 

उन्होंने नदी किनारे मच्छी भवन के पश्चिम में दोलतखाना, ख्मी दरवाज़ा 
गौर अपना अनुपम इमामबाड़ा बनवाया । 784 में ग्रवध में ग्रक्राल पड़ गया था 
ग्रौर शहर के शरीफ़ लोग तक भूखों मर रहे थे । उस नाजुक मौके पर प्रजा की 
सहायता के लिए इमामबाड़ की इमारत छोड़ दी गयी । चूंकि शरीफ़ लोग 
दिन को मज़दूरी करने मे भ्रपनी बेइज्ज़ती समभते थे इसलिए इमारत का काम 
दिन की तरह रात को भी जारी रहता और शहर के ग़रीब और फ़ाक़ाकछा 
लोग रात के अंबेरे मं आकर मज़दूरों मं शरीक हो जाते और मशालों की 
रोशनी में काम करते । इस इमारत को नवाब ने जिस निष्ठा, भक्ति और 
धामिक उत्साह के साथ बनवाया था वंसे ही युद्ध और सच्चे उत्साह से लोगों 
ने बनाया भी । नतीजा यह हुआ कि ऐसी सुंदर और शानदार इमारत बनकर 
तैयार हो गयी जो अ्रपनी किस्म की बेमिसाल और अदभुत है। उसका नक्शा 
बनाने के लिए बड़े-बड़े मशहर भूमितिविज्ञ और शिल्पी बुलाये गये ग्रौर सबने 
कोशिश की कि हमारा नक्शा दूसरों के प्रस्तावित नक्शे से बढ़ जाये । मगर 
किफ़ायत उल्लाह नामक एक बेमिसाल शिल्पी का नक्शा पसंद किया गया 
ग्रौर उसी के अनुसार इमारत बनना शुरू हो गयी जो 67 फुट लंबी 53 
फुट चौड़ी है। ईंट और बहुत ही बढ़िया क़िस्म के चूने से यह इमारत बनायी 
गयी जिसमें फ़श से छत तक लकड़ी का नाम नहीं । इस इमारत का मुग़ल 
बादशाहों की पत्थर की इमारतों से कोई संबंध नहीं है क्योंकि लखनऊ में 
इतना ज़्यादा संगमरमर नहीं मिल सकता था | लेकिन इमामबाड़े और आझासफ़- 
उदहौला की दूसरी इमारतों को देखिए तो वे एक नयी सुंदरता श्रोर शान रखती 
हैं। इमामबाड़े के लदाव की छत जो कड़ा देकर बनायी गयी है इतनी बड़ी 


गुजिश्ता लखनऊ 25 


है कि इतनी बड़ी लदाव की छत सारी दुनिया में कहीं नही है श्रौर इस वजह 
से इसकी भी दुनिया की झ्राइचयंजनक कारीगरी में गिनती की जाती है। 

प्रासफ़उहौला की इमारतों पर योरुप की इमारतों का ज़रा भी असर न 
था। वे अ्रपनी किस्म की खालिस एशियाई इमारतें हैं जिनमें दिखावटी नहीं 
ग्रसली श्रौर सच्ची शान-शौकत पायी जाती है। नवाब ग्रासफ़उदहौला के बाद 
इन इमारतों की किसी ने देखभाल नहीं की | गदर के बाद प्रंग्रेजों ने उन पर 
क़ब्जा करके आसपास के मकानों को हटा दिया श्रौर सिवाय उस औझ्रोर के 
जिघर नदी है, बाकी तीनों ओर मंदान करके इमामबाडे को किला और रूमी 
दरवाज़े को उसका फाटक बना लिया। उस ज़माने में इमामबाड़ में गोरे रहते 
थे, उसके बड़े हाल में ग्रस्त्रागार था और उसके फर्श पर बडी-बडी तापें दौडती 
फिरती थीं। मगर न कभी जमीन खुदी, न दरो-दीवार की कोई ोप उखडी ! 
भ्रव प्रंग्रेज़ सरकार ने इमामबाड़े को छोड़कर फिर मुसलमानों के हवाले कर 
दिया है । उसकी मस्जिद में एक मुज्तहिद साहब नवाज़ पढ़ाते है श्रौर इमाम- 
बाड़े में ताजियादारी होती है । 

नवाब झ्रासफ़डहोला की इमारतों की मज़बूती का पअ्रंदाज़ा इससे हो 
सकता है कि उन्हें बने हुए हालांकि सवा सौ बरस से ज्यादा की मुहत गुजर 
गयी मगर गञ्राज तक उसी ज्ञान-शोकत श्रौर उसी मजबूती श्रौर पायदारी से 
प्रपती जगह कायम है। न कोई इंट ग्रपती जगह से हटी है श्रौर न किसी 
जगह चने ने इंटों को छोड़ा है। इसके खिलाफ श्रवध के दूसरे बादशाहों ने 
करोड़ों रुपये खच करके जो इमारतें बाद में बनवायीं उनमें हमारी देशी रख- 
रखाव की भलक तो खंर है ही नहीं इसके ग्रलावा वे बहुत कमज़ोर भी है । 
ग्रोर अगर समय-समय पर उनकी मरम्मत न होती रहती तो श्राज तक कब 
की गिर चुकी होतीं । 

ग्रासफ़उदहौला इमामबाड़े और मच्छी भवन के पास अपने महल 'दौलत- 
खाना में रहते थे। शहर के बाहर प्रौर दरिया पार जनसंकुलता से दूर श्ौर 
सांसारिक भगड़ों से ग्रलग रह कर विलासिता में तल्‍लीन रहने के लिए 
बिबयापुर का महल बनवाया । अक्सर जब वे सैर-शिकार के लिए जात तो 
इसी मकान में ठहरते | इसी तरह चनह॒ट में एक स्वास्थ्यप्रद और झानंददायक 
मकान और चार बाग़ और ऐश बाणश' में कोशके बनवाई शोर उसी जमाने 
में याहियागंज में और उसके पास अ्रस्तबल बने । फिर मुहल्ला वज्ञीरगंज 


26 गुज़िदता लखनऊ 


क्रायम हुआ जो झासफ़उद्दौला के बेटे वज़ीर अली खां का निवास होने के 
कारण उन्हीं के नाम से मशहर और उन्हीं की यादगार है। 

अ्रब चंकि लखनऊ में शासक और अधिकारी सभी स्थायी रूप से रहने 
लगे इसलिए झ्राम जनता का रुख॑ लखनऊ की तरफ फिरे गया । जो लोग शुजा- 
उद्दौला के जमाने में फ़ेज़ाबाद में बस गये थे उन्होंने फ़ैज़ाबाद को छोड़-छोड़कर 
लखनऊ में भ्राकर बसना शुरू किया। दूसरी तरफ दिल्‍ली के लोग अपनी जन्म 
भूमि छोड़-छोड़क र सीधे लखनऊ गझ्राते थे और उन्हें फिर वापस जाना नसीब न 
होता था। जनता के इस बढ़ते हुए जमघट ने नये मुहल्ले आराबाद करना शुरू 
कर दिये इसलिए कि बाहर के आनेवालों में से जिसे जहां जगह मिल जाती 
ग्राबाद हो जाता और सैकड़ों नये मुहल्ले झ्राबाद होते चले जाते । 

चुनांचे अमानीगंज, फ़तेहगंज, रकाबगंज, नरवास, दोलतगंज, बेगमगंज, 
खानसामां का अभ्रहाता (जिसे नवाब आसफ़उद्दौला के एक निजी दरोगा ने आबाद 
किया श्रौर उद्घाटन-समारोह में खुद उन्हें बुलाया), टिकेटगंज, टिकेटराय का 
बाज़ार (जो प्रधान मंत्री महाराजा टिकेट 'राय के नाम पर है), तरमनीगंज, 
टिकरी या टिकली, हसीनउद्दीन खां की छावनी, हसनगंज बावली, भवानीगंज, 
वालकगंज, कश्मीरी मुहल्ला, सूरत सिहं का अहाता, नवाजगंज, तहसीनगंज, 
खुदागंज, नगरिया (जिसकी नवाब आसफ़उद्दौला की मां वह बेगम साहिबा ने 
उसी दिन बुनियाद डाली जिस दिन दरिया पार खुद उन्होंने श्रलीगंज की बुनि- 
याद रखी थी ), भ्रंबरगंज, महबूबगंज, तोप दरवाजा, खयालीगंज, भाऊलाल का 
पुल (इन दोनों मुहल्लों के संस्थापक राजा भाऊमल अवध राज्य के वित्त मंत्री 
थे) ये सब वे मुहल्ले हैं जो आ्रास; 'हौला के शासन-काल में बसे और बने 
और उन्हीं दिनों दरिया के पार हसन रज़ा खां ने हसनगंज बसाया । 

नवाब आसफ़उद्दोला की दरियादिली की सभी में शोहरत थी और दूर- 
दूर के शहरों में उनकी दानशीलता की चर्चा होती थी। लोग उठते-बं ठते 
इज्जत और मुहब्बत के साथ उनका नाम लेते और उनके सारे व॑यक्तिक अ्रव- 
गुण उनकी दानवीरता के आवरण में छिपकर नज़रों से ओमकल हो गये थे । 
जनता को नवाब की सूरत में एक विलासी शासक नहीं बल्कि एक निस्वार्थ 
प्रौर संत-स्वभाव वली दिखाई देता | हिंदू दुकानदार ग्राज तक सुबह को आंख 
खुलते ही श्रद्धावश कहते हैं या झासफ़ठद्दोला वली ।' 

इसी ज़माने में जनरल क्लाड मार्टिन नामक एक बहुत बड़ा धनवान 


गुज़िहता लखनऊ 27 


फ्रांसीसी व्यापारी जो लखनऊ में आकर रह पड़ा था उसने एक बहुत ही ग्राली- 
शान कोठी का नक़्शा बनाकर नवाब आसफ़उद्गोला के हुजर में पेश किया । 
नवाब को वह इतना पसंद श्राया कि उसकी क्रीमत में दस लाख अशरफ़ियां 
देने को तेयार हो गये। श्रभी वयनामे की कारंवाई पूरी हो भी न पायी थी कि 
नवाब आसफ़उद्दोला का निधन हो गया और इमारत अभी पूरी भी न हो 
पायी थी कि खुद मोस्यो माटिन दुनिया से क्च कर गये। उन्होंने चूंकि श्रपार 
घन छोड़ा था और वारिस कोई न था इसलिए मरते समय वसीयठ कर दी कि 
मेरी लाश इसी कोठी के श्रंदर दफ्न की जाये ताकि मेरे बाद उसे अबध के 
शासक जब्त न कर सके । इस इमारत का नाम उन्होंने 'कांस्टेशिया' रखा था मगर 
जनता में वह ग्राजजल 'मारकीन साहब की कोठी मशहूर है श्रौर दर्शनीय है । 
मरने के बाद वे इसी कोठी में दफ्न हुए। वह मदरसा श्राज तक जारी है 
जिससे बहुत से विद्याथियों को खाना और कपड़ा मिलता है । मगर सुनते है 
कि माटिन साहब ने इस स्कूल झौर इसकी छात्रवृत्तियों को किसी धम्ं या 
जाति विशेष के लिए सीमित नहीं किया था बल्कि वसीयत की थी कि ईसाई, 
हदू, मुसलमान सभी समान रूप से इससे लाभ उठा सकते है। लेकिन अ्रब यह 
स्कूल सिफ योरुपियन बच्चों के लिए सीमित है। किसी हिदुस्तानी को वजीफ़ा 
मिलना तो दरकिनार वह वहां शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सकता । शायद यह 
इस वजह से हो कि ग़दर के ज़माने में जाहिल और जोशीले बलवाइयों ने क़ब्न 
खोद कर मि० माटिन की हृड्ियां निकाल लीं और उन्हें इधर-उधर फेंक 
दिया । अंग्रेज़ों को उनके आधिपत्य के बाद एक हड्डी संयोगवश मिल गयी जो 
फिर उसी मिट्टी में दबा दी गयी | लेकिन इन बलवाइयों के काम के जिम्मेदार 
ग्राम हिंदुस्तानी नहीं हा सकते । 

सन 798 ६० में नवाब ग्रासफ़उद्दौला का देहांत हुआ्मा और उनकी जगह 
नवाब वजीर अली खा गहीनशीन हुए जिनकी शादी की घूमघाम का वर्णन हम 
पहले कर चुके हैं। मगर चार ही महीने में ऐसे मूखंतापूर्ण और घणित काम 
कर बंठे कि अधिकतर लोग उनसे नाराज़ हो गये । खुद बह बेगम साहबा 
उनके मुक़ाबिले में अपने सौतेले बेटे यामीनउद्दोला नवाब सम्रादतग्रली खां को 
ज्यादा पसंद करती थीं। उधर यह ख़बर फंली कि वज़ीर ग्रली ख्वां आसफ- 
उद्दौला के बेटे ही नहीं है बयोंकि प्रासफ़उद्दौला के बारे में बहुतों का रुूयाल था 
कि पंदाइशी नपंसक थे | 


28 गुजिह्ता लखनऊ 


नवाब सग्रादतभ्नली खां आसफ़उद्दोला के विरोध के कारण उनक समय में 
मुहृतों उनके राज्य से बाहर और दूर रहते थे । मुद्रतों कलकत्ते में रहे और 
एक लंबे अर्स तक बनारस में क़ायम रहे | जब वज़ीर अली खां के बारे में यह 
विचार क्रायम हो गया तो फिर सप्मादतग्रली ख्रां पर दृष्टि गयी और वे बना- 
रस से लाये गये और बिबयापुर की कोठी में खुद गवनंर जनरल बहादुर ने 
दरबार करके वज़ीर ग्रली खां को अपदस्थ और नवाब सम्रादतग्नली खां को 
गही पर बेठाने का फैसला किया | वजीर गली खां फौरन गिरफ्तार करके 
बनारस भेज दिये गये जहां उन्होंने तैश में ग्राकर मि० चरी को मार डाला 
ग्रौर उसकी सज़ा में गिरफ्तार करके चिनारगढ़ भजे गये और वहीं मरे । 
उनकी मुसीबतों झ्लौर परेशानियों का एक बड़ा भारी क़िस्सा मशहर है जिसका 
वर्णन इस संक्षिप्त लेख में नहीं क्रिया जा सकता । 


3] 

नवाब सआ्मादतअली खां ने सन्‌ 798 ई० में गह्दी पर बठते ही ग्ाघा प्रात 
अंग्रेजों को भेंट कर दिया । मशहूर है कि वे राज्य मिलने की ग्राशा छोड़कर 
बनारस में पड़े हुए थे कि ख़बर पहुंची नवाब झ्रासफउद्दौला बहादुर की मृत्य 
हो गयी और राजसिहासन पर वज़ी र ग्नली खां बेठ गये । यह सुनते ही राज्य पाने 
की रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फिर गया । इसी निराशाकी स्थिति म थ 
कि बनारस के किसी योरुपियन अधिकारी ने ग्राकर पछा, "नवाब साहब, अगर 
ग्रापको ग्रवध की हुकूमत मिल जाये तो अंग्रेज सरकार को क्या दीजिएगा ? ' 
जो चीज़ हाथ से जा चुकी हो इंसान के दिल में उसकी क्रद्ट ही क्‍या हो 
सकती है ? ग्ननायास बोल उठे, आधा मुल्क अंग्रेजों की नज्ज कर दूगा' । यह 
वायदा सुनकर उस अंग्रेज अधिकारी ने कहा, 'ो ग्राप खुश हों और मै 
आपको खुशखबरी सुनाता हूं कि आप ही को लखनऊ का शासक चुना गय' 
है। सम्रादतञ्नली खां अचानक यह खुशखबरी सुनकर खश तो जरूर हुए मगर 
ग्पने वायदे का ख्याल श्राया तो एक सन्‍नादे में आ गये और ग्राखिर गही पर 
बेठने के बाद इस वायदे को पूरा करने में ग्रपना ग्राधा राज्य बांट देना पढ़ा 
जिसकी फॉंटी जिदगी भर उनके दिल में खटकता रहा। 


६६83 


गुज़िश्ता लखनऊ 29 


अंग्रेज़ी इतिहासों में उनसे वचन लिया जाने का तो जिक नहीं है मगर 
इसे सभी मानते हैं कि नवाब राग्रादतग्रमली खां को चूंकि अंग्रेजों ने तस्त पर 
बिठाया था इसलिए उन्होंते अग्रपना आधा राज्य ग्राभारस्वरूप अंग्रेजों की भेंट 
कर दिया । बहरहाल कुछ भी हो सम्मादतञली खां की गद्दीनशीनी के वक्‍त 
प्रवध का राज्य ग्राथधा रह गया | लखनऊ के पुराने लोगो म॑ मशहर है कि इसी 
दुख में सम्रादतग्नली खां ने बहुत ही मितव्ययिता से काम लेकर और माल- 
गुजारी वसूल करने में बड़ी कुशलता और सूमबूक जाहिर करके बाईस-तेईस 
करोड़ मपया जमा किया और इंग्लेंड म ब्रिटिश सरकार से पत्र-व्यवहार 
करके यह तय कर लिया था कि 7”णान की हुकूमत का ठेका ईस्ट इंडिया 
कंपनी के बजाये उन्हे दे दिया जाये और क़रार की पूर्ति होने ही को थी कि 
उनके साले ने किसी साजिश में शामिल होकर उन्हें जहर दे दिया और वही 
कहावत चरितार्थ हुई : न रहेगा बास और न बजेगी बांसरी । 

ग्रौर इसी प्रकार की ग्रनेक घटनाएं मशहुर है जिनका सबूत सिवाय ग्रफ़- 
वाहों के और कुछ नहीं मिल सकता । लेकिन इसमें शक नहीं कि सम्रादतग्ली 
जा इतने मितव्ययी और अच्छे गासक थ कि उन जसे शासक ने अपने राज्य 
का कोई हिस्सा आसानी से न दिया होगा । दूसरे, उनके रवंये पश्रोर नीति में 
एक ऐसी ग्रस्थिरता और रहस्यमयी व्याकुलता दिखाई देती है कि चाहे पता 
ने चले मगर साफ मालूम होता है कि वे काई बड़ा काम करनवाल थे और 
उनके तेवर बड़ साथंक थे । 

प्रांत को ताट देन की वजह से उन्हें सवब॒स बडा मश्किल यह पश आया 
कि राज्य की आधी ग्रामदनों घट गयी। और ग्रासफउट्रोला न खच हद से 
ज्यादा बढ़ा रखे थे। चुनाने उन्हें दरवार के खर्च घटाना पड जा ग्रपने भ बहा 
मुश्किल काम था । इस कोशिश में उन्होंने हिसाब को जाच की, छोटी-छोटी 
रकमों पर नज़र डाली, माफियों और जागीरों का बहत हो सख्तो के साथ 
छानबीन की आर दरबार के खर्च मे, जता तक बना, केमी की । गरज़ यह कि 
जिस तरह स हो सका बदनामिया उठा गिर लोगों पर ससिदियां करके उन्होंने 
सल्तनत की ग्रामदनी वढायी श्रौर खच घटाया | 

ये कारवाइयां देखकर समभद्ार शौर इसाफपसंद लोग तो समग्रादतग्रली 
खां की योग्यता और मूनबून के कायल हो गये मगर ग्राम जनता में बड़ी 
सख्त नाराज़गी फैली । एक झोर तो उन माफीदारों श्र जागीरदारों का गिरोह 


30 गुजिदता लखनऊ 


शिकाग्रत करता था जिनकी जायदादें जब्त हुई थीं, दूसरी श्रोर वे फ़ालतू 
और पुराने नौकर रोते-फिरते थे जिनकी जगहें कम कर दी गयी थीं। इतना 
ही नहीं प्रांत में एक बड़ा भारी गिरोह उन लोगों का भी था जो वजीर ग्रली 
खां के समर्थक थे। उनको राज्य का जाइज और सच्चा हक़दार मानते थे 
और सञ्मादतगली खां को लुटेरा बताते थे । कहना चाहिए कि देश में हजारों 
दुश्मन थे जिनसे ख़तरा था कि नवाब की जान पर हमला न कर बेठें। 
रिग्राया के अलावा फौज भी नये नवाब से बहुत नाराज थी। बेशुमार फ़ौज 
का टिड्डी दल जो नवाब शुजाउद्दौला के समय में था उसमें ग्रासफउद्दौला ही 
के ज़माने से अंग्रेज सरकार की सलाह से कमी शुरू हो गयी थी । मगर आसफ- 
उद्दौला की दानशीलता और फिजूलखर्ची के कारण वे बहलते रहे श्रौर शिका- 
यत की आवाज ज़्यादा न उभर सकी । सम्रादतञली खां ने जब ज़्यादा छंटनी 
की और उसके साथ खद भी मिततव्ययिता बरती तो हर तरफ हाय-हाय पड़ 
गयी गौर जो था उनकी जान को रो रहा था । 

नतीजा यह हुआ कि उनकी जान की हिफ़ाज़त के लिए अंग्रेज सरकार 
को जहूरत महनूस हुई कि एक बाज़ाकब्ता अंग्रेज फ़ौजी गांड खास शहर के 
अंदर रखा जाये क्योंकि शहर के दंगाइयों और विद्रोहियों को कुचलने के लिए 
और शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से एक बाहरी जबरदस्त 
गक्तिका हर वक्त गहर में रहना बहुत ही जरूरी था जिसके बारे में सुना 
जाता है कि नवाब सम्मादतग्रली खां ने इस प्रस्ताव को बहुत ही ग्रनिच्छा से 
मंजूर किया | 

ग्रवध के शासकों ने इससे पहले अपने रहने-सहने के बारे में बहुत ही 
सादगी जाहिर की थी। पहले तीन नवाबों यानी नवात्र बुरहान-उल-मुल्क, 
नवाय सफदरजंग और नवाब शुजाउद्दोला ने जिन सादे मकानों में जिंदगी बसर 
की वे भी उनकी निजी मिल्कियत नहीं बल्कि किराये पर थे। उन्होंने ग्रपना 
अ्रसली मकान या तो जंग के मेदान को माना या सारे राज्य को जिसमें वे 
दोरा करते रहते श्रौर सारी जमीन के हर हिस्से को अपना मकान ही समभते 
रहे । नवाब ग्रासफ़उद्दोला बहुत व्यस्त थे, ऐयाशी और फ़िजू लखर्ची में बदनाम 
थे, मगर उनके लिए भी सिर्फ़ एक सादा, पुराने ढंग का मकान यानी पंच 
महला काफी था, हालांकि उन्हें इमारत का बड़ा शौक़ था । इससे ज़्यादा क्‍या 
होगा कि बीस लाख रुपये एक इमामबाडे और मस्जिद के बनवाने में खर्चे कर 


गुजिश्ता लखनऊ 3] 


दिये और उससे ज़्यादा ही रकम चौक, विभिन्‍न बाजारों, मंडियों, पुलों श्रौर 
सरायों आदि के निर्माण में खर्च की। गरज़ यह कि पहले तीन शासकों का 
इमारतों का शौक़ अगर क़िलों, गढ़ियों के निर्माण और फौजी सामान के 
जुटाने में पुरा होता था तो ग्रसफ़ठहीला का शौक मजहब्री इमारतों या लोक- 
हित के कामों में। इसके साथ इमारतें बनवाने का पुराना झौक़ भी ग्रव तक 
निभता चला जाता था । आसफ़उद्दोला के इमामबाड़े तक की इमारतें पुराने 
स्थापत्य का नमूना हैं। दिल्‍ली और आगरा में शाहज़दां बादशाह को उच्चकोटि 
का संगमरमर और संगे सुखे करीब की खानों में मिल गया था जिसने वहां की 
इमारतों में खास तरह की नफासत श्रौर शान पैदा कर दी । लखनऊ में पत्थर 
का मिलना नामृमंकिन था और आगरा गया जयपुर से लाना इतना दूभर था 
कि किसी को मंगवाने का साहस न हो सकता था । ग्रासफ़उद्दौला ने इंट और 
वने से वही काम लिया और वंसी ही शानदारी दिखा दी । 

नवात्र समग्रादठग्नमली खां को मितव्यग्िता, कंजसी ओऔर रूपया जमा करने 
की हवस के वावजद मकानों और इमारतों का जझ्ौक़ था। मगर श्रफ़्मोस 
उनका यह शौक़ कलकत्ता में रहने और जगह-जगह की इमारतों के देखने से 
ऐसा खत्म हुआ कि उनके ज़माने की इमारतों से वे पुरानी विशेषताएं समाप्त 
हो गयीं और तब से मानो स्थापत्य-कला का स्तर ही बदल गया । 

लखनऊ में इमारत-संबंधी इस तब्दीली का असली कारण गहीनशीनी से 
पहले नवाब सम्रादतग्रली खां का ग्न्य प्रांतों में रटना, खानावदोशी और योरू- 
पियन जातियों से मिलना-जुलना था और ज्यादातर यह चीज़ थी कि जनरल 
माटिन ने श्रपनी रुचि की दो-एक कोठियां बनवा कर स्थापत्य की एक नयी 
शेली नवाबों के सामने पेश कर दी जो मज़बूती की दृष्टि से बेकार और 
ज़िंदगी की जरूरतों क लिहाज से बहुत ही ग्राकषंक थी , इन इमारतों की 
हालत बिल्कुल उन खिलौनों की-सी थी जो बच्चों के हाथ में दिये जाते है और 
रोज़ टूटते और नये खरीदे जाते हैं। योर्प के आलोचक ग्रालोचना करते 
समय बड़े जोर-शोर से एतराज़ करते हैं कि श्रासफ़उ्द्दौला के बादवाले लखनऊ 
के नवाबों की इमारतें बनाने की रुचि बिल्कूल भ्रष्ट हो गयी थी और उनकी 
तमाम इमारतें लड़कों के खिलौनें या- लड़कियों के घरोंदे है, मगर इधर ध्यान 
नहीं देते कि यह रुचि विगाड़ी किसने ? कहा जाता है कि यहां की राष्ट्रीय 
रुचि इसलिए बिगड़ गयी थी कि यहां दरझ्नसल कोई जाति थी ही नहीं । और 


32 गुजित्ता लखनऊ 


इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि यहां की राष्ट्रीयता को बिगाड़ा किसने 
झ्रौर किसकी कारस्तानियों ने लोगों से उनकी पुरानी रीति छुडा दी ? सच यह 
है कि यह सब कुछ उन्हीं का किया-धरा था। 

सआदतअली खां ने पहलें फ़रहत बरुण की कोठी पचास हज़ार रुपये पर 
जनरल माटिन से मोल ली, उसी में रहना शुरू किया और उसके झरासपास श्रौर 
कई मकान बनवायें | फिर वहां से क़रीब ही रेज़ीडेंट साहब के रहने के लिए 
टेढ़ी कोठी बनवायी जिसके खंडहर रेजीडेंसी के अंदर पड़े हुए हैं । उसके बाद 
अग्रपने दरबार के लिए उन्होंने नाल बारहदरी बनवायी जिसमें अब लायब्रेरी है 
झ्रौर उन दिनों 'क़स्र-उल-सुल्तात' के नाम से मशहूर थी । इसके अलावा दरिया 
पार उन्होंने (दिल आराम! नामक एक नयी कोठी बनवायी और उसी सिल- 
सिले में एक बुलंद टेकरे पर जो अब सदर यानी लखनऊ की फौजी छावनी के 
इलाके में स्थित है श्रौर जहां सारे शहर. गिर्द के मंदान और नदी का सुंदर दष्य 
आंखों के ध्वामने झा जाता है एक खूबसू रत कोठी बनवायी और 'दिलकुशा 
उसका नाम रखा | इसी तरह एक झौर कोठी बनवायी जिसका नाम 'हयात- 
बख्श' रखा । मगर उस कोठी का नवाब सम्रादतअली खां के बाद के अवध 
नरेशों ने इस्तेमाल नहीं किया । उसमें गदर से पहले मेजर बंक रहते थे और 
ग़दर के बाद यह आम रिवाज था कि अंग्रेज सरकार की ओर गे जो भी 
प्रतिष्ठित योरुपियन अ्रवध के चीफ़ कमिहनर होकर ग्राते उसी कोठी में आ्राकर 
रहते । 

ऊपर निखी कोठियों के ग्लावा नवाब ने मशहूर इमारतें 'मुनव्वरबख्श' 
ग्रौर 'खुरणीद मंजिल, भी बनवायीं और चौपड़ा का अस्तबल भी इन्हीं 
की यादगार है। मगर इन सब इमारतों के निर्माण में अपनी पुरानी देशी रोति 
छोड़ दी गयी श्रौर योरुप से ग्रायी हुई नयी होली श्रपनायी गयी भ्रौर ज़ाहिर 
है कि इस संबंध में लखनऊ का कोई पुराना मकान इन नयी, झ्ञालीशान इमारतों 
का मुकबिलान कर सकता था जो खुद ब्रिटिश सरकार के प्रभाव और प्रबंध 
से हिंदुस्तान क॑ विभिन्‍न शहरों में बन चुकी हैं या दिन-व-दिन बनती जाती है । 
ग़रज यही जमाना है जब से लखनऊ में उन पुरानी रुचि की इमारतों का 
खात्मा हो गया जिनका ऐतिहासिक महत्व हो और जो ग्रपनी किसी विशेषता 
के कारण पर्यटकों को अपनी ओर आदक्ृष्ट करें। 

नवाब मप्रादतग्रली खां ने लखनऊ के पर्चिमी भाग में एक बड़ा गंज 


गुजिहता लखनऊ 33 


बनवाया और उसकी आबादी और रौनक के लिए ऐसा इंतजाम किया कि 
उसके लिए खास कानून बनाये गये और व्यापारियों तथा दुकानदारों को 
खास तरह के अधिकार दिये गये | उसने बड़ी रौनक़ पायी और आज तक 
इस बात के बावजूद कि वह शहर की ग्राबादी से दूर और बिल्कुल श्रलग 
स्थित है, विभिन्‍न वस्तुश्नों की सबसे बड़ी मंडी है श्लौर ग्रालम नगर का स्टेशन 
सिफं उसी की वजह से रोज़-वरोज तरकक्‍क़ी पाता जाता है । 

सआ्भदतगंज के अलावा दूसरे बडे बाजार जो नवाब साहब के समय में 
कायम हुए और ग्राबाद भी हुए ये हैं : रकाबगंज (जो आज लोहे की सबसे 
बड़ी और अनाज वगैरा की एक प्रमुख मंडी है), जंगलीगंज, मकबूलगंज, 
मौलवीगंज, गोलागंज और रस्तोगी मुहल्ला | मोती महल में जो असली 
और पुरानी इमारत है वह भी नवाव सग्मादतअली खां की बनवायी हुई है। 
यह इमारत मौजूदा मोती महल के अहाते में उत्तर की ओर स्थित है । इसमें 
बहुत ही सुदर सफेद गुंबद था जिसमें कारीगर ने मोती की-सी आबो-ताब 
पैदा कर दी थी । 

सम्रादतग्नली खां अवध के सभी नवाबों से ज्यादा बुद्धिमान, राजनीतिज्ञ 
ग्रोर इसके साथ बहुत ही मितव्ययी बल्कि कंजूस माने जाते हैं , प्रांत का 
शासन प्रबंध उन्होंने आसाधारण योग्यता गौर चतुरता से किया और इसमें 
कोई संदेह नहीं कि अ्रगर उन्हें अपने शासन-काल के अंत तक पूरी तरह 
संतोष मिल जाता तो पिछली सारी बुराइयां दूर हो जाती और वे प्रांत का 
ग्रच्छी तरह सुधार कर पाते । लिकिन खराबी यह हुई कि ईस्ट इंडिया कंपनी 
के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं रहे । यहां तक कि कभी-कभी उनका मन 
राजसिहासन तथा शासन आदि से भी खट्टा हो गया | इन्हीं बातों से तंग 
ग्राकर उन्होंने ग्राते से ज्यादा राज्य महान ब्रिटिश सरकार के सुपुर्दे कर दिया 
ग्रौर समझे कि अब में अपने इलाक़ में जहां मरा राज्य है बिना किसी 
मिकक के शासन कर सकगा, लेकिन अफ़सोस कि अब भी उन्हें चेन न 
मिला । जो प्रांत उनके अधिकार में छोड़ा गया था उसमें भी जगह-जगह 
ग्रंग्रेज फौज के कंप क्रायम किये गये और उनमें से अधिकतर लखनऊ और 
उसके ग्रासपास ही बनाये गये । उन फ़ौजों की देखभाल भी मुश्किल थी और 
उनकी संख्या अधिक होने के कारण राज्य पर भारी बोक पड़ गया था ओर 
नतीजे में उन्हें अपनी बहुत-सी फ़ोज घटा देनी पड़ी । 


34 गुजिश्ता लखनऊ 


लेकिन इन चिताओं और परेशानियों के वावजद उन्होंने जो-जो सुधार 
किये वे भी बहुत प्रशंसनीय हैं । मगर सबसे ग्रजीब यह बात है कि वाज़ारों 
की तरकक्‍क़ी और व्यापार को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ उनके दरबार में 
गुणी और प्रतिष्ठित लोगों का इतना बड़ा जमाव था कि उस समय हिंदुस्तान 
के और किसी दरबार में ऐसे वाकमाल लोग न नज़र ञ्रा सकते थे । ऐसे लोग 
अक्सर उसी जगह जमा हुआग्ना करते है जहां के रईस ग्राम लोगों की अपेक्षा 
ज्यादा उदारता और दानशीलता प्रकट करते है । सग्मादतग्रली खां, जैसा कि 
हेम बयान कर चुके हैं, मितव्ययी और कंजस थे मगर उस कंजसी और 
मितव्ययिता के साथ उनमें यह गुण भी था कि उनकी व॑ँयक्तिक योग्यता दूसरे 
व्यक्तियों की योग्यता को स्वीकार करने पर मजबूर हो जाती थी और इसी 
बात ने उनके हाथों से लायक़ लोगों की कद्र करायी और लखनऊ पहले से 
ज्यादा बाकमाल लोगों का केंद्र वतन गया । जो काबिल आदमी जहा होता 
सआमादतग्रजी खां की कद्रदानी की शोहरत सुनते ही अपना वत्तन छोड कर 
लखनऊ का रुख करता ओर यहां ऐसा ग्राराम पाता कि फिर कभी अपने घर 
जाने का नाम न लेता । 

सन 8]4 इ० में नवाब सग्मादतग्नमली खां की म॒त्यू हुई और उनके बेटे 
गाज़ीउद्दीत हैदर राजगद्टी पर बेठे । कसर वाग की वर्गाक्रार इमारत के अंदर 
नवाब सद्नादतगञली खां और उनकी बीवी मुर्शीदजादी के मकठरे है। इन 
दोनों मकबरों की जगह एक मकान था जिसमें नवाब गाजी उद्दीन हैदर उस 
समय रहा करते थ जब वे युवराज थे | बाप की झआांखें बंद होते ही जब वे 
राजमहल में गये तो कहा, 'मैंने वालिद का घर लिया तो जरूर है कि अपना 
मकान उन्हें रहने को दे द्‌ । इस खयाल के मुताब्रिक मरहम नवाब को अपने 
घर में दफ़न कराया और पुराना मकान ढहाकर ये मक़विरे बनवाये । 

ग्रब गाजीउद्दीन हैदर के समय में न वाप की-सी सूकबूझ और दौलत की 
क॒द्र थी और न पिछले शासकों की-सी फ़ौजी सरगर्मी । हां ग्रासफउद्दौला के 
जमाने की-सी आराम-तलबी और ऐशपरस्ती जरूर थी | मगर उसमें भी यह 
फ़कं आ गया था कि आसफ़ उद्दौला की फ़िज लखर्चो भी देश तथा जनता को 
लाभ पहुंचाने के लिए होती थी और ग्रब सिफं स्वार्थपरता के लिए होती थी । 

ग़ाज़ीउद्दीन हँदर को बाप का जमा किया हुआ करोड़ों रुपयों का नकद 
खजाना मिल गया था जो शाही शौक के पूरा होने में बड़ी दरियादिलो से 


गुज़िश्ता लखनऊ 35 


उड़ने लगा मोती महल में, हम कह आये हैं कि, उत्तर की ओर सझादतझली 
खां ने एक कोठी बनवायी थी, ग़ाजीउद्दीन हैदर ने उस प्रहाते में दो और 
कोठियां बनवायी जिनके नाम, “मुबारक मंजिल” और “शाह मंजिल रखे गये । 
शाह मंजिल के पास ही किश्तियों का एक पुल था और मुबारक मंजिल 
उसके पूर्व में थी । शाह मंजिल के सामने नदी के पार एक चरागाह थी जो 
टेजारी बाग के नाम से जानी जाती थी और उसमें मीलों तक सुखद बगीचा 
चला गया था | उसमें अक्सर मस्त हाथी, गैडे और जंगली जानवर लडाए 
जाते और बादशाह उस पार शाह मंजिल के कोठे पर बैठकर उनकी लड़ाई 
का तमाशा देखा करते थे । शेरों की लड़ाई भी वहीं होती जिसके लिए मज- 
बूत कटहरे औऔऔर एक बढ़िया सकंस बना हुग्मा था । मगर जो छोटे नुक्सान न 
पहुंचानेवाले जानवर लड़ाए जाते उनकी लड़ाई खास शाह मंजिल के अहाते 
म इसी पार होती थी । 
ये दरिदों और जंगली जानवरों के लड़ाने का शौक हिंदुस्तान में यहां 
से पहले और कहीं नहीं सुना गया । मालूम होता है कि रेजिडेटों और दरबार 
में आने-जानेवाले योरुपियनों से रोमियों के एंफ़ी थियेटर के हालात सुनकर 
जहांपनाह के दिल में शौक़ पंदा हुआ मगर मौलाना हबीबुरंहमान खां साहब 
गेखानी के बताने से हमें मालूम हुआ कि दररिंदों की लड़ाई का रिवाज 
मृुगलों के जमाने से है । 
गाजीउदीन हेदर ने ग्रपनी एक योरपियन बीवी के लिए विलायती महल 
बनवाया ओर उसका नाम विलायती बाग करार दिया । वहां से करीब ही 
कदम गरसूल की इमारत बनवायी । गाजीउद्दीन हैदर की इच्छा के अनुसार 
ग्रंग्रेजी दरबार से उन्हें बादशाह की उपाधि प्रदान की गयी । इससे पहले ग्रवघ 
के शासकों का पद मंत्री के समान समझा जाता था और सिवाय 'नवाब' के 
ग्रौर कोई सम्मानित नाम या पद उन्हें नहीं दिया जाता था । उत्त जमाने तक 
हिंदुस्तान में मुगल शहंशाहों की इतनी ग्रान-बान बाक़ी थी कि यद्यपि देश 
स्वतंत्र था और विद्रोही शासकों में बंट गया था और दिल्‍ली के बादशाह के 
कब्जे मे सिफ दिल्‍ली के आसपास की ज़मीन बाक़ी रह गयी थी, लेकिन इस 
बदहाली पर भी शहंशाह झ्ौर जहांपनाह वही थे । न तो दिल्ली के सम्नाटों 
के अलावा हिंदुस्तान में किसी को बादशाह कहलाने का हक़ था और न 
खिताब या इज्जत देने का । उनके इस ग़रूर को तोड़ने के लिए ईस्ट इंडिया 


36 गुजिश्ता लखनऊ 


कंपनी ने ग़ाजीउद्दीन हैदर को जिन्होंने बाप के खजाने में से बहुत-सा रुपया 
ग्रंग्नेजों को कर्ज दे दिया था, शाही का खिताब दिया और श्रवध दरबार ने 
इस सम्मान को बड़ी क॒द्र की निगाह से देखा । चुनांचे उस वक्‍त से अबध के 
शासक जो रेजिडेंटों के हाथों के खिलौने थे, बादशाह बन गये और प्रंतिम 
शासक वाजिदग्रली शाह के मरने तक उनके कृपापात्र रहे। 

ग़ाज़ीउद्दीन हैदर ने इसी शाही खिताब की यादगार में दरिया पार मच्छी 
भवन के सामने एक नया बाज़ार बसाया औऔऔरर उसका नाम वादशाहगंज रखा | 
इसी जमाने में हकीम मेहदी ने मेहदीगंज श्रावाद किया और प्रधान मंत्री आगा 
मीर की द्ाही इमारत के दूर तक फैल जाने की वजह से ऐन बीव शहर में 
मुहल्ला आगा मीर की ड्योढ़ी' कायम हुश्ा और उसी दौर में श्राग़ा मीर 
की सराय कायम हुई । 

बादशाह की और उससे ज़्यादा बादशाह बंगम की मज़हबी मामलों में बहुत 
ज्य[दा दिलनस्पी थी । सफ़विया खानदान के जमाने से ईरान का मज़ हब शीया 
इसना अशरी? था मगर हिंदुस्तान के श्राम मुसलमान सुन्ती थे। नवाब 
बुरहान-उल-मुल्क चूंकि विलायत से नये आये थे इसलिए उनका और उनके 
सारे खानदान का मज़हब शीओऋञ्रा था | इस सबके बावजूद वहुत ज़माने तक 
लखनऊ भें हुकूमत का वही पुराना तरोक़ा चला गाता था जो इस्लामी सहल्त- 
नत के शुरू से ही हिंदुस्तान के दूसरे शहरों श्रौर सारे देश का था । मगर 
उस वक्‍त बादशाह और उनकी खास मल्का की मजहबी दिलचस्पी की वजह 
से शीत्रा मत लखनऊ के शासन का प्रमुख भ्रंग बन गया । फिरंगी महल के 
विद्वानों की ओर से शासकों का ध्यान हट गया और मुज्नहिदों” का खानदान 
तरकक़ी पाकर सलल्‍तनत का ग्रसली क़ानूनसाज कराए पाया । 

लेकिन शीआ मत अगर अपनी ग्सली हालत पर कायम रहता तो कोई 
बात न थी, खराबी यह हुई कि वादशाह बेगम की अमीरों की-सी मजहबी 
गतिविधि ने, जो अज्ञान से भरी थी, शी्मा मत में नगी-नयी बाते पैदा की 
जिनकी वजह से सिर्फ यही नहीं हुआ कि बादशाहों और अ्रमीरा में तरह- 
तरह की बचकाना ग्रादतें पंदा हुई वल्कि लखनऊ का शीझा मत सार संसार 





4 ईरान का एक परिवार । 
2 बारह इमामों को मानने वाला शोआ। 
3 शो संप्रदाय का अधिकारी विद्वान । 


गुजिव्ता लखनऊ 37 


के शीक्रा मत से नया, निराला ओर अजीब हो गया | 

सबसे पहले बेगम साहबा ने उस समय के बड़े इमाम साहब की छठो की 
रस्म मनाई जिसमें अगर यह होता कि किसी महफिल मे इमाम साहब के 
हालात बयान करके सवाब हासिल कर लिया जाये तो कोई हज न था, मगर 
नहीं यहां हिंदुओं की जन्माष्टमी की परंपरा के अनुसार पूरा जच्चाखाना 
बनाया जाता । उसके बाद यह तरकक्‍क़ी हुई कि उन सेयदों की, जिनका वंश 
निमंल था, खूबसूरत लडकियां लेकर बारह इमामों की बीविया क़रार दी 
गयीं जिनका नाम 'अछतिया' रखा गया और जब वे इमामों की बीवियां थीं 
तो फिर उनके यहां इमामों का जन्म भी होता और बारहों इमामों के जन्मो- 
त्सत्र बड़े ठाट-बाट के साथ मनाये जाने लगे । 

गाजीउद्दीन हैदर बहुत ही क्राधी-स्वभाव और उद्दिग्न-चित्त गरासक थे। 
उनका रौबदाब ऐसा था कि उनके मसमय में अ्रग्रेज़ों से संबंध तो अच्छे रहे 
मगर आगा मोर, जो प्रधान मंत्री था, दरबार पर इतना हावी हो गया था कि: 
खुद बादशाह बेगम और राजकुमार तक उसके अत्याचार से न बच सकें । 
ग़ाजीउद्दीन हैदर उसे घसों और लातों से मारते जिस मार का वह ख़ुणी से 
खा लेता मगर इसका बदला दरबार के दूसरे प्रतिष्ठित सदस्यों ग्रौर बादशाह 
के रिब्तेदारों से लिया करता । 

इससे पहल ग्रवध नरेश ने धामिक श्रद्धावश नदी के किनारे और मोती 
महल के पास नजफे-अशरफ यानी हजरत अली के रोज़ (समाधि) की नकल 
नखनऊ में बनवाई और उसकी रोशनी झौर देख-भांल के लिए बहुत-सा 
रुपया ग्ंग्रेज सरकार के हवाले किया जिसकी बदोलत आज तक बह बारोनक 
और खूब आबाद है | सन 827 म जब नवाब साहब का निधन ह्य्रातोवे 
उयी में दफन हुए ' ; 


[6] 


827 ई० में ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के बेटे नसीरउद्दीन हैदर तख्त पर बेठे। 
ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के ज़माने से, जेंसा कि हम बता चुके हैं, अवध के शासक 
नवाब नहीं, बादशाह थे । इस सम्मान का प्रारंभ दिल्‍ली के वजीर के पद से 
हुआ था ओर पहले के जबरदस्त, महत्वपूर्ण शासक सभी नवाब वरज़ीर कहलाते 
थे। लेकिन अब जबकि असल हुकूमत और धाक खत्म हो चुकी थी और 
हिंदुस्तान की राजनीति में उन लोगों का बिल्कुल असर बाक़ी न रहा था, 
ये बादशाह बन गये । 

खयाल किया जा सकता है कि अंग्रेजों ने श्रवध के शासकों को बादशाही 
इज्जत दी तो अपनी हिमायत से उनकी धाक श्रौर दबदबा भी बढ़ा दिया होगा 
और उन्हें नाम ही का बादशाह नही बल्कि असल में वादशाह बनाकर दिखाया 
गया होगा । लेकिन नहीं, हमें यह नज़र ग्राता है कि उस ज़माने में अ्रवध के 
बाहर उन लोगों का असर तो बिल्कुल था ही नहीं, खुद अपने राज्य में भी 
वे इतने भ्राजाद न थे जितने कि उनके पूर्वज होते झ्ाये थे 4 अरब किसी की 
ताजपोशी बगशर भअंग्रेज़ों की मंजूरी के हो ही न सकती थी । प्रंग्रेज़ फोज सारे 
राज्य में जगह-जगह फली हुई थी । कोई भी महत्वपूर्ण मामला बगैर रेजि- 
डेट साहब के हस्तक्षेप के ते ही न हो सकता था । राजसिहासन एक मंच था 
जिस पर जो कुछ होता बज़ाहिर नज़र आता कि अभिनेता कर रहे है लेकिन 
असल में उस अभिनय का नियंता कोई और ही व्यक्ति था जो पर्दे की आड़ 
में थाऔर जो चाहता था करता था। 

मगर खुदा को इतनी मेहरबानी थी कि उन पिछले ग्रवध-न रेशों और 
उनके साथ-साथ राज्य से संवद्ध सभी व्यक्तियों की संवेदनशीलता समाप्त हा 
चुकी थी जिसके कारण वे अपनी कमजोरी और लाचारी को बिल्कुल महसूस 
न कर सकते थे । ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह बनते ही ऐश-इशरत में गक हो 
गये और नसीरउद्दीन हैदर को तो शाही तख्त विरसे में मिला था। नवाब 
सप्मादतअलो खां का जमा किया हुआ रुपया दोनो की विलासिता में सहायक 
हुआ । कुछ भश्रंग्रेजों को उधार दिया गथा, कुछ उन मज़हबो रस्में संपन्न करने 
में खर्च हुआ जिन्हें बादशाह और उनकी मल्काओं ने अपनी रुचि के अनुसार 


गुज़िइता लखनऊ 39 


बड़े शोक़ से इजाद किया और बाकी फ़िजूल खचियों ग्रौर ऐयाशियों की नज्तर 
होने लगा । गाजीउद्दीन हैदर ने तो इतना भी किया था कि नजफे-ग्रश रफ की 
नकल बनवाकर अपनी कब का ठिकाना कर लिया और बिना इसके कि अपने 
विरसे पर भरोसा करें कुछ रुपया अंग्रेजों के हवाले किया कि उसके सूद से 
धामिक संस्कारों के साथ नजफ़ की देखभाल किया करें । चुनांचे श्राज तक 
उनकी क़ब्र पर चिराग जलाया जाता है, मजलिसे! होती हैं, कुरान-पाठ होता 
है झ्रौर मुहरंम में खूब रोशनी होती है जिसकी बदौलत थोड़े से गरीबों का 
भी भला हो जाता है । मगर नसी रउद्दीन हैदर को भोग-विलास से इतनी भी 
फु्सेत न मिली । दरिया पार मुहल्ले इरादत नगर मे उन्होने एक कर्बला बन- 
वायी जहां खुद उनकी कब्र बननेवाली थी मगर उसको देखभाल पर ज़रा भी 
ध्यान नहीं दिया गया जिसका नतीजा यह है कि आ्राज वह डालीगंज के स्टेशन 
के पास उजाड़ और खामोश पड़ी है और शायद कोई चिराग जलानेवाला 
भी नहीं । उनके ज़माने में नये मुहल्ले गणेशगंज प्रौर चांदगंज वहीं नदी के 
पार आबाद हुए । 

नसीरउद्दीन हैदर को ज्योतिष से बड़ा लगाव था जिसने उन्हें खगोल 
शास्त्र को ओर आाकृष्ट किया और उन्होंने इरादा किया कि अपने शहर में 
एक उच्च कोटि की वेधशाला कायम करें । चुनांचे उसी मकसद के लिए एक 
कोठी नवाब सग्मादतग्नली खां के मक़बरे और मोती महल के दरम्यान में 
बनवायी जो वंधशाला होने के कारण लखनऊ में 'तारे वाली कोठी' के नाम 
से मशहूर हुई | इसमें बढ़ी-बडी दूरबीनें और अन्य उच्च कोटि के यंत्र इकट्ठे 
किये गये | उनको ठीक ढंग से क़्ायम करने का काम और उनका इंतजाम 
कनंल वेलकावस के सुपुर्द हुआ जो एक अच्छे खगौलविज्ञानी थे | मगर लख- 
नऊ की यह वेघशाला मानो कनंल साहब ही के जीवन की एक अज्ञात घटना 
थी क्‍योंकि 827 ई० से नसीरउद्दीन हैदर का शासन प्रारंभ हुआ जिसके 
चार-पांच साल बाद शायद यह वंधशाला क़रायम हुई होगी और उस समय से 
847 ई० तक जबकि अवध के अंतिम शासक वाजिदग्नली शाह का जमाना 
था, यह वंघशाला उन्ही की देखरेख में चलती रही । उसी वर्ष में कनंल 
साहब का देहांत हुआ झौर उनकी जगह कोई खगोलविज्ञानी उस काम के 
लिए नियुक्त नहीं किया गया । वाजिदग्नईली शाह ने उसकी, ओर से लापर- 





'कबेला के शहीदों की शोक-सभा । 


40 गुज़िइ्ता लखनऊ 


वाही बरती । लखनऊ के कुछ झभधिक्ृत व्यक्तियों की ज़बानी सुना गया कि 
उसकी सबसे बड़ी दूरबीन को वाजिदग्नली शाह ने एक खिलोना समभकर 
हैदरी वेश्या के हवाले कर दिया था | लैकिन 'ग़जेटियर' से मालूम होता है 
कि यह वेधशाला सल्तनत के समाप्त होने तक कायम थी । शायद ग़दर में 
बलवाइयों ने इसे तबाह कर दिया क्‍योंकि एहमदउल्ला शाह ने (जो डंका 
शाह भी कहलाते थे और अंग्रेज फौज से बड़ी वीरता और साहस के साथ 
लड़ते थे) तारे वाली कोटी ही में निवास किया था, इसी में अपना दरबार 
क़ायम किया था और विद्रोही सेना के ग्रफसर यहीं इकट2 होकर सलाह- 
मशविरा किया करते थे । 

इसी जमाने मे रोशनउद्दोला ने जो प्रधान मंत्री थे अपनी खबसूरत श्रौर 
शानदार कोठी बनवायी जिसमें फ़िलहाल डिप्टी कमिश्नर बहादुर इजलास करते 
हैं इसलिए कि वाजिदगली शाह ने इस कोठी को कसर बाग बनवाते व्त्तः 
ज़ब्त कर लिया था और जब प्रांत पर अंग्रेजों का कब्जा हग्याः तो यद कोटी 
सरकारी जायदाद थी! 

नसीरउद्टीन हैदर का जमाना, सच यह है कि, बहत दही खतरनाझ उमा 
था । एक ओर तो शासन-प्रबंध ढीला था, बादशाह को ऐश-ईहारत और झपर्क' 
बनाई हुई मज़हबी रस्मों से फ़्सेंत न मिलती थी, सारा इंतिजाम प्रधान मंत्री एः 
छोड़ दिया जाता था और मत्रियों की यह हालत थी कि छई ऐसा व्यक्ति 
मिलता ही न था जो नेकनियती और समभदारी से काम चला सके । हकीम 
मेंहदी बुलाये गये | वे प्रबंधक तो अच्छे थे लेकिन चाहते थे कि सल्तनत क्र! 
ग्रपनगी जायदाद बना ल। रोशनउद्रोला मंत्री बन, उनमें न कुछ करने को 
सामथ्यं थी और न दिलचस्पी, उनसे कुछ करते-धरते न बनी । बादशाह की 
फिजल -खाँचियों की यह हालत थी कि सगआमादतग्रली खां का जमा किया हुआा 
सारा रुपया पानी की तरह उड़ गया और राज्य की ग्रमदनी महल के खर्च के 
लिए काफ़ी न हो सकी । इतना ही नहीं, बादशाह ग्रौर उनको मां, गाजीउदीन 
हैदर की खास पत्नो, में झगड़े शुरू हुए। वे मुन्नाजान को बादशाह का बेटा 
बताती थीं और बादशाह उसे अपना बेटा नहीं मानते थे । इन बातों ने अवध 
की यह हालत कर दी कि मालूम होता था शासकों में शासन करने और देश 
को संभालने की बिल्कुल सामथ्य नहीं है । 

रेजिडेंट साहब और हिंद के गवनंर जनरल ने बार-बार समभाया, ढराया, 


गुजिहता लखनऊ 4] 


धमकाया, प्रंजाम से श्रागाह किया और बराबर कान खोलते रहे, मगर यहां 
किसी के कान पर जूं न रेंगी । नसीरउद्दीन हैदर में औरतों में रहते-रहते इस 
ह॒द तक ज़नानापन आ गया था कि वे औरतों की-सी बातें करते और औरतों 
ही का लिबास पहनते । ज़नाना-मिजाजी के साथ मज़हबी विश्वास ने यह शान 
पंदा कर दी कि बारह इमामों की फ़र्जी बीबियां (अ्रछृतियां) और उनके जन्मो- 
त्सव ग्रादि को जिनको उनकी मां ने प्रचलन दिया था और अधिक प्रश्नय 
मिला । यहां तक कि इमामों के जन्म से संबंधित समारोहों में वे खुद गर्भवती 
स्त्री बन कर प्रसृति-गृह में बैठते, चेहरे और हाव-भाव से प्रसव-पीड़ा प्रकट करत 
श्रौर फिर ख॒द एक काल्पनिक बच्चे को जन्म देते जिसके लिए जन्म, छठी और 
नहान की व्यवस्था उसी तरह की जाती जिस तरह कि वास्तव में ऐसे समय 
की जाती है | ये उत्सव इतने ग्रधिक थे कि साल भर बादशाह को इन्ही से 
फु्सत न मिलती थी, सल्तनत की तरफ़ कौन ध्यान देता ? 

ग्रवध दरबार और गंग्रेज़ सरकार के संबंध देखने से मालूम होता है कि 
ग्रगर गवनंर जनरल झोर रेजिडेंटों की मेहरबानी न होती ग्रौर इंग्लेड का जे! 
बोर्ड ईस्ट इंडिया कंपनी की निगरानी करता था, कंपनी को रोके-थामे न रहता 
तो हुकूमत के खात्मे की कारेंबाई उसी ज़ामाने में हो गयी होती | मगर इस 
दरबार की जिंदगी, जिसके शासक बचकाना आदतें रखते थे, अभी बाक़ी थी 
ग्रंग्रेज़ प्रांत पर अधिकार करने का विचार करके रह गये । 

नसी रउद्दीन हैदर के संबंध में लखनऊ के पुराने और विव्वस्त लोगों का 
ब्रयान है कि वे इस स्त्रणता ओर बचकाना हरकतों के साथ-साथ बहुत हों 
जालिम भी थे । लेकिन चूंकि सारी जिंदगी औरतों में बसर होती थी इसलिए 
उनके जुल्म का शिकार भी ज़्यादातर औरतें ही होती । बीसियों स्त्रियों का 
छोटे-छोटे कुसूर और मामूली बदगुमानी पर दीवारों में चुनवा दिया । कहते हैं कि 
रास्ता चलते किसी मर्द को किसी औरत के सीने पर हाथ रखे देख लिया था, 
फौरन औरत की छातियां और मद के हाथ कटवा डाले । 

ग्राख़िर दस बरस की कुरीतियों के बाद जबकि अंदर-बाहर के सभी दर- 
बारी जिंदगी से तंग आ गये थे, बादशाह खुद अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के 
हाथ का शिकार बने और किसी ने जहर देकर 837 में उनका काम तमाम 
कर दिया । नसीरउद्दीन हैदर निस्संतान मरे थे । मुन्नाजान को ग्राजीउद्दीन 
टैदर की बेगम ने हमेशा भ्रपता पोता और सल्तनत का सच्चा वारिस बनाकर 


42 गुज़िइता लखनऊ 


पेश किया । मगर ग़ाजीउद्दीन हैदर और नसीरउद्दीन दोनों ने उनके शाही 
नस्ल से होने को नहीं माना था । इसी कारण से अंग्रेज सरकार ने नवाब सआा- 
दत अली खां के बेटे नसीरउद्दौला सुहम्मद अली खां की गद्दीनशीनी का पहले 
से बंदोबस्त कर लिया था, मगर बेगम साहबा न मानीं । मुन्नाज़ान को लेकर 
लाल बारहदरी यानी उस जगह ले गयीं जहां सिंहासन था । रेज़ीडेंट ने हज़ार 
रोका और समभाया, मगर एक न सुनी और जबरदस्ती मुन्नाजान के तख्त 
पर क़दम रखते ही उनकी बलाएं लीं झौर अपने दुश्मनों से फ़ौरन बदला लेना 
भी शुरू कर दिया । बहुतों के घर लुटवाये, कुछ को गिरफ्तार कर लिया, बाज 
कत्ल हुए और शहर में एक हडबोंग मच गया । 

रेजिडिंट साहब श्रौर उनके सहायक फ़ौरन दरबार में पहुंचे । बादशाह 
बैगम को समभाया कि मुन्नाजान सल्तनत के वारिस नहीं हो सकते और 
इसमें ग्रापफो हरगिज़ कामयाबी न होगी । फिर लाट साहब का लिखित फ़र- 
मान दिखाया और कहा कि बेहतर यही है कि मुन्नाजान तख्त को खाली कर 
दें और नसी रउद्दौला को गद्दी पर बिठाया जाये, मगर किसी ने एक न सुनी । 
बल्कि किसी ने असिस्टेंट रेजिडेंट पर हमला किया जिससे उनका चेहरा लहु- 
लुहान हो गया । रेजिडेंट ने मंडियाझ्रों से अंग्रेज फ़ौज पहले ही से बुलवा ली 
थी ओर उसने तख्तगाह के सामने तोपें लगा दी थीं और सिपाही क़तार बांधे 
खड़े थे। मजबूरन रेजिडेंट साहब ने घड़ी हाथ में ली और कहा दस मिनट 
की मोहलत दी जाती है। इस समय के अंदर अगर मुन्नाजान तख्त से न उतरे 
तो जबरदस्ती की कारंवाई की जायेगी । इसकी भी किसी ने परवाह न की 
हालांकि रेजिडेंट बार-बार कहते जाते थे कि अब पांच मिनट बाक़ी हैं, अब 
दो ही मिनट रह गये, और अब देखिए पूरा एक मिनट भी नहीं । 

इन चेतावनियों पर किसी ने ध्याने न दिया और यकायक तोपेों ने गुरानें 
मारना शुरू कों। आनन-फ़ानन में तीस-कालीस आदमी गिर गये । दरबारी 
घबराकर गिरते-पड़ते भागे । जो नृत्य मंडली मुजरा कर रही थी उसमें से भी 
कई आदमी जरूमी हुए । शीशे के बतंन मनाकन ट्टकर गिरने लगे । जब कई 
वफ़ादार बहादुर, जो डट कर मुक्राबिला कर रहे थे, मारे जा चुके तो मुन्नाजान 
ने भी तख्त से गिर कर भागने का निदुचय किया, मगर पकड़ लिए गये । 
गरज़ बेगम साहबा और उन्हें दोनों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और 
साथ ही नसीरउद्दोला को गद्दी पर बिठा दिया गया जो मुहम्मदगली शाह के 


गुजिश्ता लखनऊ 43 


नाम से ग्रवध के बादशाह करार पाये ओर मन्नाजान श्रोर उनकी दादी हिरा- 
सत में लखनऊ से कानपुर और कानपुर से क़िला चिनारगढ़ भेज दिये गये 
ग्रौर दो हज़ार चार सौ रुपया माहवार उनकी तनख्वाह लखनऊ के खजाने से 
मकरंर कर दी गयी। 

मुहम्मद अली शाह की उम्र गद्दीनशीनी के वक्त त्रेसठ बरस की थी। 
बूढ़े और तजुर्बेकार थे, ज़माने की ऊच-तीच और दरबार की बचकाना हर- 
करते देखते रहे थे | सबसे बड़ी बात यह थी कि नवाब सगञ्मादतग्नलो खां के बेटे 
थे और उनकी आंखें देखे हुए थे । उन्होंने बहुत संभल कर काम किया : मित- 
व्ययिता के नियम बनाये और जहां तक बना, इंतजाम को संभालने के झछोशिश 
की । मगर उम्र ज़्यादा ग्रा चुकी थी और शरीर जवाब दे रहा था | तख्त पर 
बैठते ही उन्होंने हकीम मेहदी को फरु्खाबाद से बुलवाकर वज़ीर के पद का 
खिलग्नत दिया मगर चंद ही रोज बाद वे मर गये | तब जहीरउद्दौला को 
अपना प्रधान मंत्री बनाया | दो-तीन महीने बाद वे भी दुनिया से चल बस 
ग्रौर मुनव्वरउट्राला वजीर करार पाये जिन्‍्होने दो-चार महीने के बाद ही 
इस्तीफा दे दिया और कबला चले गये । फिर अश्ञरफउद्दोला मुहम्मद इब्राहीन 
खां वजीर करार पाये जो औरों के मुक़ाबिलें ज्यादा समभदार और गभीर 
प्रकृति के थे । ; 

पुहग्मदशाह की तख्तनशीनी पर अग्रेज़ सरकार और अवध की सल्तनत 
म॑ एक नया क़रार हुआ जिसके ग्रनुसार अंग्रेज सरकार ने जो फौज अवध की 
निगरानी के लिए रखी थी उसमे बहुत ज्यादा वृद्धि हुई और ईस्ट इंडिया 
कंपनी की गवनेंमेंट को यह इसख्तियार हासिल हुआ कि सार ग्रवध में या उसके 
जिस इलाक़ के शासन में ढील देखे उसे जब ठक चाहे अपने शासन में रखे । 
बादशाह ने अ्रनिच्छा से इस करार पर हस्ताक्षर किये और जहा तक बना 
प्रांत की स्थिति में सुधार करने लगे । 

तख्तनशीनी के दूसरे हो बरस उन्होंने अपना मशहूर इमासबाड़ा हुसेता- 
बाद और उसके क़रीब एक ग्रालीशान मस्जिद बनवाना शुरू की जिसके लिए 
यह प्रबंध किया गया कि दिल्‍ली की जामे मस्जिद से रोनक और गआकार में 
बढ़कर हो । 

उन दिनों लखनऊ की ग्राबादी श्लौर रौनक इतनी बड़ गयी थी ग्रौर इतने 
अधिक लोग वहा और गझ्ासपास आबाद थे कि उसे हिंदुस्तान का बाबुल 


44 गुजिइ्ता लखनऊ 


कहना बेजा न था । वास्तव में यह शहर हर हैसियत से उस युग का जिंदा 
बाबुल था । 

इस समानता के बारे में शायद प्रंग्रेजों या किसी अन्य दरबारी से सुनकर 
मुहम्मदग्मली शाह ने इरादा किया कि लखनऊ को पूरा-पूरा बाबुल बना दें 
और अपनी एक ऐसी यादगार क़ायम कर दे जो उनके नाम॑ को अवध के दूसरे 
बादशाहों से ज़्यादा बुलंदी पर दिखाए । उन्होंने बाबुल के मीनार या वहां के 
हवाई बाग़ की तरह की एक इमारत हुसेनाबाद से क़रीब और मौजूदा घंटा- 
घर के पास बनवाना शुरू की जिसमें महराबों के गोलाकार वृत्त पर दूसरा 
वृत्त और दूसरे वृत्त पर तीसरा वृत्त, गरज यों ही तले-ऊपर कायम होते चले 
जाते थे । इरादा था कि यों ही सात मंजिलों तक उसे ऊंचा करके एक इतना 
बड़ा और ऊंचा बुर्ज बना दिया जाये जो दुनिया भर में लाजवाब हो। और 
उसके ऊपर से सारे लखनऊ और उसके आसपास का मंदान नजर गये । यह 
इमारत अगर पूरी बन जाती तो निबचय हो लाजवाब और ग्राश्वयंजनक 
होती । उसका नाम सतखंडा करार दिया गया था और बड़ इंतज़ाम के साथ 
बन रही थी, मगर पांच ही मंजिलें बनने पायी थी कि मुहम्मद ग्रली शाह ने 
842 इ० में इस संसार से कच किया । 

मुहम्मद अली शाह ने अपने जमाने म॑ बिना इसके कि अंदरूनी भगड़ 
पंदा हों या देश की शासन-व्यवस्था बिगड़े. लखनऊ को बहुत ही खबसूरत 
शहर बना दिया। हुसे नाबाद के फाटक से रोमी दरवाज़े तक दरिया के किनारे- 
किनारे एक सड़क निकाली जो चोक कहलाती थी। इस सड़क पर दुतर्फा 
ग्रालीशान मकानों के बावजूद एक तरफ रोमी दरवाजा, आसफउद्दौला का 
इमामबाड़ा और उसकी मस्जिद थी, दूसरी तरफ सतखंडा और हुसेनाबाद का 
फाटक था । इस नये इमामबाड़े की अनेक गगनचंवी इमारते थी और उनके 
बाज में जामा मस्जिद स्थित थी । और सब इमारतों ने मिलकर दोनों ओर 
एक ऐसा मनोहर दृश्य प्रस्तुत कर दिया था जो दुनिया के तमाम मशहर और 
और सुंदर दृश्यों की मात करता था | और ग्रब भी हालाकि दरम्यान में 
शहर क बाशिदों के जितने मकान थे सब खुद गये, मगर यह दुनिया का एक 
संदरतम दृश्य माना जाता है । 


|: 2-०] 


मुहम्मदश्नली शाह के बाद अ्रमजदग्बली शाह राजसिहासन पर बंठे ! 
मुहम्मदघली शाह ने कोशिश की थी कि युवराज की शिक्षा-दीक्षा उच्च कोटि 
की हो । चुनांचे उन्हें विद्वानों की संगति मे रखा | नतीजा यह हुआ कि ग्रम- 
जद ग्रली शाह बजाये इससे कि पढ़ने-लिखने में कोई विद्येष प्रगति करे शिप्टा- 
चार और आदत-स्वभाव की दृष्टि से एक सच्चे मौलवी बन गये | हुकूमत की 
बागडोर हाथ में ग्रान के बाद उनका जो कुछ होसला था यह था कि उनके 
साथ सारी र्याया हजर को अ्रपना श्रद्धय मान ले । लेक्नि जाहिर है कि 
धामिक विद्वानों और देद्य के नताग्नों को राजनीति से कोई सरोकार नहीं हों 
सकता । वे ने राजनीतिज़ हो सकते है और न राजममज्ञ । उनसे जं। कुछ 
हिदायत मिल सकती थी यह थी कि सँयदों की सेवा की जाये और राज्य क!ः 
घन इंहकर के भनन्‍्कों क॑ यता और सवा में खर्च हा । और यह काम न 
छाठः, संयर्मी और *ूच्च रत्र ग्रवव नरेश ग्रमजदर अली शाह की नजर मे 


घ्थ 


उसया समय सतोषजनद ह सकता था जब खद मज्ताटिद-पल-ग्रस्त के सवान्व 


हाथा से सपन्‍न हो। चुनाचे दम की आमदनी से से लाखों रुपये जकात (दान, 
के नाम से उनकी नज्य का जाते और उसके अलावा झोर भी बहता 
55 8 20:77 46 व शक शत मई 

ग्रमंतद घबली शाह के वए संयम और शुद्धता का विचार एदा नाग बन 
गधा था / वे 7 नही चांजः के! पाबंदी में इतने व्यस्त रहते थे कि शासन-प्रब्ध 


नतीजा यह हझ्मा कि मुह्म्मद झली ज्ञाह ने अपनी तजुबकारी और समभ- 


कि क्राजा मृहम्मद सादक़ ला का बयान के मृताबिक सारे कर्मचारी 
बईमान आर स्वार्थी थ | रप्माया तबाह थी, जबरदस्त का ठगा 
जालिम झ्ौर मृजरिम को सजा न मिलती थी, खज़ाना खाली था. रिइ्वतल- 
खोरी की गर्मबाज़ारी थी और जो हंगामें और फ़साद पंदा होते थ किसी के 
मिठाये न मिट सकते थ । 


लेकिन इस संयम और जनसाधारण के हितों के प्रति उदासीनता ऋर 


46 गुजिश्ता लखनऊ 


लापरवाही पर भी उन्होंने मुहल्ला हज रतगंज आबाद किया जो आज लखनऊ 
म॑ तमाम मुहल्लों स ज़्यादा साफ-सुधरा, घना ग्राबाद, बहुत ही खूबसूरत 
धनी व्यापारियों का सबसे बड़ा बाज़ार है और सिविल लाइन का सबसे 
ज्यादा वारौनक़ हिस्सा है| उन्होंने लनखऊ से कानपुर तक सीधी एक पक्‍की 
सड़क बनवायी । उनके काल में सबसे बड़ा काम यह हुग्ना कि लोहे के पुल की 
इमारत बन कर तेयार हो गयी । इस पुल के निर्माण का एक महत्व यह भी 
कि इसमें लगी सामग्री ग़ाजीउद्दीन हैदर ने इंग्लेड से मंगवायी थी, मगर 
पुर्जे और सामान जब तक लखनऊ पहुंचे बादशाह यह झसार संसार छोड़ 
के थे। नसीरउद्गीन हैदर के जमाने में जब वे पूज़ विलायत से आये हो 
नि अपने दरबार के इंजीनियर मि० सिक्‍लेयर को उन पूर्जो के जोइने 
| बना कर खड़ा कर देने का ठेका दिया ग्रौर हुक्म दिया कि वे 
जिडसी के सामने दरिया के उस पार डाल दिये जायें । जिस जगह 
के ये लोहे के पुर्जे डाले गये थ उस जगह ठा पता देने के लिए ग्राज 
एक घाट और मंदिर क्रायम है| मि० सिक्‍लेयर ने दरिया के अंदर 
खंबे गाइने के लिए गहरे कुएं खुदवाये और उन खंबों की जुड़ाई भी करा ली, 
मगर उसके बाद उनसे कुछ करते घरते न बना और पूल पूरा न हो सका | 
मुहम्मद अली गाह के ज़माने मे यह एल अधूरा पड़ा रहा, मगर ग्रमजद अली 
शाह ने अपने काल में उसकी ओर ध्यान दिया और पुल बन कर तैयार हो 
गया । लेकिन जा लोहे का पुल आजकल क़ायम है वह मुहम्मद गली शाह के 
जमान का पुन नहीं है । वह एक हैशिंग ब्रिज यानी लटकने वाला पुल था 
जिसका सारा भार लोहे के चार ऊंचे और ज़बर दस्त खबों पर लटक रहा 
था । अंग्रेजों के जमाने में जब उमके पुर्जो पर जंग लग गया और वे कमजोर 
पर गये ग्रौर उस पर झाम ग्रामद-रफ़्त में खतरा नजर आया तो उसे 
गिरवाकर उसकी जगह दूसरा लोह का पुल कायम किया गया और वहां पूल 
ग्राज भी मोजद है । 
ग्रमजद अली शाह ही के ज़माने में उनके वजीर अमीनउदौला ने 
ग्रमीनावाद आबाद किया जिसकी आबादी और रोनक आजकल दिन-दूनी 
ग्रोर रात-चोगुनी तरकक़ी कर रही है | ग्रमजद अली शाह ने अपने जमाने में 
हालांकि कुछ नहीं क्रिया और न ग्रपते शौक से कोई ऐसी इमारत वनवायी 
जो श्राजजल उनकी यादगार हो, मगर शायद अपने संयम और परवित्र-हृदयता 


मं 


जे 
हट 
तने 
तू 


| 
न 
- 


बा 
ह 


न्‍फे 
॑ 


लें 


हि | 
हि हे 
। ह 


| न 
जज 


[9 2) 


गुजिश्ता लखनऊ 47 


के बदले उन्हें यह कुदरती नामवरी हासिल हो गयी कि लखनऊ के 
ग्राजकल के वे सबसे ज्यादा मशहर, सबसे ज्यादा आबाद और दौलतमंद 
महलले ग्रमीनाबाद और हजरतगंज उन्हीं के जमान की यादगार हैं । 

आखिर जमाने ने उनके दौर का पन्‍ना भी पलटा और 848 ई० मे 
जबकि उम्र अड़तालीस बरस से कुछ ही दिन ज्यादा थी, कंसर के रोग से 
पीडित होकर द्वनिया से रुव्सत हो गये और अपने ग्राबाद किये हुए मुहल्ले 
हज रतगंज में मेड खा सरिसालदार की छावनी के अंदर दफ़्न हुए। उनका 
इमामवबाडा जिस मे वे दफन है हजरतगंज के पश्चिमी हिस्से में लबे-सड़क मोजूद है 
जिसकी इमारत उनकी मृत्यु के बाद वाजिद अलो शाह न दस लाख रुपय खच 
करके बनवायी थी | यह इमामबाड़ा हुसनाबाद की एक घटिया नकल है और 
प्रगर हसैनाबाद की तरह इसमें भी रोशनी होती तो मुहरंम में लखनऊ 
का पूर्वी हिस्सा भी जगमगा उठा करता । अगर्चे उसके लिए कोई पेंशन 
म॒करर नहीं है, लेकिन उसकी ग्रामदनी भी कम नहीं । अ्रहात को इमारत 
के बाहरी हिस्से की दुकानों में बहुत से अच्छे-अच्छे व्यापारियों की दुकान 
ग्रौर अदरूना इमारतों में बहत से यूरेशियन वगैरा रहते है जिनसे किराय 
की ग्रच्छी-खासी रकम वसूल होती है । मगर किराया वसूल करन वाला का 
यह भी गहसान है जो मुहरंम में खास कब्र और इमामवाड़ में चंद चिराग 
रौशन कर दिया करते है | 

ग्रव अरमजद अली शाह के बड़े बेटे वाजिद अली शाह तख्त पर बेठ । 
उनका जमाना इस पूर्वी दरवार के इतिहास का ग्रंतिम पृष्ठ और उस प्राचीन 
शोकगीत का अंतिम पद है । चकि अवध के शासन का गअ्रत उन्हीं के काल म 
हुआ इसलिए तमाम समभ-व्‌झ वाले लोगों के घिक्‍कार के व टी भागी बने 
ग्रौर यह भी लगभग सभी ने मान लिया कि सल्‍तनत के पतन का कारण वही 
थ्र । लेकिन जिस जमाने में उनकी सल्तनत का खात्मा हुमा है उन दिनों 
उद्स्तान की सारी देशी ताक़ते टट रही थीं और बुरी-मली सब तरह की 
पुरानी हुकूमतें दुनिया से मिटती जाती थीं। पंजाब में सिखों का और दक्षिण 
मे मराठों का दफ्तर क्‍यों उलटा ? वे तो बहादुर, जबरदस्त और होशियार 
माने जाते थे। दिल्‍ली में मंगल शहंशाही का और बंगाल में नवाब नाजिम 
बंगाल का पतन क्यों हुआ हालांकि उनमें ऐसा बचकानापन भी न था जितना 
कि लखनऊ के शासकों में मौजद था। उपर्युक्त चारों दरबारों में कोई वाजिद 


48 गुज़िशता लखनऊ 


अली शाह न था, हालांकि उनकी तबाही लखनऊ की तबाही से कम न थी । 

ग्रसल वात यह है कि उस युग में इधर तो हिदुस्तानियों की ग़फ़लत 
ग्रौर जहालत का पैमाना छलकने के क़रीब पहुंच गया था और उधर ब्रिटिश 
साम्राज्य की शक्ति और ब्रिटिश राष्ट्र की दूरदशिता, योग्यता और परिश्रम 
ये सब अपने प्रयत्नों ग्रौर अपनी उच्च संस्कृति तथा सम्यता का फल पाने 
की रोज़-बरोज़ पात्र बनती जा रही थीं। यह नामुमकिन था कि अंग्रेज राज- 
नीतिज्ञों की बुद्धिमता, अभ्यास, सूकबूक, नियमितता हिंदुस्तान के अ्ज्ञान 
और ग्रात्मविस्मृति पर विजय न पातीं । उस यूग ने सारी दुनिया में संस्कृति 
का एक नया रूप दारण किया था और वह पुकार-पुक्रार कर हरेक जाति से 
कट रहा था कि जो इसमें मेरा साथ न देगा मिट जायेगा । जमाने के इस 
डिढारे की ग्रावाज हिंदुस्तान, में किसी ने सुनी और सब मिट गए | इन्हीं 
सिटनेवालों में ग्रद्ध की सत्ततत भी थी जिसके पतन का दायित्व बेचारे 
वाजिद अली शाह पर डाल देना इतिहास के साथ अन्याय करना है । 

धमंणशास्त्र का पालन करनेवाले बाप ने वाजिद श्रली ज्ञाह को भी 
विद्वान] को संगति में रखकर ग्रपना जैसा दसाना वाहा था और यह रग एक 
हेंद लक वाजिंद ग्रली णाह पर चढ़ा भी जो उम्र के दलन तक ज्यादा खिलता 
गया । मगर अमजद अली थाह का इसमें कुछ जार न चला कि सल्तनत के 
बरस राजकुमार की स्वाभाविक प्रवृत्ति विलसिता और ललित कलागञ्रों की 
गोर थीं। हालांकि बाप के आग्रह के कारण लिखने-पढ़ने में भी अच्छे 
लेकिन संगीत का झोौक़ हावी था। अपने राजकुमारत्व-काल ही में ग्रपनी 
वर्याक्तक रूचि से उन्होंने पिता की इच्छा के विपरीत गवेयों और ढारियों को 
ग्रपन साथ रख कर गाना-बजाना सीखा | आवारा औरतों और डोम-डारियों 
से संपक वड़ाया यौर परिणाम यह हम्मना कि जोग्रानंद उन्हें संदर स्त्रियों 
ग्रौर गबयों की संगति में ग्याता ज्ञान-विज्ञान की सम्य मंडलियों म ने आता 
या । 

बाप के खिलाफ उन्हें इमारत का भी शीक था ओर यवराजत्व ही मे 
उन्होंने अपनी ग्रानद-सभा और भ।सविलास के लिए हक सुहावना जाग और 
उसमे दो-एक छाटे-छाट और खबसूरत मकान अन्याय गली नो खा जिन्हें 
लख्त बर बेंठले ही वज़ारत का स्िलअत दिया, उनसे ग्रगपने राजकुमा रत्व-काल 
ए शक रही के घर वर मलाओआल उड़े । उनकी योवनबरी चचलता ने 


गुजिश्ता लखनऊ 49 


राजकुमार को प्रभावित किया और जब उपयुक्त बाग और इमारत उनकी 
निगरानी में बनी और पसंद झायी तो समझ लिया गया कि वज़ारत औ्ौर 
राज्य के प्रबंधक के लिए उनसे अ्रधिक उपयुक्त कोई व्यक्ति नही है । 

वाजिद अली शाह को सल्तनत की शुरुआत तो इस प्रकार हुई कि नौज- 
वान बांके बादशाह को न्‍्याय और सेना-सुधार से विशेष रुचि थी । सवारी 
में आगे-आ्गे दो चांदी के संदृक़चे चलते । जिस किसी को कुछ शिकायत होती 
प्री लिख कर उसमें डाल देता | कंजी ख़द बादशाह के पास रहती | महल 
में पहुंच कर हुजूर उन अजियों को निकालते और अपने हाथ से उन पर हुक्म 
लिखते । इस तरह कई नये रिसाले और कई पलटनेें भर्ती हुई । रिसालों के 
नाम बादशाह ने अपने लेखन-कौशल से बांका, तिरछा, घनघोर रखे. और 
पलटनों के नाम अख्तरी, नादरी रखे गये । नवाब साहब खुद घोड़े पर सवार 
होकर जाते और घंटों धूप में खड़े होकर उनकी कवायद श्रौर युद्ध कौशल में 
उनका ग्रम्यास देखते ओर खुश हो-होकर दक्ष सेनिकों को इनाम-इकराम 
देते । उन्होंने फौजी कवायद के लिए खुद ही फ़ारसी शब्दावली और वाक्य 
बनाये : “रास्त रो (सीधे चल), “पस॒ बया (पीछे घम ), “दस्तर-चप 
बगिरद” (बाई श्लोर मुड) । चंद रोज बाद जवान और हसीन औरतों की 
एक छोटी ज़नानी फ़ोज बनायी गयी और उनको भी इन्हीं शब्दों में कवायद 
सिखायी गयी । 

मगर आधुनिक युग का यह पहला चिह्न कुछ ही दिन बाकी रहा । पूरा 
एक साल भी न गुजरा होगा कि तबीयत इन चीज़ों से उकता गयी । राज- 
कुमारत्व-काल की वही पुरानी रुचि फिर लोट आयी । सुंदर और श्रावारा 
औरतों की संगत बढ़ी, गआनद मंडलियों का आयोजन प्रारंभ हुआ और थोड़े 
ही दिनों में डोम, ढ़ाड़ी ही सभासद आर राज्य के प्रतिष्ठित लोग बन गये । 
बादशाह के दिल में ग्रब अ्रगर ज्ञान-विज्ञान या शिष्ट रुचि बाक़ी थी तो गह 
शाइरी थी क्‍योंकि वे खुद शेर कहते और शाइरों क। क॒द्र करते थे । 

लखनऊ में उन दिनों शाइरी का चर्चा हद से ज्यादा बढ़ा हुआ था । 
ग्रकेले लखनऊ मे इतन शाइर मौजूद थे कि प्रगर सारे हिंदुस्तान के शाइर 
जमा किये जाते तो उनकी तादाद खनन के यादहरों मे न नढ सकती । 
“और गौर सौदा ओो पुरानी शाह ह बकार दी चुद पे उबर तासिस 


एः 


की जबान प्रोर पग्राजडा के तथाजाव दुसार हे उसे ए से उनम पिंड 


50 गुजिश्ता लखनऊ 


और “सहबा” की सुरा-सुंदरो विषयक शाइरी और नवाब मिर्जा “शौक़'' की 
मसनवियों ने विषय-वासना को बढ़ावा दिया था और इसी प्रकार के विषयों 
में बादशाह की रुचि थी और यही उनके स्वभाव के अनुरूप भी थे । 

इस्लामी शाइरी का रंग इस्लामी खिलाफत की पहली सदी तक तो यह 
था कि शाइर एक खास औरत पर श्राशिक होते । उसका नाम लेलेकर 
उसकी सुंदरता और उसकी श्रदाओ्रों की चिता कषंकता का वर्णन करते और 
उससे संबोधन कर-क रके ग्रपनी बेचेनी और व्याकुलता जाहिर करते । ग्रक्सर 
छिप-छिपकर उससे मिलते, मगर तहज़ीब और शिष्टता के दायरे से कभी 
क़दम बाहर न निकालते । चंद रोज़ बाद अरब ही में माशक़ गुमनाम हो गया 
और झामतौर पर शाइरों का माशूक़ उनके ख्याल का एक पुतला बन 
गया जिसे भोगी तो कोई सुंदर स्त्री या कोई सुंदर लड़का बताते मगर सूफी 
ग्रन्योक्ति के माध्यम से उसे अपना प्रियतम यानी स्रष्टा बता देते । यही 
समोया हुग्ना, छिपा ढेंका अंदाज फ़ारसी शाइरी में रहा और यही रुचि उस 
समय तक उदू शाइरी की भी थी, मगर नवाब मिर्जा शौक़ ने अपनी शाइरी 
को हसीन पर्दादार औरतों पर आशिक़ होकर उनके खराब करने का साधन 
बनाया । और क्रयामत यह थी कि उनकी मसनवियों की ज़बान ऐसी खूब- 
सूरत, बेतकल्लुफ़ और साफ़-सुथरी थी और उनमें प्रेम-प्रणय के भाव इतने 
ज्यादा भर गये थे कि सम्य और शिष्ट लोगों से भी बिना देखे और मज़ा 
लिये न रहा जाता । 

वाजिद ग्रली शाह ने भी इन मसनवियों को देखा और चूंकि वे खुद शाइर 
थे, इस रंग को अपनाकर अपने बहुत से प्रेमों और अ्रपन यौवन की सैकड़ों 
श्रसंगतियों को खुद ही शेर के रूप में ढालकर देश में फला दिया श्रौर खुद 
अपने नेतिक अपराधों को स्वीकार कर लिया । मैं समझता हूं कि बादशाह तो 
बादशाह वजीरों और अ्रमीरों में भी विरले ही ऐसे रहे होंगे जिन्होंने युवा- 
वस्था में पग्रपनी कामवासना जी भर के पूरी न को हो। मगर वाजिद ग्रली 
, शाह को तरह किसी ने अपने उन बेशर्मी के अपराधों को खुद ही लोगों के 
सामने पेश नहीं किया था । वाजिद अली शाह ज़ोर में ग्राये तो चाहे शाइरी 
में न बढ़ सर्के मगर अपने भावों और विचारों और अपने कारनामों को 
दुनिया के सामने प्रकट करने में नवाब मिर्जा से भी दो क़दम झागे निकल 
गये श्रोर यहां तक तरवक़ी की कि बाज़ मौक़ों पर उन्हें घृणित बाज़ारी 


गुजिहता लखनऊ 5] 


मजाक श्लौर अश्लील शब्दों के प्रयोग में भी संकोच नहीं होता । 

वे कहारियों, रंडियों, दासियों, महल में आने-जानेवाली श्रोरतों, गरज 
सेकड़ों औरतों पर मोहित हुए और चूंकि युवराज थे इसलिए अपने प्रेम में 
पूरी तरह सफल हुए । उनके प्रेम की शमंनाक दास्ताने उनकी कविताओं तथा 

ग्रन्य रचनाओं में खुद उनकी जबान से सुनी जा सकती हैं और यही कारण है 

कि इतिहास में उनका चरित्र सबसे अधिक अपवित्र और कलूषित नजर 
ग्राता है । 

चूंकि इमारत का बेहद शौक़ था, इसलिए तख्त पर बैठते ही कैसर बाग 
की इमारत बनवाना शुरू कर दी, जो चाहे ग्रासफउट्रौला क्री इमारतों की तरह 
मज़बूत न हो, मगर खूबसूरती और घानदारी में लाजवाब है। इसमें बहुत ही 
सुंदर और शानदार दो मंजिली इमारतों का एक आयाताकार इलाका दूर तक 
चला गया था जिसका एक रुख जो दरिया की तरफ था गदर के बाद खोद 
डाला गया और तीन पहलू झब तक क़ायम है जिनको विभिन्‍न टुकड़ों में बांट 
कर गवनेमेंट ने भ्रवध के ताल्लुक़ादारों के हवाले कर दिया है और हुक्म दिया 
है कि उनमें रहें और उनको उसी स्थिति में कायम रखें । 

कसरबाग का अंदरूनी सहन जिसमे पेड़-पौधे लगे हुए थे जिलौखाना 
(अ्रस्तवल) कहलाता था । दरम्यान में पत्थर वाली बारहदरी थी जो झ्आाज- 
कल लखनऊ का टाऊन हाल है । उसमेझ्रौर कई इमारतें भी थीं जिन्होंने जमीन 
के उस हिस्से को संसार की विलक्षण वस्तु बना दिया था। ये इमारतें कैसर 
बाग के पूर्वी फाटक के बाहर थीं। लोगों को उस फाटक से निकलते ही दोनों 
तरफ लकड़ी के पद मिलते थे जिनमे से गुजरकर वे चीनी वाग में पहुंचते | वहां 
से वाये हाथ की तरफ मुडकर श्राप जलपरियों के एक आलीशान फाटक पर 
पहुचत जिस पर प्रधान मंत्री नवाव अली नक़ी खां का कयाम रहता था ताकि 
हर बकत जहांएनाह से करीब रहे और ज़रूरत के वक्‍त फौरन बुलाये जा 
सके । इस फाटक के उस तरफ हज़रत बाग था और अदर ही दाहिनी तरफ 
चांदी वाली वारहदरी थी | यह एक मामूली ईट-चूने की इमारत थी मगर 
छत में चांदी के पत्तर जड़े होने की वजह से चांदी वाली बारहदरी कहलाती 
थी । इसी से लगी हुई कोठी 'खास मकाम' थी जिसमें खुद जहांपनाह सलामत 
रहते झौर वहीं नवाब सम्रादत श्रली खां की बनायी हुई पुरानी कोठी 'बादशाह 
मंजिल थी । 


52 गुजिश्ता लखनऊ 


फिर इन लकडी के स्क्रोनों के गलियारे से निकलकर दूसरी तरफ मुडिए 
तो पेचीदा इमारतों का एक सिलसिला दूर तक चला गया था जो चौलक्खी के 
नाम से मशहूर थी । इन इमारतों की बुनियाद हुजूरी नाई अ्रज़ी मउललाह ने 
रखी थी जिन्हें बादशाह ने चार लाख रुपया देकर मोल लिया था। नवाब 
की ख़ास बेगम और दूसरी प्रतिष्ठित पत्नियां इसमें रहती थीं । इसी के अंदर 
गदर के ज़माने में हजरत महल का क़याम रहा और यहीं उनका दरबार हुआ 
करता था। 

यहां से एक सड़क क़ैसर बाग़ की तरफ आयी थी जिसके किनारे एक 
वडा भारी सायादार दरख्त था। इसके नीचे आसपास संगमरमर का एक 
सुंदर गोल चबूृतरा बनाया गया था जिस पर क़ंसर बाग के मेलों के जमाने 
में जहांपगाह जोगी बनकर और गेरुए कपड़े पहनकर ग्राते और धूनी 
रमाकर बंठते। इस चबूतरे से आगे बढ़कर एक आलीशान फाटक था जो 
चौलक्खी फाटक कहलाता था इसलिए कि उसके बनने में. एक लाख रुपये खर्च 
हुए थे और इससे बढ़कर आप फिर कंसर बाग में आ जाते । क़सर बाग़ की 
इमारत में सलतनत के अस्सी लाख रुपये ख़र्च हुए थे और उसके चारों तरफ 
की इमारतों में जहांपनाह की बेगमें और परियों जेसी सुंदर स्त्रियां रहती थीं 
जिनकी जगह अरब गअ्जीव-ग़री ब सूरतों को देखकर बाज़ पुराने जमानेवाले कह 
उठा करते हैं : 

परीोनहुफ़्ता रुखां-ओ-देव दरकरिश्मा-ओ नाज 
बसौख्त अक्लज हैरत कि ईचे बुलअग्रजबीस्त' 


कसर बाग के पश्चिमी फाटक के बाहर रौशनउद्दौला की कोठी थी । उसे 
वाजिद अली शाह ने जब्त करके उसका नाम 'क़ैसर पसंद' रख दिया था और 
उनकी एक प्रेमिका नवाब माशक महल उसमे रहती थीं। अब उसमें डिप्टी 
कमिइनर साहब की अदालत है। उसके सामने और क़सर बाग के उस पश्चिमी 
पहलू पर भी एक दूसरा अस्तबल था। 

साल में एक बार क़सर बाग में एक द्यानदार मेला होता था। जिसमे 
पब्लिक को भी क़ंसर बाग में ग्राने और जहांपनाह की विलासिता का रग 
देखने का मौका मिल जाता था। बादशाह ने श्रीकृष्णजी का रास, जो हिंदुओं 

परी ने अभ्रपना चेहरा छिपा लिया है और देव (राक्षस) नाज-नखरे दिखा 
रहा है । भ्रकक्‍्ल हैरान है कि यह सब कंसे हुआ ? 


गुजिश्ता लखनऊ 53 


में प्रचलित है, देखा था और श्रीकृष्णजी की प्रणय-लीला ऐसी पसंद झा गयी 
थी कि इस रास से ड़ामे के तौर पर एक खेल बनाया था जिसमें खुद कन्हैया 
बनते, बेगमें गोपियां बनती और नाच-रंग की महफिले गम होतीं। कभी 
जवानी के जोश में ग्राकर जोगी बन जाते, मोतियों को जलाकर भभूत बनायी 
जाती जिसके कारण फ़क़ीरी में भी गाही के करिद्मे नज़र गआाते। मेले के 
जमाने में इन सभाओं में शामिल होने के लिए श्राम शहरियों को इजाजत हो 
जाती ५ रेकिन शर्त यह थी कि गेरुए कपड़े पहन कर आ॥ायें । नतीजा यह होता 
था कि अस्सी-अस्सी बरस के बुड़ढे भी काशाय पहनकर छेला बन जाते और 
वादशाह की जवानों की ग्रानंद-मदिरा से अपने बुढ़ापे का जाम भर लेते । 

यही रंग चला जाता था और लखनऊ मे बड़ी बेफिक्री के साथ रंगरेलिया 
मनाई जा रही थीं कि ब्रिटिश सरकार को रेजिडंटों ने यहां के हालात से 
श्रागाह किया ग्रौर वहां के बोर्ड ने यह फ़ंसला कर दिया कि अ्रवध प्रदेश का 
राज्य ब्रिटेन में शामिल कर लिया जाये । इस हुक्म की तामील के लिए अंग्रेज 
फौज लखनऊ में आई और यकायक उम्मीद के ख़िलाफ़ बादशाह को हुक्म 
सुनाया गया कि, “आपका राज्य अग्रेज़ साम्राज्य में शामिल कर लिया गया 
है। आपके लिए बारह लाख रुपया सालाना और ग्रापके नुलूसी लइकर' के 
लिए तीन लाख रुपया सालाना पेंशन जो आपकी झौर आपके ग्राश्नितों की 
जरूरतों के लिए बहुत काफी है मुक़रंर को गयी है और ग्रापकों इजाजत है 
कि शहर के अंदर आराम से बेफ़िक्रे बनकर बंठिये और रिश्राया की फिक्रों से 
ग्राजाद होकर बेघड़क रगरेलियां मनाइये | यह हुक्म सुनते ही शहर में 
सन्नाटा हो गया । खुद बादशाह ने रो-धोकर बहुत कुछ माफ़ी-तलाफो की । 
बादशाह की मां और ख़ास महल ने वकालत का भी हक़ अदा किया लेकिन 
.गवनेर जनरल बहादुर के हुक्म में रहोबदल करना रेजिडट साहब के इख्ति- 
यार से बाहर था । ईस्ट इंडिया कंपनी की गवर्न॑मेट ने बिना किसी विराध के 
ग्रवध प्रांत पर क़ब्जा कर लिया और बादशाह अपनी मां, युवराज, ख़ास 
बेगमात और सच्चे साथियों को लेकर कलकत्ता रवाना हुए कि इंग्लेंड जाकर 
ग्रपील करें और अपनी बेगुनाही साबित करके सल्तनत के खात्मे के हुक्म को 
मंसूख करायें। 

। बादशाह की गद्दीनशीनी से संबद्ध सेना । . 


| 8 |] 


वाजिद अली शाह की यह बडी ख॒शनसीबी थी कि ताज-तख्त से जुदा होते ही 
ग्राख़िर 856 ई० में लखनऊ छोड़कर कलकत्ता की तरफ राना हो गये 
ताकि अ्रपने मामले में बाज़ाब्ता परवी कर और ग़वनेर जनरल हिंद के दरबार 
से कामयाबी न हो तो लंदन पहुंत्र कर मुकदमे को पालंमेंट और इंग्लिस्तान 
की मल्का के सामने पेज्ञ कर दे । चुनांचे जब कलकत्ता में काम न निकला तो 
इंग्लिस्तान जाने का इरादा किया मगर हकोमों ने समुद्र यात्रा बादशाह के 
लिए नुक़सानदेह बताई और उनके सलाहकारों ने रोका । नतीजा यह हुआ 
कि ख़ुद बादशाह तो कलकत्ता ही में ठहर गये मगर अ्रपती मा और भाई के 
साथ युवराज को इग्लेंड भेज दिया । इस सफर में मेरे नाना मुंशी क्रमरउद्दीन 
साहब भी उस अभागे बादशाही काफिले के साथ थे । बादशाह ने अंग्रेज सर- 
कार का प्रस्तावित वेतन लेने से इंकार कर दिया था और अड हुए थे कि 
हम तो अपना ताज-तख्त ही लेंगे जो बक़सूर छीना गया है । 

बादशाह कलकत्ता में थे, इनका खानदान लंदन में था और मामले पर 
ग्रभी विचार हो रहा था कि यकायक कारतूसों के मंगड़ों और गवनंमेंट की 
जिद ने 857 ई० मे गदर पेदा कर दिया और मेरठ से बंगाल तक ऐसी आग 
लगी कि अपने-पराये सबके घर जल उठ । और ऐसा हंगामा पेंदा हुआ कि 
हिंदुस्तान में ब्रिटिश गवनंमेंट की बुनियाद ही हिलती नज़र ग्राती थी । जिस 
तरह मेरठ वगैरा के बाग़ी हर तरफ से सिमटकर दिल्ली में जमा हुए थे और 
शाह जफ़र को हिंदुस्तान का शंहशाह बनाया था, वैसे ही इलाहाबाद और 
फंजाबाद के विद्रोही मई 857 ई० में पूरे जोश के साथ लखनऊ पहुंचे । 
उनके आते ही यहां के भी बहुत से बेफिक्रे उठ खड़े हुए और अवधघ के शाही 
खानदान का और कोई सदस्य न मिला तो वाजिद अली जश्ञाह के एक दस 
बरस के ताबालिग बच्चे मिर्जा वबीरजीस क़द्र को तख्त पर बिठा दिया और 
उनकी मा नवाब हज़रत महल सल्तनत की मुख्तार बनी । थोडी-सी अंग्रेज 
फौज जो यहां मौजूद थी और उसके साथ यहां तमाम योरुपियन ओहदेदार जो 
बागियों के साथ से बच सके वेली गारद में क्षिलाबंद हो गये जिसके पास 
ब्रागियों के पहुंचने से पहले ही क़िले बना लिये गये थे और सुरक्षा का काफ़ी 


गुज़िश्ता लखनऊ 55 


प्रबंध कर लिया गया था | ग़नीमत हुआ या यह कहिए कि क़िस्मत अच्छी थी 
कि वाजिद ग्रली शाह लखनऊ से ना चुके थे वर्ना वही ख्वाहमख्वाह बादशाह 
बनाये जाते। उनका हश्न ज़फर श्ञाह से भी बदतर होता और अवध के 
ग्रभागों को ज़रा पनपने के लिए मटिया वुजे के दरबार का जो क्षणिक सहारा 
मिल गया था वह भी न नसीब होता । 

ग्रब लखनऊ में अंग्रेजों की बागी फ़ोज के अलावा गवध के अक्सर जमीं- 
दारऔर ताल्लुकैदार और बादशाह के ज़माने में श्रलग किये गये सिपाही बहुत 
बड़ी संख्या में मौजूद थ | उनमें शहर के बहुत से व्यभिचारियों और हर वे 
के लोगों का तूफाने-बेतमीजी भी शरीक हो गया था। मालूम होता था कि 
थोड़े से अंग्रेजों पर असंख्य विद्रो्टी टट पड़े हैं। मगर फर्क यह था कि घेरा 
डालनेवालों में सिवाय शहर के लफंगों और अपने को बहादुर समभनेवाले थोथे 
गौर उहंड लोगों के एक भी ऐसा व्यक्ति न था जो युद्ध कला से परिचित हो 
ग्रौर सारी बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करके एक बाज़ाब्ता फ़ौज बना 
सके । इसके विपरीत गअग्रेज़ अपनी जान पर खेलकर अपनी रक्षा करते, सिर 
हथेली पर रखकर हमलावरों को रोकते थ और आधनिक युद्ध कौशल से ग्रच्छी 
तरह परिचित थे । 

ग्रब लखनऊ में बिरजीस क़द्र का जमाना ग्रौर हज़रत महल की हुकूमत 
थी । बिरजीस क़द्र के नाम का सिक्‍क्रा जारी हुआ, सल्तनत के ओहदेदार 
मुक़रंर हुए, सूबे से मालगुजारी वसूल होने लगी और सिर्फ मनोरंजन के लिए 
घेरा डालने की कारंवाई भी जारी थी । लोग हजरत महल की तत्परता 
ओर नेकी की तारीफ़ करते है । व सिपाहियो की बहुत क़॒द्र करतीं और उनके 
काम और हौसले से ज्यादा इनाम देती थीं। मगर इसका क्‍या इलाज कि यह 
मुमकिन न था कि वे खुद पर्दे से निकल कर फ़ौज की सिपहस्तालार बन जाती । 
उनके सलाहकार अच्छे न थे और सिपाही काम के नथ। दर व्यक्ति स्वार्थी 
था और कोई किसी का कहना न मानता था | अंग्रेज फौज के बारी इस 
घमंड में थे कि यह सब कुछ हमारी ही वजह स है, असली शासक हम दी है 
और जिसके सिर पर जूता रख दें वही बादशाह हो जाये | एह्मदउल्लाह नाम 
के एक शाह साहब जो फैज़ाबाद के बागियों के साथ आये थे और कई लड़ा- 
इयों में लड चुके थे, वह ग्रपना रौब जमा रहे थे । बल्कि खुद ग्रपनी हुकूमत 
कायम करना चाहते थे । बिरजीस क़द्र के मुकाबिल पर लखनऊ ही में उनका 


56 गुज़िरता लखनऊ 


दरबार अलग क़ायम था और दोनों दरबारों में राजनीतिक विरोध के साथ 
शीआ-सुष्नी का भगड़ा और तास्सुब भी सामने झ्ाने लगा । ग़रज बादशाह 
ग्रौर शाह साहब में शत्रता बढ़ती जाती थी। आखिर उसी साल नवंबर के 
महीने में बिरजीस क़द्र की गद्दीनशीनी को छह-सात महीने ही हुए थे कि 
अंग्रेज फौज नखनऊ पर क़ब्जा करने के लिए ग्रा गयी जिसके साथ पंजाब के 
सिख और भूटान के पहाड़ी भी थे और कहा जाता है कि उन्हीं लोगों ने 
ज्यादा जुल्म किये । दो ही तीन दिन की गोलाबारी मे नयी सलल्‍्तनत का जो 
निशान नज़र आया था, मकड़ी के जाले की तरह ट्टकर रह गया। हज़ारों 
भगोडों के साथ हज़रत महल और बिरजीस क़॒द्र नेपाल को तरफ भागे। शाह 
साहब ने दो-तीन दिन लड-लड़ कर हालांकि बिरजीस क़द्र के लिए आज़ादी से 
भागने का मौका पंदा कर दिया, मगर खुद झ्पनी जान न बचा सके । हार 
खाकर भागे । बाड़ी और मुहम्मदी होते हुए पवाई मे पहुंचे । वहां कसी ने 
गोली मार दी। पवाई के राजा ने सिर काटकर श्रग्रेजों के पास भजा और 
बदले में इनाम और जागीर पायी । 

ग्राबादी को बागियों से साफ करने के लिए शअरंग्रेज़ो ने शहर में सख्त 
गोलाबारी की । सारी रिग्राया घबरा उठी, मरद्ं-पश्रौरतें घर छोडकर भागीं 
ग्रौर एक ऐसी कयामत आरा गयी कि जिन लोगों ने देखा है आ्राज तक याद 
करके कांप जाते हैं। मुहल्ले की बंठने वालियां जिन की सूरत कभी सूरज तक 
ने न देखी थी नंगे पेर जंगलों की खाक छानती फिरती थीं । बेकसी में एक- 
एक का दामन पकड़ती थीं और जो मिलता था दुश्मन ही मिलता था और 
सादी' का यह मिसरा पूरी तरह चरिताथ्थ हो रहा था कि “यारां फ़रामोश 
करदंदा इश्क (प्रेमी प्रेम करना भूल गये) । इसी हालत में विजेता सेना ने 
शहर को लूटा और जब सब कुछ नष्ट हो गया तब कहों खुदा-खुदा करके 
लोगों को फिर श्रपने घरों में ग्रेने की इजाज़त मिली । अ्रब एक तहलल्‍के के 
बाद जो शांति स्थापित हुई थी वह आज तक क़ायम है और रोज़-बरोज़ तर- 
कुक़ी करती जाती है । लेकिन पुरानी सल्तनत के कर्ता-धर्ता और बादशाह के 
रिश्तेदार और दोस्त, जो सल्तनत के खात्मे के बाद बिल्कुल बेकार हो गये 
ग्रोर नयी सल्तनत से फ़ायदा उठाने की योग्यता न रखते थे, मिटते ही चले 
गये । चुनांचे बड़े-बड़े घनवान और प्रतिष्ठित घरानों के बरबाद होने का 
सिलसिला मुहत तक बराबर जारी रहा। मुहल्ले के मुहल्ले उजड़ते चले जाते 


गुजिइ्ता लखनऊ 57 


थे गऔऔर खानदान के बाद खानदान मिट रहा था और ग्रक्सर लोगों को यक्रीन 
हो गया था कि चंद रोज़ के बाद लखनऊ का नामो-निशान भी बाकी न 
रहेगा । लेकिन आखिरकार अंग्रेज सरकार की वह नीति जिसके कारण 
दुनिया में अंग्रेजों ने अपने उपनिवेश कायम किये हैं, सफल हुई और लखनऊ 
उस समय की दुघंटनाञ्रों से बच निकला झर पनपने लगा । जिन्हें मिटना था 
मिट गये और जो बाक़ी रहे वे संभलने योग्य हो गये और ग्रगर मि० बटलर 
जेसे कुछ और अधिकारी लखनऊ को मिल गये तो उम्मीद है कि आइंदा बहुत 
तरकक्‍क़ी करेगा । 

ज़रूरत मालूम होती है कि घटनाओं के इसी क्रम में हम वाजिद अली 
शाह की बाकी जिंदगी और कलकत्ता में उनके प्रवास के समय के हालात भी. 
अपने पाठकों के सामने पेश कर दे क्‍योंकि बिना इसके यह इतिहास पूर नहीं 
हो सकता । कलकत्ता में खुद हमारा बचपन बादशाह की छत्रछाया में गुज़रा 
है और अगर पिछली बातें हमने लोगों से सुनकर श्र इतिहास के पन्नों में 
पढ़ कर बयान की हैं तो ग्राइंदा आंखों देखे हालात बयान करेंगे । 

कलकत्ता से तीन-चार मील की दूरी पर दक्षिण की ओर हुगली न्दी 
किनारे “गार्डन रिज” नामक एक शांत मुहल्ला है और चूंकि वहां मिट्टी का 
एक तोौदा-सा था, इसलिए ग्राम लोग इसे मटिया बुज कहते है। यहां ; ई 
ग्रालीशान कोठियां थीं जिनकी ज़मीन दरिया के किनारे-किनारे लगभग दो 
ढाई मील तक चली गयी है । जब वाजिद ग्रली शाह कलकत्ता पहुंचे तो 
गवनमेंट आफ इंडिया ने ये कोर्ठियां उन्हें दे दीं: दो खास बादशाह के लिए, 
एक नवाब खास महल के वास्ते और एक ग्रली नक़ी खां के रहने के लिए जो 
बादशाह के साथ थे और उनके गिद ज़मीन का एक बड़ा टुकड़ा, जो चौड़ाई 
में नदी के किनारे से लगभग मील-डेढ़ मील तक चला गया था और उसका 
हल्का छह-सात मील से कम न होगा, बादशाह को अपने और अपने कमं- 
चारियों के निवास के लिए दिया गया । म्युनिसिपैलिटी की सड़क इस रक़ब 
की लंबाई के बीच से गुज़रती थी । वे दो कोठियां जो बादशाह को दी गयी 
यीं उनके नाम बादशाह ने सुल्तान खाना” और “ग्रसद मंजिल” क़रार 
दिये । नवाब खास महल की कोठी पर जब बादशाह ने क़ब्जा कर लिया तो 
उसका नाम “मुरस्सा मंजिल” रखा और श्रली नक़ी खां की कोठी ग्राखिर 
तक उन्हीं के क़ब्जे मे रही और उनके बाद उनकी औलाद, खासतौर से नवाब 


58 गुज़िता लखनऊ 


अख्तर महल के कब्जे में रही जो अली नक़ी खां की बेटी और बादशाह की 
खास बीबी बल्कि उनके दूसरे युवराज मिर्जा खुशबख्त बहादुर की मां थीं । 

गदर के जमाने में अंग्रेज फ़ौज के बागी अफसरों ने इरादा किया कि 
अगर बादशाह उनके शासक बनें तो वे कलकत्ता में गदर कर दें। मगर 
बादशाह ने गवनंमेंट झ्राफ इंडिया के मामले में यह नीति उस समय भी न 
ग्रपनायी थी जब उन्हें गद्दी से उतारा गया था और न अरब पसंद की बल्कि 
लाट साहब को उन लोगों के इरादे की इत्तिला कर दी जिस पर उन्हें घन्यवाद 
दिया गया । मगर दो ही चार रोज़ के वाद मुनासिव समभा गया कि बादशाह 
को फ़ोट विलियम में रखा जाये ताकि फिर कभी बागी उन तक न पहुं 
सकें । लंदन में उनकी ओर से जो मुक़दमा पेश था वह इस कारण से मुल्तवी 
कर दिया गया कि जिस देश के लिए यह दावा है वह अब हमारे कब्जे में 
ही नहीं, जब उस पर फिर ब्रिटिश साम्राज्य का अधिकार होंगा तब देखा 
जायेगा । 

बादशाह हिरासत ही में थे कि लखनऊ का उपद्रव शांत हों गया और 
मसी हउद्दीन खां ने, जो लंदन में बादशाह के मुख्तार-ए-ग्राम थे, फिर अपना 
दावा पेश किया। उन्हें शुरू-शुरू में कामयाबी और सल्तनत की वहाली की 
पूरी उम्मीद थी मगर बदक़िस्मती से उन लोगों में जो किले में बादशाह के 
सलाहकार और मुसाहिब थे--चाहे किसी वाह््मय प्रेरणा से या खुद अपने फ़ायदे 
के खयाल से-- एक साजिश हुई । उन लोगों ने सोचा कि अगर मसी हउद्दी न 
खां मुक़दमा जीत गये तो हमें कौन पूछेगा और बस वही वह रह जायेंगे । 
लिहाजा सबने बादशाह को समभाना शुरू किया कि “जहांपनाह, भला कभी 
किसी ने मुल्क लेकर दिया है ? मसीहउद्दीन खां ने हुश्र को धोखे में डाल 
रखा है । होना-हवाना कुछ नहीं है और जहांपनाह मुफ्त में तकलीफ़ उठा रहे 
हैं । डेढ़-दो साल से तनख्वाह नहीं ली है, हर बात की तंगी है और हम सर- 
कार के नौकर भी पैसे-पंसे को मोहताज हैं। मुनासिब यह है कि हुजर अंग्रेज 
सरकार के प्रस्तावों को मान लें और तनख्वाह वसूल करके इत्मिनान और 
बेफ़िक्री से अपनी बेगमात श्र सरकारी नौकरों के साथ जिदगी बसर फरमाये ।” 
बादशाह को खर्च की तंगी थी और वादशाह से ज्यादा उनके साथी परेशान 
थे । मुसाहिबों ने जब बार-बार यह सुझाव दृहराया तो उन्होंने बिना भिरक 
के वाइस राय को लिख भेजा, “मुझे अंग्रेज़ सरकार की प्रस्तावित पेंशन स्वीकार 


गुज़िश्ता लखनऊ 59 


है, लिहाजा मेरी इस वक्‍त तक की तनख्वाह दी जाये और मुक़दमा जो लंदन 
में दायर है, खारिज किया जाये |” जवाब मिला, 'अब आपको पहले तो 
पिछले दिनों की पेंशन नहीं दी जायेगी, सिफं इस वक्‍त से पेंशन जारी होगी । 
दूसरे सिफ बारह लाख रुपये सालाना दिये जायेंगे और जो तीन लाख रुपये 
सालाना झ्ापके मुलाजिभों के लिए तय किये गये थ ग्रव उनके देने छी ज़रूरत 
नहीं समभी जाती 

ग्रधिक संभावना ता यह थी कि बादशाह इस नुकसान को बरदाक्त नहीं 
करते, मगर मुसाहिबों ने इस पर भी राजी कर दिया । गवनंमेंट ग्राफ इंडिया 
ने इंग्लिस्तान में इत्तला दी कि वाजिद अली जाह ने सरकार के प्रस्ताव 
स्वीकार कर लिये, लिहाजा उनका मुक़दमा खारिज किया जाये । ये घटनाएं 
मैने ख़द अपने नाना मुशी क़मरउद्दीन साहब की जबान से सुनी है जो बादशाह 
के साथ गये दफ्तर के मीर मुशी और मौलवी मसीहउद्दीन खां के नायब-ए- 
खास थे और कुल कारंबाइयां उन्हीं के हाथ से अमल में ग्राती थी । बादशाह 
के पेंशन पर राज़ी हो जाने की खबर जेसे ही लंदन पहुंची, मसीहउद्दीन खां 
के होश जाते रहे । बादशाह की मां, उनके भाई और युवराज ने सिर पीट 
लिया और हैरान थे कि यह क्‍या ग़ज़ब हो गया । अफ़सोस इस वक्‍त तक 
का सब किया-धरा खाक में मिला जाता है। आ्रखिर मसीहउद्दीन खां ने 
सोचते-सोचते एक बात पैदा की और पालंमेंट में यह क़ानूनी आ्रापत्ति पेश की 
कि “बादशाह फ़िलहाल गवनेमेंट ग्राफ इंडिया की हिरासत में है और ऐसी 
हालत में उनका कोई बयान विश्वसनीय नहीं माना जा सकता । आपत्ति 
ठीक ही थी और मान ली गयी । गवनंमेंट आफ इंडिया को बादशाह के 
मुख्तार की श्रापत्ति की सूचना दी | साथ में मसीहउद्दीन खां और शाही खान- 
दान के सभी सदस्यों ने बादशाह को लिखा : “यह आप क्‍या ग़ज़ब कर रहे 
हैं ? हमें ग्रवध का राज्य वापस मिलने की पूरी उम्मीद है ।' ग्रब गदर खत्म 
हो चुका था | गवर्नमट ने बादशाह को छोड़ दिया और खुशी-खुशो किले से निकल 
कर मटिया बुजं में आये और आजादी हासिल हुईं ही थी कि मुसाहिबों ने 
ग्रज किया, 'हुजूर ! मसीहउद्दीन खां लंदन में यह कह रहे हैं कि जहांपनाह 
ने तनख्वाह लेने को सिफ्फ क़द होने की वजह से मंजर कर लिया है।” यह 
सुनते ही बादशाह ने उत्तेजित होकर उसी वक्‍त लिख भेजा कि, “हमने आजादी 
से गऔर अपनी रज़ामंदी से गवनंमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार किया है और 


60 गुजिइता लखनऊ 


मसीहउद्दीन खां का यह कहना बिल्कुल गलत है कि हमने क़ंद में होने या 
किसी जोर-जब रदस्ती की वजह से मंजूरी दी है। लिहाजा हम आइंदा के लिए 
उस मुख्तारनामे ही को मसूख किये देते है जिसके ग्रनुसार वे हमारे मुख्तार- 
ए-आम बनाये गये हैं । 

अग्रब॒ कया था, सारी कारंवाई खत्म हो गयी । बादशाह मटिया बुर्ज में 
रंगरेलियां मनाने लगे, मुसाहिबों के घरों में धन बरसने लगा और शाही 
खानदान का अभागा काफ़िला जो इंग्लिस्तान में पड़ा हुआ था, करीब-क़रीब 
वहीं तबाह हो गया । ग्रक्सर साथियों ने साथ छोड़ दिया, बादशाह की मा 
इस सदमे से बीमार हो गयी और इसी बीमारी में चलीं कि फ्रांस से होती 
हुई मुस्लिम तीथ स्थानों में जायें श्रौर उनके दर्शन लाभ करके कलकत्ता 
पहुंचे । मगर मौत ने पेरिस के आगे क़दम न बढ़ने दिया, वहीं उनका निधन 
हो गया । फ्रांस के उस्मानी दूतावास की मस्जिद के पास मुसलमानों का एक 
कब्रिस्तान है उसी में दफन हुईं | मिर्जा सिकंदर हृश्मत को मां के मरने का 
ऐसा सदमा हुआ कि मां के मरते ही ख़ुद भी बीमार पड़ गये और मां के 
चौदह-पंद्रह रोज बाद वे भी मां के बराबर लिटा दिये गये | सिफ़ युवराज 
कलकत्ता वापस आकर मां-बाप से मिले । 

कहते है कि शुरू-शुरू में मटिया बुर्ज में भी बादशाह की ज़िंदगी बहुत 
सूभबूक और होशियारी की थी। यह हालत देखकर पास-पड़ोस के लोगों ने 
कुछ वाद्य लाकर दे दिये, फौरन 'ऊघते को ठलते का बहाना' कहावत चरितार्थ 
हुई और आनंद-मंडली वहां भी जमा होने लगी । हिंदुस्तान के ग्रच्छे-भ्रच्छे 
गवंये ग्राकर नोकर हुए और मटिया बुर में संगीतकारों का ऐसा जमघट हो 
गया कि और किसी जगह न था। 

सुंदर स्त्रियों के एकत्र करने और प्रेम-प्रणय की क्रियाओ्रों में फसे रहने 
का वहां भी वसा ही शौक़ था जेसा कि लखनऊ में सुना जाता है, मगर 
मटिया बुजे में इस शौक़ में कुछ मज़हबी एहतियात भी बरती जाने लगी । 
बादशाह शीभ्रा थे और शी्रों के धर्म में मुत्मा! बिना किसी रोक-टोक के 
जायज है | इस मज़हबी गआ्राज़ादी से फ़ायदा उठाकर बादशाह जी भर के 
ग्रपना शौक़ पूरा कर लेते और क़ायदा था कि ऐसी औरत की, जिसके साथ 
मुत्या न हुआ हो, सूरत देखना भी पसंद न करते । यह एहतियात इस हृद तक 
१ एक निश्चित अवधि के लिये किया गया विवाह । 


गुजिश्ता लखनऊ 6] 


बढ़ी हुई थी कि एक जवान भिश्तन जो बादशाह के सामने जनाने में पानी 
लाती उसे भी सुत्मा करके उसे नवाब ग्राबरसां बेगम का खिताब दे दिया। 
एक जवान भंगन जिसकी हुजूरी में ग्रामद-रफ्त रहती उसे भी मुत्य्राशुदा 
वेगमात में ग्वामिल करके नवाब मुसफ्फा बेगम का खिताब दिया गया । इसी 
तरह संगीत का शौक़ भी मुत्माशुदा औरतों तक ही सीमित रहता । शायद 
ही कभी ऐसा रहा होगा कि बादशाह ने कभी किसी बाज़ारी वेद्या का 
मुजरा देखा हो । खुद मुत्म्राशुदा बेगमों की पार्टियां बना दी गयी थीं जिन्हें 
विभिन्‍न प्रकार के नृत्य-गान की शिक्षा दी जाती थी। एक राघा मंजिल- 
वालियां, एक भूमरवालियां, एक लटकनवालियां, एक शारदा मंजिलवालियां, 
एक नथवालियां, एक घूंघटवालियां, एक रासवालियां, एक नक़लवालियां 
ग्रौर इसी तरह के वीसों गिरोह थे जिनको नाच-गाने की ऊंची शिक्षा दी गयी 
थी और उन्हीं के नाच-गाने में उनका दिल बहलता था । उन सबसे मुत्या . 
हो गया था, बेगमें कहलाती थीं और दो-एक गिरोहों में ग्रगर कुछ कम उम्र 
ग्रौर नाबालिग लडकियां ऐसी थीं जिनके साथ मुत्या नहीं हुआ था तो उसकी 
वजह यह थी कि उनके बालिग होने पर उनके साथ मुत्म्रा कर लिया जायेगा। 
उनमें से अधिकतर खुद बादशाह के करीब खास सुल्तानखाने में रहतीं और 
बाज़ को दूसरी कोठियों में अलग महल सरायें मिली थीं | इन मुत्याशुदा 
ग्रौरतों मे से जिनके संतान हो जाती उनको 'महल' का खिताब दिया 
जाता, रहने को ग्ललग महलसरा मिलती और उनकी तनख्वाह और इज्जत 
बढ़ जाती । 

इससे साफ़ ज़ाहिर है कि संगीत के अलावा और तमाम हैसियतों से 
बादशाह बड़े संयमी थे और धामिक सिद्धांतों का पालन करते थे । उनकी 
नमाज में कभी देर न होती थी, तीसों रोज रखते थे । अफ्रीम, शराब, फ़लक 
सेर या और किसी किस्म के नशे से जिदगी भर परहेज करते रहे और मुह- 
रंम की मातमदारी बड़ी निष्ठा से किया करते थे । 

तीसरा शौक उन्हें इमारत का था | सुल्तानखाने के पास बीसियों महल- 
सरायें बन गयीं और बहुत-सी नयी कोठियां और उनमें महलसरायें बनीं । 
गवरनंमेंट से सिफ सुल्तानखाना, असद मंजिल और मुरस्सा मंजिल मिली थी 
मगर बादशाह के शौक़ ने चंद ही रोज़ में बीसियों कोठियां बनवा दीं जिनके 
प्रासपास बहुत ही हरे-भरे और ग्रानंददायक बाग़ थे । जिस वक्‍त मैंने देखा है 


62 गुजिइता लखनऊ 


बादशाह के कब्ज में निम्नलिखित आलीशान कोठियां थीं जो दक्षिण से उत्तर 
तक सिल-सिलेवार चली गयी थीं : सुल्तानखाना, क़स्र-उल-बज़ा, गौशः-ए- 
सुल्तानी, शहंँंशाह मंजिल, मुरस्सा मंजिल, असद मंजिल, शाह मंजिल, न्‌र 
मंजिल, तफ़रीह बख्श, बादामी, श्रासमानी, तहनियत मंजिल, हद-ए-सुल्तानी 
सह-ए-सुल्तानी, श्रदालत मंजिल । इनके अलावा श्रौर भी कई कोठियां थीं 
जिनके नाम मुझे याद नहीं रहे । 

इनके अलावा बागणों के अंदर तालाबों के किनारे बहुत से कमरे, बंगले और 
छोटे-छोटे महल थे । इन तमाम कोठियों, कमरों, बंगलों और महलों में साफ- 
सुथरा फर्श बिछा रहता, चांदी के पलंगों पर बिछोने और तकिये लगे रहते, 
तस्वीरें और तरह-तरह का फ़र्नीचर सजा होता और सिर्फ देखभाल के खयाल 
से ज़रूरत से ज़्यादा मकानदार मुकरंर थे जो रोज भाडते और हर चीज़ को 
सफ़ाई और सलीक़ से सजाकर रखते ।॥ ग़रज़ हर कोठी अपने में इतनी सजी 
हुई नज़र आती कि इंसान चकित हो जाता । कोठियों के झ्रासपास के बाग 
और चमन ऐसे भ्रंकों और ज्यायिति की आक्ृत्तियों के अनुसार बनाये गये थे 
कि देखने वालों को बादशाह की स्थापत्य कला के प्रति स्वाभाविक रुचि पर 
ग्राइचयं होता । 

लखनऊ में तो बादशाह ने सिर्फ कसर बाग और उसके पास की चंद 
इमारतें या अपने वालिद का इमामवाड़ा और मक़बिरा ही बनवाया था, मगर 
मटिया बुज में बढ़िया और ऊंचे दर्जे की इमारतों का एक खूबसूरत शहर बसा 
दिया था । दरिया के उस पार मटिया बु्ज के ठीक सामने कलकत्ते का मशहूर 
पौलिटिकल गाड्डन है मगर वह मटिया बुर्ज की दुनियवी जन्नत और उसकी 
अजीब-भ्रजीब चीज़ों के सामने मिट गया था | इन तमाम इमारतों, बयीचों, 
कंजों और विस्तृत हरी-भरी चारागाहों के गिदं बुलंद दीवारों का अहाता था, 
मगर म्युनिसिपलिटी के श्राम रास्ते के किनारे-किनारे लगभग एक मील तक 
शानदार दुकानें थीं और उनमे वही निचले दर्जे के नौकर रह पाते थे जिन्हें 
श्रपने फ़र्ज प्रे करने के लिए वहां रहने की ज़रूरत थी । मगर अंदर जाने 
का रास्ता सिवाय फाटकों के जिन पर पहरा रहता, किसी दुकान में नहीं 
रखा गया था | ख़ास सुल्तानखाने के फाटक पर निहायत शानदार नौबतखाना 
था । नक्‍क़ारची नौबत बजाते और पुराने पहरों और घड़ियों के हिसाब से 
'दिन-रात घड़ियां बजाया करते थे । 


गुजिश्ता लखनऊ 63 


दुनिया में इमारत के शौकीन हज़ारों बादशाह गुज रे हैं मगर श्रपनी पसंद 
ग्रौर शौक़ से किसी बादशाह ने इतनी इमारतें और इतने बाग न बनवाये 
होंगे जितने कि वाजिद अली शाह ने अपनी ग्रसफल जि दगी और नाममात्र की 
बादशाही के थोड़े से अस में बनवाये | शाहजहां के बाद इस संबंध में अगर 
किसी का नाम लिया जा सकता है तो वह इसी ग्त्याचार-ग्रस्त ग्वध-नरेश 
का नाम है । यह और बात है कि कोई खास इमारत सेंकडों-हज़ारों साल 
तक बाक़ी रही और किसी की संकड़ों इमारतें ज़माने ने चंद ही रोज में 
मिटाकर रख दीं । 

इमारत के अलावा बादशाह को जानवरों का शौक़ था भ्रौर उस शौक़ 
को भी उन्होंने इस दर्ज तक पहुंचा दिया कि दुनिया उसका सानी पैदा न कर 
सकी और शायद किसी व्यक्ति की कोशिश उसके आधे दर्जे को भी न पहुंच 
सकी होगी । 

नूर मंजिल के सामने लोहे के एक संदर कटहरे से घेरकर एक लंबा- 
चोड़ा रास्ता बनाया गया था जिसमें संकड़ों चीतल, हिरन और जंगली 
चोपाये छूटे फिरते थे । उसी के दरम्यान संगमरमर का एक पुख्ता तालाब 
था जो हर वक्‍त लबालब भरा रहता श्रौर उसमें शुतुरमुगं किशोरी,/ फ़ील- 
मुर्गं/ सारस, क़ाजें,? बगले, क़रक़रे,! हंस, मोर, चकोर और सैकड़ों किस्म के 
पक्षी श्रौर कछवे छोड़ दिये गये थे । सफाई का ऐसा प्रबंध था कि मजाल 
क्या जो कहीं बीट या किसी जानवर का पर भी नजर गञ्रा जाये । एक तरफ 
तालाब के किनारे कटहरों में शेर थे श्रौर उस चारागाह के पास ही लकड़ी 
के सलाखदार बड़े-बडे खानों का एक सिलसिला शुरू हो गया था जिसमें 
बीसियों तरह के श्लौर खुदा जाने कहां-कहां के बंदर लाकर जमा किये गये 
थे जो ग्रजीब-ग्रजीब हरकतें करते और इंसान को बिना ग्पना तमाशा दिखाये 
श्रागे न बढ़ने देते । 

होज़ों में ग्रनेक स्थानों पर मछलियां पालीं गयी थीं जो इशारे पर जमा 
हो जातीं और कोई खाने की चीज़ डालिये तो श्रपनी उछल-कद से खूब बहार 
दिखातीं । सबसे बढ़कर यह कि शहंशाह मंजिल के सामने एक बड़ा-सा लंबा 
श्रौर गहरा होौज़ कायम करके और उसके किनारों को चारों तरफ से खूब 

छोटे पशु, “मोर की जाति का पक्षी, टर्की, 

"बड़ी बत्तख, *एक सुंदर पक्षी | 


64 छ् गुज्िश्ता लखनऊ 


चिकना करके और ग्रागे की तरफ भुकाकर उसके बीच में एक कृत्रिम पहाड़ 
बनाया गया था जिसके अंदर सेकड़ों नालियां दौड़ाई गयी -थीं श्रौर ऊपर से 
दो-एक जगह काटकर पानी का सोता भी बहा दिया गया था | उस पहाड़ी 
में हजारों क्ड़े-बड़े दो-दो, तीन-तीन ग्रज के लंबे सांप छोड़ दिये गये थे जो 
बराबर दोौड़ते और रेंगते फिरते | पहाड़ की चोटीं तक चढ़ जाते और फिर 
नीचे उतर आते । मेढकें छोडी जातीं, उन्हें दोड-दौड़ कर पकड़ते । पहाड़ के 
इर्देंगिदे नहर की शान से एक नाली थी । उसमें सांप लहरा-लहरा कर 
दौड़ते और मेढकों का पीछा करते और लोग बिना किसी डर के पास खडे 
सर देखा करते । उस पहाड़ के नीचे भी दो कटहरे थे जिनमें दो बडी-बड़ी 
चीतें रखी गयी थीं। वे यों तो खामोश पड़ी रहतीं लेकिन जिस वक्‍त मुर्ग 
लाकर छोड़ा जाता उसे भपट कर पकडती और प्रा-का-पूरा निगल जातीं। 
सांपों के रखने का इंतिज़्ाम इससे पहले शायद कहीं न किया गया होगा और 
यह छास वाजिद ग्रली शाह का आविष्कार था जिसे यूरोप के पर्यटक 
आइचये से देखते श्रौर उसकी तस्वीरें तथा उसका ब्योरा लिखकर ले जाते थे । 

उपयु क्त जानवरों के अतिरिक्त हज़ारों पक्षियों के पीतल के पिजरे खास 
सुल्तानखाने के अंदर थे | बीसियों बड़े-बड़े हाल थे जो लोहे के जाल से सुर- 
क्षित कर दिये गये थे और गंज कहलाते थे । उनमें भांति-भांति के पक्षी बहुत 
ग्रधिक संख्या में लाकर छोड़ दिये गये थे और उनके रहने श्रौर पलने-बढ़ने का 
पूरा सामान जुटाया गया था । बादशाह की कोशिश थी कि चरिद-परिद में 
से जितनी किस्म के जानवर मिल सकें सब जमा कर लिये जायें और ऐसा 
पूरा, जिंदा चिड़ियाघर शायद संसार में और कहीं मौजूद न होगा । इन 
जानवरों को जुटाने में बेमकिभक रुपया झाचे किया जाता और कोई शख्स नया 
जानवर लाता तो मुंह मांगे दाम पाता । कहते हैं कि बादशाह ने रेशमपरे 
कबूतरों का जोड़ा चौबीस हज़ार रुपये में मौर सफेद मोर का जोड़ा ग्यारह 
हज़ार रुपये में लिया था। ज़िराफ़ जो अफ्रीका का बहुत बड़ा और बहुत ही 
ग्रजीब जानवर है, उसका भी एक जोड़ा मौजूद था । दो कोहान के बगदादी 
ऊंट हि्वस्तान में कहीं नज़र नहीं ञ्राते लेकिन बादशाह के यहां थे । कलकत्ता 
में हाथी का नाम नहीं है मगर बादशाह के उस जिंदा नैचरल हिस्ट्री-म्यू ज़ि- 
यम में एक हाथी भी था। सिर्फ़ इस ख्याल से कि कोई जानवर रह न जायें 
दो गधे भी चारागाह में लाकर छोड़- दिये गये थे । दरिदों में से शोर बबर, 


गुजिश्ता लखनऊ 65 


देसी शेर, चीते, तेंदुए, रीछ, सियाहगोश,! चर्खे, भेडिये सब कटहरों में बंद थे 
ग्रौर उनकी बड़ी देखभाल रखी जाती थी । 

कबूतरों का इंतिज़ाम दूसरे जानवरों से अलग था । बादशाह की विभिन्‍न 
कोठियों में सब मिलाकर चोबीस-पच्चीस- हज़ार कबृतर थे जिनके उड़ाने में 
कबूतरबाज़ों ने बड़े-बड़े कमाल दिखाये थे । 

जानवरों पर जो खर्च हो रहा था उसका मामूली-सा अंदाज़ा इससे हो 
सकता है कि आठ सौ से ज्यादा जानवरबाज़ थे, तीन सो के क़रीब कबृतरबाज 
थे, इतने ही मछली पालनेवाले थे और तीस-चालीस सांप पालनेवाले थे जिन्हें 
छह रुपया माहवार से लेकर दस रुपया माहवार तक तनख्वाहें मिलती थीं । 
ग्रफसरों की तनख्वाहें तीस से बीस रुपये तक थीं और कबूतरों, सांपों श्रौर 
मछलियों के अलावा दीगर जानवरों की खुराक में कुछ कम हज़ार रुपये माह- 
वार खर्च होते थे । 

इमारत का काम ज्यादातर मूनिसउदह्ौला ओर रेहानउद्दोला के सुपुर्द रहा 
जिन्हें इमारत की मद में लगभग पच्चीस हजार माहवार मिला करते थे । 

हजार के क़रीब पहरे के सिपाही थे जिनकी तनख्वाहें श्रामतौर पर छह 
रुपये माहवार थीं, बाज़-बाज़ ग्राठ या दस रुपये भी पाते थे | यही तनख्वाह 
मकानदारों की थी जिनकी गिनती पांच सौ से ज़्यादा थी । क़रीब अस्सी मुहरिर 
थे जो दस से तीस रुपये माहवार तक तनख्वाह पाते थे । प्रतिष्ठित मुसाहिबों 
और ऊंचे ओहदेदारों की संख्या चालीस-पचास से कम न होगी जो अठासी 
रुपये माहवार पाते थे । सौ से ज्यादा कहार थे । 

इनके अलावा बीसियों छोटे-छोटे महकमे थ : बावर्चीखाना, आाबदारखाना, 
भिडीखाना, खसखाना और खुदा जाने क्‍या क्या । फिर एक मद मुत्य्राशुदा 
बेगमों के रिश्तेदारों और भाई-बंदों की थी जिन्हें उनकी हैसियत के मुताबिक 
तनख्वाहें मिलती थीं । 

इन सब लोगों ने कोठियों के रक़बे से बाहर, ज्यादातर इसी ज़मीन पर, 
जो बादशाह को दी गयी थी और बहुतों ने पास की दूसरी ज़मीनों पर मकान 
बना लिये थे और एक शहर बस गया था जिसकी मद मशुमारी खालीस हजार 
से ज़्यादा थी । उन सबकी ज़िंदगी का दारोमदार बादशाह की तनख्वाह के 
एक लाख रुपये माहवार पर था और किसी की समझ में न श्राता था कि इतने 


* कुत्ते की जाति का एक पशु । 


66 गुजिश्ता लखनऊ 


लोग इस थोड़ी-सी रकम में कक्‍्योंकर बसर कर लेते हैं । बंगाल में यह मशहूर 
था कि बादशाह के पास पारस पत्थर है--जब जरूरत होती है लोहे या तांबे 
को रगड़ कर सोना बना लिया करते हैं । 

ग्रसल बात तो यह है कि बादशाह के रहने से कलकत्ता के पड़ोस में एक 
दूसरा लखनऊ आाबाद हो गया था, असली लखनऊ मिट गया था और वहां के 
चुने हुए लोग मटिया बुर्ज में चले गये थे, बल्कि सच तो यह है कि उन दिनों 
लखनऊ लखनऊ नहीं रहा था, मटिया बुजं लखनऊ था । यही चहल-पहल थी, 
यही ज़बान थी, यही शाइरी थी, यही महफ़िलें श्रौर मनोरंजन की सामग्री थी। 
यहीं के विद्वान और संत थे, यहीं के ग्रमीर और रईस थे और यहीं की जनता 
थी | किसी को नज़र ही न गञ्राता था कि हम बंगाल में हैं । यही पतंगबाजियां 
थीं, यही मुर्गंबाजियां थीं, यही बटेरबाजियां थीं, यही भञ्रफीमची थे, यही दास्ता- 
नगोई (कथा वाचन) थी और यही ताजियादारी थी, यही मर्ियाख्वानी थी, 
यही इमामबाड़े थे और यही कबंला थी । बल्कि जिस शान-शौकत से बादशाह का 
खास ताज़िया उठता था लखनऊ में बादशाहों के समय में शायद उठ सका हो । 
गदर के बाद तो कभी कोई ताज़िया नहीं उठा सका । कलककत्ते के हज़ारों लोग 
और भप्रंग्रेज तक ज़ियारत (दर्शन) के लिए मटिया बुजं में ञ्रा जाते थे । 

बादशाह अगर्चे शी थे, मगर उनके स्वभाव में घामिक पक्षपात न था । 
उनका पुराना क़ौल था कि “मेरी दो ग्रांखों में से एक शीत है और एक सुन्नी 
है ।” एक बार दो व्यक्तियों में घामिक मतभेद के कारण मारपीट हो गयी । 
बादशाह ने दोनों को निकाल देने का हुक्म दिया बल्कि अपने यहां उनका प्रवेश 
भी निषिद्ध कर दिया और फ़रमाया, “ऐसे लोगों का मेरे यहां गुजर नहीं हो 
सकता । आखिर में बादशाह की एक किताब में बाज़ ऐसे आपत्तिजनक शब्द 
छप गए थे जिन पर कलकत्ता के सुन्नियों में बडी हलचल मची मगर लोग यह 
नहीं जानते कि वे शब्द असल किताब में नहीं बल्कि दूसरों के इतिहास या 
समीक्षा में थे और बादशाह को ज्योंही पता चला, बिना किसी के कहे-सुने 
माफी मांगने को तयार हो गये । बेतास्सुबी का इससे ज्यादा सबूत क्या होगा 
कि इंतिज़ाम की सारी ज़िम्मेदार जगहें सुन्नियों ही के हाथ में थीं। प्रधान 
मंत्री मुंसरिमउद्दोला बहादुर सुन्नी थे, मंशी उस्सुल्तान जो एक जमाने में बाद- 
शाह के सबसे ज्यादा निकट थे और सारे जानवरखाने, कुल मुहरिरों और कई 
महकमों के बडे ग्रफ़ुसर थे, सुन्‍्नी थे । बख्शी श्रमानतउद्दोला बहादुर जिनके 


गुजिउता लखनऊ 67 


हाथ से स्रारे नौकरों--यहां तक कि बेगमों और शाहेज्ञादों तक को --तनख्वाह 
मिलती थी, सुस्नी थे । इससे बढ़कर क्‍या होगा कि सिबंतनाबाद का इमाम- 
बाड़ा और खास इमामबाड़े 'बेतुलबक़ा' का इंतिजाम और मजलिसों पर मज़- 
हबी समारोहों के आयोजनों की जिम्मेदारी भी सुन्नियों ही के हाथ में थी । 
वहां कभी किसी ने इसे महसूस ही नहीं किया कि कौन सुन्ती है और कौन 
शीग्रा है । 

मटिया बुर के दुकानदार और महाजन तक लखनऊ के थे और लखनऊ 
की कोई चीज़ न थी जो वहां मौजूद न हो । जिघर गुजर जाइये एक अजीब 
रौनक और चहल-पहल नजर ग्राती और उस जगह लोग इतने लीन, मस्त 
और बेसुध हो रहे थे कि किसी को यह ध्यान ही न था कि इस सब का अंजाम 
क्या होगा । शाही इमारतों और चारागाहों वगरा के अंदर जाने की लखनऊ- 
वालों बल्कि मटिया बुजं के निवासियों को ग्राम ग्राज़ादी थी । बाग़ों में टहलिये 
तो उससे ज़्यादा रमणीय स्थान कहीं न मिल सकता था । दरिया के किनारे 
खड़े हो जाइये तो अजीब सुखद दृश्य दिखायी देता था। कलकत्ता आने-जाने 
वाले जहाज सामने से होकर गुजरते जो फ़ो्ट विलियम की सलामी के लिए 
यहीं से ग्रपनी भंडियां उतारना शुरू कर देते और लोग समभते कि बादशाह 
को सलामी ले रहे है | बेगमों की ड्योढ़ियों और महलसराग्रों के दरवाज़ों पर 
खड़े हो जाइये तो ग्रजब धूमधाम में कभी-कभी ऐसी सूरतें नज़र आ जातीं 
ग्रोर ऐसी सदर मुहावरेदार भाषा और ऐसी प्यारी बातें सुनने में ञ्रा जातीं कि 
इंसान मुहतों बल्कि जिंदगी भर मजे लिया करता । 

ग्राह * यह सुंदर और जित्ताकषंक दृश्य तो मिटने योग्य न था ! मगर 
हाय, समय के दुष्ट हाथों ने उसे मिटा ही दिया और ऐसा मिटाया मानों वह 
कभी था ही नहीं । 887 ई० में सहसा बादशाह की आंखें मुंद गयीं और 
मालूम हुआ कि ख्वाब था जो कुछ कि देखा, जो सुना अ्रफ़साना था ।” सब 
बातें ख्वाब-खयाल थीं । एक तिलिस्म था कि यकायक टूट गया श्रौर वह खूब- 
सूरत अहाता जिसे देखने की तमन्ना योरुप के बादशाहों और हिदुस्तान के 
राजाब्रों को रहा करती थी ग्राज एक सुनसान जगह है जहां कुछ भी नहीं । 
जिसने उस अगले रंग को भी देखा था अब वहां के सन्नाटे को देखकर सिवाय 
इसके कि हसरत और दुख के साथ एक ठंडी सांस भर कर कहे, 'रहे नाम 
ग्रल्लाह का !_ और क्‍या कर सकता है | 


[9 ] 


इस दरबार के बादशाहों के इतिहास के वारे में अब सिर्फ इतना बताना बाक़ी 
है कि मिर्ज़ा बिरजीस क़॒द्र बहादुर लखनऊ से भागे तो नेपाल की सरहद पर 
दम लिया । उनके साथ लगभग एक लाख गआ्रादमी थे । उन लोगों ने इरादा 
किया कि हिमालय की घाटियों में शरण लें और जब मौका मिले, निकलकर 
भ्रंग्रेजों पर हमला करें। जीत जायें तो अपने घर पहुंचें और हारें तो फिर 
भागकर पहाड़ों में जा छिपें। मगर यह निभनेवाली सूरत न थी । नेपाल राज्य 
न तो इतने ग्रादमियों को अपने वहां शरण दे सकता था और न उनके लिए 
अंग्रेजों से लड॒ सकता था। उसमें इतनी ताक़त ही न थी कि अंग्रेजों का मुक़ा- 
बिला करता । लिहाजा नेपाल सरकार ने सिफ मिर्जा बिरजीस क़द्र और उनकी 
मां को शरण दे दी, लेकिन उनके साथियों को हुक्म दे दिया कि फ़ोरन वापस 
जायें और न जायें तो मार कर निकाल दिये जायें। नेपाल राज्य फ़ौरन उनसे 
खाली करा लिया जाये । नतीजा यह हुम्ना कि सबके सब वहां से निकल-निकल 
कर भागे | बहुत से मारे गये, बहुत से भेस बदल-बदल कर किसी तरफ निकल 
गये और मिर्जा बिरजीस क़द्र मय अपनीं वाल्दा के खास नेपाल में जाकर रहने 
लगे । नेपाल दरबार से उनके लिए कुछ मामूली वजीफ़ा मुक़रंर हो गया और 
कहते हैं उनके साथ जितने जवाहिरात थे सब नेपाल के खजाने को नज़ हो 
गये । आखिरकार हजरत महल का वहीं निघन हो गया और उनके बाद महा- 
रानी विक्टोरिया की जुबिली के मौक़ पर ब्रिटिश साम्राज्य ने मिर्जा बिरजीस 
क़द्र का क़सूर माफ़ कर दिया, उन्हें वापस आने की इजाजत मिली तो बिना 
किसी को इत्तला दिये नेपाल से भाग कर कलकत्ता पहुंचे । यहां वाजिदग्नली 
शाह का देहांत हो चुका था और बड़े युवराज होने को हैसियत से मिर्जा क़मर 
कदर सबसे ज़्यादा तनख्वाह पा रहे थे । बिरजीस क़द्व ने दावा किया कि बाद- 
शाह के तमाम बेटों से ज़्यादा प्रतिष्ठित और अधिकारो मैं हूं । क़ानून के अनु- 
सार बादशाह की पेंशन में से एक तिहाई घटाकर बाक़ी तनख्वाह मुझे जारी 
की जाये और उनके तमाम बारिसों और रिव्तेदारों की खबरगीरी मेरे ज़िम्मे 
को जाये । इसकी पंरवी में वे इंग्लिस्तान जाने की तंयारियां कर ही रहे थे कि 
उनके खानदानदालों ही में से किसी ने दावत की । दावत से वायस गआ्राये तो 


गुजिश्ता लखनऊ 69 


क़ श्रौर दस्त जारी हो गये | आनन-फ़ानन हालत खराब हो गयी और एक ही 
दिन में वे, उनकी पत्नी और उनके बेटे सबकी जिंदगी का खात्मा हो गया और 
दुनिया उस खानदान की उन तमाम यादगारों से खाली हो गयी जिन्होंने कभी 
तख्त-ताज की सूरत देखी थी । 

इस सबके बावजूद मटिया बुजं की चहल-पहल औऔर उस नयी बस्ती की 
रोनक़ और ग्राबादी ने ऐसी सूरत पैदा कर दी थी कि अगर यह स्थान दुघं- 
टनाग्रों की कुदृष्टि के प्रभाव से बच जाता तो मुहृतों याद दिलाता रहता कि 
उस बदनसीब बादशाह के दरबार और उसके रिश्तेदारों की क्‍या शान-शौकत 
थी और उनका क्या स्तर था। मगर ब्रिटिश गवनंमेंट की न्यायप्रियता ने 
वाजिदग्नोली शाह की जायदाद बांट दी और उनके वारिसों के साथ ऐसा 
न्याय किया कि सारी जायदाद और सारा घर बेचकर जिसका जितना हिस्सा 
है उसके अनुसार बांट दिया जाये और जो कुछ है नक़द रुपये में बदल दिया 
: जाये । इसका नतीजा यही हो सकता था कि मटिया बुर्ज की ईंट से ईंट बज 
गयी । लाखों का सामान कौडियों में बिक गया और वहो श्रह्मता जो कुछ ही 
दिनों में बागे-इरमा (शहाद का स्वगं) बन गया था, विनाश और पतन का 
नरक बन कर रह गया । अब तुम वहां जाकर खाक उड़ाओ कुछ नज़र न 
ग्रायेगा । अगर आंखें अगली रोौनक़ और चहल-पहल को ढूंढती हों तो किसी 
इमरो-उल-क़ैस” को बुलाग्रो जो आंसू बहाता जाये और तुम्हें बताता जाये कि 
यहां मुरस्सा मंजिल थी, यहां नूर मजिल थी, यहां सुल्तानखाना था ओर यहां 
ग्रसद मंजिल थी । वहां म॒णाइरे थे, वहां बड़े-बड़े विद्वानों की गोष्ठी होती 
थी, वहां बेतकल्लुफ़ दोस्त व्यंग्य-विनोद किया करते थे और वहां जादू का-सा 
अग्रसर रखनेवाले कवि और लेखक अ्रपना कमाल दिखाते थे। उस जगह 
संसार की सुंदरियों का कुरमुट था, इस जगह नाच-गाने हुआ करते थे, उस 
जगह पर परी जैसी सुदर स्त्रियों को गान-नाचने की शिक्षा दी जाती थी 
ग्रौर यहां जहांपनाह अपनी सुंदर मुत्य्राशुदा बंगमों के बीच में बेंठकर जश्न 

। शहाद नामक वादझ्ाह ने प्रथ्वी पर ही एक कृत्रिम स्वर्ग बनवाया था 
जिसे बागे-इरम भी कहते हैं | कहते हैं वह उससें प्रवेज्ध करत समय घोड़े से 
गिरकर मर गया थ 

2 इम्लाम-पुर्वं गग का एक प्रस्याव क्राव जिसने ग्रपनी प्राचीन रंगगस्‍ला 





ञ 
जप दि कन प््षर 
का + ग [ ते १ु 


के विनाश का चविशण बडे मामिक दाोड 


70 गुजिश्ता लखनऊ 


मनाया करते थे । इस जगह अफ़ी मचियों के जमघट में दास्तान होती थी, इस 
जगह बटेरों की पालियां होती थीं। इस जगह कबूतर उड़ते थे और उस जगह 
कनकोवे के मेंदात बदे जाते थे । इस ड्योढ़ी पर चंद्रमुखियां पर्दे से सिर 
निकाले भांकती नज़र आती थीं, उस ड्योढ़ी पर मामः असीलों (रसोई बनाने 
वाली ) की आमद-रफ्त से हर वक्‍त एक ग्रजीब जोश-उत्साह रहता था । इस 
ड्योढ़ी पर ख़ास शाइर हाजिर रहते इसलिए कि महलसरा के मालिक को 
शाइरी से दिलचस्पी थी झौर उस ड्योढ़ी पर रोज़ रंगीन इबारत लिखनेवाले 
जवान लेखकों की तलाश रहती थी इसीलिए कि दूसरे-तीसरे यहां से एक नये 
रंग का तोदूनामा! जाकर बादशाह के हुजूर में पेश होता । 

लेकिन मटिया बुर के मिट जाने पर भी उस दरबार की हज़ारों यादगारे 
बाक़ो है। खुद लखनऊ शहर और उस्रकी सोसाइटी इस दरवार की याद 
दिला रही है श्रौर अवध का चप्पा-चप्पा उसकी महसा की याद दिलाता है, 
इसलिए कि इस पर जगह-जगह ग्रतीत के राज्य के चिह्न बने हुए है। लखनऊ 
वालों की हर हरकत झौर प्रदा पिछले दरबार के सदस्यों का जीवित इतिहास 
है ग्रोर उनकी चाल देखकर मुंह से हठात निकल जाता है, 'ऐ गुल वतू खुर 
स्ननदम तू बुए कस दारी” (ऐ फूल, मैं तुकभ से खुश हूं, तुभ में किसकी गध 
है) । लिहाजा इन प्राचीन ग्रवशेषों की याद ताज़ा करने की ग़रज़ से अब हम 
यह बताना चाहते है कि इस दरवार के क़ायम होने से लखनऊ में जो सोसा- 
इटी पैदा हो गयी थी वह क्‍या थी और उसने किस-किस तरह से हिदस्तान 
को संस्कृति पर अग्रसर डाल रखा था ? 

हिंदुस्तान में उन दिनों फ़ारसी दरबारी ज़बान थी और हिंदस्तानियों क॑ 
संस्कृति ईरानी सभ्यता से प्रभावित थी । सफ़विया स्राम्राज्य के काल मे ईरा 
नियों का आम मज़हब शीम्रा इसना अशीरी हो गया था और हिंदुस्तान का 
मुगल सम्राट तुगताइया मज़हब-उल-मिननत का अनुयायी था मगर सस्क्ृति पर 
चूंकि फ़ारसी असर था इसलिए धामिक मतभेद के बावजद जो ईरानी यहां 
आते उनका बड़ा सम्मान होता था | इसी शिष्ट व्यवहार के कारण नरजहां 
बेगम जहांगीर के ताज-तरुत की मालिक बन गयी थी । इसी की बदौलत दिल्‍ली 
के ग्रध्चिकतर प्रतिष्ठित अधिकारी उस युग के प्मंत में ज्ञीआ ये और उसी की 
.. 7 तोदुनामा उन खतों को कहते थे जो बेगमें जहांपनाह को भेजती थीं और 
जो आमतौर पर प्रेम-प्रणय से संबंधित होते थे । 


गुज़िइता लखनऊ 7] 


वजह से ग्रमीनउद्दीन खां नेशापुरी यहां पहुंचते ही नवाब बुरहान-उल-मुल्क बन 
कर गंगा के सारे विद्याल क्षेत्र के मालिक हो गये ! बुरहान-उल-मुल्क का प्रभाव 
ग्रौर प्रभुत्त जितना बढ़ता गया और उन्नति करता गया उतने ही वे दिल्‍ली 
के विभिनन क्षेत्रों के दक्ष लोगों के संरक्षक बनते गये । चूंकि उनकी और 
नवाब सफ़्दरजंग को जिंदगी एक नये राज्य की बुनियाद डालने मे बीतो इस- 
लिए सिवाय बहादुर सिपाहियों की क्रद्गदानी के उन्हें राष्ट्रीय संस्कृति और 
सामाजिक विषयों की और ध्यान देने की बहुत ही कम मोहलत मिली क्‍योंकि 
इन बातों का संबंध युद्ध और विजय के युग की अपेक्षा शांति और समृद्धि के 
युग से श्रधिक हुआ करता है। 

लेकिन जब शुजाउद्दोला ने बक्सर की लड़ाई में हिम्मत हारने के बाद 
ग्ंग्रेजों से नया समभोता किया और मजबूर होकर फ़ंज़ाबाद में खामोश बेठे 
तो अवध में एक नयी संस्कृति प्रारंभ हो गयी । इस लेख के शुरू में हम बता 
चुके हैं कि शुजाउह्ोला के ज़माने में दिल्‍ली के बाकमाल लोग कितनी ग्रधिक 
संख्या में वतन छोड-छोड़ कर यहां आने लगे थे । दिल्‍ली से फ़ैजाबाद तक हर 
पेश और हर वर्ग के लोगों के ग्राने का कैसा तांता बंध गया था और सिर्फ 
नौ साल की मुद्दत में फ़ज़ाबाद क्‍या से क्या हो गया था ? शुजाउद्दोला के बाद 
नवाब ग्रासफ़ठद्दोला जब लखनऊ आकर रहे तो फ़ैजाबाद का जमा-जमाया 
ग्रखाड़ा एकबारगी फ़ेजाबाद से उखड़कर लखनऊ में थ्रा गया और दिल्ली के 
उच्च परिवारों और कला-प्रवीणों का जो दल फ़ैजाबाद जा रहा था, लखनऊ 
ही रोक लिया गया जो ढोक रास्ते में पडता था । और पंत में कुछ भद्रजन 
और शिल्पी जो फंज़ाबाद में बेगमों की सरकारों में उलभे रह गये थे धीरे- 
धीरे वे भी लखनऊ में ग्रा गये इसलिए कि ग्रासफ़उद्ौला ने यहां धन-दौलत 
की ऐसी गंगा नहीं बहा रखी थी कि कोई सुनता और उसमें नहाने के शौक़ 
में एकदम न दोड पड़ता । 

उन दिनों यों तो वहुत-सी हिंदू रियासतें मौजूद थीं मगर मुहज्जब और 
शिष्ट दरबार मुसलमान शासकों के ही समभे जाते थे और हिंदू राजा खुद 
इस बात की प्रशंसा करते थ कि सभ्यता और संस्कृति में हम मुसलमान दर- 
बारों का मुक़ाबिला नही कर सकते क्योंकि अपनी प्राचीन संस्कृति को फिर 
से जीवित करके अपने लिए नयी संस्कृति और नया साहित्य पैदा करने का 
खयाल अभी उसमझअंग्रेजी शिक्षा ने पटा नहीं किया था । इसका नतीजा यह 


72 गुजिश्ता लखनऊ 


था कि भगर कोई उच्च कोटि का विद्वान, कवि या सिपाही मुसलमान के 
सामंतों से निराश होकर हिंदू धनिकों के इलाके में पहुंच जाता तो हाथों-हाथ 
लिया जाता और देवताग्नरों की तरह उसका आदर-सत्कार किया जाता था । 
मुसलमान दरबार उन दिनों इने-गिने ही थे । सबसे पहले तो दिल्‍ली का 
मुगल दरबार था और उसके प्राचीन वैभव के कारण हर तरह के कला-प्रवीणों 
झ्रोर प्रामाणिक भद्रजनों का केंद्र दिल्ली बती हुई थी और उसी सरजमीन के 
रोड थे जिन्होंने दूर-दराज सूबों में जाकर नये-तये दरबार कायम किये थे 
जिनमें से दक्षिण में आसफ़जाह का दरबार था। वहां से ग्रागे बढ़कर टीपू 
सुल्तान और नवाब ग्रकाट के दरबार थे। उत्तर में दिल्‍ली से चलिये तो पहले 
रुहेलखंड के बहादुर पठानों का राज्य मिलता, उसके बाद यह अवध का 
दरबार था। फिर उससे आगे मुशिदाबाद में नवात्र नाजिम-ए-बंगाल का दर- 
बार था। उपयुक्त इस्लामी दरबारों से दक्षिण के दरबार बहुत दूर थे। 
उनका रास्ता एक तो जंगलों और पहाड़ों कीं वजह से बहुत ही दुर्गंग था और 
इस पर भी जुरंत करके कोई चल खड़ा होता तो ठग और डाक, जो सारे देश 
में फेले हुए थे, रास्ते ही में उसकी जिंदगी का खात्मा कर देते । टीपू सुल्तान 
गऔर नवाब कर्नाटक के राज्य तक जाना तो दरकिनार, किसी को निज़ाम 
हैदराबाद की रियासत तक पहुंचना भो मुश्किल से नसीब होता । इसलिए 
जब दिल्‍ली बिगड़नी शुरू हुई और मुगल सम्राटों की हालत खराब होन से 
वहां लोगों की क़द्र कम होने लगी तो लोगों ने ग्राम तौर से दक्षिण की और 
जाना शुरू किया। इसमें शक नहीं कि रुहेलखंड बहुत क़रीब था, यहां के 
पठान शासक अगर उन्हें पूछते तो उनसे ज्यादा मौका किसी को हासिल नहीं 
था । मगर उनमें घामिकता, वीरता और ग्रन्य गुण तो थे लेकिन ज्ञान-विज्ञान 
और सांस्कृतिक क्रियाकलाप से उन्हें कोई दिलचस्पी न थी । उनकी हालत का 
सही अंदाजा कीजिये तो मालूम होता है कि वे लोग शुद्ध रूप से सेनिक रुचि 
रखते थे जिन्हें अपने देश के लोगों को इकट्ठा करने और अपने जिर्गों की 
तादाद बढ़ाकर अ्रपनी सेनिक शक्ति में वृद्धि करने के सिवाय और किसी बात 
का शोक़ न था। संस्कृति और सम्यता की दृष्टि से देखिये तो उनकी हालत 
बिलकुल जंगली गेंवारों की-सी थी । ऐसे लोग भला कवियों, साहित्यकारों 
और दूसरे कलाकारों के महत्व को क्‍या समभते ? लिहाजा उनके राज्य में 
जो दाखिल हुआ, क़दम बढ़ाता हुग्नरा ग्रागे निकल गया और चार-पांच मंजिलें 


गुजिइ्ता लखनऊ 43 


ते करके लखनऊ में पहुंचा तो देखा कि रईस से लेकर छोटे-से-छोटे वर्ग वाले 
भी उस का स्वागत कर रहे है और हर तरह की सेवा के लिए तैयार हैं । 
ऐसी जगह पहुंचकर फिर भला कोन वापस आ सकता है ? जो गया वहीं का 
हो गया । दिल्ली का हर लुटा-पिटा व्यक्ति यहां आते ही पांव तोड़ कर बेंठ 
गया : न उसे अपना वतन ही याद रहा और न किसी और दरबार के देखने 
की हवस ही दिल में बाक़ी रही । चंद लोग यहां से आगे बढ़कर नवाब 
नाजिम-ए-बंगाल तक भी पहुंच गये । मगर वे वही थे जिनकी लखनऊ कद्र 
न कर सका | मगर ऐसे चंद गिनती ही के लोग थे वरना दिल्‍ली से जितने 
कलाकार आये सभी खपते चले गये । थोडें-से अर्स में ही यह हालत हो गयी 
कि उस समय के सबसे अ्रधिक सुसंस्कृत समाज के जितने प्रसिद्ध बुजुगें थ सब 
लखनऊ के अंदर जमा थे । 

सिफं एक चीज़ ऐसी थी जो इस दरबार के कायम द्ोने से पहले ही लख- 
नऊ में मौजूद थी और वह अरबी का ज्ञान था। इसकी बुनियाद उस समय 
पड गयी थी जब शहंशाह औरंगजेब ने फ़िरंगी महल के मकान मुल्ला निज़ाम- 
उद्दीन सिहालवी को दे दिये थे । मुलला साहब और उनके परिवारवालों ने 
चंद ही रोज में फ़िरंगी महल को हिंदुस्तान की एक ऐसी ऊंचे दर्ज की यूनि- 
वसिटी बना दिया कि सारे हिंदुस्तान के सारे विद्वानों का केंद्र लखनऊ का यह 
छोटा-सा मुहल्ला ही क़रार पाया शेख श्रब्दुल हक़ देहलवी के बाद दिल्‍ली 
में भी कोई प्रसिद्ध विद्वान पंदा नहीं हो सका था। ग्राखिर में शाह वलीउललाह 
साहब के खानदान ने ग्रलबत्ता बहुत प्रगति की लेकिन उनकी ख्याति केवल 
विद्वानों तक ही सीमित थी | हृदीस! के अलावा और जितनी शाञाएं ज्ञान की 
है उनका विश्वविद्यालय लखनऊ ही था। उन दिनों लखनऊ एक गुमनाम 
दहर था मगर एक ऐसे ग्रज्ञात स्थान का इतना बड़ा विश्वविद्यालय बन जाना 
कि हिंदुस्तान दरकिनार बुखारा, ख्वारज्म हिरात और काबुल उसके आग 
सिर भुका दे, बहुत ही आश्चययं की बात है। सारी इस्लामी दुनिया यही की 
शागिदी पर गवं कर रही थी और यहीं के चुने हुए पाठ्यक्रम यानी सिलसिल- 
ए-निजामिया को शभ्रपनाती थी । ग़रज़ फ़िरंगी महल के विद्वानों के कारण 
इस नये दरबार के क़ायम होने से पहले ही लखनऊ दर्शन, तकंशास्त्र, इस्लामी 
धर्म शास्त्र तथा उसके सिद्धांत और ज्ञान-विज्ञान की गअन्य-अनेक शाखाओं का 
। हजरत मुहम्मद साहव की कही हुई बात । 





74 गुजिइता लखनऊ 


केंद्र बन चुका था। लिहाज़ा _इस एक चीज़ में तो लखनऊ इस दरबार का 
ऋणी नहीं है, बाक़ी और सभी प्रकार की प्रगति इस सल्तनत के क़ायम होने 
ही से ही हुई । 

प्रब हम ग्लग-ग्रलग यह बताना चाहते हैं कि दिल्‍ली से लखनऊ में कौन- 
कौन सी चीजें ग्रायीं श्रौर यहां आकर उन्होंने क्‍या रंग अपनाया | सबसे 
पहली चीज उद््‌ृ ज़बान है जो दिल्ली के उन भद्रजनों और फ़ौज के सरदारों 
की जबान थी जो अब बुरहान-उल-मुल्क बहादुर के साथ लखनऊ में ग्राये थे । 
यह ज़बान दिल्‍ली में पैदा हुई और इसकी शाइरी की शुरूआत दक्षिण से हुई । 
'वली गुजराती ने दिल्ली में झ्राकर अपना दीवान पेश किया और अपनी 
दिलकश शाइरी से उदृ भाषियों को नींद से जगाया। उनके कलाम में कुछ 
ऐसा जादू था कि सुनते ही सबकी ज़बान पर चढ़ गया श्रौर दिल्ली में उद्ू 
शाइरी शुरू हो गयी । 

शुरू में तो कुछ ही बुजुर्ग थे जिन्होंने उस्तादी की शान से दिल्‍ली में 
शाइरी की दाद देना शुरू की । मगर उस जमाने को अगर उर्दू ज़ब्रान का 
बचपन नहीं तो उदू शाइरी का बचपन कहना चाहिए | उर्दू जगत के उन 
अगले-पिछलों मे सबसे अ्रधिक विद्वात और सबसे बढ़कर दक्ष खान' आरजू 
थे जिन्हें मोलाना मुहम्मद हुसन ग्राज़ाद ने दूसरे दौर की शाइरी में रखा है । 
बाद के काल में बड़े-बड़े घुरंघर--जिनमें 'सौदा', 'मीर', मिर्जा मजहर 
जाने जानां और ख्वाजा मीर ददं' शामिल हैं--सब उनके शागिद थे। 
शाइरी और भाषा पर अपूर्व अधिकार की बुनियाद लखनऊ में इन्ही पहले 
उस्ताद खान आरजू ने डाली । नबाब शुजाउद्दोला के माम्‌ सालारजंग ने 
बड़ी मिन्‍नत-समाजत से उन्हें लखनऊ बुलवाया और एक जमाने तक अ्रवघ मे 
रह कर शुजाउद्दौला की गद्टी नशीनी के दो बरस बाद यानी 752 ई० मे 
खास लखनऊ में ही उनका निघन हुआ । उदूं शाइरी के वही पहले उस्ताद 
थे और उन्हीं से उदू काव्य के लखनऊ में आने की बुनियाद पड़ी । मगर 
ग्रफपोस कि उनकी हडिडयां लखनऊ की सरज़मीन से छीन कर दिल्‍ली की 
मिट्टी में दफ़नायी गयीं । क् | 

इसके बाद इसी दोरान शाइरी के दूसरे नामी उस्ताद ग्रशरफ़ अली खां 
'फुगां ने, जो एहमद शाह बादशाह के दूध शरीक भाई थे, क़द्गदानी की 
तलाश में लखनऊ की राह ली । शुजाउदहौला ने उनका बड़ा आ्रादर-सम्मान 


गुजिश्ता लखनऊ 75 


किया, उन्हें हाथों-ह॥वाथ लिया और एक जमाने तक अपने दरबार में रखा। 
मगर शाइरों के खयाल चाहे नाजुक न हों उनके दिमाग़ नाजुक हुआझ्आा करते 
है। किसी मामूली-सी बात पर रूठ कर अजीमाबाद चले गये श्रौर शुजाउद्दोला 
के देहांत से दो बरस पहले वही उनकी मृत्यु हो गयी । 

ग्रब मौलाना मुहम्मद हुसेन ग्राजाद का मुक़रंर किया हुआ श्ाइरी का 
तीसरा दौर शुरू हुआ जबकि 'खान' आरजू के शागिदों का उद शाइरी पर 
एकछत्र राज्य था। उस ज़मान की हालत देखने से मालूम होता है कि 
दिल्‍ली अपने कलाकारों को अपनी गोंद में संभाल नही सकती । हर तरह के 
कलाकार वहां से निकलते चले जाते है और जो जाता है फिर नही आता । 
इसके मुकाबिले में लखनऊ की यह हालत है कि जो भी कलाकार आता हे। 
चाहे कहीं का हो, यही का होकर रह जाता है। मिर्जा रफ़ी 'सौदा', मीर 
तक़ी 'मीर, सेंयद मुहम्मद मीर 'सौज' जो इस तीसरे दोर के महाकवि है, सब 
दिल्‍ली छोड़-छोडकर लखनऊ में आये और यही की मिट्टी में सो गये । 

इनके ग्रलावा जो महाकवि इस ज़माने में लखनऊ आये झौर यही के 
ही गये मीरज़ा जाफ़र अली हसरत', मीर हैदर अली 'हैरान', ख्वाजा हसन 
'हसन , मी रज़ा 'फाखर' मकी, मीर 'ज़ाहक' बक़ाउल्लाह खां 'बक़ा',मीर हसन 
देहलवी मीर 'जाहक के पुत्र (जिनकी मसनवी है) और इन्ही के ऐसे बीसियों 
शाइर है। मीर क़मरउद्दीन मिन्नत, मीर जियाउद्दीन 'जिया', ग्रशरफ गली खां 
'फुगा दिल्‍ली से लखनऊ में आकर एक मुहत तक रहे ग्रौर यहीं चमके | मगर 
ग्राखिर म बाहर के क़द्रदानो की कोशिश से कलकत्ता और ग्रज़ीमाबाद मे 
जाकर मौत की गोंद में सोये | शेख मुहम्मद क़ायम 'कायम' का निधन 
हालांकि उनके वतन नगीना में हुआ मगर वे भी एक मुहत तक इसी लखनऊ 
की सभा के एक एक्टर थे । 

सिफ मीरज़ा मजहर जान-जाना और ख़्वाजा मीर 'दर्द' जैसे चद बुजुर्ग 
दिल्ली में पड़े रह गये जिन्हें इसलिए दिल्‍ली में क्रम जभाने का मौका मिल 
गया था कि उनमें फकीरों का-सा सयम और संतोष मौजूद था और सज्जा- 
दानशीनी' की वजह से अपभ्ती दरवेशी को न छोड सकते थे | ग़रज ज्ञाइरी 
का यह तीसरा दोर वह जमाना है जबकि दिल्‍ली की सभा वहा से उखड़कर 

: किसी बड़े फ़क़ौर की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी का उस गहटी 
पर बेठना । 


76 गुजिश्ता लखनऊ 


लखनऊ में जम रही थी और लखनऊ में उसकी ऐसी क़द्र हो रही थी जिसकी 
हिंदुस्तान के इतिहास में मिसाल नहीं मिलती । ह 

ग्रब चौथा दौर शुरू हुआ । इसके शाइर भी श्रगर्चे दिल्‍ली और ग्रकब रा- 
बाद वगैरा की ज़मीन से पैदा हुये थे मगर सबकी शाइरी लखनऊ ही 
में चमकी | यहीं से उनका नाम मशहूर हुआ, यहीं के मुशाइरों के दे मीरे- 
मजलिस थे । ये लोग आम तौर पर यहीं से निकले, यहीं रहे, यहीं उनका 
उत्कषष हुआ और यहीं मर-खप गये । इस दौर के शाइर “जुरअ्रत , सयद इशा 
मुसहफ़ी', 'कतील' और “रंगीन', वगेरा थे । इन लोगों का अपने युग में 
भाषा पर पूरा अधिकार था और उनकी कविता की लोकप्रियता इतनी बढ़ 
गयी थी कि उनके सामने किसी उदू शाइर का नाम चमक ही न सका । इन 
सबकी हडिडयां कहां हैं? लखनऊ की ज़मीन में । 

उस जमाने में दिल्‍ली के साहित्यकार जिस संख्या में लखनऊ आा रहें थ 
उसका अंदाज़ा सैयद इंशा की एक कहानी से हो सकता है जिसमें उन्होंने उस 
युग के एक शरीफ़ बुड॒ढे और नू रन नामक एक वेश्या की बातचीत चित्रित 
की है । वह बुजुर्ग और वेश्या दोनों दिल्‍ली के है मगर दोनों लखनऊ में बाते 
कर रहे हैं । बी न्रन कहती है, “भ्रजी आो मीर साहब ! तुम तो ईद का 
चांद हो गये । दिल्‍ली में आते थे दो-दो पहर रात बंठते थे । लखनऊ मे तुम्हें 
क्या हो गया कि कभी सूरत भी नहीं दिखाते ? श्रवकी कबंला में कितना मैंने 
ढूंढा, कहीं तुम्हारा असर-आसार मालूम न हुआ । ऐसा न किजो की ग्राठों में 
भी न चलो । तुम्हें ग्रली की क़सम ग्राठों में मुकरेर चलियो । इसका जवाब 
जो मीर साहब ने दिया है वह अगर्चे बहुत ही दिलचस्प है मगर हम विस्तार 
से बचने के खयाल से उसे छोड देते हैं। उन्होंने दिल्‍ली और लखनऊ के 
मौजूदा रंग पर एतराज़ किये हैं और समकालीन शाइरों पर नुक्ताचीती को 
है जिससे हमें सरोकार नहीं । हमें सिर्फ यह बताना है कि उस जमाने 
शरीफ़ों और बाकमालों को तो छोडिये, रंडियां तक आ-आकर लखनऊ 
बसती जाती थीं । और जो लोग दिल्‍ली में फूलवालों की सैर के रसिया 
ग्रब कबंला और आठों के मेले में ग्रपना दिल वहलाते थे । 

शम्स-उल-उलमा मौलाना आज़ाद ने बाद के दिल्‍ली के तमाम शाइरों को 
उनके युग या दूसरी विशेषताओं का खयाल किये बिना एक जगह जमा करके 
आर जमाने की तनाबें खेंच कर पांचवां दौर बना दिया है, लेकिन यह ना- 


का काया! 


गुजिश्ता लखनऊ 7 


इंसाफी है। ग्रसली पांचवां दौर सिर्फ 'नासिख' और 'ग्रातिश' का था जिसमें 
भाषा ने नया रूप धारण किया और बहुत से पुराने मुहाविरे निकाल दिये 
गये, नयी बंदिशें पैदा हुई और उस जबान की बुनियाद पड़ी जो दिल्‍ली और 
लखनऊ के बाद के शाइरों में समान रूप से लोकप्रिय हुई और क़रीब-क़रीब 
वह भाषा बन गयी जो अब हिंदुस्तान में प्रामाणिक है और यही वह जमाना 
था जब कविता के साम्राज्य में पहले-पहल लखनऊ का सिक्‍का जारी हुगझ्ना । 

इसके बाद छठा दोर वह था जब लखनऊ में वजीर' “जिया, “रिद', 
गोया', “रइक', 'नसीम' देहलवी, असीर', मसनवो-लेखक नवाब मिर्जा शोक' 
ग्रौर पं० दया शंकर 'नसीम' की शाइरी की धूम थी और दिल्‍ली में 'मामिन', 
'जौक', और ग़ालिब' अपना शाइराना गीत सुना रहे थे । उस दौर ने सच यह 
है कि जबान को खयालों की दृष्टि से सबसे ज्यादा तरकक़ी दी । 

इसके बाद सातवां दौर 'अ्मीर', दाग, 'मुनीर, तसलीम', 'मज़रूह', 
'जलाल', 'लताफ़त', अफ़ज्ल' और 'हकीम' वगरा का था । 

इन आखिरी दौरों पर उड़तीं हुई नजर डालने से साफ नज़र झा जाता है 
कि जबान की खूबी और शाइरी ने लखनऊ में कसी मजबूत जगह पकड़ी थी। 
चद ही रोज में शेर कहना लखनऊ में एक फ़ैशन बन गया और शाइरों की 
यहां ऐसी भरमार हो गयी कि शायद कहीं किसी जबान में न हुई होगी । 
औरतों लक में गेरो-शाइरी का चर्चा हुआ ग्रौर जाहिलों के कलाम में भी 
शाइराना खबाल, उपमाशों और अलंकारों की कलक नज़र आने लगी । 


| 0] 


फारसी शाइरी का ग्रसल उठान मसनवी/ से हुग्ना है और यह काव्य-रूप 
हमेशा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और लोकप्रिय समझा गया है। इसका प्रारंभ 
फ़िरदौसी के महाकाव्य 'शाहनामा से हुआ। फिर “निज्ामी, 'सादो, 
मोलाना रूम', खुसरो', 'जामी' और 'हातिफ़ो वरगरा ने इसमें बडी ख्याति 

 उद्दू का एक काव्य-रूप जिसमें कोई कहानी या उपदेश एक ही वृत्त 
में होता है और उसका हर शेर दूसरें शेर रदीफ़-काफिए में नहीं मिलता और 
हर शेर की दोनों पंक्तिया सानुप्रास होती हैं । 


78 गुजिह्ता लखनऊ 


प्राप्त्की। उदू में मीर तक़ी 'मीर' ने छोटी-छोटी बहुत सी मसनवियां 
दिल्ली और लखनऊ के प्रवास के दौरान लिखी थीं मगर वे इतनी छोटी और 
मामूली हैं कि मसनवियों के संबंध में उतका जिक्र कुछ ग्रनुचित जान पड़ता है । 

मसनवी लिखने का प्रारंभ उद्दृ में मीर जाहक के बेटे मीर गुलाम 
हसन 'हसन' से हुआ जो बचपन हो में अ्वने पिता के साथ लखनऊ चले आये 
थे। यहीं के वातावरण में वे पले-बढ़े और यहीं उनकी काव्य-प्रतिभा का 
विकास हुआ क्‍योंकि जिस शिक्षा और जिस समाज ने उनकी मसनवी 'बेन- 
जीर' ग्रौर “बद्र-ए-मुनीर' लिखवाई वह शुद्ध रूप से लखनऊ की थी । इस 
जमाने में मिर्जा मुहम्मद तक़ी खां “हवस' ने मसनवी लेला-मजनूं लिखी 
ग्रीर लखनऊ में मसनवी के प्रति रुचि बढ़ने लगी। 'आतिश' और 'नासिख' 
के ज़माने में तो ज़रा खामोशी रही मगर फिर जो यह शौक़ उभरा तो प० 
दया शंकर 'नसीम' ने गुलजार-ए-नसीम” आफताबउद्दोला 'क़लक़' ने 'तिलिस्म 
-ए-उलफत' और नवाब मिर्जा शौक़ ने बाहर-ए-इश्क , जहर-ए-इश्क' और 
“फरेब-ए-इश्क़'' लिखी और उन्हें ऐसी ख्याति और लोकप्रियता प्राप्त हुई कि 
हर छोटे-बड़े की ज़बान पर इन मसनवियों के शेर चढ़ गये । इससे पहले के 
ज़माने में किसी साहब ने 'मसनवी मीर हसन' के जवाब में 'लज्जत-ए-इश्क 
नामक एक मसनवी लिखी थी । वह नवाब मिर्जा शौक़ की मसनवी के साथ 
प्रकाशित होने की वजह से उन्हीं के नाम से संबद्ध हो गयी, लेकिस वास्तव में 
न वह उनकी है झ्लौर न उनके ज़माने की । 

इन सब मसनवियों को देखते हुए मसनवी 'गुलजार-ए-नसीम' इस बात 
के बावजूद कि वह बहुत लोकप्रिय हुई, उसमें सेकड़ों गलतिया है । देखने से 
मालूम होता है कि एक नौसिखुए का नाजुक खयाल है जो हर प्रकार के 
काव्यात्मक गुण अपनी कविता में पैदा करना चाहता है। मगर चूकि उसे 
काव्य-कला पर पूरा श्रधिकार नहीं है इसलिए क़दम-क़दम फ्र ठोकर खाता है 
और किसी जगह अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता | इसके जवाब में ग्रागा अली 
'शम्स' ने जो एक अनुभवी शाइर थे इसी बहर (छंद) में एक मसनवी लिखी 
थी जिसमें गलती तो कोई थी ही नहीं, अलबत्ता उपमा, अलंकार और शब्दा- 
लंकारों के चमत्कार दिखाये थे। मगर ग्रफु्तॉस वह मसनवी मिठ गयी और 
'गुलजार-ए-नसीम' को जो प्रसिद्धि मिल चुकी थी उस पर वह हावी न हो 
सकी । दिल्‍ली में उन दिनों मोमिन खां ने चंद छोटी-छोटी बेमिसाल मसनवियां 
लिखीं जो बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुई । 


गुजिश्ता लखनऊ 79 


मोमिन खां की शाइरी में नाजुकखयाली बढ़ी हुई थी । काल्पनिक उप- 
माझ्नों और अलंकारों पर वे अपनी कविता की इमारत खडी करते थे । मस- 
नवियों में वे अधिकतर काल्पनिक भावों तथा विचारों को मानवीकृत करके 
ग्रपनी कविता में एक विशुद्ध रस उत्पन्न कर देते थे । मोमिन खां के एक शिष्य 
'नसीम' देहलवी लखनऊ में आये और यहां के मुशाइरों में ग्रपना रंग ऐसा 
जमाया कि बहुत से लोग उनके शागिद हो गये | 'नसीम' देहलवी ने लखनऊ 
में अपने उस्ताद के रंग को खूब चमकाया और उनके शागिदं 'तसलीम' लख- 
नवी ने उदूं मसनवी में 'नज़ीरी' 'उर्फ़ी!' और 'साइब' की उवंर कल्पना 
दिखायी और उर्दू काव्य में जीते-जागते 'फंजी' और 'गनीमत' लाकर खड़े कर 
दिये । इधर झआखिर-ज़माने में मौलवी मीर अली हैदर तथा तबाई 'नज्म 
लखनवी ने शराब की निंदा में 'साक़ीनामा सकसक्रिया' के नाम से एक ऐसी 
बेमिसाल नीति-विषयक कबिता उदू पब्लिक के सामने पेश कर दी कि उसका 
जवाब नहीं हो सकता । ग़रज़ कि मोमिन खां की चंद संक्षिप्त मसनवियों 
की और भअ्रगर ध्यान न दिया जाये तो उदू मसनवी-रचना का प्रारंभ भी 
लखनऊ में हुआ और उसकी प्रगति भी यहीं हुई । 

कुछ लोग मीर हसन की मसनवी और 'गुलज़ार-ए-नसीम' के माध्यम से 
दिल्‍ली और लखनऊ की भाषा की तुलना किया करते हैं। जिस खयाल को 
मौलाना मुहम्मद हसन ग्राजाद ने और अधिक पुणष्ट किया लेकिन एक तो 
'गुलजार-ए-तसीम' को 'नजीर अकबराबादी के 'बजारा-नामा की तरह ग्मगर 
ख्याति मिल भी गयी तो उसे मीर हसन को मसनवी की तुलना मे रखना उद्दू 
कविता का घोर अपमान है । यदि तुलना ही करनी है तो मीर हसन की 
ग्रौर मसनवी 'तिलिस्म-ए-उलफत' की हो सकती है और यदि 'गुलजार-ए-नसोम 
की जबान जबरदस्ती लखनऊ की जबान मान भी ली जाये तो मीर हसन कीं 
मसनवी झर “गुलजार-ए-नसीम' की तुलना दिल्‍ली और लखनऊ की कविता 
की नहीं बल्कि खुद लखनऊ की अगली पिछली जबानों की तुलना है इसलिए कि 
मीर हसन की मसनवी पहली जबान का नमूना है और यह आखिरी ज़बान का । 

शाइरी का एक महत्वपूर्ण और सबसे प्राचीन रूप मसिया है| प्राचीन 
ग्ररबी शाहरी में ज्यादातर मसिए ग्रौर रजजः ही कविता में चमत्कार दिखाने 


। शोक-गीत । 
2 युद्ध में अपने कुल की शूरता का वर्णन । 


80 गुजिश्ता लखनऊ 


के माध्यम थे । फ़ारसी में मप्तिया पढ़ने की प्रथा कमज़ोर पड गयी थी लेकिन 
सफ़विया व के शासन-काल में ईरान में शीआ संप्रदाय को प्रश्नय मिला तो 
हजरत मुहम्मद साहब क॑ रिहतेदारों पर पड़ी मुसीबतों की याद ताज़ा करने 
के लिए शाइरों का ध्यान मसिए लिखने की श्रोर गया । मौलाना मोहतशिम 
काशफ़ी ने कुछ पदों का एक अनुपम मसिया लिखा था जो हर जगह लोकप्रिय 
हुआ । उसके बाद से रिवाज था कि शाइर कभी-कभी हुसेन के मातम में दो- 
एक मसिए भी लिख दिया करते। लेकिन काव्य जगत में मंसियागोई का महत्व 
इतना कम था कि कहा जाता था, बिगड़ा शाइर मसियागो'। फिर जब मज- 
हब की दृष्टि से सफ़विया साम्राज्य की उत्तराधिकारिणी शअ्रवध की सल्तनत 
बनी तो लखनऊ में मजलिसों की वृद्धि और ताजियादारी के जोश के कारण 
मसियागोई की ऐसी क़द्र हुई कि इस कला की असाधारण प्रगति हुई और 
वास्तव में देखा जाये तो लखनऊ के उत्कर्ष का रहस्य भी इसी ऐतिहासिक 
घटना में निहित हैं | हिंदुस्तान में मुगलों का राज्य था जिन्होंने फारसी भाषा 
को दरबारी भाषा क़रार दे दिया और फ़ारसी संस्कृति उनकी जिंदगी तथा 
अन्य सभी महत्वपूर्ण क्रियाकलाप की केंद्र थी। नतीजा यह हुआ कि हर 
ईरानी हिंदुस्तान में श्राते ही श्रांखों पर बिठाया जाता और उसकी हर हरकत 
ग्रोर हर अदा लोकप्रिय होती । दिल्ली में बादशाहों का मजहब सुन्नी होने की 
वजह से ईरानी अपनी बहुत-सी बातों को छिपाते और वहां की महफ़िलों में 
इतने मुखर न हो पाते जितने कि वे वास्तव में थे | श्रवध का दरबार शीा 
था और यहां का शासक परिवार ख़ास खुरासान से आया था इसलिए यहां 
ईरानी बिल्कुल खुल गये और अपने असली रंग में प्रकट हो जाने से जितने 
मुखर और प्रफुल्ल हुए उतना ही ज़्यादा यहां के दरबारवालों ने धामिक एकता 
के कारण उनकी विशेषताएं अपनानी शुरू कर दीं और ईरानी संस्कृति जो 
दरग्रसल सासानी और गब्बासी शान-शौकत की गोद में पली हुई थी कुछ ही 
दिन के अ्रंदर लखनऊ की संस्कृति का अंग बन गयी । 

ग़रज सौदा और 'मीर' के जमाने में मियां 'सिक्रंदर', पदा', 'मिस्कीन' 
और ग्रफसुर्दा मसियागो थे जो इमाम हुसेन की शहादत के बारे में छोटी- 
छोटी नज़्म लिख कर मजलिसों में सुनाया करते थे। उनके बाद मीर खलीक 
ग्रौर मीर जमीर ने मसियागोई का विकास किप्ा और मर्सियों का आधुनिक 
रूप उन्हीं के समय से उभरा | यहां तक कि समय ने मीर जमीर के शारगिद 


गुजिइता लखनऊ 8] 


मिर्जा दबीर' और मीर खलीक़ के सुपुत्र मीर 'झनीस' को बहुत ख्याति दिलायी 
ग्रौर इन दोनों बुजुर्गों ने मसिया लिखने में ऐसे-ऐसे कमाल दिखाए कि वे 
साहित्याकाश के सूय और चंद्र बनकर चमके । वही मुक़ाबिला जो 'मोर' और 
'सौदा' और 'भ्रातिश' श्रोर 'नासिख' में रहा था ग्रब मीर “ग्रनीस' पश्रौर मिर्जा 
'दबी र' में क़ायम हुआ । मिर्जा दबीर' के यहां भाषा की गरिमा, ऊंची कल्पना 
प्रौर पांडित्य था तो मीर अनीस' में सादगी, बेतकल्लुफ़ो और मानवीय भाव- 
नाग्नरों को प्रभावित करनेवाली भाषा की वह विशेषता थी जो ईश्वरप्रदत्त 
प्रतिभा से ही संभव थी, सीखने से प्राप्त नहीं हो सकती । इन दोनों बुजुर्गों से 
मसियागोई की कला को कविता के अन्य रूपों से आगे बढ़ा दिया और उदू 
साहित्य में वे नयी चीजें पैदा कीं जिन्‍हें अ्रंग्रेजी शिक्षा से प्रभावित लोग ढूंढने 
लगे थे। 

अनीस' और 'दबीर' ते मसियागोई को उस चरम सीमा पर पहुंचा दिया 
था कि अभ्रब मसियागोई बजाये एक दोष होने के सबसे बड़ा काव्यात्मक गुण 
बन गयी थी । लखनऊ के सभी निवासी इन दोनों महाकवियों के ऐसे प्रशंसक 
ग्रौर गुणग्राहक हुए क्रि सारा शहर दो गिरोहों में बंट गया और हर सहृदय 
या तो अ्रनी सिया था या दबीरिया और इन दोनों गिरोहों में प्रापस में हमेशा 
विरोध रहता था । 

मीर अनीक्ष' ने मरसयागोई के साथ मसियाख्वानी (वाचन) को भी एक 
कला का रूप दे दिया | यूनान के कुछ वक्ताओं के बारे में सुना जाता है कि 
उन्होंने ग्रपने भाषणों में असर -पैदा करने के लिए खास-खास कोशिशों की थीं 
श्रौर वे स्वर के उतार-चढ़ाव और हावभाव तथा मुद्रा-परिवतन से श्रपने भाषण 
में प्रभाव उत्पन्न करते थे । इस्लाम की इस लंबी उम्र में इस ग्त्यंत ग्रावश्यक 
कला को मोर 'अ्रनीस' ने ही जिंदा किया । समुचित शब्दों की ध्वनि में 
विविधता लाने और विषय के अनुकल चेहरा बना लेने, मसिया पढ़ते समय 
अंग-प्रत्यंग के हावभाव दिखाने आदि से उसे अधिक प्रभावशाली बना देने की 
कला लखनऊ की झौर वह भी 'भझनीस' के घराने की ईजाद है जिसे तरक्क़ो 
देने के लिए अब भी प्रयत्न किये जा रहे हैं और हमारे वक्‍ता अपने भाषण में 
प्रभाव पैदा करने के लिए अगर इन उस्तादों से कुछ सीखें तो बहुत ही सफल 
वक्ता बन सकते हैं । 

डामा पाहवात्य काव्य का एक महत्वपूर्ण पलंग है. इससे श्ररदी आर 


82 गुजिश्ता लखनऊ 


फारसी साहित्य बिल्कुल खाली था और चूंकि फ़ारसी पर ही उदू भी झ्राश्नित 
थी इसलिए वहां भी उसकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया । संस्कृत में 
बहुत उच्च कोटि के नाटक थे मगर उनसे हिंदुस्तान की पिछली सोसाइटी 
बिल्कुल अनभिज्ञ हो चुकी थी | रामचंद्रजी श्रौर श्रीकृष्ण के कारनामे अल- 
बत्ता हिंदुप्नों में घामिक निष्ठा के साथ दिखाये जाते थे। मगर उह्ू शाइरी 
को उनसे किसी तरह का सरोकार न था। रामचंद्रजी के हालात इंग्लिस्तान 
के ग्रोलंपिया की तरह खुले मदानों में महाकाव्य-प्रदर्शनत की ही भांति दिखाये 
जाते और श्रीकृष्णजी के हालात नाच, गाने और संगीत के माध्यम से धामिक 
मंचों पर ठीक आपेरा की तरह से प्रस्तुत किये जाते जो 'रास' कहलाते थे । 
वाजिद अली को रास से खास दिलचस्पी पैदा हो गयी और रास के प्लाट 
को झ्राधार बनाकर उन्होंने श्रपना एक ड्रामा तैयार किया जिसमें वे कन्हैयाजी 
बनते या प्रेम में म्सफल एक योगी बनकर घूती रमाते और बहुत-सी स्त्रियां 
श्रप्स राएं और गोपियां बन कर उन्हें ढूंढती फिरतीं। फिर जब क़ंसर बाग के 
मेलों का दरवाज़ा जन-साधारण के लिए भी खुल गया तो सारे शहर के 
शौक़ीनों में नाटक की कला स्वयं विकसित होने लगी श्रौर कुछ ही दिन में 
इस कला की ऐसी प्रगति हुई कि कुछ मशहूर शाइर भी उस युग के रुचि- 
स्तर के अनुसार नाटक लिखने लगे। चुनांचे वाजिद अली शाह के शौक़ के 
साथ ही मियां ग्रमानत ने, जो एक अनुभवी कवि थे, इंदर सभा लिखी और 
वर्तमानकाल की कंपनियों की तरह शहर में जगह-जगह विभिन्‍न मंडलियां 
उनकी 'इंदर सभा' को स्टेज पर खेलने लगी जिनमें कहीं औरतें श्र कहीं लड़के 
ऐक्ट करते । इस नाटक में संगीत के नियमों के अनुरूप बड़ी कर्णप्रिय और 
मधुर घुनें बनायी गयीं और सारा शहर 'इंदर सभा' देखने के लिए लालायित 
रहता । मियां ग्रमानत की 'इंदर खभा' की सफलता देखकर और लोगों को 
भी शौक़ हुआ और इस प्रकार के बहुत से नाटक रचे गये झ्लौर सभी का नाम ' 
'सभा' पड़ गया । चुनांचे शहर में मदारी लाल बगैरा की बहुत-सी सभाएं 
बन गयीं जिनके प्लाट बदले हुए थे । 

सभा के नये रंग ने शहर में ऐसी जिदादिली पैदा कर दो कि सिवाय 
'इंदर सभा' के लोग किसी और प्रकार का नाच-गाना पसंद ही न करते थे । 
हर तरफ सभाओ्रों की धूम थी और इसकी बुनियाद पड़ गयी कि समाज के 
स्तर के अनुसार पुराने प्रेमाख्यानों का अच्छी कविताओं में समावेश किया 


गुजिश्ता लखनऊ 83 


जाये श्ौऔर उन्हें सुंदर ढंग से जनता के सामने पेश किया जाय। इसमें शक 
नहीं कि पारसी थियेटरों ने अपने अच्छे प्रबंध और शप्राकषंक प्रदर्शन कै द्वारा 
सभाओं का रंग फीका कर दिया । लेकिन यह न समभो कि ड्रामे का जो रूप 
लखनऊ में बनकर प्रचलित हुग्नमा था, मिट गया | पहले तो पारसियों ने भी इस 
चीज को लखनऊ से लिया है, उनका पहला ग्राम खेल भ्रमानत की 'इंदर सभा' 
थां और इसके बावजूद कि लखनऊ के तमाम राष्ट्रीय समारोहों में श्राज तक 
सपेरे, हरिदचंद्र बगेरा कै ऐसे बीसियों प्रदर्शन हो रहे हैं और इस प्रकार के अभि- 
नेताप्रों का एक स्थानीय गिरोह पैदा हो गया है जो जनता का मनोरंजन करता 
है हालांकि वहां के भद्रजनों की राष्ट्रीय रुचि समाप्त हो चुकी है। कुछ भी हो 
इसमें संदेह नहीं किया जा सकता कि उद्द्‌ ड्रामे की बुनियाद खास लखनऊ ही 
में पडी और यहीं से सारे हिंदुस्तान में इसका रिवाज हुआा ।! 

उदूं कविता का एक रूप बासोझ्त है। ये ख़ास किस्म के प्रेम-प्रणय संबंधी 
पद होते है और इनका विषय ग्राम तौर पर यह होता है कि कवि पहले श्रपना 
प्रेम प्रकट करता है और उसके बाद अपनी प्रेमिका का नख-शिख वर्णन करता 
है । फिर उसकी बेवफाइयां, उससे रूठ कर उसे यह विश्वास दिलाना कि 
हम किसी और प्रेमिका पर मोहित हो गये, उस काल्पनिक प्रेमिका के सौंदर्य की 
प्रशंसा करके अपनी प्रेमिका को जलाना, छेड़ना, जली-कटी सुनाना श्रौर यों 
उसका दर्पष तोड़कर फिर मिलाप कर लेना | छद॒ काव्य का यह रूप लखनऊ 
ही से शुरू हुआ | मध्य युग के गते-प्राते तमाम शाइरों ने वासोख्त लिखे हैं 
ग्रौर उनमें बड़े-बड़े चमत्कार पंदा किये हैं। दिल्‍ली में भी बाद के ज़माने में 
ग्रनेक वासोख्त लिखे गये विशेषतः मोमिन खा ने कई बहुत अच्छे वासोख्त लिखे 
मगर आरंभ लखनऊ हो से हुआझा । 

ग्रमीरों की विलासप्रियता ने और भी कई काब्य-रूप पैदा किये जिनका 
प्रारंभ दिल्‍ली ही से हुआ था इनमें सबसे ग्रधिक बेकार हज़लगोई! है और 
कुछ हद तक दिलचस्प रेख्ती? है। हजलगोई का प्रारंभ दिल्ली में जाफ़र 
जटल्ली से हुआ जो शायद मुहम्मद शाह के जमाने में थे । उनके कष्य को 
मैंने शुरू से आरिखिर सक देखा है, सिवाय अश्लीलता और हद से बढ़कर बेशर्मी 
के न कोई काव्यात्मक सौंदये दिवायी देता है श्रोर न भाषा का ही कोई रस 

। ग्रइलोल कविता । 

£ स्त्रियों की भाषा में की गयी कविता | 


84 गुजिश्ता लखनऊ 


है। इसके बाद दिल्‍ली की ही सरज़मीन से बिलग्राम के एक हज़लगो कवि 
जिनका उपनाम 'साहब करां' था, लखनऊ आये और यहीं चमके । उनका नाम 
सैयद इमाम भ्रली था और आ्रासफ़उद्दौला के जमाने में वे लखनऊ आये थे । 
मालूम होता है कि लखनऊ के गिरे हुए स्तर वाले रईसजादों में उनको लोक- 
प्रियता मिली । उनका दीवान मिलता है और हालांकि उनकी कविता भ्रश्लील 
श्रौर शिष्टता से कोसों दूर है मगर फिर भी उसमें एक बात है। काब्यात्मक 
गुणों के साथ भाषा और मुहाविरों का प्रयोग भी संदर है। लेकिन इस कला 
को लखनऊ के भ्राखिरी दौर में मियां मुशीर ने, जो मिर्जा दबीर के शगिद थे, 
कमाल के दर्ज तक पहुंचा दिया । 

हजलगोई के सिलसिले में मियां 'चिरकीं का नाम भी लेना चाहिये। 
लखनऊ के मध्य युग में आ्राशर अली खां नामक एक जिदादिल और बहुत ही 
योग्य और सहृदय रईस थे। उनके यहां की गोष्ठियां तत्कालीन समाज का 
एक सजीव नमूना थीं। उन्हीं ने जानसाहब और “चिरकीं' को पंदा किया 
झ्रौर कुछ लोग कहते हैं कि उन्ही की संगति में 'साहबकरां' भी पनपे थे । 
'चिरकी' अपने हर शेर में पेशाब-पाखाने का जिक्र करते और उनके हर शेर 
से ऐसी बदबू आती है कि नाम सुनते ही हमारे पाठकों के दिमाग़ सड़ गये 
होंगे मगर चंकि उसमें एक विशेषता थी इसलिए हमने उनका ज़िक्र कर दिया। 
उनकी कविता में कुछ काव्यात्मक सोौंदयं और कुछ अच्छी उपमाएं भी प्रयुक्त 
हुई हैं लेकिन उनके रुचि-स्तर ने इन खूबियों को भी गंदा और पलीद कर 
दिया है । 

लेकिन रेख्ती की कला अशिष्ट होने के बावजूद दिलचस्प है और 
'चिरकीं की शाइरी की तरह त्रासदायक नहीं। मर्दो और औरतों के मुहाविरों 
ग्रौर लहजे में थोड़ा-बहुत फ़क़ हर जबान में हुआ करता है, मगर इतना नहीं 
जितना हमें अपनी ज़बान में नज़र आता है। फ़ारसी-अ्रवो सब भाषाओं में 
यह अंतर मौजूद है लेकिन उदू में यह अंतर बहुत ज्यादा स्पष्ट है। फ़ारसी 
भ्रौर अरबी की प्राचीन रुचि यह थी कि स्त्रियां कविता करतीं तो अपनी ही 
भाषा में करती थीं और पुरुष यदि कभी स्त्रियों की भाषा में कोई भाव 
प्रकट करते हैं तो भाषा में लालित्य पैदा करने के लिए उन्हीं की भाषा का 
प्रयोग करते हैं । यही हाल अंग्रेजी का है । उद्दू शाइरी हमेशा से सिर्फ मर्दों 
की ज़बान में हो हो, यहां तक कि उसमें औरतें कहती भी हैं तो मद बनकर 


गुज़िशता लखनऊ 85 


कहती हैं, मर्दों ही की भाषा प्रयोग करती हैं और अपने लिए स्ेनाम तक 
पुल्लिग के इस्तेमाल करती हैं । श्रगर शाइर का नाम न मालूम हो तो कोई नहीं 
पहचान सकता कि यह्द्‌ किसी मर्द का कलाम है या औरत का । 

उर्दू शाइरी का तीसरा या चौथा ही दौर था कि चंचल स्वभाव नव- 
युवकों में खयाल पेंदा हुआ कि रेख्ते की तरह एक रेख्ती ईजाद की जाये। 
मीर हसन ने अपनी मसनवी में जरूरत के मौक़ा पर इस भाषा का प्रयोग 
किया था । मगर वहां तक तो कोई बात नहीं थी | मियां “रंगीन' ने जो 
दिल्‍ली के रहनेवाले थे गौर लखनऊ की गोष्ठियों में भाग लेते थे इस रंग 
को स्थायी रूप से अ्रपना लिया । लिहाजा सम्य और शिपष्ट समाज ने इस रंग 
को बेशर्मी और ग्शिष्टता समझा । चुनांचे सेयद 'इंशा' की ज़बानी हमने 
लखनऊ में दिल्‍ली के जिन सभ्य और वयोवृद्ध व्यक्ति और वही के एक वेश्या 
न्रन की बातचीत लिखी है उसमें वह बुजुर्ग फरमाते है, “ओर सबसे ज्यादा 
एक झौर सुनिये कि सञ्मादत यार तहमास्प का बेटा अ्रनवरी रेख्ता अपने को 
जानता है । 'रंगीन' तखललुस है, एक किस्सा कहा है और इस मसनवी का 
नाम दिलपजीर' रखा है। औरतों की बोली इसमें बांधी है । मीर 'हसन पर 
जहर खाया है, हर चंद उस मरहूम को भी कुछ शऊर न था । 'बद्र-ए-मुनी र 
की मसनवी नहीं कही गोया सांडे का तेल बेचते हैं। भला इसको शेर क्यूकर 
कहिये ? सारे लोग दिल्‍ली के, लखनऊ के--औरत से लेकर मर्द तक-- पढ़ते हैं : 

चली वहां से दामन उठाती हुई 
कड़े से कड़े को बजाती हुई 

सो इस बेचारे “रंगीन ने भी इसी तौर पर किस्सा कहा है ! कोई पूछे 
कि भाई तेरा बाप रिसालदार मुसललम, लेकिन बेचारा भाले का हिलानेवाला 
तेग का चलानेवाला था, तू ऐसा काबिल कहां स हुआ ? आर शोहदपन 
मिजाज में रंडी बाजी से ग्रा गया है तो रखते के तई छोड़कर एक रेख्ती 
ईजाद की है इस गासते कि भले झादमियों की बह-बेटियां पढ़कर मुश्ताक़ 
(उत्सुक) हों और उनके साथ अपना मुह काला करें भला यह कलाम 
क्या है ? 


86 गुजिश्ता लखनऊ 


एक क्रिताब बनायी है, उसमें श्रौरतों की बोली है जिसमे ऊपरबालियां चली. 
ऊपरवाला चांद, डउजली धोबन वर्ग रा वर्गरा | 

मगर मुहक्नब बुडढे शिकायत करते-करते मर गये। नौजवानों की 
रंगीनी ने “रंगीन की इस रुचि को बढ़ावा दे कर ही छोड़ा और रेख्ती उदृू 
का एक काव्यांग हो. गया जिसका आझ्राविष्कार यहाँटि दिल्‍ली ही के एक कि ने 
किया था, लेकिन लखनऊ में हुआ और यहीं इउम्का विस हुआ । क्रिस्से के 
सिलसिले में इस जवान को मीर हसन के बाद ठवाश मिर्जा शौक ने जिस 
कमाल “7! पहुंचा दिया उसकी प्रद्यंसा नहीं ह सकती . पन्‍ने-के-पन्ते पढ़ते 
चले जाइये यही नहीं पता चलता कि शर कहन श झ्ञा ग्रपती ज़रूरत के 
ग्नुसार बोलने की भाषा में बहा कुछ तवदीली नही की है या नहीं। लेकित 
ग़ज़ल कहने में 'रगीन' के उत्तराधिकारी जान साहब दइने जो लखनऊ के एक 
मामूली गब्स थे और ग्राशूर ग्रली रा की खराद पर चहकर सेयार हुए थे 
गो कि जान साहब के बाद शझौर रेख्तीगों भी रखनऊ मे पंदा हुए मगर जो 
लोकथियता जात साहब को मिला उस तक कोई न पहच सका । उन्होंने 
ग़ज़लें कही, वासाख्ती कही झौर भी कई नज्मे कर्टी । 

रेख्ती में प्रगर अब्लीलता और लपटता से बचकर साफ-सुथरे भाव ब्यक्त 
किये जाते तो यह कला ही प्रगति करती, मगर खराबी यह हुई कि उसकी 
बुनियाद ही लंपटता की भावनाप्रों और अब्लीलता के वि चारों पर थी । इस- 
लिए रेख्तीगोयों का कदम हमेशा तहजीब ग्रौर सयम के मांग से भटक गया 
और उससे भाषा को चाहे कुछ फ़ायदा हुआ हो, मगर ने तिकवता को नुकसान 


हथ। | 


॥५ 3000 


उदूं गद्य उम्र में पद्म से कुछ छाटा है | मुहत तद पढ़ें-लिखे लोगों का यह रवंया 
रहा कि ग्रगर्चे कुछ लोग फ़ारसी मे भो शर कहते थे मगर ग्राम रूफान उदू 
ग़ज़ल द्वी की तरफ था और हिदुस्तान में उदू शाइरों की तादाद फ़ारसी 
दशाइरों से बहुत ज्यादा थी। मगर जहां तक गद्य का संबंध है सारे देश को 
फारसी ही में पढ़ने का शौक था | ज्ञान-विज्ञान की किताबें फ़ारसी में लिखी 


गुज़िब्ता लखनऊ 87 


जाए, मज़हब की किताबें फ़ारसी मे लिखी जातीं । यहां तक कि बूढ़े से लेकर 
बच्च तक सब फ़ारसी ही में पत्र-व्यवहार करत ध । बच्चों को मदरसे में फ़ारसी 
हो की रचनाएं पढ़ायी जाती और फ़ारसी ही में खत लिखना उन्हें सिखाया 
जाता । नतीजा यह था कि बोलचाल मे उदू भाषा चाह कंसी ही मधुर हो 
गयी हो लेकिन जब लिखने की नौबत आ्रायी तो सब गूगे हो गये ।. 

पहले-पहल उदू्‌ में मीर अम्मन देहलवी ने अग्रेज़ों के प्रोत्साहन और उन्हीं 
की प्रेरणा से ग्रपती किताव “चार दरवेग लिखी । इसी ज़मान मे मीस्जा 
प्रली लुत्फ़ न अपना तज़किरा-ए-शोग्ररा-ए-उदू लिखा जो ग्रब्दुल्ला खा साहब 
की, जो उस समय हैदराबाद में थे, कोशिश स छप गया है । इसी जमाने के 
क़रीब मौलवी इस्माईल साहब 'शहीद' ने तोहीद (अद्व त) और दृत्तिवाग्र-ए- 
सुन्नत (पैगंबर के बताये मार्ग का अनुकरण) पर अपनी पुस्तक 'तक़वियत-उल- 
ईमान' (धर्म-शक्ति) लिखी । ये किताबे ग्रब चाहे जिस नजर से देखी जायें उन 
दिनो कोई साहित्यिक चमत्कार दिखाने के लिए नहीं लिखी गयी थी । उनकी 
रचना सिर्फ इस उद्देश्य से की गयी थी कि सीघी-सादी भाषा में अपनी बात 
कह दी जाये और जन-साधारण उससे फायदा उठा सकें । उपयु क्त महानुभावों 
को अगर उद्दू साहित्य का कमाल दिखाना होता तो उस समय की लेखन-शे ली 
के अनुसार 'जहूरी' और नेमत खान-ए-ग्राली और अबुलफ़ज्ल और ताहिर 
वहीद का रंग अपनाते जो उस समय साहित्य-जगत पर छाया हुआ था और 
जिसके बिना कोई रचना देश में प्रशंसा योग्य नहीं समझी जाती थी । लखन ही 
नहीं बोलचाल में भी ग्रगर शिष्टाचार का ज्यादा खयाल रखा जाता तो वही 
ग्रंदाज इख्तियार कर लिया जाता जैसा कि सेंयद इंशा ने मीरजा मजहर जाने- 
जाना के भाषण से कुछ शब्द उद्घृत करके बना दिया है । 

सच पूछिए तो उदृू का गद्य लेखन लखनऊ ही से शुरू हुआ जबकि पहले 
मिर्जा रजब अली बंग 'सुरूर' ने 'फ़्साना-ए-प्रजायब' और गपनी दूसरी पुस्तक 
प्रकाशित कीं । इसी जमाने में 'नौरतन' भी लखनऊ में लिखी गयी जिसके 
लखक मुहम्मद बख्श 'महज्र' जो 'जुरग्नत' के शिष्य थे, लखनऊ ही में पले- 
बढ़े थे। 

रजब ग्रली बेग 'सुरूर' ने, सच यह है कि, गद्यनलेखन का चमत्कार दिखाया 
है और जिस वक्त व्रह किताब प्रकाशित हुई है, उदृ्‌ -जगत में उस्ते बड़े ग्राइचये 
से देखा गया । मगर दुर्भाग्य से उन्होंने भूमिका में मीर भ्रम्मन पर हमला कर 


88 गुजिएता लखनऊ 


दिया था जिसकी वजह से उनकी सारी विशेषताग्रों का दिल्‍ली वालों की दृष्टि 
में कोई महत्व नहीं रहा । यहां तक कि मीर मुहम्मद हुसैन भ्राज़ाद जेसे शिष्ट 
ब्यक्ति भी उन्हें 'लखनऊ का शोहदा' बताते हैं श्रौर मालूम नहीं रजब अली 
बेग मरहम से इस गुस्ताखी का बदला कब तक लिया जायेगा ? मीर श्रम्मन 
के गद्य का सौंदयं श्रंग्रेजों को उन दिनों चाहे नज़र श्रा गया हो मगर हिंदु- 
स्तान के उदूं- भाषियों में से किसी को नज़र न आया था श्रौर न नज़र श्रा 
सकता था | इसका कारण यह था कि अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रभाव ने उस समय 
तक हिंदुस्तान के साहित्य की रुचि नहीं बदली थी क्षौर पूर्व का साहित्य 
खयालों भौर दिमागों में बसा हुआ था । 

साहित्यिक शैली के बारे में मैंने कई बार लिखा है श्रोर फिर लिखता हूं 
कि उसका संबंध शिक्षा श्रौर रुचि विद्वेष के विकास से होता है। जिस तरह 
गिज़ाभों, खुदबूओं श्रौर रंगों तथा श्रन्य तमाम जीज़ों को नगर विद्येष की 
संस्कृति भ्रच्छा या बुरा बनाया करती है और विभिन्‍न जातियों तथा देशों मे 
इतना मतभेद रहता हैकि एक की स्वादिष्टतम प्रौर झ्त्यंत प्रिय वस्तु 
दूसरे के लिए बहुत ही नीरस और गहंणीय होती है बसे ही साहित्य पभौर 
उसकी रुचि होती है । जो शैली एक जाति में विकसित होकर लोकप्रिय हो 
जाती है, वही दूसरी जाति की दृष्टि में नीरस, निरर्थक और मूखंतापूर्ण होती 
है और उन दोनों में कोई यह निर्णय नहीं कर सकता कि कौनसी श्रच्छी है 
ग्रौर कौन-सी बुरी । 

इस्लाम-पूर्व भ्ररब में वही शैली सुंदर और श्रलंकृत मानी जाती थी जिसमे 
प्रनुप्रासात्मक वाक्य लिखे जायें, इबारत में उचित और प्रचलित शब्द और 
उनके पर्यायों का प्रयोग हो और एक ही मतलब बार-बार दोहराकर उसे प्रभाव- 
शाली और दिलचस्प बनाया जाये । इसी शैली को क़ुरान ने, चूंकि वह उसी 
जाति की भाषा में था, बड़े चमत्कारपूर्ण ढंग से विकसित किया और फिर वही 
दली अरबी साहित्य का एक आवद्यक तत्व बन गयी । भ्राजकल के स्तर से 
देखा जाये तो ग्ररबी की मानक कृतियां 'मुक़ामात-ए-हरीरी श्लौर 'तारीख-ए- 
तैमूरी' ग्रादि में अत्यधिक श्रनुप्रास, अनुचित विस्तार और अनावश्यक शब्दों 
की भरमार के ग्रतिरिक्त कुछ नहीं है जिसका मुहतों तक संसार भर आनंद 
लेता रहा है। यही शैली फ़ारसी के साहित्यकारों ने अ्पनायी प्रौर ज्यों-ज्यों 
साहित्य प्रगति करता गया यही शैली प्रोौढ़ भौर स्थायी बन गयी और चूंकि 


गुजिइता लखनऊ 89 


प्रारंभ के उदूं साहित्यकार इसी शैली से प्रभावित थे इसलिए उन्होंने भी इसी 
का अनुसरण किया और सभी ने उनकी प्रशंसा की । लिहाज़ा यह सोचना कि 
'चार दरवेश' जिन दिनों लिखी गयी है उन दिनों वह सिवाय इसके कि अंग्रेजों 
को पसंद थी, जो उदू जानते ही न थे, हिन्दुस्तान के शिक्षित जन-समुदाय में 
कोई साहित्यिक चमत्कार समभी गयी होगी, बिल्कुल ग़लत है । 

ग्रब अंग्रेजी के असर से बेशक ऐसा जमाना झा गया है जब उदू को पुराने 
लिटरेचर ने जो जेवर और लिबाप पहनाया था, उतार लिया गया और नये 
पश्चिमी कपड़े पहनाये गये । चार दरवेश' ग्रौर उसकी-सी दूसरी किताबें 
चूंकि पुराने साहित्यिक आभूषण झौर वेशभूषा से वंचित थीं इसलिए लोगों को 
पसंद ग्रायीं, इसलिए नहीं कि उनमें कोई खास खबी थी बल्कि इसलिए कि 
उस प्राचीन और लोकप्रिय साहित्य की विशेषताग्रों से रिक्त थीं जो आज के 
लोगों को नापसंद है । 

उसी जमाने में लखनऊ में मौलवी गुलाम इमाम 'शहीद' ने अपना मदहूर 
'मौलूद शरीफ़' लिखा जो उस वक्‍त की साहित्यिक रुन्नि के ऐसा प्रनुकल था 
कि लोगों को बहुत पसंद झ्राया और धामिक लोकप्रियता के कारण आज भी 
बहुत पसंद है । 

जैकित प्राधुनिक उदू गद्य वस्तुतः दिल्ली ही से निकला और हमेशा दिल्ली 
का ऋणी रहेगा । मिर्जा ग़ालिब ने उदूं गद्य में सादगी और सहजता की शैली 
अपनायी जो आधुनिक रुचि के बहुत ही ग्रनुरूप है। हालांकि उनके यहां भी 
कभी-कभी ग्नुप्रास की छटा दिखायी देती है लेकिन वह इतनी सहज है कि 
पढ़ने वाले को उसका एहसास गौर करने से ही हो पाता है । आधुनिक शिक्षा 
ने लोगों को इस शैली को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार कर दिया था, 
लिहाजा हर जगह वाह-वाह होने लगी । उसके बाद सर सयद ने इस सादगी 
में गंभीरता पैदा की मगर इस कोशिश के साथ कि भाषा कठिन न होने पाये 
ग्रौर ऐसी रहे कि छोटे-बड़े सभी उसे समभ लें । मौलवी मुहम्मद हुसेन श्राज़ाद 
ने इसमें गंभीरता के साथ और भी सरलता पैदा कर दी जबकि लखनऊ के 
लोग ग्रंग्रेज़ी के प्रभाव से दूर होने के कारण अ्रभी तक पुरानी शैली पर ही 
मुग्धघ थे | यहां वाजिद भ्रलो शाह की जिंदगी के भ्राखिरी वक्‍त तक रंगीन 
ओर सानुप्रास इबारत लिखी जाती थी झ्लौर लोगों को इस सादगी का मजा 
नहीं मिल पाया था । 


90 गुज़िश्ता लखनऊ 


ग्रब अलीगढ़ से 'तहज़ीब-उल-भ्रखलाक़, आगरे से 'तेरहवीं सदी और 
लखनऊ से अवध पंच' निकल रहे थे जिनमें से हरेक में उद्‌ गद्य का एक 
विशिष्ट नमूना मिल जाता था। 'तहज़ीब-उल-ग्रखलाक़' में गंभीरता श्रौर 
विद्त्ता के साथ राष्ट्रीय सहानुभूति का भी पुट था। सुलभी हुई साफ भाषा 
थी और नये पाइचात्य साहित्य श्रौर दर्शन से लिये हुए विचार और प्रभाव- 
शाली लेख तथा भाषण थे । 'तेरहवीं सर्द! में उच्च लेखन योग्यता के साथ- 
साथ नये विचारों और नवीन बातों के माध्यम से प्राचीन साहित्यिक रुचि को 
भी रक्षा की जाती थी और पुराना पौर्वात्य साहित्य कुछ ऐसी नवीन सद्भा- 
वनाओं के साथ नयी शली में प्रस्तुत किया जाता था कि नये और पुराने दोनो 
गिराहों से उन्हें वाहवाही और प्रशंसा मिलती थी । 

'ग्रवध पंच' में भाषा का असल रूप दिखाया जाता था जिस में मज़ाक 
का एहलू हावी रहता । इसके विभिन्‍न लेखक थे और हरेक के मज़ाक़ में एक 
खास चबी और खास मज़ा रहता था । मुंशी सज्जाद हुसेन एडिटर की शोखिया 
मिर्जा मच्छ बेग साहब की कौसर! की धोयी हुई जबान, मुंशी एहमद अली 
कसमंडवी की फ़ारसीनिष्ठ साहित्यिक और काव्यात्मक रुचि प्रकट करनेबाली 
शैली, प० त्रिभुवन नाथ 'हिज्बर' की हिंदी कविताएं और उनको बड़ी दिल- 
चस्पी के साथ जाहिर करनेवाले लेख उदू गद्य में एक विचित्र सजीवता और 
प्रफुल्लता उत्पन्न करते थे । 

इसी अवधि में ग्रवघध अख़बार के साथ प० रतन नाथ सरशार का उप- 
न्यास 'फ़साना-ए-ग्राज़ाद' प्रकाशित होना शुरू हुआ जिसने देश पर बड़ा असर 
डाला और उर्दू जगत उपन्यास कला से परिचित होकर उस पर मोहित हो 
गया । 'फ़साता-ए-आ्राजाद' में जहां लेखक ने अपने क़लम से कोई दृश्य चित्रित 
किया है या किसी घटना का वर्णन किया है वहा वही 'फ़साना-ए-श्रजायब को 
पुरानी शैली कुछ विकसित रूप में अपनायी है और जहां दूसरों की जबान से 
बातचीत करायी है वहां बहुत ही सादी और सरल भाषा रखी हैं । त्रिशेषकर 
औरतों की:भाषा बहुस ही संंदर है गो उसमें कहीं-कहीं गलतियां भी हो गयी 
हैं मंगर सच यह है कि अपनी कोशिश मे उन्हें जो सफलता मिली है वह उनसे 
पहले किसी को न मिल सकी थी । 

यही जमाना है जब कि मौलवी नजीर एहमद साहब ने गवरनंमेंट की 


._१ स्वर्ग का एक कुंड । 


जुजइता लखनऊ ५] 


फ़रमाइश से ताजीरात-ए-लिंद का अनुवाद किया और अपनी किताबों के जर्ये 
से एक ऐसी जबान देश के सामने पेश की जो कही पह्रपनी सहजता झ्रौर कही 
प्रवाह में झपना सानो नहीं रखती गौर कही ग्ररवी के छद्दों से बोभिल हमे 
के कारण द्र्गम और झलकुत हो नयी है । इसी जमाने में मौलवी महम्मद 
हसन साहब आजाद का साहित्य भी बहत लोक प्रिय हो रहा था विल्लेषकर 
उन्होंने उद भाषा का इतिहास और उद के कवियों का तजकिरा (चर: 
लिखकर उदू साहित्य में टाई रूयरति प्राप्त की। इसी जमाने में 88> 
'महशर नामक एक साप्ताहिक उत्रका मैंने मौलवी मुहम्मद ग्रब्दुल दा फल 
साहब 'महदार' के नाम से निकाला जिसके जरिये से एडिसन की शलो छइए £ 
ऐसे सुदर जझीवका और समचित शब्दों तथा विचारों के साथ प्रस्तुत को के 
देश सहसा चौक-सा एड़ा, साथ ही मरे लेख 'ग्रवध अ्रखबार के काल*।) रे 
प्रकाशित हान शुरू हश जिन्‍्टान देश के सामसे एक बिल्कुल नया साहित्य ऐश 
कया जा इतना लोकीजिय ऋद्ध, & «४२ तरफ से बाहवाज़ी होने लगी । यक्ता<< 
मेजर झाया कि अधिकतर जेजक इसी शैली को अपना रह है और देश का 
श्राम गहन उसी वरफ है. इसी दरम्यान में मैंने प्रपता दिलचम्प हा' 
प्रभावशाली ड्ामा 'शहाद-ए-बफ़ा राटकों के सामने पेश किया और हः त*५ 

से मे ोत्वाहुत मिलने लगा । 
ग्रत मे देशवास्यों का &! ग्रह रखकर !887 के प्रारंभ में मैंने अपनों 


व 


पत्रिक)] दिलयुदात जारी के जे अंग्रेजी जाननेवालों और पुरानी लीक * 


का ४ | 


) 


पैेसंद ऋर्नेवाशों ते सनान रूप से पद किबा । फिर !888 ई० से "के 
साथ एनिहासक उपन्यासा का ।सल सला जारी किमय्रा गया जिनमें सबसे गए 


उपन्यास मलिकुल-अर्जाज वाजेदा है। इन उपन्यासों का दव में जिस तक।: 
स्वागत हुआ उह बलान का या जरूरत नहीं है मगर इतना! बता देना जरूरी 
है कि इन्ही उपन्यासों की अझह से घटनाओं को जानने और पुस्तक पहने ज 
शौँक़ बढ़ने को बुनियाद पड़ी । इन्ही उपन्यासों के माध्यम से देश में इतिहास 
के पढ़ने और संसार के बार मे दिलचस्पी लेने का शौक़ पंदा हुआ और इन्हों 
उपन्यासों और 'दिलगुदाज़' के पन्‍नों से वह शैली जन्मी जिस पर वतंमान 
उदू साहित्य की बुनियाद रखी गयी है। 

बहरहाल उड के गद्य का संबष जहा तक प्राचीन साहित्यिक शैली से है उसकी 
बुनियाद लखनऊ में पड़ी | हां, आधुनिक शली का प्रारंभ दिल्‍ली से हुआ्ला, मगर 


92 गुजिइता लखनऊ 


इस कोशिश में जहां तक संभव हुआ लखनऊ ने दिल्‍ली का साथ दिया। विशेष 
रूप से हास्य-संबंधी रुचि लखनऊ ही से पैदा हुई श्रौर यहीं उसका विकास 
हुप्रा । 


[ 42 ] 


लेकिन उदू भाषा का जो विकास लखनऊ में हुआ वह कवियों, साहित्यकारों, 
गद्यकारों और लेखकों तक ही सीमित नहीं है । विभिन्‍न संस्थाओ्रों और वर्गों 
में भाषा की प्रगति और विस्तार की नयी-नयी संभावनाएं पैदा हुई जिन्होंने 
सभी वगं वालों के लिए विशेष दिलचस्पी का सामान जुटाया । 

इनमें से अ्रधिक महत्वपूर्ण दास्तानगोई है जो दरग्रसल आ्राशु कविता करने 
को कहते हैं। यह कला वास्तव में शभ्ररबों की है जहां इस्लाम-पूर्व युग में भी 
दास्तानगोई की गोष्ठियों का श्रायोजन हुआ करता था । लेकिन हिंदुस्तान की 
दास्तानगोई के बारे में हम नहीं जानते कि अग्ररब की किस्साख्वानी से इसका 
कोई संबंध है या नहीं। भ्रमीर हम्जा की दास्तान जो दास्तानगोयों का भ्रसली 
प्रेरणा-स्रोत है वास्तव में फ़ारसी में थी और कहते हैं कि शंहशाह अकबर के 
जमाने में अमीर खुसरो नामक एक योग्य व्यक्ति ने इसकी रचना की थी। इति- 
हास साक्षी है कि तुगलक़ वंश के बादशाहों के शासनकाल में 'दास्तान-ए- 
ग्रमीर हम्जा' मोजूद थी । 

दिल्ली के प्रसिद्ध दास्तान-लेखक लखनऊ में ग्राना शुरू हुए । यहां ग्रफी- 
मत्रियों ने उनका ऐसा आदर-सम्मान किया कि दास्तान सुनने को अपनी 
गोष्ठियों का एक महत्वपूर्ण अंग बना लिया । कुछ ही दिनों में लखनऊ में 
उसका एसा चलन हो गया कि कोई धनिक ऐसा न था जिसकी सरकार में 
कोई दास्तानगो नियुक्त न हो । सेकड़ों दास्तानुगों पैदा हो गये । सच तो यह 
है कि हमारे आजकल के बड़ें-से-बड़े वक्ताओ्रों में से श्रभी तक किसी .को वबतृता 
में वह प्रतिष्ठा नहीं मिली जो उन दास्तानगोयों को प्राप्त थी जिनका भाषा 
गर विषय पर पूरा अधिकार था। दिल्ली में भी दो-एक उच्च कोटि के 
दास्तानगो आज तक पड़े हैं मगर लखनऊ में उनकी संखूया बहुत भ्रधिक है और 
उनकी बर्णन शली का प्रभाव शहर के लोगों की भाषा पर बहुत अ्रधिक पड़ा 


गुजिइ्ता लखनऊ 93 


है । उपन्यास-साहित्य से दिलचस्पी पैदा होने के बाद जब इस बात की कोशिश 
की गयी कि दास्तान को दास्तानगोयों की ही ज़बान में लिखबा लिया जाये 
तो लखनऊ से ही ऐसे दक्ष दास्तानगों सामने ग्राये जिन्होंने मोटे-मोटे ग्र थ लिख- 
कर उदू पाठकों के सामने पेश कर दिये । चुनांचे 'जाह' श्रोर 'क़मर' की रच- 
नाएं बड़े आदर की दृष्टि से देखी जाती हैं । 

दास्तान के चार लक्षण निश्चित क्यि गय है : रज्म, बज़्म, हुस्न-प्रो-इश्क़ 
प्रौर ऐयारी । इन चारों लक्षणों में लखनऊ के दास्तानगोयों ने ऐसे-ऐसे चम- 
त्कार दिखाये हैं जिनका अंदाजा बिना देखे श्रौर सुने नहीं हो सकता । छाब्दों 
से चित्र खींचना और उन चित्रों से बडा गहरा झ्ौर स्थायी प्रभाव श्रोताग्रों 
के मन पर डाल देना उन लोगों का खास कमाल है । 

सामाजिक मनोरंजन, मजाक, हास्य और दिललगी के माध्यम से भी लख- 
नऊ में भाषा की कई दैलियां पैदा हो गयीं जिनमें कोई अन्य स्थान लखनऊ 
कः मुकाबिला नही कर सकता । इन्हीं में से एक फब्ती कहना है । इसका दर- 
ग्रसल काव्यगत उपमा और ग्रलंकार से संबंध है लेकिन इसमें इतनी विशेषता 
है कि यह किसी को विगाड़कर दिखाने, उसके अ्रवगुण को स्पष्ट करने शग्लौर 
समयानुकल कोई अ्रनोखी, हंसाने वाली और श्रवगुण प्रकट करने वाली उपमा 
दे देने तक सीमित है । लखनऊ के निचले वर्ग के लड़के, बाज़ारू औरतें, जाहिल 
दुकानदार और दस्तकार तक ऐसी फब्तिया कस जाते है कि बाहरवालों को 
ग्राइचर्य होता है । एक साहब कबेला' की जियारत करके वापस आये ग्रौर 
बिल्कुल सफेद कपड़े पहनकर दोस्तों में आकर बेठे ही थे कि एक लौंडे ने कहा, 
'"ऐ, यह फ़रात का बगला कहां से आ गया ? एक बूढ़े दूल्हा खिज़ाब लगाकर 
दुलहन ब्याहने को आ्राये और बड़ी धूम की बरात लाये । जनाने से निकल कर 
वह महफ़िल में ञ्रा रहे थे । जूता उतारने के लिए भूके और चंद क़दम फशे 
पर घुटने टेक कर चले | किसी की जबान से निकला, “दूल्हा कहां है ?” शोख 
मिजाज रंडी जो खड़ी मुजरा कर रही थी, हंसकर बोली, “ऐ वो मैयों-मयों 
चला तो ग्राता है ।” एक कबडिया चौक में पौंडे बेच रहा था, आ्रावाज़ यह थी, 
“अरे भई ये कनकौवे कौन-कौन लूटेगा ?” क्‍या इससे ज्यादा विनोदपूर्ण कोई 
ग्रौर अलकार हो सकता है । सूक्ष्म अलंकार वह है जिसमें श्रपमान की कोई 
. वह्राक़ का एक प्रसिद्ध स्थान जहां हजरत इमाम हुसेन शहीद हुए थे 
प्रौर जहां उनका मज़ार है। 


94 गुजिश्ता लखनऊ 


क्षा 


विज्वेप्ता बताकर उक्ति में बचित्रय उत्पन्न कर दिया जाथे। इसका इससे «७ 
कर और क्या उदाहरण हो सकता है कि न पौंदे का नाम लिया, न लश्गे का 
जिससे कतकोवे लूटे जाते हैं। और फिर इससे ज़्यादा मनासिब और बाशारा 
लोगों के स्तर फी कोई उपमा नहीं हो सक्रती । इसी तरह की सेक्टं 6 उरों 
मिसाले है जो यहां की गोषप्टियों में उठते-बेठत हर समय सुनी जाती है : 
उसरा 'जिज्ञा! है। यह दरग्रसल काव्यात्मक अलंकार है जिसने 

की बलतबीत आर मजाक की बातचीत में श्राकर खास रन क्‍दा जेट दिए है । 
जिला मे कोशिश की जाती है कि जिस चीज़ का जिक्र &। जय उ ने सूद्ध 
सं" चाज क्रिसी-न-किसी पहलू सबातों में ले ग्रायी जे ! ब्राजाद पात 
जिनका एक खास रग-ढंग था जिला बोलने में अपना राह ०2. च्रात थे। 
असम मत ने ग़पनी शाइरी में अलंकारों के प्रयोग की ऐसी ह हएश वी £ पन्‍्य 
सभी काव्यगत ३» यों को भुलाकर अलंकार को ही $इना पदद्धन दरनता तथा 
नतीजा यह हुमा कि उनकी कविता कविता ने रहुह+ ला शा 4 #. 7»! । 
फिर थी लत नऊ के अविकतर लोगों ने अपनी ऐसी रा हो मे बता हा 5 
निकिंदा ने होती « , इस कला को ऐसा बढ़ावः दिया "्लॉ,तल को #... | 
दीहछ एड एथवी! सच यह है कि किसी जगह के लोग ला बाउन मे अखलझ 
मे कनी गागे नहीं बढ सकते | इस कला पर एक युब्भ० नी प्रशाशिक :। 


»]' 


च्च्न्गं 


तीसरी शैली तुकबदी है, यह त॒के मितनाकर कविता करने का नाम हे । 
बहुत से जादिल जब इधर ध्यान देते है तो जवाब-सबाल में इस तर ४-४ 
घारी के प्रत्यानुप्रासों का प्रयोग करते है कि बड़े-बड़े झाइरः का अबना 
ता है ! हमने अपने विद्यार्थी काल में एक हिंदू बुड़िया के कातेबाला रेखा हू 
जो सुबह खोचा लगाकर निकलता | सूरत देखते है| सैकड! बाजारी तौह उस 
घेर लेते और वह रास्ते में ही खोंचा रख कर बंठ जला । फीोरत लाओा का 
उससे तुकबंदी का मुक़ाबिला झुरू हो जाता । सारी भोष्ट एक तरफ हातो 
दोनों पक्षों के बीच गालियों की बौछारें होतीं, मगर शत थी कि कोई गाली 
तुक से बाहर न हो । हमने ऐसा बीसियों बार देखा, घंटों उससे मुकाबिला 
रहता | मगर हमने कभी नही देखा कि वह जवाब में हारा हो, कोई ने कार 
तुक ढूढ कर पेश कर ही देता था । 


.. वद्वियर्यक बात, व्यंग्योक्ति । 


7 | 


गुजिइ्ता लखनऊ 95 


इसी तरह मज़ाक़ और ग्राम बातचोत में तरह-तरह के नये विचार और 
ल्पनाएं सामने आरती थीं प्रौर अनपढ़ लोग कभी-कभी ऐसे खयाल ऐश कर 
दिया करते थे कि बड़े-बड़े शाइर हैरान रह जाते थे। यह जमाना दरभ्रमल 
लखनऊ का गोल्डन एज' था | कविता और साहित्यिक गुण लोगों के रग-हेफी 
में जम गये थे । हर शख्स जो मामूली पढा-लिखा हाता काव्य-रचना दफा कार 
शना । जाहिल लोग, निचले वर्ग के लोग और घर की बेटठने द'जो शझाौश्दः तक 
कवियों की-सी लोच ओर साहित्यिक कोमलता पैदा हो गयी थी | &नाइ 
कर्बाड्ये शाइर थे और जाहिलों की भाषा भी इतनी साफ-सुथरी, शि"दाच्च'7ः 
के शब्दों से युक्त और सुसंस्कृत- थी कि अक्सर पढ़े-लिखे लोग उनकी बालछोत 
सुनकर चकित रह हात और कोई यह कल्पना भी न कर पाता कि वे वे-पढ़ 
लिखे होंगे | सौदा बेचने वालों की सदाए ऐसी काव्यमय, ग्रलंकृत और खाँ 
वेचिक्रण स परिपूर्ण होती थीं कि दूसरे उसे समझ भी न पाते थे ! 
निचले वर्ग के लोगों ने भी ग्रपती €चि के अनुरूप खास साहित्यिक दिल- 
चम्पिया पैदा कर ली थीं । मिसाल के तौर पर एक शैली खयाल की पंद्ा हो 
गयी । लोग बिना नोच या तंयारी के शेर लिखकर दाबरे पर गाते | उसका 
नाम खयाल इसलिए रखा गया कि हर व्यक्ति अपनी कल्पनाशक्ति से कोई 
नयी बात/पंदा करे । इस कला के यहां अनेक म्मंज्ञ पैदा हुए जिनका हालाकि 
उच्च वर्ग के समाज और शिक्षित लोगों की गोष्ठियों से कोई सबंध नहीं था 
लेकिन वास्तव में देखा जाये तो वह वास्तविक और प्राकृतिक कविता थी और 
कुछ बसी हो थी जैसी कि इस्लाम-पूर्व युग के श्ररब में थी । 
इसी तरह एक गिरोह डंडेवालों का पंदा हो गया । इन लोगों की यह 
शान थी कि पिछले युग की महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध घटनाग्रों को बड़े चमत्कार- 
पूर्ण ढंग से कविताबद्ध करते । जो जैसा होता--चाहे वह कितना ही प्रभाव- 
शाली और धनवान हा+उसे बसा ही बड़े निर्भीक ढंग से चित्रित करते और 
साबित करते कि देश को इससे क्‍या फ़ायदा हुआ या कितना बड़ा नुकसान 
पहुंचा । फिर अपनी इन कविताग्रों को शेर पढ़ने के एक खास ढंग से डंडे बजा 
बजाकर सुनाते । 
स्त्रियों की भाषा पुए्ठषों की अपेक्षा हर देश और जाति में ग्रधिक साफ 
प्रौर आकर्षक होती है, मगर लखनऊ में यह खास बात थी कि महलों औ्नौर 
संज्लांत परिवार की सम्मानित बेगमों की भाषा में स्त्रेण भ्राकषंणों के प्रतिरिक्त 


96 । गुज़िइता लखनऊ 


- साहित्यिक कोमलता पैदा हो गयी थी । बातें करतीं तो मालूम होता कि मुह 
से फूल भड़ रहे हैं भौर ग़ोर कीजिये तो छाब्दों का झुद्ध प्रयोग, सुंदर शब्द 


विन्यास और व्यंजनाशली से प्रकट होता है कि भाषा का हस प्रांत में कितना 
विकास हो चुका है । 


[ 3 ] 


इसके बावजूद कि अरबी विधाओं के बड़े-बड़े घुरंघर विद्वान लखनऊ मैं पैदा 
हुए, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ग्ररबी की शिक्षा देश के बड़े-बड़े 
घमंगुरुओं और नेताग्रों तक सीमित थी । हिंदुस्तान में दरबारी जबान फारसी 
थी । नौकरी हासिल करने के लिए और समाहत गोष्ठियों या सभाझ्रों में चम- 
कने के लिए यहां फ़ारसी की शिक्षा काफी समभी जाती थी | अवध ही नहीं 
सारे हिंदुस्तान में साहित्यिक तथा नतिक प्रगति का साधन केवल फ़ारसी ही 
मान ली गयी थी। मुसलमान तो मुसलमान ऊंचे वर्ग के हिंदुओं का आम 
रुकान फ़ारसी साहित्य की ओर था | यहां तक कि उच्च कोटि के लेख हिंदू 
लेखकों की कलम से ही लिखे गये थे । टेकचंद 'बहार' ने 'बहार-ए-अ्रजम' की - 
सी लाजवाब किताब लिखी जो फारसी भाषा का एक ग्रनुपम शब्दकोष है और 
जिसमें हर मुहावरे के प्रमाण में अधिकृत कबियों के शेर प्रस्तुत किये गये हैं । 
लखनऊ के प्रारंभिक उत्थान में मुल्ला 'फायक़' का, फिर मिर्जा 'क़तील' का 
ताम मशहूर हुआ जो एक नव-मुसलिम फ़ारसीविद थे । वे खुद तो मजाक में 
कहा करते कि “बू-ए कबाब मरा मुसलमान कद” (कबाब की गंध ने मुझे मुस- 
लमान बना दिया) मगर सच यह है कि फ़ांरसी की शिक्षा, उससे दिलचस्पी 
ग्रौर उसमें कमाल हासिल करने की इच्छा ने उन्हें मुसलमान होने पर मजबूर 
कर दिया । उन्होंने सिफे इसी शौक़ में ईरान का सफर किया । बरसों शीराज़, 
इस्फ़हान, तेहरान और अजरंबजान की खाक छानी और फ़ारसी साहित्य में 
उनकी ऐसी प्रतिष्ठा हो गयी कि खुद फ़ारसीभाषी भी ऐसे महान भाषाविद 
से ईर्ष्या करें तो ग्राइचयं की बात नहीं है । 

मिजा गालिब ने जा-बजा मिर्जा 'क़तील पर हमले किये हैं| बेशक मिर्जा 
गालिब का फारसी ज्ञान उच्च कोटि का था। वे इस सिद्धांत पर बार-बार 


गुज़िदता लखनऊ 97 


जोर देते थे कि किसी ऐसे व्यक्ति के अलावा जिसकी कोई भाषा-विशेष मातृ- 
भाषा हो और किसी व्र्याक्ति का कथन प्रमाण नहीं माना जा सकता। मगर 
उनके समय में चूंकि ग्रवध से बंगाल तक लोग “क़तील' के अश्रनुयायी थे और 
बात-बात पर 'क़तील' का नाम लिया जाता था इसलिए मिर्जा ग़ालिब को 
ग्रक्सर तैश ग्रा गया और जब 'कतील' के अनुयायियों ने उनको ग्राड़े हाथों 
लिया तो कहने लगे : 

फंजे अ्रज् सोहबत-ए-क्रतीलम नीस्त 

रइक बर शोहरत-ए-कतीलम नीस्त 

मगर ग्रांगा कि फ़ारसी दानंद 

हम बरीं अहद-ओ्रो-राए-पैमानंद 

कि ज़ग्नहल-ए-जुबां न बूद कतील 

हरगिज़ ग्रज._ इस्फहां न बूद क़तील 

लाजर्म एतिमाद रा न सज़द 

गुफ्ता ग्रण इस्तनाद रा न सज़द 

की जुबान ख़ास अ्रहल-ए-ईरान अस्त 

मुक्किल-ए-मा-ग्रो-सहल-ए ईरान अस्त 

सुखनस्त आाइकार-्ञ्रो-पिन्हा नीस्‍्त 

देहली-ग्रोजल्खनऊ ज-ईरांं नीस्त 

[मुकके 'क्रतील' की सगति में बैठने का और उनसे लाभान्वित होने का 
प्रवसर नहीं मिला है, नहीं मुभे उनकी ख्याति से कोई द्व ष है। लेकिन मुझे 
ग्रगर ईएप्या और द्वप किसी से होगा तो किसी ऐसे फारसीविद से होगा 
जिसकी मातृभाषा फ़ारसी हो । क़तील' की मातृभाषा फ़ारसी नहीं थी, न 
ही वह इस्फ़हान के रहने वाले थे, लिहाजा उनके काव्य को प्रामाणिक या 
विश्वसनीय नहीं माना जा सकता, क्योकि यह भाषा ईरानियों की है जो 
हमारे लिए कठिन है और उनके लिए सरल | उनकी कविता में कोई ऐसी 
प्रकट या प्रच्छन्‍न बात नहीं है क्योंकि दिल्‍ली और लखनऊ ईरान के शहर 
नही है । | 
मगर इससे पह नतीजा नहीं निकलता कि 'क़तील' ने फ़ारसी ज्ञान के 

धया जो प्रयत्त स्थि गौर उसमे दक्षता प्राप्त करने में जिंदगी गुजारी. 
तह बिल्कुल तेकार गया | इस बाल के घन्‍नने में किसी कः आपत्ति नहों हा 


98 गुज़िइ्ता लखनऊ 


सकती कि 'क़तील' का कोई दावा, जब तक वे फारसी भाषी विद्वान का प्रमाण 
न दें, स्वीकार नहीं किया जा सकता और न खुद क़तील के मन में कभी 
यह विचार ग्राया होगा । लेकिन यह सिर्फ क़तील पर ही निर्भर नही, 
हिंदुस्तान का कोई व्यक्ति खुद प्रमाण नहीं हो सकता । खुद मिर्जा नौशा 
ग़ालिब भी कोई फ़ारसी का मुहाविरा किसी ईरानी के सुबृत के बिना इस्तेमाल 
नहीं कर सकते । हिंदुस्तान के फ़ारसीबिदों की ग्रगर कुछ प्रतिष्ठा बन सकती 
है तो सिफ इस आधघार पर कि फ़ारसी काव्य का उनका ग्रध्ययन गहन है और 
वे फ़ारसी के प्रत्येक शब्द का ठीक प्रयोग कहा-कहा हो सकता है इससे परिचित 
हैं। इस दृष्टि से सच पूछिये तो ग़ालिब के मुकाबिले मे क़रतील' अधिक 
प्रामाणिक थे । गालिब जिंदगी भर हिंदुस्तान की खाक छानते रहे और साथ 
ही जीविका-अ्रजंन के लिए प्रयत्नशील रहे | 'क़तील' का जीवन सुख-संतोप 
में बीता था और वे बरसों ईरान मे रह कर गांव-गाव की टाकरे खात 
फिरे थे । 

कुछ भी हो, लखनऊ के फ़ारसी ज्ञान का श्लरीगणश 'कतीन' से हुआ और 
उनसे कुछ पहले मुल्ला 'फ़ायक़ ने, जिनका खानदान आगरा से आकर 
लखनऊ के ग्रासपास बस गया था, फ़ारसी गद्य-पतद्म मे उच्च काटि के ग्रथों 
की रचना की । फ़ारसी भाषी और फ़ारसीविद हिंदुस्तन में उनसे पहले भी 
गुज़ रे थे, मगर फ़ारसी जानने के साथ-साथ उस भाषा के नियम और उसका 
व्याकरण तेयार करने का शोक पहले-पहल लगानऊ ही में शुरू हुआ झौर वह 
इन्ही की क़लम से जाहिर हुआ । उनवी किताबे श्रगर सच पूछिये तो 
बेमिसाल हैं । 

उसके बाद फ़ारसी की शिक्षा आम हो गयी और उसका पाठ्यक्रम इतना 
कठिन बना दिया गया जो सच यह है कि ख़द ईरान के पाठ्यक्रम से अधिक 
कठिन था । ईरान में, जेसा कि हर देश का नियम है, सोधी-सादी भाषा 
जिसमें सफाई के साथ कोई बात कही जाये, पसंद की जाती है और उसी 
प्रकार का पाठ्यक्रम भी है। हिंदुस्तान में 'उर्फ़ी ज 'फ़ैजी' और नेमत खान-ए- 
गली ज॑ंसे नाजकखयाल शाइरों का काव्य पाठ्य-पुस्तकों में शामिल हो गया । 
मुल्ला तुगरा और पंजरुकक़़ा के लेखक जेसे दुर्‌ह कवियों की कविताएं पढ़ी 
और पढ़ायी जाने लगीं जिससे दावा किया जा सकता है कि हिंदुस्तान का 
फारसी भाषा का ज्ञान ईरान से भी बढ़ गया था और यहीं के लोगों ने फ़ारसी 


गुज़िहता लखनऊ 99 


की तमाम पाठ्य-पुस्तकों की उच्च कोटि की टीकाएं लिख डाली थीं और 
उसी का यह परिणाम है कि जबकि दुनिया के तमाम भाषाओ्रों के कवि उस 
भाषा-विशेष के बोलने वालों तक ही सीमित रहते हैं श्नौर श्रगर कुछ दूसरे 
भाषाभाषी उस भाषा में कविता करने भी लगते हैं तो उस भाषावाले उन्हें 
नहीं मानते । फ़ारसी के कवि ईरान से ज़्यादा नहीं तो ईरान के बराबर ही 
हिदुस्तान में पेदा हुए, विशेषतः पिछली सदी में जबकि शिक्षा-प्रसार और 
सामान्य प्रगति के लिए लखनऊ हर जगह प्रसिद्ध हो रहा था और यहां का 
बच्चा-बच्चा फ़ारसी बोलता था। जाहिल रंडियों और बाज़ारी मज़दूरों की 
भाषा पर फ़ारसी की ग़जलें चढ़ी हुई थीं और भांड तक फ़ारसी की नक़लें 
करते थे। ग्रवध के क़स्बों के सभी शरीफ़ आदमियों की जीविका का साघन 
फारसी पढ़ाना था और ऐसे देहाती विद्वान फ़ारसी अश्रष्यापक लखनऊ की 
गलियों में मारे-मारे फिरते थे कि उनके फ़ारसी ज्ञान पर खुद ईरान वाले भी 
चकित होते । उनका लबो-लह॒जा ईरानियों का-सा न हो, मगर फ़ारसी के 
मुहाविरों, शब्द-विन्यास और छाब्दों के प्रयोग में वे ऐसे दक्ष थे कि मामूली 
ईरानी फ़ारसीविदों को भी कुछ न समभते थे । 

लखनऊ में फ़ारसी के प्रति रुचि कितनी बढ़ी हुई थी इसका अंदाजा लख- 
नऊ की उदू भाषा से हो सकता है । जाहिलों और औरतों तक की ज़बान पर 
फ़ारसी की संधियां, शब्द-विन्यास झ्और कारक मौजूद हैं और लखनऊ की 
भाषा पर हमला करनेवालों को ग्रगर कोई एतराज़ की बात इतने दिनों में 
मिल सकी है तो वह सिर्फ यह है कि उसमें फ़ारसी का दखल जरूरत से ज्यादा 
बढ़ गया है । लेकिन इस दौर में हुई प्रगति के स्तर को देखते हुए यही चीज़ 
लखनऊ की भाषा की खूबी और उसके समाज के उन्नत हो जाने का कारण थी । 
खुद दिल्ली में उदू भाषा की उन्नति के जितने दौर कायम किये जायें उनमें 
भी झगले-पिछल दौर का फ़क सिर्फ यही हो सकता है कि पहले की अपेक्षा 
बाद वाले में फ़ारसी का असर ग्रधिक है । 

मुसलमानों को तरह हिंदू भी फारसी में ख्याति प्राप्त कर रहे थे । उनकी 
यह रुचि मुगल सल्तनत के ग्रारंभिक काल से ही प्रकट होने लगी थी। उस 
समय भी जितने प्रसिद्ध और प्रामाणिक फ़ारसीविद हिंदू लखनऊ के श्रासपास 
मौजूद थे और कहीं नहीं थे । कायस्थों श्रौर कश्मीरी पंडितों ने फ़ारसी की 
शिक्षा को श्रपने लिए अनिवाय बना लिया था और यहां तक तरकक्‍क़ी की थी 


00 गुज़िहता लखनऊ 


कि कश्मीरी पंडितों की तो मातृभाषा ही उदू हो गयी और उनके और मुसल- 
मानों के फ़ारसी ज्ञान में बहुत कम फक़ रह गया था। कायस्थ चूंकि यहीं 
के निवासी थे इसलिए उनकी जबान 'भाषा' (खड़ी बोली ) रही । मगर फ़ारसी 
की शिक्षा भी कायस्थों में इतनी जड़ें जमा चुकी थी कि वे फारसी मुहाविरों 
का इस्तेमाल हद से ज़्यादा करने लगे थे । यह वात और कहीं के हिंदुग्रों में 
ने थी। उन दिनों लोग कायस्थों की भाषा का मज़ाक उड़ाया करते थे, मगर 
सच यह है कि वजाये मज़ाक उड़ाने के उनकी क़द्र करनी चाहिए थी, इसलिए 
कि उनकी भाषा उनकी शैक्षिक प्रगति की द्योतक थी जिस तरह झ्राजकल 
अंग्रेजी के शब्दों के उचित-अनुचित प्रयोग को ग्रंग्रेजी जाननेवाले ग्रपनी उन्नति 
का प्रमाण मानते हैं भौर बहुत बदतमीजी से अंग्रेजी शब्द अपनी भाषा में 
भरते चले जाते हैं । 

लखनऊ में उन दिनों फ़ारसी के सैकड़ों गद्यकार और कवि मौजूद थे श्र 
उदू की तरह फारसी मुशायरों का भी सिलसिला जारी रहा था। फारमी 
शरीफ़ों की ही नहीं आम जनता की भाषा वन गयी थी और ग्रव इसके 
वावजूद कि फ़ारसी दरवारी जवान नहीं रही और राजगर। दर उदू भाषा 
का क़ठ्जा हो गया है मगर सम्य समाज पर ञ्राज तक फ़ारसी का सिक्‍का जमा 
हुआ है और झ्राम खयाल यही है कि फ़ारसी मदरसों से निकल गयी ओश्ौर 
जीविकोपाजन के लिए उसकी ज़रूरत बाकी नहीं रही । मगर इंसान फ़ारसी 
पढ़े बिना सम्य समाज में बंठने के योग्य नहीं हो सकता और न सही माने में 
पुरा इंसान वन सकता है। द 

इंग्लिस्तान में कभी फ्रांसीसी ही दरवारी जवान थी। अब अगच मुदहृत हुई 
कि वह दरवार से निकाल दी गयी मगर सांस्कृतिक और नेतिक प्रगति आज 
भी फ्रांसीसी भाषा सीखे थिना नहीं प्राप्त की जा सकती । खाने-पीने, उठने- 
बैठने, पहनत-ओ्रोढ़ने और हंसने-बोलने जिंदगी के सभी तोर-तरीक़ों पर फ्रांसीसी 
का साम्राज्य अब तक वैसा ही बना हुआ है और लडकियां फ्रेंच भाषा 
सीखे बिना शिष्ट महिलाएं नहीं वन सकती । यही हाल लखनऊ का है कि 
फ़ारसी दरबार से गयी, पत्र-व्यवहार से गयी मगर समाज के सभी क्षेत्रों पर 
ग्रब तक उसका आधिपत्य है श्रौर बिना फ़ारसी की शिक्षा प्राप्त किये न हमारी 
रुचि परिष्कृत हो सकती है श्रौर न हमें वात करने का ढंग आ सकता है । 

मटिया बुजं में ग्रेतिम और अभागे अवध नरेश के साथ जो कुछ लोग वहां 


गुज़िहता लखनऊ 0] 


जाकर बस गये थे उनमें कोई पढ़ा-लिखा ऐसा न था जो फ़ारसी न जानता 
हो | दफ्तर की भाषा फ़ारसी थी और हिंदू-मुसलमानों में सैकड़ों फारसी के 
दाइर थे । औरतें तक फ़ारसी मे शेर कहती थीं और बच्चा-बच्चा फ़ारसी में 
ग्पना मतलब बयान कर लेता था । 

ग्राजजल लखनऊ में फारसी की शिक्षा बहुत कम हो गयी है और हिंदुश्रों 
ने तो इसे ऐसा छोड़ दिया कि वह कायस्थों की भाषा गायब हो गयी जिसका 
भाषा-संबंधी गोष्ठियों में उपहास किया जाता था और भांड तक उस फ़ारसी- 
निष्ठ भाषा की नक्‍लें करते थे। मगर फिर भी पुराने बुजुर्गों और ख़ास तौर 
से मुसलमानों में बहुत कुछ फ़ारसी-प्रेम मौजूद है, इसलिए कि उनकी उद्ू दानी 
ही एक ह॒द तक उनके लिए फ़ारसीदानी का साधन बन जाती है । मुसलमानों 
में ग्रब. तक ख्वाजा अजीज़उद्दीन साहब जेसा फ़ारसी अनुसंधाता अतीत की 
पाहित्य गोष्ठियों की याद दिलाने के लिए जिंदा है जो अपनी विद्वता के लिए 
सार भारत में प्रसिद्ध है। बूढ़े हिंदुओं में भी फारसी के अनेक स्कालर मिलेंगे 
जिसका एक नमूना संदेला के राजा दुर्गा प्रसाद हैं जिनका सबसे बड़ा कमाल 
यह है कि जमाना बदल गया, जमीन आसमान वदल गये, ग्रावोहवा बदल गयी 
मगर वे आज तक वही हैं। फ़ारसीदानी की दाद देने और लेने को मौजूद हैं 
ग्रौर पिछले इतिहास के एक कीड़ा लगे पन्ने की तरह चूमने-चाटने और आंखों 
से लथाने के योग्य है। 


| [4 ] 


विद्याओं में ही खुशनवीसी (सुलेख) और लिखावट की कला है । मुसलमानों 
को पुरानी लिपि अरबी थी जिस “नस्ख' कहते हैं। बग़दाद की खिलाफ़त से 
लेकर मध्य युग तक सारी इस्लामी दुनिया म पूव से यरिचिम दक शही लिपि 
थी । हीरा! को पुरानी लिपि से कूफ़ो लिपि और क॒फ़ी लिपि से नस्ख लिपि बन 
गयी थी । ताहिरिया वंश के ज़मान से वे सभी विद्याएं और कलाएं जो बग- 
दाद में विकसित हो रही थीं, ईरान और खुरासान की तरफ आने लगीं और 
वेलमियों तथा सलजूक़ियों? के जमाने में बगदाद की अधिकतर कलाए॑: ईरान 
. 4 दक्षिणी अरब का एक ज़िला | 
४ दो शाही खानदान जिन्होंने ईरान पर राज्य किया था । 





02 गुझिदता लखनऊ 


में एकत्र हो गयीं विशेषकर वेलमियों के विद्या-प्रेम और आमोद-प्रमोद से 
ईरान का पश्चिमी प्रांत अज़ रबंजान जो स्वाभाविक रूप से ईरानी इराक़ और 
ग्ररब इराक़ के बीच में स्थित था, हर तरह की अच्छाइयों ग्रौर तरक्कियों का 
केंद्र बन गया । 

इसी इलाके में पहले-पहल लिपि ने भी नया रूप घारण करना शुरू किया। 
खुशनवीसी सुलेख की परिधि से निकलकर नक्काशी के क्षेत्र में आर गयी और 
उसमें चित्रकला की-सी बारीकियां पैदा की जाने लगी | ईरानी नजाकतपसंदों 
को ग्ररब॒ की लिपि की पुरानी सादगी मे भद्दापन नजर झाया और पुरानी 
लीक, खुदबंखुद छूटने लगी । नस्ख मे क़लम हर अ्रक्षर और शब्द की बनावट 
में शुरू से आखिर तक एक जैसा रहा करता था। अक्षरों मे असमान घुमाव 
और ग्नुचित प्रसमानता होती थी । दायरे गोल न थे बल्कि नीचे श्लौर चपटे 
होते और इधर-उधर उनमें कोने पंदा हो जाते । भ्रब नक्क़ाशी को खुशनवीसी 
में मिलाकर लिखावट में नोक-पलक पैदा की जाने लगी । दायरे खूबसूरत और 
गोल लिखे जाने लगे। उस आधुनिक स्तर को सामने रखकर सबसे पहले मीर 
ग्रली तब्रेजी ने जो खास वेलम का रहने वाला था इस नयी लिखावट को 
नियमित रूप प्रदान करके पूर्व के शहरों में प्रचलित किया और उसका नाम 
नस्तालीक क़रार दिया जो असल में नस्ख-तालीक़ यानी “नस्ख' का परिशिष्ट 
था। 

यह नहीं मालूम कि मीर अ्रली तब्रेज़ी किस जमाने में थे | मुंशी शम्स- 
उद्दीन साहब जों आज लखनऊ के मशहूर झौर माने हुए खुशनवीस हैं उनका 
जमाना तंमूर से पहले बताते हैं लेकिन “नस्तालीक़' की किताबे इतनी पुरानी 
मिलती हैं कि तैमूर दरकिनार हम समभते हैं कि इस लिपि का आविष्कार 
महमूद गजनवी से भी पहले हो चुका था। इसमे शक नहीं कि महमूद के 
हमलों के साथ ही लाथ हिंदुस्तान मैं फारसोी खुशनवीसों की भी आ्रामद शुरू 
हो गयी होगी जिनके असर से यहां इस लिपि का रिवाज शुरू हुआ श्रौर हिंदु- 
स्‍्तान के हर प्रांत और हर जिले में नस्तालीक़ के खुशनवीस बहुत बड़ी तादाद 
में पैदा हो गये । लिहाजा या तो मीर श्रली तब्रेज़ी का युग बहुत प्राचीन है 
ग्औौर या वह इस लिपि के श्रसली ग्राविष्का रक नहीं हैं। लेकिन इसमें शक 
नहीं कि दिल्‍ली और लखनऊ बल्कि सारे हिंदुस्तान की वतंमान खुशनवीसी भ्रपना 
ग्रादि गुरु मीर अली तब्नेजी को बताती है । उनके बहुत मुहत के बाद ईरान 


गुज़िदता लखनऊ 03 


में नस्तालीक़ के गुरु मीर इमादुल हसनी मशहूर हुए जो एक नामवर खुश- 
नवीस श्लौर इस कला के गुरु माने जाते हैं। उनके भानजे भआ्राग़ा अब्दुरंशीद 
वली नादिरशाह के ग्राक्रमण के समय हिंदुस्तान ग्राये और लाहोर मे भ्राकर 
ठहर गये । लाहौर में उनके सेकड़ों शागिदं पंदा हुए जिन्होंने सारे हिंदुस्तान 
में फैलकर उन्हें यहां की खुशनवीसी का ग्रादम नहीं तो नूह जरूर साबित कर 
दिया । 

उन्हीं के दो शिष्य, जो विलायती थे, लखनऊ आये । इन दोनों बुजुर्गों में 
से एक हाफ़िज नूरुलला और दूसरे क़ाजी नेमतुल्ला थे। कहा जाता है कि 
प्रब्दुल्ला बेग नामक श्राग़ा ग्रब्दुरंशीद के एक तीसरे शागिद भी लखनऊ में 
श्राये थे । इन लोगों के आने का ज़माना शायद नवाब ग्रासफ़उद्दौला बहादुर 
का जमाना था जब यहां कोई कलाकार या शिल्पी प्राकर वापस न जाने पाता 
था । क़ाजी नेमतुल्ला ञ्राते ही इस काम पर तनात हो गये कि शाहजादों का 
लेख सुधारा करें और हाफ़िज नूरुल्ला का भी अ्रवध के दरबार से संबंध हो 
गया और उन दोनों ने यहां ठहर कर लोगों को खुशनवीसी सिखाना शुरू 
की । 

इन बुजुर्गों के अलावा यहां श्र पुराने खुशनवीस भी थे जिनमें से एक 
नामवर बुजुर्ग मुशी मुहम्मद भ्रली बताये जाते हैं। मगर आगा अब्दूरशीद के 
शागिदों ने ग्रपना ऐसा सिक्का जमा लिया कि खुशनवीसी के सारे शौक़ौन 
बल्कि सारा शहर उनकी ओर आग्राकृष्ट हो गया। जिसे भी खुशनवीसी का 
शौक़ हुम्ना, उन्हीं का शागिदं हो गया और पुरानी तमाम लिखावटों के नाम 
मिट गये, गुमनामी के अथाह सागर में डूब गये और सच यह है कि ये बुजुर्ग 
प्रपने कमाल की वजह से इसके हक़दार भी थे । 

हाफ़िज़ नूरलला की लखनऊ में जो क़द्र हुई उसका ग्रंदाजा इसी से नहीं 
हो सकता कि वे यहां सरकार में नौकर हो गये थे, बल्कि लखनऊ की क़द्र- 
दानी का सही अंदाजा इससे होता है कि लोग उनके हाथ के लिखे हुए क्रित्यों 
(पुर्जं) को मोतियों के दामों मोल लेते, यहां तक कि उनकी मामूली लिखा- 
वट भी बाज़ार में सिफे एक रुपया ग्रक्षर के हिसाब से हाथों-हाथ बिक जाती 
थोी। 

उन दिनों प्रमीर और शौकीन लोग अपने मकानों को बजाये तस्वीरों के 
क्रित्मों से सजाझा करते थे जिसकी वजह से उन पत्रों की बहुत अधिक मांग 


]04 गुज़िइता लखनऊ 


थी। जहां किसो भच्छे ख़ुशनवीस के हाथ का क़ित्मा मिल जाता उस पर 
लोग परवानों की तरह गिरते और उसे झांखों से लगाते । इससे समाज को 
तो यह लाभ पहुंचता कि झनेक नतिक सिद्धांत और उपदेशात्मक वाक्य या 
शेर हमेशा सामने रहते और हर समय घर में नीति-पाठ मिलता रहता और 
खुशनवीसी को यह फ़ायदा पहुंचता कि खुशनवीसों ने अपने कमाल को क्ित्या 
लिखने तक ही सीमित कर दिया था जो ग्राबदार और उम्दा वसलियों को 
लिखकर तंयार करते ग्लौर उसी में वे घर बेठे घनवान हो जाते । मगर श्रफ- 
सोस अब हिंदुस्तान से क्ित्मों और कत्बों (शिलालेख) का रिवाज उठता जाता 
है और उनकी जगह तस्‍वीरों ने ले ली है जिसकी वजह से साज-सज्जा की 
पिछली सम्य और सुसंस्क्रृत रुचि के मिटने के साथ ही खुशनवीसी की कला 
भी यहां से उठ गयी । अभ्रव कातिब तो हैं खुशनवीस नहीं हैं और जो दो-एक 
खुशनवींस मशहूर हैं भी वे मजबूर हैं कि कापीनबीसी श्रौर किताबत' से 
अपना पेट पालें जो चीज़ कि अ्रसल में ख़ुशनवीसी की दुश्मन है। इसके विप- 
रीत उन दिनों एक गिरोह क्रायम हो गया था जिसका काम सिर्फ यह था कि 
खुशनवीसी के नियमों का पालम करे और उसका समय-समय पर समुचित 
विकास करता रहे । यही वजह थी कि पिछले ख़शनवीस किताबत को अपनी 
शान के खिलाफ़ समभते थे और समभते थे कि जो शख्स पूरी-पूरी किताबें 
लिखेगा उसके लिए यह नामुमकिन है कि वह शुरू से आखिर तक खुशनवीसी 
के नियमों का पूरी तरह पालन कर सके। और सच यह है कि जितनी मेहनत 
वे लोग एक-एक वसली की दुरुस्‍्ती में करते थे, कातिब पूरी किताब के लिखने 
में उसका लेशमात्र भी नहीं कर सकते । 

उनकी मेहनत का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि हाफ़िज़ नरुलला से एक 
बार नवाब सम्मरादत ग्रली खां ने फ़रमाइश की कि “मुझे, 'गुलिस्तां” का एक 
नुस्खा (प्रति) लिख दीजिए ।” नवाब सआ्लादत अली खां सादी की गुलिस्ता' 
के बहुत शौफ़ीन थे और कहते हैं कि 'गुलिस्तां' हर समय उनके सरहाने मौजूद 
रहा करती थी । और कोई ऐसी फ़रम्माइश करता तो हाफिज नूरुलला शअपनी 
तौहीन समभकर उसका मुंह ही नोच लेते । मगर जासक का कहना था इस- 
लिए मंजूर कर लिया और श्रज् किया, “तो मुझे अस्सी गड्डी क़ाग़ज़ (उन 

. 4 लीथो प्रेस के लिए लिखाई का काम | 
2 फारसी कवि शेख सादी का कथा-संग्रह । 





गुजिश्ता लखनऊ 05 


दिनों रिम को गड्डी कहते थे), एक सौ क़लमतराश चाक़ और खुदा जाने 
कितने हजार क़लमों के नरकट मंगवा दीजिये ।” सम्रादत अली खां ने श्राइंचय 
से पूछा, “फ़क़त श्रकेली एक गुलिस्तां के लिए इतना सामान दरकार होगा ?” 
कहा, “जी हां, मैं इतना ही सामान खर्च किया करता हूं ।” नवाब के लिए उस 
सामान का जुटाना कुछ मुश्किल तो था नहीं, मंगवा दिया । अरब हाफिज साहल 
ने गुलिस्तां लिखना शुरू की, मगर पूरी नहीं होने पायी थी, सात अध्याय ही 
लिख पाये थे और आठवां ग्रध्याय बाक़ी था कि उनका देहांत हो गया । उनके 
बाद जब उनके बेटे हाफिज इब्राहीम दरवार में पेश हुए और उन्हें सम्वेदना- 
स्वरूप काला खिलशञ्बनत दिया गया तो सग्रमादत ग्नली खां ने कहा, “भई, मैंने 
हाफिज साहब से गुलिस्तां लिखवायी थी । खुदा जाने उसका क्या हाल हुआ ?” 
हाफ़िज इब्राहीम ने ग्रज किया, “उनके लिखे हुए सात ग्ध्याय तैयार हैं, आठवां 
बाक़ी है उसे यह श्रकिचन लिख देगा और उसे उतना ही शानदार बना देगा 
कि हुजूर फ़क़े न कर पायेंगे । लेकिन हां, अगर किसी मिस्री खुशनवीस ने देखा 
तो वह बेशक पहचान लेगा ।” नवाब ने इजाज़त दी और उस गुलिस्तां को 
हाफिज इब्नाहीम ने पूरा किया । 

हाफिज नूरुल्‍लला के शागिददों में ग्रधिक प्रतिष्ठित सबसे पहले तो उनके बेटे 
हाफ़िज़ मुहम्मद इब्राहीम थे । दूसरे मुंशी सरब सिंह नामक एक हिंदू बुजुर्ग थे 
जिनको कोई कायस्थ बताता है और कोई कश्मी री पंडित । और तीसरे मुहम्भद 
प्रब्बास नामक लखनऊ के एक ख्‌शनवीस थे । हाफ़िज इब्राहीम ने भी बहुत 
नाम पंदा किया और सेकडों आदमियों को खुशनवीस बना दिया और इस कला 
में एक नवीनता पेदा करके अपने पिता से भिन्‍न गरिमा प्रदान की । हाफ़िज़ 
न्‌रलला के दायरे बिल्कुल गोल होते थे, हाफ़िज़ इब्नाहीम ने उन्हें कुछ मामूली- 
सा श्रंडाकार बना दिया । मुंशी सरब सिंह के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 
ग्रपने उस्ताद की शान ऐसी उड़ा ली थी कि संँकड़ों वसलियां हाफ़िज़ नूरुल्ला 
के नाम से फला दीं और बड़े-बड़े खुशनवीस बिल्कुल तमीज़ नहीं कर सकते 
थे और यह उन दिनों खुशनवीसी का बहुत बड़ा कमाल था । 

हाफिज़ इब्राहीम के खास शागिदों में पहले तो उनके साहबज़ादे हाफ़िज 
सईदउदीन थे। उनके श्रलावा मुंशी नजीर हमीद, मुंशी अब्दुल मजीद जो 
सरकार के शाही हुक्म और प्रन्य पत्र-व्यवहार (प्ंग्रेज़ी साम्राज्य और अवध 
के राज्य के बीच) लिखने पर तैनात थे । मगर हाफ़िज़ इब्राहीम के दो शिष्यों 


06 गुज़िदता लखनऊ 


ने बहुत ख्याति प्राप्त की । जो प्रपने समय के लखनऊ के उस्ताद माने गये थे : 
एक तो मुंशी मंसा राम कश्मीरी पंडित जो इस कला के बहुत बड़े पंडित थे 
और दूसरे मुंशी मुहम्मदहादी झली जो नस्तालीक़ के अलावा नस्ख और तुगरान- 
वीसी! में भी लखनऊ म अपना सानी नहीं रखते थे । 

उधर क्राज़ी नेमतउल्ला के शागिदं एक तो उनके बेटे मौलवी मुहम्मद 
ग्रशरफ़ थे और दूसरे मोलवी कूल एहमद । 

गरज नस्तालीक़ के यही लोग उस्ताद थे जिनसे लखनऊ में खुशनवीसी 
कमाल को पहुंची । फिर प्रेस चालू होने के बाद किताबत और कापीनवीसी ने 
प्रगति की और दरअसल यह इसी खानदान की बरकत है कि लखनऊ में हजारों 
मुसलमान, हजारों कायस्थ जिनसे नौबस्ता और अशरफ़ाबाद के मुहल्ले भरे 
हुए हैं और सकड़ों कश्मीरी पंडित खुशनवीस हो गये । मगर अ्फ़सोस कश्मीरी 
पंडितों ने अंग्रेजी शिक्षा के शौक़ में श्रौर ख़ुशनवीसी का महत्व घटते देखकर 
इस कला को बिल्कुल छोड़ दिया और ग्बब जितने शभ्रच्छे लिखने वाले है सब 
मुसलमान हैं या कायस्थ । 

ग्राखिर ज़माने में संदेला के एक मुंशी भब्दुल हुई भी बड़े कमाल के खुश- 
नवीस थे जिनके शागिदं मुंशी श्रमीर उलला “तसलीम' उनके बड़े भाई मुंशी 
मुहम्मद अब्दुल लतीफ़ और मुंशी अशरफ़ भ्रली वगरा थे । फ़िलहाल नस्तालीक़ 
में मुंशी शम्सउद्दीन साहब और नस्ख में मुंशी हामिद श्रली साहब मशहूर हैं 
और ये दोनों मुंशी हादी अली साहब के शागिदं हैं । 

हिंदुस्तान में नस्ख लिखावट के संबंघ में जिन लोगों के नाम लिये जाते हैं 
उनमें सबसे पहले शख्श याक़ृत मुस्तासी के उपमान से मशहूर हैं 
जो याक़ृत अव्वल कहलाते हैं । हमें इस नाम का कोई बाकमाल 
कातिब मुअतसिम बिलला के ज़माने में नज़र नहीं आता। क्‍या अजब 
कि इस नाम से अभिप्राय इमाद कातिब हो जिसकी किताब खरीदा" मशहूर 
है और जो पहले शाम (सीरिया) में सुल्तान अताबक नूरुद्दीन जंगी का और 
उसके बाद मिस्र में सुल्तान सलाहउद्दीन अय्यूबी, बेतुलमुक़्दस-विजेता, का 
कातिब था, इसलिए कि नस्ख का सबसे बड़ा आखिरी खुशनवीस वंही माना 
जाता है । उसके बाद सुलतान औरंगजेब झ्रालमगीर के शासन काल में मुहम्मद 

4 एक प्रकार की लिखावट जिसमें कोई ञ्राकृति बना देते हैं, बादशाहों के 

फ़रमानों पर शाही संबोधन-प्रभिवादन लिखने की लिखावट । 


गुजिशता लखनऊ 807 


ग्रारिफ नामक नस्ख लिखावट के एक बड़े माहिर पैदा हुए जिनको 'याक़्त- 
रक़म-ए-सानी' का खिताब दिया गया | ग्रामतौर से कहा जाता है कि उन्होंने 
नस्ख़ की नयी शान ईजाद की और पहले के मुक़ाबिले उसे ज़्यादा सुंदर बना 
दिया । यहां तक कि नस्ख के लखनऊ के उस्ताद दावा करते हैं कि उनके 
कमाल को सारी इस्लामी दुनिया ने माना है । मैं इसे मानने के लिए तैयार 
नहीं हूं । याक्त-रक़म-ए-सानी को हिंदुस्तान में चाहे जंसी महत्ता मिल गयी 
हो मगर उन देशों में जहां की राष्ट्रीय लिखावट नस्ख और राष्ट्रभाषा ग्ररबी 
है, लोग याक़त रक़म का नाम भी नहीं जानते और न ही उनके अनुयायी है। 

मुहम्मद आ्रारिफ याक़्त रक़म के जमाने मे अब्दुल बाक़ी नाम के एक 
शख्श थे जिनका पेशा लुहारी था। उन्हें याक्र्त रक़म की लोकप्रियता देखकर 
शौक़ हुआ कि खूद भी इस कला में नाम पंदा करें | संयोगवश अब्दुल्ला तब्बाह 
नामक नस्ख के एक और खशनवीस उन दिनों मशहूर थ, हृद्दाद जाकर उनके 
शिष्य बन गये और ऐसी मेहनत की कि पूरे उस्ताद मशहूर हो गये । जब उन 
दोनों का ज़माना गुजर गया तो याकुत रक़म की जगह उनके भतीजे क़ाज़ी 
ग्रस्मतउलला ने ली और ह॒द्दाद की यादगार उनके दो बेटे अली अ्रकबर और 
ग्रली ग्रसग़र माने गये । 

उसके वाद हिंदुस्तान मे बड़े-बड़े खुशनवीस पैदा हुए और नस्ख की किता- 
बत हिंदुस्तान में बराबर तरकक़ी करती रही । आखिर में शाह गृलाम अली 
साहब की ख्याति फली जो नस्ख़ के वाकमाल खशनवीस थे । उसके बाद लख- 
नऊ में एक तरफ़ मौलवी हादी अली साहब की शोहरत हुई जिनका खानदान 
दिल्‍ली से आया था और कालपी के एक खुशनवीस मीर ग्रकबर अली के यह 
शागिद थे । मौलवी हादी अली साहव को तुग़रानिगारी में बड़ा कमाल हासिल था । 

मुंशी हादी अली के समकालीन नस्ख के एक मशहूर खुशनवीस मीर बंदा 
ग्रली 'मुतेइश' थे । उनके उस्ताद नवाब एहमद झली नामक एक पुराने वक्‍त 
के रईस आर नस्ख के बाकमाल उस्ताद थे | मीर बंदा अली के हाथ में राशा 
था, मगर कलम जेस ही काग़ज पर लगता मालूम होता कि लोहे का हाथ है, 
क्या मजाल कि काबू से बाहर हो । उनकी नज़ र लिखावट के पहचानने में 
ऐसा कमाल रखती थी कि बड़े-बड़े लोग लोहा मान गये । 

मुंशी हामिद ग्रली साहब फ़रमाते हैं कि एक मोक़ पर मुंशी हादी श्रली, 
मुंशी मुहम्मद याहिया (यह भी नस्ख़ के बड़े उस्ताद थे जिन्होंने छपने के लिए 


08 गुजिहता लखनऊ 


लखनऊ में पहला क़रान शरीफ लिखा), मुंशी अब्दुल हुई संदेलवी श्रौर मीर 
बंदा अली “मुतेइश” एक गोष्ठी में एकत्र थे। यह नस्ख के सभी उस्तादों की 
गोष्ठी थी | किसी ने नस्ख में लिखा हुग्ना एक क़ित्मा बिक्री के लिए लाकर 
पेश किया । गो उसमें कातिब का नाम नहीं लिखा था मगर उन उस्तादों ने 
एकमत होकर पहचान लिया कि खास याक़्त के हाथ का है और सबको शोौक़ 
हुआ कि उसे अपने क़ब्जे में करें । मगर मुंशी हादी अली साहब ने कहा, “यह 
एक दिन मेरे पास रहे तो मुझे गौर करने के बाद इत्मीनान होगा कि दरअ्रसल 
यह याक़॒त के हाथ का है या नहीं ।” मालिक ने दे दिया और वह उसे घर 
लाये । दूसरे दिन लेजाकर पेश किया और कहा, “वास्तव में यह याक़ृत ही के 
हाथ का है। इसी के साथ का याक़्त का एक क़ित्या मेरे पास भी पड़ा हुआ 
था, मैंने इसे लेजाकर उससे मिलाया तो बिल्कुल वसा ही पाया और मुझे 
यक्कीन आ गया कि वाक़ई याक़्त का है ! और दोनों कित्ए सबके सामने रख 
दिये । सबने निस्संकोच यह मान लिया कि दोनों याक्र्त के ही हाथ के लिखे 
हुए हैं। मगर मीर बंदा अली ने मुंशी हादी भ्नली वाले क़ित्ए को ग्रौर से देखा 
फिर मुस्कराये और उसके नीचे लिख दिया, “ईं कारअज तू आयद--ओो --मर्दा 
चुनीं कुनंद! ।” यह लिखा देखकर मुंशी अब्दुल हई साहब बिगड़े ओर कहा, 
“क्या आपको इसमें कुछ शक है ?” मीर बंदा अली ने कहा, “यह कित्यग्रा तर 
याकत के हाथ का नहीं हो सकता ।” मुंशी अब्दुल हुई और दूसरों ने दावा 
किया कि यह खास याक़त के हाथ का है| मीर बंदा अली ने उसमें 'वाव का 
सिरा दिखाया और कहा, “यह याक़्त का नहीं हो सकता ।” झ्रब तो सब लोग 
ग्समंजस में पड़ गये कि इतने में ही मुंशी हादी अली ने उस वसली का एक 
कोना फाड़कर कागज़ की तह के ग्रंदर से निकाल कर अपना नाम दिखा दिया 
आर सबको यक़ीन हो गया कि यह कारस्तानी मुंशी हादी अली साहब की 
थी । सभी ने उनकी बेहद तारीफ़ की और उन्होंने कहा, “मगर मैं तो मीर 
बंदा अली साहब की नज़र का क़ायल हो गया ।” 

खुशनवीसों की आम रुचि के अनुसार मीर बंदा ग्रली साहब से भी क्रित्य्रा- 
नवीसी के सिवाय किताबत नामुमकिन थी । जिंदगी भर कभी कोई छोटी 
किताब भी न लिखी गयी । हाजी हरमन शरीफैन ने जब प्रेस लगाया तो मीर 
बंदा ग्नली की बड़ी मिन्‍नत-समाजत करके उन्हें इसके लिए राजी किया कि 

3 यह काम तूने किया और मर्द ऐसा ही किया करते हैं । 


गुजिइ्ता लखनऊ ]09 


एक पंजसू रा” लिख दें | मीर बंदा अली ने बड़ी नेहनत से श्रौर खुदा जाने 
कितने दिनों में लिखा और ले गये । मगर हाजी साहब के सामने जब उस 
पर आखिरी नज़र डाली तो कुछ ऐसा नापसंद हुआ कि बजाये हाजी साहब 
के हवाले करने के फाड डाला और कहा, “भई, मुझसे नहीं हो सकता ।” 

इन बुजुर्गों की चर्चा से मेरा यह उद्देश्य नही है कि खशनवीसी में लख- 
नऊ की कोई ऐसी प्रतिष्ठा स्थापित हो गयी थी जिसका हिदुस्तान में सानी ही 
तहीं था। बल्कि इसके विपरीत मेरा विचार है कि नस्ख के जसे-जैसे वाकमाल 
मुगल सल्तनत से पहले हिदुस्तान में गुजर चुके हैं उनका लेशमात्र भी इन: 
लोगों में नहीं था, बल्कि नस्ख का कमाल उन दिनों मिट चुका था। अलबत्ता 
नस्तालीक़ के बारे में इतना कहा जा सकता है कि हाफ़िज़ नूरुल्ला और 
हाफिज इब्राहीम के हाथ के क़ित्ए हिंदुस्तान में जितने लोकप्रिय हुए अन्य किसी 
खुशनवीस के शायद न हो सके होंगे। लेकिन इस पर भी इस कला में लखनऊ 
का स्थान लगभग वही था जो दूसरे सुसंस्क्रत नगरों का हो सकता है । 

मगर लखनऊ की खुशनवीसी ने प्रेस की तरक्की में जो काम किया शायद 
कहीं की खुशनवीसी न कर सकी होगी । मुझे यह जानकारी नहीं है कि हिंदु- 
स्तान में सबसे पहले छपाई का काम कहां युरू हुआ | कलकत्ता में उदू लिटरेचर 
की तरक्की और सामान्य पूर्वी विद्याग्रों को प्रोत्माहन देने के लिए बहुत कुछ 
किया गया, मगर वहां टाइप के सिवा पत्थर के छापे को पुरानी किताबें मैंने 
नहीं देग्वी ! 

लखनऊ में ग़ाजीउद्दीन हैदर के शासनकाल में (84 -827 ई० ) असल 
नामक एक योगपियन ने ग्राकर लोगों को प्रेस का खयाल दिलाया और जब 
पढ़े-लिखे लोग उस ओर ग्राकृप्ट हुए तो उसने पहला प्रेस लखनऊ में खोला ! 
उसने प्रेस और तमाम सामान यहीं तैयार करा के छापना शुरू किया और 
'जाद-उल-मग्राद', 'हफ़्त कुलजुम' और 'ताज-उल-लुगात (जो कई खंडों में थी) 
छापकर पब्लिक के सामने पेश की । उससे सीख कर और लोगों ने भी प्रेस 
खोलने शुरू किय जिनमें सबसे पहला प्रेस शायद हाजी हरमेन शरीफ़ेन का 
था। उन्ही दिनों शीशे के सामान के एक घनवान व्यापारी मुस्तफा खां कुछ 
छापने के लिए हाजी हरमन के पास ले गये और हाजी साहब की जबान से 
कोई ऐसी सख्त बात निकल गयी कि मुस्तफा खां ने घर आकर खुद अपना 
... 2 कुरान की पांच बहुत छोटी सूरतें जो फ़ातिहा में पढ़ी जाती है । 


0 गुज़श्ति लखनऊ 


मुस्तफ़ाई प्रेस जारी कर दिया जिसने भ्रसाधारण प्रगति की । थोड़े दिनों बाद 
भ्रली बख्श खां ने ग्रलवी प्रेस जारी किया और लखनऊ में बहुत ज़्यादा छापे- 
खाने खुलने लगे । 


शुरू में छपाई का काम यहां व्यापारिक सिद्धांतों पर नहीं बल्कि शौक़ की 
वजह से जारी हुआ । बढ़िया से बढ़िया कागज़ लगाया जाता जो पत्थर के छापे 
के लिए बहुत ही मुनासिब था। बड़े-बड़े खुशनवीसों को मजबूर करके और 
बड़ी-बड़ी तनख्वाहें देकर उनसे किताबत का काम लिया जाता था। न तो उसके 
साथ काम की कोई शतते होती, न यह देखा जाता कि वे दिन भर में कितना 
लिखते हैं, या लिखते भी हैं या नहीं । उल्टे उनकी बडी खातिर की जाती । 
इसी तरह प्रेसमेनों से भी न पूछा जाता कि दिन भर में कितने काग़ज छापे । 
स्याही के लिए कड़वे तेल के हज़ारों चिराग जलाकर बढ़िया काजल तैयार 
किया जाता, खटाई की जगह काग़ज़ी नीबू खर्च होते और कपड़े की जगह 
अ्रसली स्पज' काम में लाया जाता। ग़रज़ हर चीज उच्च कोटि की काम में 
लायी जाती । इसका नतीजा यह हुआ कि नवाबी शासन के समय फ़ारसी 
ग्रौर अरबी की पाठय-पुस्तकें और घमं ग्रंथ जेसे लखनऊ में छपकर तंयार हुए 
ग्रौर शायद कहीं न छप सके होंगे। उस समय की छपी हुई किताबें जिस 
किसी के पास मौजूद है वे एक तरह की संपत्ति है और लोग ढूंढते हैं और 
नहीं पाते । 


मेरे वालिद के सगे चाचा मौलवी एहमद साहब को यात्रा और व्यापार 
का बड़ा शौक था और उस ज़माने में जबकि लोग घर से बाहर क़दम निका- 
लते डरते थे उन्होंने हाजी हरमन शरीफंन के एजेंट की हैसियत से रथों और 
बेलगाड़ियों पर सवार होकर और हजारों किताबें साथ लेकर लखनऊ से 
रावलपिडी तक सफ़र किया था । उनका कहना था कि किताबें उन दिनों 
दुलेभ थीं | यहां की छपी हुई किताबों को देखकर लोगों की आंखें खुल जाती 
थीं और वे उन पर परवानों की तरह गिरते थे। लोगों के शौक का यह 
आ्रालम था कि हम जिस शहर या गांव में पहुंचते हम से पहले हमारी ख़बर 
जाती और हमारा दाखिला अजब द्यान-शौकत से होता । इधर हम किसी 
बस्ती में पहुंचे, उधर जनसमूह ने घेर लिया । भीड़ लग जाती थी और हम 
जिस किताब को जिस क्रीमत पर देते लोग निस्पकोच ले लेते और आंखों से 


गुजिश्ता लखनऊ ]] 


लगाते थे। हम 'करीमा', “मामक़ौमां” वगरा को छह या आठ ग्राने फ़ी कापी 
के हिसाब से और “गुलिस्तां, 'बोस्तां को फी जिल्द तीन रुपये या चार रुपये 
के हिसाब से बेचते थे। और उस पर यह हाल था कि मांग को पूरा न कर 
सकते । एक शहर से दूसरे शहर्‌ तक पहुंचते-पहुंचते क्विताबों का भंडार खत्म 
हो जाता और नये माल के इंतिजार में महीनों ठहरना पडता क्योंकि उन दिनों 
माल का पहुंचना कठिन था। मगर हमने ऐसा इंतिजाम कर लिया था कि 
माल लखनऊ से बराबर आता रहता । 

शाही के आखिरी दौर में मुस्तफ़ाई प्रेस अपनी छपाई के लिहाज से 
दुनिया में जवाब न रखता था। सल्‍्तनत खत्म होने के बाद मुंशी नवलकिशोर 
ने ग्रपना प्रेस जारी किया । गो वह छपाई की खूबी में मुकाबिला न कर 
सका, मगर व्यापारिक सिद्धांत पर चलकर उसने फ़ारसी और अरबी की ऐसी 
बडी-बडी और मोटी किताबें छाप दीं कि आज किसी प्रेस को उनके छापने का 
साहस नहीं हो सकता | सच यह है कि लखनऊ में उस जमाने की ग्यौक़ीनी ने 
ऐसा सामान जमा कर रखा था कि उससे फ़ायदा उठाने के लिए मुंशी नवल- 
किशोर जैसे साहसी मुद्रक की ग्रावश्यकता थी । ग्राखिर नवलकिशोर प्रेस ने 
यहां तक प्रगति की कि पूर्व के साहित्य को उसने जिंदा कर दिया और विश्व- 
सनीयता तथा संदर कृपाई के लिए जो ख्याति लखनऊ की हुई और किसी 
शहर को नहीं मिल सकती । और उसी की बरकत थी कि मध्य एशिया में 
काशगर और बुखारा तक श्रौर भ्रफ़गानिस्तान और ईरान की सारी मांग 
लखनऊ ही पूरी कर रहा था चुनांचे आज तक नवलकियोर प्रेस ज्ञान-विज्ञान 
के व्यापार की कंजी है जिससे काम लिये बिना कोई व्यक्ति ज्ञान-विज्ञान के 
क्षेत्र में कदम नहीं रख सकता । 

मगर ग्रफसोस श्रब लखनऊ में प्रेसों की इतनी बडी संख्या के बावजूद 
छपाई की स्थिति इतनी खराब हो रही है और रोज-बरोज ऐसी बदतर होती 
जाती है कि दूसरे शहर उससे बाजी ले गये हैं और हमारी नजर में प्रेसमेनों 
की नैतिक अवस्था बिगड़ जाने की वजह से अब लखतऊ में दूसरे शहरों की 
ग्रपेक्षा खराब छपाई होती है। बस हमारे संतोष के लिए इतना काफो है कि 
कानपुर में मुंशी रहमतउल्ला साहब की वजह से छापे की हालत श्रच्छी है और 
कानपुर दरग्रमल लखनऊ की प्रगति का ही एक छोटा रूप है। 

१फ़ा रसी भाषा की दो प्रायमरों के नाम । 


]]2 गुजिश्ता लखनऊ 


प्रेय के साथ ही लखनऊ में पत्थर की छपाई की दुरुस्‍्ती की कला की भी 
शुरूआत हुई । पत्थर पर जो कापी जमायी जाये उसे किसी हद तक छीलकर 
ग्रौर कलम लगाकर दुरुस्त करना संभवतः योरुप ही से शुरू हुआ होगा और 
वहां ग्रब भी क्‍या अजब कि संशोधन की यह प्रक्रिया जारी हो । मगर नस्ख 
ग्रोर नस्तालीक़ के अक्षरों को इस ढंग से सुधारना कि ख॒शनवीस की ग्रपनी 
शेली बाक़ी रहे और किसी को महसूस न हो सके कि उसमें किसी दूसरे का 
भी कलम लगा है, खास लखनऊ की ही विशेषता है जहां शुरू-शुरू मे यह कला 
सिर्फ इस हद तक सीमित थी कि अक्षर और अन्य बेल-बूटे चाहे कितने हो उड़ 
गये या कुचलकर फंल गये हों, उन्हें ठीक कर दिया जाये । मगर कुछ दिन बाद 
यहां की नवीनता वी प्रवृत्ति इस सीमा को भी लांघ गयी और ऐसे दक्ष संग- 
साज़ (पत्थर-संशोधक ) पंदा होने लगे जो पत्थर पर प्री-पूरी किताबें उल्टी 
लिख देते हैं और लिखावट शभ्रपनी जगह ऐसी जमी रहती है कि मजाल क्या 
जो कोई पहचान सके कि यह पत्थर पर उल्टा लिखा गया है | शुरू में इसके 
आविष्कारक एक पुराने बुजुर्ग थे जो मुस्तफाई प्रेस की ख्याति के कारण प्रसिद्ध 
हुए । उनके ज़माने ही में उनके शिष्यों की अधिकता ने यहां के प्रंसों को लाभ 
पहुंचाया । बहुत से लोगों ने प्रगात की और यहां से संगसाज दूसरी जगह भेजे 
जाने लगे । जब यह काम ग्राम हो गया तो मुंशी जाफ़र हुसेन नामक एक मश- 
हर संगंसाज़ को उनकी दक्षता ने इस बात के लिए तंयार किया कि छापाखाने 
को कापीनवीसी के म्ंभटों से मुक्त कर दें । उन्होंने पत्थर पर उल्टा लिखना 
शुरू किया । यह काम प्रारंभ में छोटे-छोटे बाज़ारी प्रेसों से शुरू हुआ झ्ौर बाद 
में चलकर सभी छोटे-बड़े प्रेसों में इसे अपना लिया गया । ग्रब म्‌शी सेयद 
प्रली हुसेन साहब ने इस हद तक तरकक़ो की कि उनकी उल्टी लिखावट का 
बहुत से मशहूर खशनवीस भी मुक़ाबिला न कर सके । चुनांचे उनकी उल्टी 
किताबत का एक मामूली नमूना हमारा 'दिलग्रुदाज' भी है जिसकी कापियां 
नहीं लिखी जातीं वल्कि मुंशी अली हुसेन साहब लेखों को पत्थर पर उल्टा 
लिख दिया करते हैं । दिलगूदाज' के पाठक इसे पढ़कर और इसकी लिखावट पर 
गौर करके अंदाजा कर सकते हैं कि संगसाज़ी की कला का लखनऊ में कितना 
विकास हो चुका है । गो कि हिंदुस्तान के अधिकतर शहरों में संगससाज लखनऊ 
के ही हैं, लेकिन इस वक्‍त तक किसौ और दहर के प्रेस को यह बात नसीब 
नहीं हुई कि कापियां जमाने के बदले इबारत पत्थरों पर उल्टी लिखवाकर 


गुजिशता लखनऊ 3 


छापे । यह कला श्रभी तक लखनऊ तक ही सीमित है । मगर अफ़सोस प्रेसमैनों 
की हालत खराब हो जाने के कारण लखनऊ संगसाज़ो की इस कला से इतना 
फायदा नहीं उठा सकता जितना कि होना चाहिये । 


[ 5 ] 


अभी हमें लखनऊ की बहुत सी विशेषताएं बतानी है जिनका अधिकांश ब्ंबंध 
नेतिक बातों और सांस्कृतिक क्रियाकलाप से है। मगर यह भी उचित जान 
पड़ता है कि संक्षेप में कुछ इतिहास युद्ध-कौशल का भी दे दिया जाये । 

सच यह है कि पूर्व का अंतिम दरबार उस समय क़ायम हुआ जब मुसल- 
मानों और ग्राम हिंदुस्तानियों की सैनिक-शक्ति कमजोर पड़ चुकी थी, बल्कि 
इससे भी ज्यादा सही यह कहना होगा कि पुराने युद्ध-कौशल इतने नहीं मिटे 
थे जितने कि युद्ध के पुराने हथियार नये युद्धकौशल और बये हथियारों के 
सामने बेकार हो गये थे । जिसका नतीजा यह हुआा कि पुराने युद्धकौशल 
बजाये इससे कि मुसलमानों या हिंदुस्तानियों से निकलकर किसी नयी प्रगति- 
शील और शूरवीर जाति में प्रगति कस्ते, दुनिया ही से मिट गये और ऐसे मिटे 
कि मौजूदा नस्ल अपने पुरखों की बहादुरी के कारनामों और उनके युद्धकौशल 
से बिल्कुल अपरिचित है । आज इन कलाग्रों की चर्चा के लिए हमने क़लम 
उठाया है तो कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं मिलता जिससे कुछ हालात मालूम हों । 
हम शाहज़ादा मिर्जा मसूद क॒द्र बहादुर बी० ए० और लखनऊ के एक बहुत 
पुराने बुजुर्ग सुलेमान खां साहब (जो हाफ़िज़ रहमत खां, बरेली-नरेश की 
नस्ल से हैं) के आभारी हैं कि इन पुरानी युद्ध-कलाग्रों के बारे में जो कुछ 
लिख रहे हैं उन्हीं की मदद से लिख रहे हैं । 

युद्ध की जिन कलाग्रों का विकास दिल्ली में और दिल्‍ली के बाद लखनऊ 
में हुआ वे वास्तव में तीन विभिन्‍न जातियों से संबद्ध थीं और तीनों जातियों 
के परस्पर मिलने से उन कलाओों का समुचित विकास हुआ था और आदचरय्य 
इस बात पर है कि मेलजोल के बावजूद आखिर तक उनकी विद्येषता बाक़ी 
रही । कुछ कलाएं तो आ्रायं जाति के योद्धा्ों ने दी थीं, कुछ तुके और तातारी 
बहादुर अपने साथ लाये थे और कुछ ऐसी कलाएं थीं जो अरबों की देन थीं 


4 ' गुज़िशता लखनऊ 


जो ईरान से होती हुई यहां ग्रायी थीं। लखनऊ में जिन कलाग्रों का प्रचलन 
था श्रौर जिनके उस्ताद यहां मौजूद थे, वे नीचे दी जाती हैं : 

(।) लकड़ी, (2) पटा हिलाना, (3) बांक, (4) बिन्नौट, (5) कुश्ती, 
(6) बर्छा, (7) बाना, (8) तीरंदाजी, (9) कटार, और (0) जलबांक । 
]-लकड़ी 

यह कला मूलतः: आर्यों की थी जिसे फिकती कहते हैं । यह हिंदुस्तान और 
ईरान दोनों देशों के आर्यों में प्रचलित थी । अरबों की विजय के बाद ईरान 
की फिकेती पर अ्ररबी योद्धाओ्रों का श्रसर पड़ गया श्रौर वहां की फि्कती 
हिंदुस्तान की प्रपेक्षा अधिक प्रगति कर गयी ! हिंदुस्तान में आखिर तक वे 
दोनों कलाएं अग्रपनी-अपनी विशेषता के साथ बाक़ी रहीं और लखनऊ में दोनों 
स्कूल क़ायम थे । ईरान की अ्ररबी मिश्रित फिकेती यहां अली मद' के नाम 
से मशहूर थी ओर शुद्ध हिंदुस्तानी फिकेती 'रुस्तमखानी' के नाम से याद की 
जाती । अली मद में फिकेत का बायां क़दम एक जगह जमा रहता और सिर्फ 
दाहिने पांव को आगे-पीछे हटाकर पतरे बदले जाते । इसके खिलाफ़ रुस्तमखानी 
में फिकेत पेतरे बदलते वक्त दाहिने-बायें और आगे-पीछे जितना चाहता 
या जगह पाता हटता-बढ़ता और एकदम प्रतिद्व द्वी पर झा पड़ता । एक यह फर्क 
भी था कि ग्रली मद की कला खास रईसों और शरीफ़ों के साथ जुड़ी थी । 
इसके उस्ताद कभी किसी छोटी कौम या निचले वर के श्रादमी को श्रपना 
शागिदे न बनाते और न अ्रपनी कला से परिचित होने देते । लेकिन उधर 
रुस्तमखानी की कला छोटे वर्ग के लोगों में ग्राम थी । 

अली मद के एक जबरदस्त उस्ताद फ़ैजाबाद में शुजाउद्दोला बहादुर और 
उनके बाद उनकी बेवा बहू बेगम साहिबा की सरकार से संबद्ध थे। उनका 
जिक्र फ़ैज़ाबाद के इतिहास में है और मालूम होता है कि इस कला के सबसे 
पहले उस्ताद वही थे जो फ़ैजाबाद में रहे और फिर लखनऊ श्रा गये । इस 
कला के दूसरे उस्ताद मुहम्मद अली खां थे जो खास हमारे मुहल्ले कटरा 
बिज्जन खां में रहते थे और श्रली मद के आविष्कारक माने जाते थे । तीसरे 
उस्ताद मीर नज़्मउद्दीन थे जो दिल्ली के शाहज़ादों के साथ पहले बनारस गये 
झ्रौर फिर वहां से लखनऊ आये । उनका नियम था कि सिफ़ं शरीफ़ों को शागिद 
करते और शागिदं करते वक्‍त शाहज़ादों से दौलत और शरीफ़ों से सि्फे मिठाई * 
लेते और उसे बजाग्रे इसके कि अपने काम में लायें खुद ले जाकर संयदों को 


गुजिशता लखनऊ ]5 


भेंट दे देते । यह नवाब आसफ़उद्दौला के ज़माने में थे। एक बहुत बड़े उस्ताद 
मीर ग्रता हुसेन थे जो हकीम मेहदी के खास साथियों में थे । एक बहुत बड़े 
उस्ताद पटेबाज़ खां थे जो अपने कमाल के कारण गाजी उद्दीन हैदर के जमाने 
में गली मद के आविष्का रक और संस्थापक मशहूर हो गये । उनके बारे में कहा 
जाता है कि वह नव मुस्लिम थे मगर कायदा उनका भी यही था किसिवा शरीफ़ों 
के श्रपनी कला किसी निचले वर्ग के ग्रादमी को नहीं बताते थे | उन्होंने लखनऊ 
में अपनी यादगार के रूप में एक मस्जिद छोड़ी है जो घनिया मेहरी के पुल से 
ग्रागे आलमनगर के पास झाज भी मौजूद है । 

रुस्तमखानी का रिवाज जनता में रहा ग्रौर इसी वजह से हिंदू या मुसल- 
मानों में उसको कोई प्रमुख स्थान न मिला, बल्कि इसके संकड़ों उस्ताद श्रवध 
के तमाम गांवों और क़र्बों में फैले हुए थे। फिर भी लखनऊ में याहिया खां 
बिन मुहम्मद सिद्दीक़ खां ने जो कमाल और नामवरी रुस्तमखानी में हासिल 
की, किसी को नसीब न हो सकी । नवाब फ़तंहयाब खां का अगर्चे ऊंचे रईसों 
में शुमार था लेकिन इसके बावजद एक बड़े ख़शनवीस भी थे और उन्होंने 
रुस्तमखानी में भी कमाल हासिल किया था | इसी तरह लखनऊ के एक मशहूर 
वांके पहलवान मीर लंगर बाज़ भी रुस्तमखानी के उस्ताद थे और ग्रव तक 
थोडा-बहुत रिवाज बाक़ी है तो निचले वर्ग के लोगों में | श्रली मद की कला 
शरीफ़ों में प्रचलित थी और शरीफ़ों को युद्ध-कला से कोई वास्ता नहीं रहा 
लिहाजा वह कला भी नष्ट हो गयी । रुस्तमखानी का नीचे लोगों में रिवाज 
था और वे लोग आज भी लइते-भिड़ते रहते हैं, लिहाजा उनमें रुस्तमखानी का 
रिवाज झाज तक मौजूद है। 

ग्रली मद के दो-एक उस्ताद मैंने मटिया बुजं में देखे थे श्रौर सवके आ्राखिर 
में मीर फजले ग्रली थे जो मुहल्ला महमूद नगर में रहते थे । 

2-पटा हिलाना 

इस कल। ज्ञा मूल उद्देश्य येह था कि अगर इसान दुश्मनों के घरे में ग्रा 
जाये तो लकड़ी के हाथ चारों तरफ फेंकता हुआ सबको हटाकर, सबसे बच- 
कर और सब5,। मारता हुआ निकल जाये । पटे को टेक कर उड़ना इस कला 
की विशेषता थी घप्लौर सबसे बड़ी तारीफ इस बात की थी कि इंसान पर एक 
साथ दस तीर भी ग्ञाकर पड़ें तो उनको काट दे । यह कला दिल्‍ली में नहीं 
थी, लखनऊ में योरुप से ग्रायी और जुलाहों में इसका ग्रधिक प्रचलन रहा । प्रगर्चे 


6 गुज़िशता लखनऊ 


आखिर में वहुत से शरीफों ने भी, खासकर क़रस्बों के शेखज़ादों ने इसे भ्रपना 
लिया । ग़ूलाम रसूल खां का बेटा गौरी पटेबाज़ लखनऊ में इस कला का सबसे 
बड़ा माहिर माना जाता था जिसकी सैकड़ों घटनाएं जनता में प्रसिद्ध हैं, मगर 
ग्रफसोस श्रब ये क़िस्से भी वर्तमान पीढ़ी भुलाए जा रही है । 

मीर रुस्तम अली के सैफ़! में दोनों तरफ घार होती और उसे हिलाते 
हुए संड़ों प्रतिद्व द्वियों को चीरकर निकल जाते । असेवन के एक शेखजादे 
शेख मुहम्मद हुसन दोनों हाथों से पटा हिलाते | चुनांचे गाज़ीउद्दीन हैदर के 
जमाने में एक दिन साहब रेज़िडेंट बहादुर और कुछ योरुपियन मेहमानों ने 
इस कला के किसी उस्ताद का कमाल देखना चाहा । शेख मुहम्मद हुसेन अ्रा 
मौजूद हुए । चूंकि पटा उनके पास न था, शाही ग्रस्त्रागार से एक सजा-घजा, 
टोपीदार पटा दिया गया जिसे लेकर उन्होंने ऐसे-ऐसे कमाल दिखाये कि हर 
तरफ से वाहवाही हुई श्रौर वह उसी बाहवाही भौर. जयजयकार के जोश में 
पटा हिलाते हुए भीड़ से निकल कर चले गये और अपने घर पहुंचे ! कलाकारों 
में मशहूर था कि जो शख्स पटा हिलाना जानता है वह दस तलवारवालों को 
भी पास न पहुंचने देगा । 

इसी कला में प्रवीण एक साहब लखनऊ में मीर विलायत अली डंडा तोड़ 
थे। उनके बारे में मशहूर था कि प्रतिद्व दी के हाथ में कितना ;) जबरदस्त 
डंडा हो उसे तोड़ डालते थे । 

3-बांक 

युद्धकोशल में इसका बड़ा महत्व था और सिद्धांततः दूसरी युद्धकलाग्रों 
से इसे प्राथमिकता दी जाती थी । शरीफों के लड़के खास कोशिश और खास 
शौक़ से इस कला को सीखते । इसका मूल उद्देश्य छुरियों से प्रतिद्व द्वी का 
सामना करना है । यह कला प्राचीन काल में हिंदुओं में भी थी और ग्ररबों में 
भी, मगर छुरियां दोनों की अलग-श्रलग क़िस्म की थीं । हिंदुओं की छुरी सीधी 
होती जिसके दोनों ओर धार होती और अरबों की छुरी मुडी हुई और खंजर 
जैसी होती जिस पर एक ही तरफ धार होती । मगर अरबों की आखिरी छुरी 
जॉबया है जिसको नोक से कुछ दूर तक चारों तरफ चार घारें होती हैं और 
उससे ऐसा चौफांका घाव पड़ता है कि कहते हैं कि जसमें टांका लगाना 
मुश्किल होता है। ग़रज़ इस हथियार से लड़ने की कला का नाम बांक है । 

4 जिल्दसाज़ों का काग़ज़ काटने का श्रौज़ार । 


गुज़िद्ता लखनऊ ]7 


इसकी शिक्षा यों दी जाती है कि उस्ताद और शागिदं दोनों आमने-सामने 
घुटनों के बल बेठते हैं । मगर हिंदुओं वाली सीधी छुरी की शिक्षा में यह नियम 
था कि दोनों प्रतिद्व ढ्वी घुटनों के बल बैठने के साथ एक घुटना खड़ा रखते और 
अरबोंवाली छुरी की शिक्षा में बिल्कुल घुटने टेककर बेठते थे और चोटों के साथ 
बड़े जबरदस्त पेच होते जिनके आगे कुछती के पेचों का कोई महत्व न था। यह 
फर्क भी बताया जाता है कि अरबों के कौशल में श्रसली सात चोटे थीं और 
हिंदुओं के कौशल में नौ। अरबों की बाक में पेच पूरा बंध जाता तो प्रतिद्व॒द्दी 
को जिंदा छोडना बांधने वाले के क़ाबू से बाहर हो जाता और हिदुस्तानवालों 
की कला में श्राखिर तक क़ाबू में रहता कि जब चाहें पेच खोलकर प्रतिद्व द्वी 
को बचा दें। 

इस कला में सिफ़॑ चोटें ही नहीं बल्कि बड़े-बड़े ज़बरदस्त पेच हैं जिनमें 
दोनों प्रतिद्व द्वी घंटों गुथते और निरंतर पेच करके एक-दूसरे को बांधकर 
ज़रूमी कर देने की कोशिश करते है । इस कला के पेच ऐसे सच्चे और श्रचूव 
ग्रौर नियमबद्ध थे कि कहा जाता है कि कुइ्ती और लकड़ी के तमाम पेच 
बांक ही से निकले हैं | बांक के उस्तादों में मशहूर था कि बांक लेटकर 
पूरी होती है, बैठ कर ग्राधी रहती और खड़े होकर सिर्फ चौथाई रह 
जाती है। यह न समझना चाहिए कि बंकत का काम सिफ यह है कि प्रतिद्व द्वी 
को छुरी से घायल कर दे, नहीं उसका असली काम यह है कि प्रतिद्व द्वी को 
जिंदा बांध ले और बेबस करके गिरफ्तार कर लाये। 

एक यह खास बात भी थी कि बांक वाला अपने कौशल को यथासंभव 
गुप्त रदता, उसका रंग-ढंग और तौर-तरीक़ा किसी बात से न पहचाना जाता 
कि वह योद्धा है। बंकेत आम शिष्ट और सभ्य जनों का-सा तौर-तरीक़ा अश्रपनातै, 
जूतियां पहनते, कोई हथिवार न बांधते यहां तक कि उनमें लोहे के कलमतराश या 
सूई तक पास रखने की क़सम थी। सिर्फ़ एक रुमाल रखते श्रौर उसके एक कोने 
में एक लोहे का छलल्‍ला बंधा रहता । बस यही अस्त्र ज़रूरत के वक्‍त उन्हें काम 
दे जाता या उससे भी ज़्यादा तहज़ीब बरतते तो हाथ में तस्थीह रखते ओर 
उसमें लोहे का भट्दा-सा क़िब्लानुमा (दिग्दशक यंत्र) लगा होता । बस यही 
हथियार उनके लिए काफ़ी था । 

हिंदुओं में प्राचीन काल से यह कला ख़ास ब्राह्मणों में प्रचलित थी । 
राजपूत नहीं जानते थे, न ब्राह्मण उन्हें सिखाते थे और न वे उसे अपनी शान 


]8 गुज़िहता लखनऊ 


के खिलाफ़ समभकर उसे सोखने की कोशिश करते थे । इसका कारण शायद 
यह था कि बंकत होने के लिए समाज में श्रेष्ठता का होना आवश्यक था और 
राजपूत खुले सिपाही थे । ब्राह्मण बंकेत दिग्दशंक यंत्र या लोहे के चने के 
बजाये एक कुंजी रखते जो जनेऊ में बंधी रहती थी श्रौर उससे काम लेकर 
बड़ी शिष्टता और गंभीरता के साथ दुश्मन का काम तमाम कर देते थे । 
शहज़ादा मिर्जा हुमायूं क़द्र बहादुर फ़रमाते हैं कि लखनऊ में यह कला शाह 
झालम के शासन-काल में उस समय आयी जब मिर्जा खुरंम बख्त बहादुर 
बनारस आ्राये और इस कला के दो-एक उस्ताद अपने साथ लाये । लेकिन हमें 
विश्वस्त सूत्र से और फ़ज़ाबाद के इतिहास के पढ़ने से मालूम हुआ कि इस 
कला के माहिर मंसूर अली खां बंकत शुजाउट्टौला ही के जमाने में फैज़ाबाद में 
भ्रा गये थे । 

नवाब आसफ़उद्दला के _शासन-काल में वांक के उस्ताद लखनऊ में शेख 
नज्मउद्दीन थे । उसी के आसपास के जमाने में बांक के एक दूसरे उस्ताद 
लखनऊ में मौजूद थे जो मीर वहादुर अली के नाम से मशहूर थे। उनका 
दावा था कि पलंग के नीचे जंगली कबूतर छोड़ दीजिये ग्रौर तमाशा देखिये-- 
किसी तरफ से निकल कर उड़ जाये तो जानिये कि मैं बंकत नहीं । यह बात 
इन्हीं तक सीमित नहीं, बांक की यही विशेषता है श्रौर हर उस्ताद इसका दावा कर 
सकता था | लखनऊ में एक तीसरे उस्ताद वली मुहम्मद खां थे । नसीरउद्दीन 
हैदर के जमाने में शेख नज्मउद्दीन के शागिदं के शागिदं ग्रब्बास का नाम 
मशहूर था और उनके चार शागिदं नामवर हुए जिनमें से एक तो डाक्‌ था, 
बाक़ी तीन सभ्य लोग थे । इस कला के आखिरी उस्ताद मीर जाफ़र अली थे 
जो लखनऊ की तबाही के बाद वाजिद अली शाह के साथ मटिया बुजं में 
पहुंचे । उन्हें मैंने देखा था श्रौर बचपन में खुद उनका शागिद हुआ था, मगर 
दो-एक महीने सीख कर छोड़ दिया और जो कुछ सीखा था ख्वाव-छुयाल- 
सा रह गया । ग्रव नहीं जानता कि कोई जाननेवाला बाक़ी है या नहीं । 

4-बिननौट ह 

इस कला का मूल उद्देश्य यह था कि प्रतिद्व ढ्वी के हाथ से तलवार, लठ 
या कोई हथियार हो गिरा दे और एक रूमाल से जिसमें पैसा बंधा हुआ करता 
है या अपने हाथ ही से प्रतिद्व द्वी को ऐसा धक्‍का पहुंचायें कि उसका काम 
तमाम हो जाये । इस कला के बारे में लखनऊ में शुरू ही से मशहूर था कि 


गुजिशाता लखनऊ ]9 


इसके बडे-बड़ जबरदस्त उस्ताद हैदराबाद दक्‍्खन में हैं । वहां जाने और मालूम 
करने से पता चला कि वास्तव में श्रब॒ तक यह कला जीवित है। जानकार 
लोगों का कहना है कि खड़े होकर मुक़ाबिला करनेवाला कलाकार अगर निहत्था 
है तो कुश्ती है, उसके हाथ में छुरी है तो वांक है और अगर कोई दो गज़ का 
लंबा सोंटा या रूमाल उसके हाथ में है तो विननौट है। बिन्‍न्नौट वाले भी 
ग्रपती कला को छिपाकर रखते है और झापस में यह तय है कि सिर्फ़ शरीफ़ 
को सिखायेंगे और उससे वचन ले लेते हैं कि कभी जबरदस्त या निरीह व्यक्ति 
पर इसका इस्तेमाल न करेंगे । बिन्नौटवालों के पैतरे, जिन्हें वे पावले कहते हैं, 
बहुत ही उच्च कोटि का फुर्तीलापन और सफ़ाई चाहते हैं जो ज़्यादा उम्रवालों 
को हासिल नहीं हो सकते । इसके अलावा बिननोटवालों को मानव शरीर के 
सारे रग-पटठों की पूरी जानकारी होती है और वे भली भांति जानते हैं कि 
किस जगह सिर्फ़ उंगली से दबा देना से या एक मामूली चोट इंसान को बेदम कर 
देगी । हालांकि इस कला के लिए हैदराबाद मशहर था मगर लखनऊ में इसके 
उस्ताद मौजूद थे । कहा जाता है कि यहां सवसे पहले मुहम्मद इब्राहीम खां 
इसे रामपुर से लाये थे | तालिब शेर खां यहां एक बड़े ज़बरदस्त बांके थे और 
तलवार के धनी । उन्होंने जो इन्नाहीम खां का दावा सुना तों तलवार की 
लड़ाई के लिए तैयार हो गये । मुहम्मद इब्नाहीम खां ने भी यह चुनौती स्वीकार 
कर ली । तालिब शेर खां ने जैसे ही तलवार मारी, मुहम्मद इब्राहीम खां ने 
अपना रूमाल, जिसके कोने में पैसा बंधा हुआ था, कुछ ऐसी खूबी से मारा कि 
तालिब शेर खां के हाथ से तलवार छूटकर भनन्‍न से दूर जा निरी । वह मुंह देख- 
कर रह गये और सबने मुहम्मद इब्नाहीम खां का उत्तादी का लोहा मान 
लिया । 

उसके बाद लखनऊ में ग्रंत तक इस कला का रिवाज रहा । यहां तक कि 
मटिया बुजं में भी मुहम्मद मेहदी नाम के एक शख्स, जो नवाब माशूक्र महल 
के यहां दरोगा थे, बिननौट के ज़बरदस्त उस्ताद माने जाते थे । 

5-कुछ्तो 

यह कला मुख्य रूप से आार्यो की थी--हिंदुस्तान में भी और ईरान में 
भी । अरब और तुर्क इससे बिल्कुल अपरिचित थे । हिंदुस्तान के पुराने बाशिदों 
में भी, जो झ्रायं लोगों से पहले थे, इस कला का कोई पता नहीं चलता । लख- 
नऊ में पेंचों और प्रतिद्व द्वी को परास्त करने के तरीकों का बड़ा विकास हुग्ना 


20 गुजिह्ता लखनऊ 


मगर कुश्ती का असली दारोमदार शारीरिक शक्ति पर है और जहां तक शक्ति 
का संबंध है लखनऊ की आबोहवा को कुदरत ने यह गुण ही नहीं दिया कि 
उसमें गुलाम वगेरा जैसे भीमकाय पहलवान हों । इसलिए लखनऊ की कुश्ती 
की कला केवल दाव-पेंच दिखाना मात्र था जिसमें ज़्यादा से ज़्यादा अपने से 
दुगुने पर काबू किया जा सकता था। मगर उससे अ्रधिक ताकतवाले को गिराना 
नामुमकिन था । लखनऊ के अखाड़ और पहले के पहलवानों के क़िस्से बहुत 
मशहूर हैं मगर सब हैं दाव-पेंच ही के कारण, ताकत के कारण नहीं । एक 
बार मैंने यहां के एक मशहूर पहलवान सयद की लडाई एक दूने कद के पंजाबी 
पहलवान से देखी । इसमें शक नहीं कि संयद की लड़ाई शुरू से ही बहुत अच्छी 
थी । उसकी चलत-फिरत और उसकी फुर्ती काबिले-तारीफ़ थी । लेकिन नतीजा 
यह हुआ कि घंटा भर में संयद पसीने में डूबा हुआ था, ताकत जवाब दे चुकी 
थी और दम फूल गया था और पंजाबी पहलवान पर, जो उसे खिला रहा था, 
कुछ असर न हुझ्ना था । भ्राख़िर सेयद खुद ही मेंदान छोड कर भाग गया और 
बिना लड़ हार मान ली । 
6-बर्छा 

युद्ध की यह एक पुरानी कला है जो भ्रार्यो, तुर्कों और अरबों में थी । 
ग्ररबों का बर्छा लंबा होता और उसका फल नुकीला । तुर्को का बर्छा छोटा 
होता और फल नोकदार यानी शंकु के आकार का । और हिंदुस्तान के आर्यों 
का बर्छा लंबा होता, मगर उसका फल पतला और पान जेसा घारदार | मगर 
ताज्जुब यह है कि तीनों तरह के भाले लखनऊ में मौजूद थे । बड़े बछें पांच 
गज़ के लंबे होते और छोटे बछ तीन गज़ लंबे । बड़े बछ की शर्त यह थी कि 
उसमें लचक नाम की भी न हो और उसी लिहाज से दोनों के चलाने के तरीके 
भी भिन्‍न थे । लखनऊ के मशहूर श्औौर श्रसली वछेत मीर कल्‍लू थे जिनका नाम 
बुरहान-उल-मुल्क के ही जमाने से चमक गया था । उनके वाद मीर अकबर 
ग्रली वछेत मशहूर हुए । फिर बरेली और रामपुर स काफी बरछेत ग्राने शुरू 
हो गये । ग़ाज़ीउद्दीन हेदर के जमाने में बादशाह को हाथियों के शिकार का 
शौक़ हुआ तो बछ की कला जानने वालों की बड़ी क़द्र हुई और लड़ाइयों में 
यही हथियार ज्यादा काम देने लगा । अफ़सोस, यह पुराना हथियार जिससे 
बड़ी-बडी प्राचीन जातियों ने नामवरी पेदा की थी, लखनऊ में ग्रमली या नक़ली 
तौर पर ञ्राज भी बाक़ी है लेकिन सिर्फ़ बरातों के जुलूस का काम देता है । 


गुज़िशता लखनऊ 2 


7-बाना 

यह कला भी निरले वर्ग के लोगों में प्रचलित थी और किसी हृ॒द तक 
ग्राज भी बाक़ी है । लट॒ठ की लड़ाई के हाथ और ज़दें इसी से निकली हैं । 
बाने का उद्देश्य भी यह है कि बाना या लट्ठ चलाता हुआ इंसान दुश्मनों के 
घरे में सं निकल जाये | बाना एक लंबी लकड़ी का नाम था जिसके एक तरफ 
लट्ट होता था और कुछ लोग दोनों तरफ लट्‌टू रखते थे और इस तरह हिलाते 
कि कोई क़रीब न ञ्रा सकता । बाज़ लोग लट््‌टुओों में कपड़ा बांधकर और तेल 
में डबोकर उन्हें जलाते और इस तरह हिलात कि अपने ऊपर झ्ाग का जरा 
ग्रसर न हो और दुश्मन आग की वजह से दूर ही दूर रहे । 

8-ती रंदाज्ञी 

यह संसार की सभी लड़ाकू जातियों का पुराना हथियार और प्राचीन 
काल की बंदूक है। इसमें बड़े-बड़े कमाल दिखाये जाते और उच्च या निम्न 
वर्ग के सभी लोग इसे सीखना जरूरी समभते थे । यही वह हथियार है जिससे 
राजा रामचंद्रजी और उनके भाई लक्ष्मणजी ने रावण और उसके ज॑से भी म- 
काय शात्रुओं को मारकर गिरा दिया । अगर्चे बंदूक के आविष्कार ने इसका 
जोर कम कर दिया था, मगर फिर भी युद्ध-कौशल की दृष्टि से इसका मह व 
बहुत था । कमानें इतनी कड़ी रखी जातीं कि उनका चिल्ला खेंचना हरेक के 
लिए आसान न था । बल्कि जिसकी कमान जितना ज्यादा कड़ी 
होती उसका तीर उतना ही ज्यादा दूर जाता औ्लौर पैना होता। ग्रब्बों 
ने ग्रपपी विजयों के समय तीरंदाजी के ऐसे-ऐसे कमाल दिखाये हैं जो 
विस्मयकारी हैं। उम्मेलब्बान नामक दस-पांच रोज़ ही की ब्याही हुई 
एक अरब दुलहन ने दमिश्क की विजय के ग्रवसर पर अपने शहीद दुलहे का 
बदला लेने के लिए ऐसे जबरदस्त तीर बरसाये कि पहले ने दुश्मन के ध्वजा 
वाहक को मार गिराया और दूसरा दुश्मनों के बहादुर सरदार टामस की आंख 
में ऐसा जाकर लगा कि किसी के निकाले न निकल सका और गत में गांसी 
काटकर आंख ही में छोड़ दी गयी । 

अवध के पांसी और भर इस कला को पहले से खूब जानते थे । फिर नये- 
नये उस्ताद दिल्‍ली से आये और ग्रासफ़ठ्हौला के शासन-काल में उस्ताद 
फंज बख्श ने बादशाह के इशारे से मिर्जा हैदर के वालिद को, जो हाथी 
पर सवार आरा रहे थे, ऐसी फुर्ती से तीर मारा कि न किसी ने उन्हें 


]22 गुज़िदता लखनऊ 


निशानेबाजी करते देखा और न उन्हें खबर हुई । हालांकि तीर पटके को तोड- 
कर निकल गया था लेकिन वह ग्राखिर तक बेखबर रहे । घर पहुंचकर पटका 
खोला तो वह खून से लथपथ था और साथ ही घाव से खून का फब्वारा छूटा 
ग्रौर दम भर में मर गये । 

इस कला के सिखाने का ढंग भी कठिन था। मगर अब इस कला का 
रिवाज दुनिया की सारी सभ्य जातियों से उठ गया है इसलिए कि आधुनिक 
ग्राग बरसानेवाले हथियारों ने इसे बिल्कुल बेकार बना दिया है। लेकिन फिर 
भी हिंदुस्तान की असम्य जातियों में यह शेष है जो शिकार आदि और कभी- 
कभी आपसी लड़ाइयों में भी तीर-कमान से काम लेती हैं । 

9--कटार 

यह पुराना हथियार खासकर आये जाति का था शऔश्लौर बाद में 
इससे ज़्यादातर चोर और डाक काम लेते थे । इससे प्रतिद्व द्वी 
पर टोककर हमला नहीं किया जाता था बल्कि उसे बेखबर रख कर उस पर 
ग्राक्रमण किया जाता था। इसी वजह से शायद दिल्‍ली में भी गश्रौर खास तौर 
से लखनऊ में शरीफ़ लोगों ने इससे काम लेना बिल्कुल छोड़ दिया था। 
कटार सब बांधते मगर उससे लड़ना और हमला करना कोई न जानता था । 
इससे हमला करने की परिभाषा यह थी कि जब चाहें तो हमला करें मगर 
दुश्मन के जिस्म में कहीं खराश भी न आये और जब चाहें तो क़ब्जे तक पार 
हो जाये । इससे चोर अक्सर रातों को सोते हुए प्रतिद्व द्वी पर हमला करते 
और छिपकर उसका काम तमाम कर आते । 

]0-जलबांक 

यह वही बांक की कला थी जिसका हम ऊपर वर्णन कर आये हैं और 
जिसे बाद में तराकी से मिला दिया गया था। इसका उद्देश्य यह था कि गहरे 
पानी में दुश्मन पर क़ाबू हासिल करें ओर उसे बांध लायीं या पानी में ही 
उसका काम तमाम कर दें | इतिहास में और कहीं इसका उल्लेख नहीं, मगर 
लखनऊ में तरने के एक उस्ताद मीरक जान ने इसे ईजाद किया और संकड़ों 
शागिरदों को सिखाया। वैसे देखने में तो इसका श्राविष्कार लखनऊ ही में हुग्रा 
ग्रौर आज भी तंराकी के कुछ करतब यहीं के उस्ताद जानते हैं, श्नौर कहीं 
इस कला का नाम-निदान तक नहीं । 

पैराइयों में लखनऊ ने जो तरक्की की उसका ज़िक्र हम आगे करेंगे। 


[ 6 ] 


उदू' में एक कहावत मशहूर है कि “बुढ़ापे में इंसान की कामवासना 
जीभ में आ जाया करती है।” वंसे भी बहादुरों और शूरवीरों की शरता के 
बारे में ग्रक्सर यह तजुर्बा हुआ है कि जब कमजोरी आ्राती है, या हाथ पैरों 
की ताक़त जवाब दे देती है तो सारी बहादुरी और सूरमाई हाथों से निकल 
कर ज़बान और,आंखों में जमा हो जाती है। ग्रब वे अपनी वीरता और 
नामवरी के क़िस्से सुनाते और बहादुरो के कारनामे अपने श्राप नहीं दिखाते 
बल्कि उनका तमाशा लड़नेवाले जानवरों के माध्यम से देखते और दूसरों को 
दिखा-दिखा कर वाहवाही प्राप्त करते हैं । 

यही हाल लखनऊ का हुआ । जब लोगों को युद्ध से फुसंत मिली और 
रणभूमि में खड़ होने का साहस उनमें न रहा तो उनकी युद्ध भावना ने 
जानवरों को लड़ा-लडाकर बहादुरी और खून बहाने का तमाशा देखने का 
शौक़ पंदा किया । यह शौक़ वैसे तो थोड़ा-बहुत सब जगह है, मगर इसमें 
जितनी अधिक दिलचस्पी लखनऊवार्लों ने ली श्रौर उन बेकार और क्र्रता- 
पूर्ण रुचियों को उन लोगों ने जितनी तरक़क़ी दी वह दूसरे स्थान के लोगों 
ने सपने में भी न देखा होगा । और अगर गौर से देखिये तो यह मानना 
पड़ेगा कि इस शौक़ के ज॑से करिद्में श्रौर दिलकश तमादे लखनऊ के इदं-गिर्दे 
देखे गये, वे दिल्‍ली या हिंदुस्तान के दरबार तो कया शायद सारी दुनिया के 
किसी शहर में भी न देखे गये होंगे । 

लखनऊ में दूसरे की वीरता से अपने दिल की भड़ास निकालने का यह 
शौक़ तीन तरीक़ों से पूरा किया गया: (क) दर्रिदों और चौपायों को 
लड़ाकर, (ख) पक्षियों को लड़ाकर, और (ग) तुक्कलें और कनकौवे लड़ाकर 
यानी पतंगबाज़ी के जरिये | इन तीनों तरीकों को हम अपनी जानकारी के 
प्रनुसार अलग-श्रलग विवरण के साथ बताना चाहते हैं । 

पहली क़िस्म यानी दरिदों और चौपायों की लड़ाई का तमाशा यहां 
नीचे लिखे जानवरों को लड़ाकर देखा गया: () शेर, (2) चीते, (3) 
तेंदुए, (4) हाथी, (5) ऊंट, (6) गेडे, (7) वारहसिघे, और (8) मेंढे | पशुझ्रों 
के लड़ाने का शौक़ प्राचोन भारत में कहीं या कभी नहीं सुना गया था । यह 


24 गुज़िह्ता लखनऊ 


रुचि वास्तव में रोमियों की थी जहां इंसान और जानवर कभी आपस में 
और कभी एक दूसरे से लड़ाये जाते थे । मसीही घर की उन्नति के साथ ही 
वहां भी यह शोक़ खत्म हो गया था। मगर अ्रब तक स्पेन में और यूरोप के 
कुछ दूसरे देशों में वहशी सांड आपस में और कभी-कभी इंसानों से लड़ाये 
जाते हैं। लखनऊ में ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह को संभवत: उनके योरुपियन 
दोस्तों ने दरिदों की लडाई देखने का शौक़ दिलाया । बादशाह फौरन तंयार 
हो गये और कुछ ही दिन में शाही दिलचस्पी उन खौफ़नाक और बबंर 
लडाइयों में ऐसी बढ़ी कि कोई कसर नहीं उठा रखी गयी । मोती महल में 
ठीक दरिया के किनारे दो नयी कोठियां मुबारक मंजिल और शाह मंजिल 
बनवायी गयीं । उनके सामने दरिया पार कोसों तक एक रमणीय उद्यान 
चला गया था जिसमें लोहे के कट॒हरे से घेरकर एक विद्ञाल चरागाह बनायी 
गयी थी । इसमें भांति-भांति के हज़ारों -जानवर लाकर छोड़े गये थे और 
दरिदे कटहरों में बंद करके रखे गये थे | इसी चरागाह के साथ दरिया 
किनारे ही जंगली जानवरों के लड़ाने के लिए बड़े-बड़े मंदान बांस के ठाठरों 
या लोहे के अ्रहाते से सुरक्षित बनाये जाते जो शाह मंजिल के ठीक सामने 
दरिया के उस पार होते । दरिया का पाट वहां बहुत कम है | बादशाह प्रौर 
उनके मेहमान और मुसाहिब शाह मंजिल के ऊपरी ग्रांगन पर गंगा-जमनी 


' शामियानों के साये में बंठकर इत्मीनान और आराम से सर देखते और पार 


छल 


' के घिरे हुए मेंदान में दरिदों की भयंकर लड़ाई का रोमांचकारी दृश्य 


उपस्थित होता । दरिदों और मस्त हाथियों का लड़ाना तो झ्ासान है मगर 
उसकी संभाल बहुत ही मुश्किल । एक मस्त हाथी या शेर कटहरे से छूट 
जाता है तो शहरों में भगदड़ पड़ जाती है और बहुत-सी जानें नष्ट हो जाती 
हैं । मगर यहां लोग इस भयानक काम में इतने होशियार हो गये थे कि उस 
समय जो योरुपियन पर्यटक दरबार में मौजूद थे, खुद श्रपनी किताबों में यह 
स्वीकार करते हैं कि जंगली जानवरों के पालने, साधने और उनकी देखभाल 
करनेवाले आदमी लखनऊ से बेहतर दुनिया भर में कहीं नहीं हैं । यही लोग 
हाथियों ञ्रौर दरिदों को लाकर छोडते, उनको अपने बस में रखते, उनके 
हारते वक्‍त विजेता और पराजित दोनों पशुओं को अपने क़ाबू में करते थे । 
इस काम के लिए संकड़ों सांटेमार और वल्लमधारी नियुक्त थे जो उन्हें मारते 
और अपने आपको उनके हमलों से बचाते । लोहे की दहकती हुई सलाखों और 


गुजिश्ता लखनऊ ]25 


पग्रातिशबाजियों से उनको जिधर चाहते मोडते और जहां चाहते हंका ले 
जाते । शरों और तेंदुओं को कटहरों में बंद करते । गरज़ उन लोगों की 
फुर्ती, चालाकी और चलत-फिरत श्रौर होशियारी खुद जानवरों की लड़ाई 
से ज़्यादा दिलचस्प और ग्रचरज भरी थी । इन बातों को देखकर दम भर में 
नजर झा जाता कि उन बड़े-बड़े भीमकाय पशुश्रों और भयंकर हिख्र जंतुओं 
पर मानव ने किन ज़रियों से वश किया है । अब इन जानवरों में से हरेक 
की लड़ाई का अलग-श्रलग हाल सुनिये जो दिलचस्पी से खाली नहीं होगा । 
--शेर 

बादशाह ने बहुत से शेर जमा कर रखे थे जो नेपाल की तराई से पकड़- 
पकड़ कर लाये जाते । इनमे से कुछ बहुत बड़ थे। कुछ विभिन्‍न लड़ाइयों में 
जीतकर बादशाह के प्रेम-पात्र हो गये थे। लड़ाई के लिए उनके कटटहरे 
मेंदान के पास लाकर खोल दिये जाते । दोनों प्रतिद्ठ दी छटते ही ग्रुर्राकर 
एक-दूसरे पर हमला करते और दांतों ग्रौर पंजों से एक-दूसरे को घायल 
करते हुए झ्रापस में गुंथ जाते ! कभी यह उसको गिराकर ऊपर चढ़ बेठता, 
कभी वह इसको दबा लेता । देर तक एक भयानक लड़ाई होती रहती जिसमें 
कभी तो एक प्रतिद्व द्वी मारा जाता और कभी सख्त जख्मी होकर हिम्मत 
हार बंठता । बहुत अधिक खूत बह जाने के कारण कमज़ोर होकर भागता 
ओर प्रतिद्व द्वी गुस्से से उसका पोछा करता । उस समय उन दोनों के संभालने 
और काबू में लाने के लिए लड़ाने वालों का कमाल और उनकी दौड-घधृप 
ग्और कारस्तानियां देखने योग्य होतीं । 

शेर ग्रक्सर तेंदुओं से लडाये जाते । मगर यहां ऐमे-ऐसे जबरदस्त तेंदुए 
थे जिनसे शेर बहुत कम ही जीत पाता । उनकी लड़ाई की शान भी वही 
होती जो शेरों के आपस में लड़ाने की है। कभी-कभी शेर और हाथी भी 
लड़ा दिये जाते । मगर उनकी लड़ाई जोड़ की न होती और उसके नतीजे 
भी ग्राशा के विपरीत अलग-प्रलग प्रकार के होते | अगर हाथी खूब जियाला 
हुआ तो शेर उससे बहुत कम मुृक़़ाबिला कर सकता था। सबसे अधिक 
दिलचस्प लड़ाई शेर और गेडे की होती । गेंडे का सिवाय पेट के सारा 
निचला शरीर फ़ौलादी होता है। इस पर न शेर के दांत अग्रसर करते है न 
पंजे । इसी स्वाभाविक शक्ति के घमंड में वह किसी जबरदस्त से जबरदस्त 
प्रतिद्द ह्वी की परवाह नहीं करता और खुद जब सर भुकाकर प्रतिद्व द्वी के पेट 


26 गुज़िदता लखनऊ 


के नीचे घुसता है तो अपने बांसे के ऊपर वाला भयानक सींग पेट में इस तरह 
गाड़ देता है कि ग्ंतें बाहर निकल पड़ती हैं श्रौर प्रतिद् ढ्दी का काम तमाम 
हो जाता है । शायद ही कभी ऐसा हुआ कि शोर ने गैडे को चित गिराकर 
अ्रपने नाखुनों और दांतों से उसका पेट फाड़ डाला हो, वर्ना अक्सर यही होता 
कि गेंडा अपना सींग भोंककर शेर को मार डालता । 

मगर सबसे ज़्यादा ग्राइचयंजनक यह बात है कि बादशाह नसीरउद्दौन 
हैदर के जमाने में एक बार एक घोड़े के मुक़ाबिले में शेरों को बरहुत नुक़सान 
उठाना पड़ा । यह एक अजीब घोड़ा था जो इसानों को त्रास देने में दरिदों 
से भी बढ़ गया था। मजाल न थी कि कोई ग्रादमी उसके पास जाये। 
दाना दूर से उसकी तरफ बढ़ा दिया जाता और जब छुट जाता, बहुत से 
ग्रादमियों को मार डालता, जो सामने ग्राता उसे मार कर हडिडयां-पसलियां 
चबा डालता और लाश ऐसी बिगाड़ देता कि पहचानी न जाती । मजबूरन 
यह सुभाव रखा गया कि उस पर शेर छोड़ दिये जायें। चुनांचे भूरिया 
नामक शेर, जो बादशाह को बहुत प्रिय था और अक्सर बाज़ियां मार चुका 
था, उस पर छोड़ा गया । घोड़ा बजाये इसके कि शेर से डरता उससे लड़ने 
को तैयार हो गया और जैसे ही शेर छलांग लगाकर उस पर आ्राया, घोड़े ने इस 
तरह अगला जिस्म भुकाया कि शेर पीछे को गिरा और शेर ने उसके पुट॒ठों में 
नाखुनों के रूंजर गड़ा दिये । साथ ही घोड़े ने इस जोर से दुलत्ती मारी कि 
शेर कलाबाज़ियां खाता हुआ दूर जा गिरा। मगर वह फिर संभला और 
चंद मिनट इधर-उधर लगाकर फिर छलांग मारकर घोड़े पर जा रहा। घोड़े 
ने फिर वही हरकत की कि अगला जिस्म भुका दिया । शेर पुठठों पर जा 
पड़ा और इरादा किया कि उसे पंजों से गिराकर मार डाले। मगर घोड़े ने श्रब 
की इस जोर से दुलत्ती भाड़ी की शेर के जबड़े टूट गये और चारों खाने 
चित दूर जा गिरा । लेकिन इस चोट से शेर ने ऐसी हिम्मत हार दी थी 
कि घोड़े की तरफ पीठ फेर कर भागने लगा और तमाशाई हैरान रह गये । 
तब दूसरा उससे बड़ा शेर छोड़ा गया । उसने सामना ही न किया | मजबूरन 
वह शेर भी हटा लिया गया और तीन अरने भेसे छोड़े गये । वे भी घोड़े से न 
बोले और घोड़े ने बढ़कर बिना छेड़े ही एक भैसे पर इस जोर से दुलत्ती भाडी 
कि वह भेंसा तिवरा गया और उसके दोनों साथी इस तरह सिर हिलाने लगे 
मानो उसकी प्रशंसा कर रहे हों कि हां ! यह हुई ! आखिरकार घोड़े को 


गुजिश्ता लखनऊ 27 


छोड़ दिया गया और नसीरउद्गीन टैदर ने कहा, “मैं इसके लिए एक लोहे का 
कटहरा बनवा दूंगा प्लौर उसके पालन-पोषण का भी सामान कर दूंगा। 
ग्रब्बाजान के सर की क़सम, यह बड़ा बहादुर है ।' 
2-चोता 
सभी दररिंदे लड़ाई के लिए दो-एक दिन पहले से भूखे रखे जाते हैं, मगर 
चीते के बारे में इसका खास ख्याल रखना पड़ता है इसलिए कि चीता 
जितना ज़्यादा ज़ालिम और खंख्वार है उतना ही कभी-कभी डरपोक भी 
साबित होता है । बिगड़े भग्रमी रजादों की तरह वह खुशामदपसंद माना जाता 
है। चुनांचे मंदान में जब उसका जी चाहे लड़ता है श्रौर जब न जी चाहे 
लाख जतन करो नहीं लड़ता । लड़ाई में वह कतराता और कनियाता हुग्ना 
प्रतिद्द ढ्दी पर हमला करता है । पहले छलांग मारकर एक दूसरे को जख्मी 
करना चाहता है । ऐसी दो-एक छलांगों के बाद दोनों पिछले पैरों पर खड़े 
होकर पंजों से लड़ने लगते हैं । यह एक बड़ी खूरेज लड़ाई होती है जिसमें दोनों 
गुरति जाते हैं और प्रतिद्द ढ्वी पर पंजे मारते जाते है। अंत में जबरदस्त 
कमज़ोर को गिरा कर चपतें मार-मारकर दुश्मन का काम तमाम कर देता 
है। मगर खुद भी सर से पांव तक जख्मी हो जाता है । 
3-तेंदुश्ना 
तेंदुआ छोटे आकार का शेर होता है, मगर कहा जाता है कि लखनऊ 
में शेरों से श्रक्सर लड़ने वाले तेंदुए थै जो भयानक लड़ाई लड़ते और अक्सर 
शेरों को हरा देते । तेंदुए की लड़ाई बिल्कुल शेरों की सी होती है। लड़ते- 
लड़ते दोनों प्रतिद्व द्वी सख्त घायल हो जाते हैं और पराजित प्रतिद्व ढ्वी कभी 
तो वहीं मंदान में गिर कर मर जाता है और क भी दुश्मन से हारकर भाग 
खड़ा होता है । 
4-हाथी 
लखनऊ में हाथियों की लड़ाई बहुत पसंद की जाती थी और बहुत ही 
दिलचस्प समझी जाती थी । यह शौक़ इतना बढ़ा हुआ था कि बादशाह 
नसी रउद्दीन हैदर के ज़माने में डेढ़ सो लड़ाई के हाथी थे जिनका सवारी 
के लिए उपयोग नहीं होता था । हाथियों की लड़ाई के लिए शर्त यह 
है कि वे मस्त हो गये हों इसलिए कि हाथी जब तक मस्त न हों, नहीं 
लड़ते और लड़े भी तो उनमें जीतने और अपने दुश्मन को हराने का 


28 गुज़िइता लखनऊ 


सच्चा और जोशगुस्सा नहीं होता । 

लड़ाई के वक़्त उनकी गर्दन से दुम तक एक रसस्‍्सा बंधा होता है । 
प्रतिद्द ढी का सामना होते ही दोनों अ्रपनी-अपनी संडें श्रौर पूछें उठाकर जोर 
से चिंघाड़ते हुए एक-दूसरे पर भरपट पड़ते हैं श्रौर बड़ी जबरदस्त टक्कर 
होती है । उसके बाद बराबर टक्‍करों पर टक्‍करें होती रहती हैं जिनकी 
ग्रावाज़ वड़ी दूर तक जाती है। फिर दोनों एक-दूसरे से मुंह मिलाकर और 
दांतों को अड़ा कर एक-दूसरे को रेलना और ढकेलना शुरू करते हैं जिसमें 
उनके शरीर के चक्कर खाने से अंदाज़ा होता है कि कैसा जोर लगा रहे हैं । 
फीलवान अंकुश मार-मारकर जोर लगाने पर उन्हें और ज्यादा उभारते 
रहते हैं। ग्राखिर दोनों में से एक हाथी कमज़ोर पड़ता है और रेले की चोट 
सहन न करके ज़मीन पर गिरता है । विजयी हाथी उस समय दांत से उसका 
पेट फाड़ डालता है और उसका काम तमाम कर देता है। लेकिन अक्सर 
हाथियों का स्वभाव है कि कमज़ोर पड़ते ही दांत छुड़ा कर भागते हैं और 
जोतनेवाला पीछा करता है । पा गया तो टक्करें मार कर गिराता श्र 
ग्रक्सर दांतों से पेट फाड कर मार डालता है और ञ्रगर वह निकल गया तो 
जान बच जाती है । 

लखनऊ में हाथियों से श्रक्सर गेडे भी लड़ाये जाते थे लेकिन मुश्किल यह थी 
कि दोनों जानवर श्रापस में लड़ते ही न थे और झगर कभी लड़ गये तो बेशक सख्त 
लड़ाई होती । अ्रगर कभी हाथी ने गडे को ढकेल कर उलट दिया तो उसके 
दांत पेट में गड़कर उसका काम तमाम कर देते । और अगर गेड़े ने मौक़ा 
पाकर ग्रपना ऊपरी सींग हाथी के पेट में उतार दिया तो खाल दूर तक फट 
जाती । मगर हाथी सूंड की मदद से गेडे के सींग को अपने शरीर में ज्यादा 
दूर तक न घुसने देता और भारी ज़रूम से बच जाता था । 

5--ऊंट 

यों तो दुनिया में हर प्राणी लड़ सकता है, लेकिन लड़ाई के लिए ऊंट से 
ज्यादा नामुनासिब जानवर कोई दूसरा नहीं हो सकता । मगर लखनऊ में 
ऊंट भी मस्त और जोशीले बनाकर लड़ाये जाते । ऊंट की पकड़ मशहूर है 
और उसका एकदम गिरना उसके लिए बहुत ही भयानक है। ऊंटों का जोश 
कफ़ निकालने श्रौर काग उड़ाने से जाहिर होता है। वे कफ़ उड़ाते हुए 
दौड़ते हैं औ्लौर गालियां देने, एक दूसरे के मुंह पर थूकने यानी बलबलाने और 


गुजिशता लखनऊ 29 


भाग उड़ाने से लडाई शुरू होती हैं । जिसे मौक़ा मिल गया प्रतिद्वंद्वी का 
लटक हुआ होंठ दांतों से पकड़ लेता हैं और खेंचना शुरू कर देता है । 
जिस ऊंट का होंठ दुश्मन के दांतों में आरा गया वह अक्सर गिर पडता हैं भौर 
हार जाता है श्लौर इसी पर लड़ाई खत्म हो जाती है । 
6-गेंडा 

गेंडे से ज्यादा मजबूत जानवर कोई नहीं पैदा किया गया। वह क्रद में 
देर झौर हाथी से छोटा है मगर ऐसा फ़ोलादी बदन है कि न उस पर हाथी 
के दांत का रगर होते हैं, न शेर के पंजे और नाखून। सिर्फ पेट की खाल 
नम होती है। प्रगर कोई जानवर उस पर हमला कर सका तो मार लेता 
है, वर्ना हर जानवर श्रपनी ताकत लगाते-लगाते थक जाता है और अ्रंत में 
गेडा भ्रपना बांसे पर का जबरदस्त सींग उसके पेट में भोंक-भोंक कर मार 
डालता है। 

लखनऊ में गेंडे, हाथियों से, शेरों से, तेंदुओ्ों से और खुद गेंडों से लडाये जाते 
थे। ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह के जमाने में लड़ाने के अलावा कुछ गेंडे इस 
खूबी से सधाये गये थे कि गाड़ी में जोते जाते श्रौर हाथी की तरह उनकी पीठ 
पर होदा कसकर सवारी ली जाती । गेडा स्वभाव से लड़ने वाला जानवर 
नहीं है बल्कि जहां तक मुमकिन होता है लडाई से बचता है। लेकिन हां, 
श्रगर उसे छेड़ा जाये तो मुकाबिले के लिए त॑यार होकर बहुत ही घातक बन 
जाता है। नसीरउद्दीन हैदर के ज़माने में लड़ाई के पंद्रह-बीस गैडे मौजूद थे 
जो चांदगंज में रहा करते । जब सवार उन्हें रगेद कर एक-दूसरे के सामने 
कर देते तो वे सिर कुका कर एक-दूसरे की ओर दोड़ते और टककरे होने 
लगती । दोनों की यह कोशिश होती कि प्रतिद्वंद्वी के पेट को अपने सींग से 
फाड़ डालें श्र इसी कोशिश में वे देर तक एक-दूसरे को रेलते-पेलते और 
ढकेलते रहते, बड़े ज़ोर-जौर से गुर्राते, सींग को सींग से टकराते और झ्राखिर 
में लड़ते-लडते सिर जोड़कर गुंथ जाते और प्रतिद्वंद्वी को ढकेलते रहते । यहां 
तक कि जो प्रतिद्वंद्वी कमज़ोर पड़ता वह आहिस्ता-आहिस्ता हटने और जगह 
छोड़ने लगता है और इस पर भी जान नहीं छूटती तो भागता है । मगर जो 
जीत रहा होता है वह रगेद-रगेद कर मारता है । ग्राखिरकार कमजोर प्रपना 
सींग भ्रलग करके मुकाबिले से मुंह मोड़ता और बड़े जोर से भागता है | श्रगर 
मेदान घिरा हुआ है तो विजेता प्रतिद्वंद्वी भागते मे उस पर हमला कर-कर के उसे 


30 गुजिश्ता लखनऊ 


गिराता और पेट में सींग भोंक कर काम तमाम कर देता है और झगर मंदान 
विशाल और खुला हुम्ना है और हारा हुआ गेंडा भाग सका तो भाग कर 
अपनी जान बचा लेता है। उस समय सवार रगेद-रगेदकर और और गरम 
सलाखों से मार-मार कर विजेता को पराजित के पीछा करने से रोकते और 
हटा ले जाते हैं। गेंडों की लड़ाई का सारा दारोमदार इस पर है कि वह सिर 
भुकाए और गपने पेट को बचाए रहें । भ्रगर धोखे में भी किसी का सिर उठ 
गया तो दूसरा प्रतिद्वंद्वी अपना काम कर गुजरता है। चुनांचे एक गेंडा विजयी 
हुआ और उसका प्रतिद्वंद्वी भागने लगा। उसे भागते देखकर विजेता ने सिर 
ऊंचा कर दिया और साथ ही उसी पराजित गेडे ने बिजली की तरह दौड़कर 
उसके पेट में सिर डाल दिया प्रौर पेट फाड़ डाला। 
7-बारहासिघा 

यह एक छोटा, नाजुक और खूबसूरत जानवर है श्लोर शायद लखनऊ के 
सिवा श्रौर किसी जगह यह मनोरंजन के लिए लड़ाया न गया होगा । मगर 
इसकी लड़ाई बड़ी खूबसूरत होती है। हिरन से शाइर अपनी प्रेमिका से 
उपमा देते हैं इसलिए इसकी लड़ाई में भी माशूक्रों की-सी अ्रदाएं जाहिर होती 
हैं। मुक़ाबिले के वक्‍त पहले बड़ी खूबसूरती के साथ दोनों प्रतिद्वंद्वी पेंतरे 
बदलते रहते हैं और आखिर टक्‍करें होने लगती है जिनमें सींगों से वे तलवार 
का भी काम लेते हैं और ढाल का भी । अंत में देर तक की टक्‍्करों के बाद 
दोनों के सींग आपस में इस तरह उलभ जाते है कि मालूम होता है कि तिफली 
पड़ गयी । ञ्रब एक-दूसरे को रेलते श्रोर ढकेलते रहते हैं । इसी रेला-पेली में 
एक कमज़ोर पड़ जाता है ओर उस पर हार का ऐसा आतंक छा जाता है कि 
उसके नाजुक पांव थरथराने लगते हैं और सारे तन-बदन में कंपकंपी भ्रा 
जाती है। मगर प्रतिद्वंद्वी उस पर तरस खाने के बजाये ज़ोर से झ्राकर श्रौर 
ढकेलता है और ढकेलता हुआ मेंदान के आखिर में यानी ठाठर तक पहुंचा 
देता है। ग्रब पराजित निराश हो जाता जाता है, आंखों से मोटे-मोटे आंसू 
और सींगों से खून की बूंदें टपकने लगती हैं और वह सींग छुडांकर लड़ाई से 
मुंह फेर लेता है। उस समय प्रतिद्वंद्वी सींगों से उसके जिस्म को जख्मी करना 
शुरू करता है और पराजित बारहसिघा जोर से भागता है। जिस फुर्ती से वह 
भागता है उसी तेजी से विजेता प्रतिद्वंद्वी उसका पीछा करता है। यह दौड़ 
देखने योग्य होती है । दोनों हवा से बातें करने लगते हैं श्रोर उन पर निगाह 


गुजिश्ता लखनऊ 3] 


नहीं ठहरती है । मगर निर्देयी शत्रु पराजित बारहसिंघे का पीछा करना नहीं 
छोड़ता, जहां पाता है जख्मी करता है । आ्राखिर जरूमों से चूर करते-करते 
मार डालता है और मरने के बाद उसकी लाश को सींगों से मंकोड़ कर हटता 
ग्रौर अपनी जीत पर गवं करता है । 
8-मेंढा 

यह बहुत ही गरीब और निरीह पशु है, मगर इसकी टक्कर बड़ी ज़बर- 
दस्त होती है। मालूम होता है कि जैसे दो पहाड़ लड़ गये। चुनांचे इन्हीं 
टक्करों का तमाशा देखने के लिए लोग इन्हें लड़ाते हैं और श्राज ही नहीं 
पुराने जमाने से इनकी लड़ाई देखी जाती रही है। इनके लड़ाने का प्रारंभ 
हिंदुस्तान में बलूची लोगों से हुआ और उन्हीं से दूसरे स्थानों में शौक़ पैदा 
हुआ । मगर लडाई के लिए उनके पालने ग्रौर तंयार करने का काम अक्सर 
कसाइयों और निचले वर्ग के लोगों के सुपुर्दं रहा । श्रमीर और सामंत उन्हें 
सामने बुलवाकर लड़ाई का तमाशा देख लिया करते थे। सुना जाता है कि 
नवाब ग्रासफ़उद्दीला और सम्रादत अली खां को मेंढों की लड़ाई देखने का 
बडा शौक था । ग़ाजीउद्दीन हैदर और नसीरउद्दीन हैदर के सामने भी ग्रक्सर 
मेंढे लड़ाये गये । वाजिद अली शाह को कलकत्ते के प्रवास में भी किसी हद 
तक शौक़ था । म॒ंशी-उस्सुलतान बहादुर उनकी दिलचस्पी के लिए अक्सर 
कसाइयों के तत्वावधान में बहुत-सी जोड़ें तैयार रखते थे और मैंने कई बार 
देखा कि किसी जबरदस्त मेंढे की ऐसी टक्कर पड़ी कि दूसरे प्रतिद्वंद्वी का 
सिर फट गया । मेंढा जब हारता है श्रौर अपने प्रतिद्वंद्वी की टक्कर सहन 
नहीं कर सकता तो उसकी टक्कर खाली देकर भाग खड़ा होता है । मुझे याद है 
कि एक बार बादशाह की चरागाह देखने के लिए नियत सालाना तारीख को 
कलकत्ता के सैकड़ों अंग्रेज जमा थे । बादशाह सलामत अपनी शान के खिलाफ़ 
बूसे पर सवार निकल आये और उन मेहमानों को खुश करने के लिए हुक्म दिया 
कि मेढे लाकर लड़ाए जायें । चुनांचे उनकी टक्‍करों का हंगामा शुरू हुप्रा गौर 
उससे ज्यादा शोर योरुवियन लोगों ने हुरे और खुशी के नारे बुलंद करके 
मचाया | उस समय दशकों मे एक अ्रजीब उत्साह नजर ञ्राता था । लखनऊ में 
नवाबी शासन के पतन के बाद भी नवाब मोहसिनउद्दोला बहादुर को मेंढों की 
लड़ाई देखने का बड़ा शौक था । अब शरीफ़ों भश्रौर ग्रमीरों ने यह शुगल छोड़ 
दिया है श्रौर निचले वर्ग के लोगों में किसी हद तक बाक़ी है । 


[ 7 ] 


दरिदों को लड़ाई लखनऊ में सिर्फ सलतनत और अमीरों के दरबार तक 
सीमित थी, इसलिए कि उनकी देखभाल, तंयारी, लड़ाई के वक्त उन्हें संभालना 
ग्रौर तानाशाइयों को उनके आधघात से बचाना ऐसी चीज़ें हैं जो ग़रीबों को 
तो छोष्टिये बड़े-बड़े अमीरों के बस से भी बाहर हैं । इसी लिए दरिदों की लड़ाई 
लखनऊ के झासपास के इलाके में उसी समय देखी गयी जब तक कि पिछला 
दरबार क्रायम था| इधर वह दरबार बरखास्त हुआ और उधर वे भयानक 
दंगल भी उजड़ गये । 

लेकिन परिदों की लड़ाई ऐसी न थी । उसका शौक हर अमी र-गरीब कर 
सकता 'वा और हर शौक़ीन मेहनत करके लड़ाई के योग्य मुर्ग या बटेर तेयार 
कर सकाता था । जो पक्षी लखनऊ में शौक़ और दिलचस्पी के साथ लड़ाये गये 
वे ये है : () मुर्गं, (2) बटेर, (3) तीतर, (4) लवे,! (5) बुलबुल, (6) 
लाल, (7) कबूतर, और (8) तोते । इनमें से हरेक खेल के श्रलग-पलग बयान 
करने को ज़रूरत है । लखनऊ की कबूतरबाज़ी और बटेरबाज़ो आमतौर पर 
मशहूर है जिस पर आजकल के पढ़े-लिखे और आधुनिक संस्कृति के समर्थक 
अक्सर हंसा करते हैं। वे यह बिल्कुल नहीं जानते कि इन शौक़ों और खेलों में 
हरेक को उन लोगों ने किस कमाल तक पहुंचाकर एक स्थायी कला का रूप 
दे दिया था लेकिन जब वे योरुप में जाकर भी वहां इस प्रकार के बेहूदा शौक़ 
देखेंगे तो कम-से-कम उन्हें अपने उन शब्दों पर शर्मिदगी जरूर होगी जो 
प्रपने देश के इन शौक़ोनों के बारे में अक्सर निस्सकोच कह बेंठते हैं । 

]-मुग्रंबाज़ो 

अग्चे हर क़िस्म और हर जाति के मुर्ग हो लड़ते हैं मगर लडाई के लिए 
खास भुंग्रे श्रसील मुर्ग है और सच यह है कि दुनिया में असील मुर्ग से ज़्यादा 
बहादुर कोई जानवर नहीं है.। मुर्ग की-सी बहादुरी दरअसल शेर में भी नहीं 
है । वह मर जाता है, मगर लड़ाई से मुंह नहीं मोड़ता । असील मुर्ग के बारे 
में यहा के अनूसंघाताओं का विचार है कि उनकी नस्ल अरब से लायी गयी है 
ग्रोर यह संभव भी प्रतीत होता है इसलिए कि ग्राजजल असील की जितनी 


॥ बटेर को जाति का एक छोटा पक्षों जो अक्सर भाड़ियों में रहता है । 


गुजिहता लखनऊ 33 


ज्यादा और ऊंची नस्‍्ले हैदराबाद दक्खिन में मौजूद हैं, कहीं नहीं हैं। और 
हिंदुस्तान में वही एक शहर है जहां श्ररब वाले सब जगहों से ज़्यादा आ्राबाद 
हैं। उत्तर भारत में मुर्गों की नसले ईरान होती हुई आयी । लखनऊ के नामी 
मुर्गंबाज़ों में से एक साहब का बयान था कि बाजी में उनका मु्ग इत्तिफ़ाक़ से 
हार गया था | दुखी और हतोत्साह होकर वह इराक चले गये। नजफ़-ए - 
अशरफ में कई महीने तक इबादत करते रहे श्रौर दिन-रात दुआ मांगते कि 
ए खुदाबंद ! अपने मासूम इमामों के सद्क में मुझे ऐसा मु दिलवा जो 
लड़ाई में किसी से न हारे । एक रात को ख्वाब में यह खुशखबरी मिली कि 
“जंगल में जाग्रो | सुबह ञ्रांख खुलत ही उन्होंने जंगल का रास्ता लिया और 
एक मुर्गी साथ लेते गये । यकायक पहाड़ के एक दरें से कुकड़ं-कं की ग्रावाज 
आयी । उन्होंने फ़ौरन करीब जाकर मुर्गी छोड़ी जिसकी ग्रावाज़ सुनते ही 
मुर्ग निकल आया और यह किसी तरकीब से उसे फौरन पकड़ लाये। 
उसकी नस्ल ऐसी थी कि फिर कभी पाली में उन्हें शमिदा न होना पड़ा । 

मुर्गों की लडाई का शौक़ यहां नबाब शुजाउद्दौता के शासन-काल से 
ग्राखिर तक बराबर रहा । नवाब ग्रासफउहोला को इसका बहुत ज्यादा शौक़ 
था। नवाब सग्रादत ग्रली खां इसके बावजूद कि बड़े सूभबूभ के मालिक 
थे मुगंबाज़ी के बेहद शौकीन थे। उनके शौक़ ने सोसाइटी पर ऐसा असर 
डाला कि लखनऊ के अमीर और दरबारी तो दूर उस ज़माने में जो योरुपियन 
यहां मौजद थे उन्हें भी यही शौक़ हो गया था। चुनांचे जनरल न्‍माटिन 
जिनकी कोठी लखनक की एक दर्शनीय इमारत और योरुपियन बच्चों की 
पाठशाला हूं, बड़े उच्च कोटि के मुर्गंबाज थे और नवाब सआादत अली खां 
उनसे बाजी बदकर मुर्ग लड़ाया करते थे । 

लखनऊ में मुर्गों की लड़ाई का यह तरीक़ा था कि मुर्गे के कांटे बांध दिये 
जाते ताकि उनसे नुक्सान न पहुंच सके । चोंच चाक से छीलकर तेज और 
नुकीली को जाती और जोड़ के दोनों मु पाली में छोड़ दिये जाते । मुर्गबाज 
उनके पीछे-पीछे रहते । मुर्ग को दूसरे मुर्ग के मुकाबिले में छोड़ना भी एक 
कला थी जिसमें यह कोशिश रहती कि हमारा हो मुर्ग पहले चोट करने का 
मौक़ा पाये । श्रब दोनीं मुर्गे चोंचों श्रौर लातो से लड़ना शुरू करते । 
मुर्गंबाज़ अपने-अपने मुर्गे को उभारते और उत्तेजित करते और चिल्ला- 
ल्चलाकर कहते, 'हां, बेटा शाबाश है ! हा, बेटा काट | फिर यही पर !/ 


34 गुजिइ्ता लखनऊ 


मुर्ग उनकी ललकारों और बढ़ावों पर इस तरह बढ़-बढ़कर लातें और चोंचें 
मारते कि मालूम होता जैसे समभते और उनके कहने पर अभ्रमल करते हैं । जब 
लड़ते-लड़ते घायल और चर हो जाते तो दोनों पक्षों की सहमति से थोडी 
देर के लिए उठा लिये जाते। यह उठा लेना मुगंबाज़ी की शब्दावली में 
'पानी' कहलाता हू । उस वक्‍त मुगंबाज उनके जख्मी सिरों को पोंछते, उन 
पर पानी की फुहारं देते, जरूमों को अपने मुंह से चूसते और ऐसी-ऐसी 
तद्बीरें करते कि चंद मिनट के अंदर मुर्गों में फिर नया जोश पैदा हो जाता 
और ताज़ादम होकर दुबारा पाली में छोड़ जाते । इसी तरह बराबर पानी' 
होते रहते और लड़ाई का खात्मा चार-पांच रोज बाद और कभी ग्राठ-नौ रोज 
बाद होता । जब एक मुर्गे ग्रंघा हो जाता या ऐसी चोठ खा जाता कि उठने 
के काबिल न रहता या और किसी वजह से लड़ने के क़ाबिलन रहता तो 
समझा जाता कि वह हार गया । अक्सर यह होता कि मुर्ग की चोंच टट 
जाती | इस सूरत में भी जहां तक बनता मुगंबाज चोंच वांधकर लडाते । 

हेदराबाद का खेल यहां के खिलाफ़ बहुत सख्त है। वहां कांटे नहीं 
बांवे जाते बल्कि बांधने के बजाये चाकू से छीलकर बरछी की ग्ननी बना 
दिये जाते हैं ओर नतीजा यह होता है कि लड़ाई का फ़ैसला घंटे डेढ़ घंटे 
ही में हो जाता है। लखनऊ में कांटों के बांधने का तरीक़ा शायद इसलिए 
इख्तियार किया गया था कि लड़ाई लंबी हो जाये और ज़्यादा देर तक 
ग्रानंद उठाया जा सके । 

लड़ाई के मुर्गों की तैयारी में मु्गंबाज का कमाल मुर्ग की खुराक और 
देखभाल के अलावा उसके शरीर की मालिश, फूई यानी पानी की फुहार देने, चोंच 
झ्रौर कांटे बनाने या कांटे के बांधने और कोफ्त के मिटाने में नज़र ग्राता 
है। इस अंदेशे से कि जमीन पर दाना चुगने में चोंच को नुक्सान न पहुंच 
जाये, अक्सर दाना उन्हें हाथ पर खिलाया जाता है । 

यह शौक़ बाजिद अली शाह के जमाने तक जोरों पर था । मटिया बुजं 
में नबाब श्रली खां की कोठी में मुर्गों की पाली होती थी और कलकत्ता से 
कुछ अंग्रेज अपने मुर्ग लड़ाने को लाया करते थे । बादशाहों के अलावा और 
बहुत से रईसों को भी मुर्गंबाजी का शौक था । मिर्जा हैदर बह बेगम साहिबा 
के भाई नवाब सालार जंग हैदर बेग खां, मेजर स्वारिस जो नसीरउद्दीन 
हैदर के जमाने में थे ओर खुद बादशाह के मुगग से मुर्ग लड़ाते थे । ग्लाग़ा 


गुजिहता लखनऊ 435 


बुरहानउद्दीन हैदर भी मुर्गवाज़ी के शौकीन थे । उनके यहां आखिर 
ज़माने तक दो-ढ़ाई सौ मुर्ग रहते । वे बहुत सफाई औौर सुथरे ढंग से रखे 
जाते | दस-बा रह आदमी उनकी देखभाल पर तैनात थे। मियां दाराब ग्रली 
खां को बड़ा शौक़ था। नवाब घसीटा ने भी इस शौक़ को आ्राखिर तक 
निबाहा । मलीहाबाद के प्रतिष्ठित पठानों को भी बहुत शौक़ था और उनके 
पास असील मुर्गों की बहुत अच्छी नस्‍्लें सुरक्षित थीं | यहां मशहूर मुर्गबाज 
जो अपनी कला में पारंगत माने जाते थे, बहुत से थे । मीर इमदाद ग्रली, शेख 
घसीटा, मुनव्वर अली जिन्हें यह कमाल हासिल था कि मुर्ग की आवाज़ सुन- 
कर बता देते कि यह बाज़ी ले जायेगा । सफ़दर ग्लली और एक प्रथम कोटि 
के वसीकादार सयद मीरन साहब भी मशहूर थे | इस आखिरी जमाने में नीचे 
लिखे लोगों का नाम, मशहूर हुग्ना : फज्ले अ्रली जमादार, कादिर जीवन खां, 
हुसेन गली, नौरोज़ अली, नवाब मुहम्मद तक़ी खां जो यहां के एक बड़े रईस 
थे, मियां जान, दिल, छंगा, हुसेन अली बेग, एहमद हुसेन । इनमें से अब कोई 
जिंदा नहीं है ! 

यही लोग हैं जिन्होंने मुगंबाजी की कला को उसकी चरमसीमा तक पहुंचा- 
कर दिखा दिया । मगर मेरा खयाल है कि फ़िलहाल मुर्गबाजी का शौक हैदरा- 
बाद दक्खिन में बढ़ा हुआ है । वहां के बहुत से ग्रमी रों, जागी रदारों और मंसब- 
दारों को शोक है श्रौर उनके पास मुर्गों की नस्ल भी बेमिसाल है जिनकी वे 
बहुत हिफाजत करते है । 

2-ब टे रबाज्ञी 

बटेरबाज़ी का शौक़ लखनऊ में पंजाब से आया । पंजाब के कुछ कंचन 
लोग जिनकी औरत वेश्यावत्ति करती हैं, नवाब सग्रादत अली खां के शासन- 
काल में लखनऊ ग्राये और घाघस बटेर अपने साथ लाये जिनको वे लड़ाते थे। 
ग्राजफल की बाज़ नामवर रंडियां उन्हीं लोगों की नस्ल से हैं| बटेरों की दो 
क़िस्में होती हैं : एक घाघस, दूसरी चनंग । पंजाब में सिफ घाघस बटेर होता 
है । वह चनंग से ज्यादा जबरदस्त और ताक़तवर होता है । लखनऊ में घाघस 
और चनंग दोनों होते हैं। चनंग घाघस से कद में छोटा और नाजुक होता है 
मगर लड़ने में ज्यादा मजबूत और जियाला हुग्ना करता है और उसकी लड़ाई 
ज्यादा शानदार और खूबसूरत होती है। बहरहाल इस बात का पता लखनऊ 
ही में लगा कि लडाने के लिए चनंग बटेर ज़्यादा मुनासिब है । 


36 गुज़िइता लखनऊ 


बटेर की लड़ाई के लिए न किसी बड़े मंदान की ज़रूरत थी, न घर से 
बाहर निकलकर सहन तक भी आने की, बल्कि कमरे के अंदर ही साफ-सुथरे 
फर्श पर तहजीब के साथ बंठकर उसकी लड़ाई की सर देखी जा सकती है । 
इसलिए लखनऊ की सोसाइटी ने उसी को बहुत पसंद किया | बहुत ही नफ़ीस 
भ्रोर खबसूरत काबुक बटेरों के लिए बनायी गयी थीं जो हाथीदांत की नन्‍हीं- 
नन्‍्हीं मगज़ियों से सजाई जातीं ग्रौर उनमें बटेर रखे जाते । 

इसका खेल यों है कि पहले मूठ यानी पानी में भिगो-भिगोकर घंटों हाथों 
में दबाये रहने से उसकी घबराहट दूर हो जाती है, यहां तक कि वह बोलने 
भ्रौर चोंचें मारने लगता है । इसके बाद भूख देकर श्रौर दस्तावर चीजें, जिनमें 
मिस्री ख़ास है, देकर उसका जिस्म दुरुस्त किया जाता है। फिर रात गये या 
भ्राधी रात को उनके कान मे चिल्लाकर 'क्‌' कहा जाता है जिसे “कूकना' कहते 
हैं। गरज़ इन तदबीरों से चर्बी छट जाती है, भद्दापन दूर हो जाता है और 
जिस्म बहुत ही फुर्तीला और ताक़तवर हो जाता है | यही बटेर की तैयारी है 
प्रोर इन बातों में जितना पूरा हो उतना ही समभिये कि लड़ाई के लिए ज़्यादा 
मुनासित्र है । 

लड़ाई के वक्‍त फर्श पर चारों तरफ हल्का-हल्का दाना छिटका दिया जाता 
है भ्रौर बटेर काबुक से निकाले जाते हैं | पहले दोनों बटेरों की चोंचें चाक्‌ 
से बनाकर खब तेज कर दी जाती हैं, उसके बाद मुक़ाबिले के लिए छोड़ दिये 
जाते हैं। बटर की लड़ाई मुर्ग से मिलती-जुलती है। चोंच से काटता श्रौर 
पंजों से लात मारता है। चोंच से प्रतिद्वंद्वी के मुंह को ज़रूमी श्रीर उत्तू कर 
देता है मौर पंजों से बाज़ वक्‍त प्रतिद्वंद्वी का पोटा तक फाड़ देता है। लड़ाई 
पद्रंह-बीस मिनट या कभी इससे ज्यादा देर तक रहती है और पअ्रंत में हारा 
हुआ प्रतिद्वंद्वी भाग खड़ा होता है और भागने के बाद फिर वह किसी बटेर 
के सामने लड़ाई में नहीं ठहरता । 

बटर की तरक्‍क़ी के तीन दर्जे हैं और उसकी नामवरी के तोन दोर समभे 
जाते हैं। पहला तो 'नया' जो पकड़कर और पहले पहल सघाकर लड़ाया जाता 
है । ग्रगर वह बहुत-श्री लड़ाइयों में जीता श्रौर न भागा तो लड़ाई की ग्रवधि 
समाप्त होते ही मामूली पिजरों में छोड़ दिया जाता है। यह वह जमाना होता 
है जब वह पुराने पर भाड़कर नये निकाल लाता है। उसे 'कुरीज़ बिठाना' 
कहते हैं । यह जमाना खत्म होते ही दूसरे साल उसकी तरकक्‍क़ी का दूसरा दर्जा 


गुज़िदता लखनऊ 37 


ग्रौर दौर होता है ओर उसे 'नोकार' कहते हैं । फिर उसके बाद दुबारा 'कुरीज 
बैठकर जब तीसरे साल वह लड़ाई के लिए तंयार किया जाता है तो 'कुरीज 
कहलाता है और यह उसकी तरक़्क़ी का तीसरा ओर सबसे ऊंचा दौर 
होता है । 

प्रामतौर पर यह मान लिया गया है कि लड़ाई में 'नोकार' नये से और 
'कुरीज़' 'नोकार' से जबरदस्त होता है। नया वटेर 'कुरीज' से दो चोंचें भी मुश्किल 
से लड़ सकता है । ऊंचे दर्जे के बटेरबाज और शौक़ीन रईस सिफ “कुरीज़ों' को 
लड़ाते हैं और नये बटेरों का लड़ाना बिल्कुल मामूली खेल है । लड़ाई में तरह- 
तरह के जाल-फंदे भी किये जाते हैं । कुछ लोग भ्रपने बटेर के मुंह पर कभी 
कोई ऐसी कड़वी और जहरीली चीज या इत्र लगा देते हैं कि दूसरा बटर दो- 
एक चोंचें मारते ही पीछे हटने श्रौर लड़ाई से मुंह मोड़ने लगता है । और शअ्गर 
इस पर भी लडता रहा तो लड़ाई के बाद मर जाता है। कुछ लोग नशे का 
खेल खेलते हैं, यानी लड़ाई से एक घंटा पहले अपने बटेर को कोई ऐसी तेज 
नहेवाली चीज़ खिला देते हैं कि वह लड़ाई में बेसुध होकर भागना भूल जाता 
है शौर जब तक प्रतिद्वंद्वी को पाली से न भगा दे पागलों की तरह लड़ता 
रहता है । 

लखनऊ में बटेरबाजी के शौक़ ने ऐसे-ऐसे बाकमाल बटेरबाज़ पंदा कर 
दिये जिनकी कहीं मिसाल नहीं मिलती । कुछ लोगों ने यह कमाल पैदा किया 
था कि किसी के अच्छे नामी वटेर को एक नज़र देखा और किसी मामूली 
बटेर की वैसी ही सूरत बना दी और किसी मौक़े पर बातों-बातों में बदल 
लिया | खैर यह तो एक बेहूदा चोरी थी मगर कुछ उस्तादों ने यह कमाल 
हासिल किया कि भगे बटेरों को तयार करके अ्रच्छे-प्रच्छे 'कुरीज़ों से लड़ा देते 
और बाजी ले जाते । नशे के खेलवाले उस्तादों में एक साहब निहायत ऊंचे 
दर्जे की गोलियां तैयार करते जो सो रुपये की दस गोलियां बिकतीं श्जौर लोग 
शौक़ से ले जाते । 

इन लोगों की सबसे बड़ी उस्तादी बटेरों के इलाज में नज़र झ्राती है और 
ऐसे-ऐसे बीमार, गये-गुज़रे बटेरों को ठीक कर लेते हैं श्रौर इस खूबी से उनकी 
बीमारी का निदान करते और मुनासिब चीज़ें इस्तेमाल कराते हैं कि हकीम 
म,र डाक्टर अ्रचरज़ में पड़ जाते है। इसकी बहुत कोशिश की गयी कि बटेरों 
को पालकर श्रंडे से बच्चे दिलवाए जायें मगर इसमें कामयाबी न हुई । 


38 गुजिशता लखनऊ 


बटेरों के नाम भी बड़े-बड़े शानदार रखे गये जैसे, रुस्तम, सोहराब, शोह रा- 
ए-प्राफ़ाक (जगत प्रसिद्ध ) । पालियों में बड़ी बाजियां बदी जाती हैं और एक 
हजार रुपये तक की बाजी मैंने खुद देखी है। इसका शौक़ भी बाज बादशाहों 
को रहा । नसीरउद्दीन हैदर अपने सामने मेज पर बटेरों की लड़ाई देखकर 
खुश होते थे । 

पुराने बटेरबाजों में मीर बच्चू, मीर अमदू, ख्वाजा हसन, मीर फ़िदा अली, 
छंगा, मीर, आबिद और सेयद मीरन के नाम यादगार हैं । आज से चालीस 
साल पहले मटिया बुजं में मैंने दरोगा गुलाम अब्बास, छोटे खां और गुलाम 
मुहम्मद खां खालिसपुरी को, जो बुजुर्ग लोग थे, इस कला में पारंगत पाया 
था । ग़ालिब अली बेग, मिर्जा असद ग्बली बेग, नवाब मिर्जा, मियां जान, शेख 
मोमिन भ्रली और ग़ाज़ीउद्दीन खां ने भी आखिरी जमाने में बहुत नामवरी 
हासिल की थी । 

बटेरों का शिकार भी लखनऊवालों के लिए बड़ी दिलचस्पी की चीज है। 
पहले इसमें सिर्फ शौक़ीनी थी जिसकी बदौलत बहुत से बोदे और कमज़ोर 
प्रादमी जिन्होंने कमी शहर से बाहर का इलाका भी न देखा था, खेतों और 
जंगलों की हवा खा आते थे । मगर अब इसी पर बहुतों की रोटियां चलती है । 

कहते हैं कि बटेर पहाड़ों से रात को निकलते और ऊपर के वायुमंउल में 
उड़ते हुए जाते हैं। शिकार के शौक़ौन बड़ी आवाज से बोलनेवाले बटेरों को 
तेयार करते हैं जो बराबर रात भर बोलते रहते हैं। ऐसे बटेरों को 'फंदत' 
कहते हैं। किसी ग्ररहर के खेत के ग्रासपास अक्सर जाल फंला दिया जाता 
है । फंदतों की आवाज सुनकर बटेर ऊपर से उतरना और गिरना शुरू होते हैं 
ग्रौर रात भर में बहुत से जमा हो जाते हैं | सुबह होते ही वे सब तरफ से 
हंकाकर जाल की तरफ भगाये जाते हैं जिसमें फंसते ही पकड़-पकड़ कर 
फटकियों में बंद कर लिये जाते हैं | 

3-तोतरों को लड़ाई 

यह भी दिलचस्प है | तीतर दूसरे पक्षियों की अपेक्षा उचक-उचक कर 
लड़ता है मगर इसका शौक़ सिवाय देहातियों और निचले वगे के लोगों के 
झमीरों और शरीफों को कभी नहीं रहा । तीतर दोडा-दोड़ाकर तेयार किये 
जाते हैं । उनमें जोश और गुस्सा पेदा करने के लिए उनको दीमक खिलायी 
जाती है । मगर यह कोई बड़ा खेल नहीं है और न सम्य समाज में इसे 


गुजिइता लखनऊ 39 


मान्यता मिली, हां लखनऊ के निचले वर्ग के लोगों में यह बहुत आम रहा 
गऔर है । 
4-लवों को लड्डाई 

लवा छोटे किस्म का तीतर है जो बटेर से छोटा है । वह बजाये दाने के 
सदाया यानी मादा पर लड़ा करता है। उसे लड़ाना होता है तो मादा का 
पिजरा लाकर सामने रख दिया जाता है । उसका शौक़ रियासत रीवां वग्गरा 
में लोगों को छयादा था। लखनऊ में भी पसंद किया गया और एक ह॒द तक 
ग्रपनाया भी गया | लवे की लड़ाई सच यह है कि बटेर से ज़्यादा खूबसूरत 
होती है । वह कंदे खोलकर लडता और ग्‌थ जाता है और फूल की तरह 
खिल-खिलकर उठता और गिरता है । लखनऊ के चंद अ्मीरों को इसका 
शौक हो गया था। मटिया बुर्ज में वाजिद अली शाह की सरकार में एक 
बड़े उस्ताद लवे लड़ाने वाले थे जिन्होंने बहुत अ्रच्छी-ग्रच्छी जोड़ें तैयार की 
थीं और जब उन्हें सामने लाकर लड़ाते तो बड़ा लुत्फ़ आता | लवों की 
तेयारी भी ज्यादातर लोट और भूख से होती है और इसकी लड़ाई का रिवाज 
बटेर से पहले से ही था। मगर आखिर में बटेरबाज़ी का इतना रिवाज हुआा 
कि लवे का शौक़ फीका पड़ गया । इसका शिकार भी ग्रजब तरीके से होता 
है । यह भी बटेर की तरह ऊपर के वायुमंडल में उड़ता हुआ जाता है। लोग 
बटेर के फर्दतों की-सी छर पर एक घड़ा बांध देते हैं। उसके मुहगड़ पर मिल्‍ली 
मढ़कर सींक में डोरा बांधकर उस सींक की भिल्‍ली से एक बेतुकी भों-भों की 
ग्रावाज़ निकलना शुरू होती है जो लवों को ऐसी पसंद है कि उड़ते-उड़ते 
नीचे उतर पड़ते हैं और सुबह को जाल में फंसकर बटेरों ही की तरह पकड़ 
लिये जाते है । 

5-ग लदुम लड़ाना 

गुलदुम को ग्राम लोग बुलबुल कहते हैं। मगर यह गलती है। बुलबुल 
बदरुशां और ईरान का एक गायक पक्षी है और इस चिड़िया की दुम के 
नीचे एक सुर्ख फूल होता है जिसकी वजह से इसका नाम गुलदुम रखा गया 
है । इसकी लड़ाई भी देहातियों और बाजारी लोगों में ज़्यादा है। सभ्य 
समाज ने इसे कभी दिलचस्पी की नज़र से नहीं देखा मगर इसकी लड़ाई 
होती मज़ेदार है। दाने पर लड़ते हैं और लडाई में दोनों प्रतिद्वंद्वी लड़ते हुए 
ऊपर उड़ते और गुंथकर गिरते है । 


40 गुजिइहता लखनऊ 


6-लाल लड़ाना 

लाल सिफ़ पिजरों में रखकर पालने के लिए हैं, लड़ाई के लिए ठीक 
नहीं । मगर स्वार्थी मानव ने इन्हें भी लड़ाकर दो घड़ी दिल बहला लिया । 
लालों का पहले तो इतना हिलना मुश्किल होता है कि पिंजरे के बाहर निकाल 
कर छोड़े जायें और उड़ न जायें । दूसरे इन्हें इतना मस्त भी होना चाहिए 
कि दूसरे लाल से लड़ने को त॑यार हो जायें। चुनांचे उनका लड़ जाना ही 
दुश्वार होता है, मगर जब लड़ गये तो खूब गुंथ-गुंघकर झर उड़-उड़कर 
लड़ते हैं और बडी देर तक लड़ते रहते हैं। लालों की लडाई दूसरे छोटे 
परिंदों की लडाई की भ्रपेक्षा देर तक रहती है । लालों की लडाई का शौक़ 
लखनऊ वालों में बहुत कम रहा सिफ़ दो ही एक उस्ताद पँंदा हुए जिन्होंने 
लड़या वर्ना आम रुझान इसके खिलाफ़ था और इसके शौक़ीन भी ग्राम 
जनता और बाज़ारी लोग ही थे । 

7-कब्तरबाज़ो 

कबूतर उन पालतू जानवरों में है जिनका शौक़ लोगों को प्राचीन काल 
से लेकर आज तक हर देश और हर घरती पर किसी न किसी हद तक जरूर 
रहा । कबूतरों की बहुत-सी किसमें हैं जिनमें उडने वाले गिरहबाज़ और गोले 
होते हैं श्रोर जो महज़ खूबसूरती और खुशरंगी के लिहाज से पाले जाते हैं । 
इनमें शीराजी, गुली, नसावरी, गुलवे, लक़, लोटन और चूया चंदन वगैरा 
ज़्यादा मशहूर हैं। याहू कबतर रात-दिन गूंजते और 'याहू का दम भरने को 
वजह से इबादत करने वालों को ज़्यादा पसंदा थे और गअ्रक्सर फ़क़ौरों और 
देखों को इनका शौक़ था। 

सुनते हैं कि गिरहबाज़ पहले-पहल काबुल से लाये गये । पहले ग्रामतौर 
पर वही उडाये जाते थे । गोले बाद को श्राये जिनकी नस्ल अरब और ईरान 
प्रौर तुकिस्तान से आयी | गिरहबाज़ की यह शान है कि सुबह को उड़े तो 
घंटों मकान के ठीक सामने ग्रासमान पर चक्‍कर लगाते रहे इस तरह कि 
सहन के अंदर लगन में पानी भरकर रख दीजिये तो उसमें हमेशा नज़र 
श्राते रहेंगे। बाज दिन-दिन भर उडते हैं और शाम को उतरते हैं। अपने 
मकान को पहचानते और बड़े वफ़ादार होते हैं। गिरहबाज़ इतना कमाल 
रखते हैं कि खुद मेरे यहां का एक कबूतर किसी के यहां फंस गया था जिसने 
पर काट दिये । तीन साल के बाद जब उसे मौका मिला और पर निकल 


गुजिशता लखनऊ ]4] 


आये तो वापस झाया और अपने खाने में घुसकर उस कबूतर से लडने लगा 
जो अ्रब उसमें रह रहा था । 

लेकिन गिरहबाज़ की दस-बारह से ज़्यादा की टुकड़ी नहीं उड़ती । 
लोगों को सौ-सौ, दो-दो सौ कबूतरों की टुकड़ियां उड़ाने का शौक़ हुआ तो 
गोले इख्तियार किये गये । कबृतरबाजी की कला दिल्‍ली ही में इतनी तरकक़ी 
कर गयी थी कि कहते हैं श्राखिरी मुगल सम्राट बहादुरशाह की सवारी 
निकलती तो दो सो कबूतरों की टुकड़ी ऊपर हवा में सवारी के साथ उड़ती 
हुई जाती और जहांपनाह पर साया किये रहती । 

कबूतर को अपने घर से बहुत ज्यादा लगाव होता है । काबुक को ठेले पर 
रखकर ले जाते और जहां कहा जाये रोक कर उडाते और फिर काबुक पर 
बुला लेने का कमाल भी दिल्ली ही में पहले नज़र श्रा चुका था। 

लखनऊ में कबूतरबाजी शंहशाह खानदान के प्रारंभिक काल से ही शुरू हो 
गयी थी । चुनांचे नवाब शुजाउद्दोला को कबूतरों का बड़ा शौक़ था । सैयद यार 
ग्रली नामक एक दाख्स ने, जो बरेली का रहनेवाला था, अपने ग्रापको एक 
दक्ष कबृतरबाज़ की हैसियत से दरबार में पेश किया और उसकी बड़ी क्र॒द्र 
की गयी । नवाब आसफ़उहोला और समप्रादत अ्रली खां को भी शौक़ था और 
ग़ाजीउद्दीन हैदर और नसीरउद्वदीन हैदर के ज़माने में तो कबूतरबाजी यहां 
बहुत ऊंचे दर्जे पर पहुंच गयी थी। मीर अब्बास नामक यहां के एक नामी 
कबूतरबाज़ ने यह कमाल दिखाया कि जो कोई पांच रुपये नज्ज करके उनकी 
दावत करना चाहे वह कहीं रहता हो, काबुक लेकर पहुंच जाते और उसी के 
घर से कबूतर उड़ा देते । उड़ाते और सीटी पर बुला लेते । मजाल क्या कि 
कोई कबूतर किसी और जगह गिर जाये। शौक़ इस क़द्र बढ़ा हुआ था कि 
बाज अमीरों के यहां सिफ़े नौ सौ कबूतरियां एक साथ उड़तीं ग्रौर बाज़ 
रईस इतने ही या इससे ज्यादा तादाद में नर कबूतर उड़ाते । 

खोस्त (सरहदी अ्रफ़गानिस्तान) से पटेत नामक एक ख़ास रंग के कबूतर 
ग्राये थ जो बहुत क़ीमती थे । अ्रक्सर रईस हज़ारों रुपए खर्च करके उन्हीं 
को उड़ाते । 

एक बुजुर्ग! ने जिन्हें नवीनता प्रिय थी, लखनऊ में यह कमाल किया कि 
कबूतर के दो पट्‌ठों को लेकर एक का दाहिना और एक का बायां बाजू काट 
दिया और कटे हुए बाजुग्नों की जगह उन दोनों में टांके लगाकर एक दोहरिया 


42 गुजिइता लखनऊ 


कबूतर बना लिया और उसकी ऐसी देखभाल की कि वे बड़े हुए और उड़ने 
लगे । ऐसे बहुत से दोहरिया कबूतर तैयार किये गये । भ्रक्सर ऐसा होता था 
कि जब नसीरउद्दीन हैदर छत्तर मंजिल से बजरे पर सवार होकर पार जाते 
झौर कोठी 'दिल आराम' में बंठकर दरिया की सर देखते वे उस पार से भ्रपने 
इन अजीब दोहरिया कबूतरों को उड़ा देते जो पार जाकर बादशाह के करीब 
बेठ जाते। बादशाह उन्हें देखकर बहुत ख॒श होते और इनाम देते । 

मीर झ्रमान अली नामक एक बुजुर्ग ने यह कमाल पैदा किया था कि 
कबूतर को रंग कर ज॑ंसा चाहते बना देते । अक्सर जगह पर उखाड़कर दूसरे 
रंग का पर उसी के सुराख में रखकर इस तरह जमा देते कि वह असली 
परों की तरह जम जाता और बहुत-सी जगहों पर रंग से काम लेते । मगर 
ऐसा मज़बत ओर पक्का रंग कि मजाल क्‍या जो ज़रा फीका भी पड़ जाये । 
बरस भर तक रंग क़ायम रहता । मगर जब कुरीज में पर गिर जाते तो फिर 
असली रंग निकल ग्राता । उनके इन कबूतरों में से हरेक पद्रह-बीस रुपये को 
बिकता और अमीर लोग बड़े शौक़ से लेते । वह भांतिया भी बना लिया करते 
जो लाखों में एक निकलता है और रंग की भिन्‍नता और गलों की दृष्टि से 
बेमिप्ताल होता है। 

एक बड़े कबूतरबाज़ नवाब पाले थे जो गिरहबाज़ कबूतरों को गोलों की 
तरह उड़ाते | कमाल यह था कि जिस जगह और जिस मकान पर चाहते छीपी* 
के इशारे से बाज़ी करा देते यानी कब॒तर हवा में कलाबाजियां खाने लगते । 

वाजिद अली शाह ने मटिया बुजं में बहुत से नये कबूतर जमा किये थे । 
कहते है कि रेशमपरे कबूतरों का जोड़ा पच्चीस हज़ार को लिया था और 
एक किस्म के हरे कबूतरों की नस्ल वढ़ायी थी । जब उनका देहांत हुआ है तो 
तीस हज़ार से ज़्यादा कबूतर थे जिन पर संकड़ों कबूतरबाज नौकर थे और 
उनके दरोगा गुलाम ग्रब्बास कबूतरबाजी की कला मे जवाब न रखते थे । 

शौक़ीन और जानकर लोगों ने पालने के रंगीन कबूतरों में भी बेमिसाल 
तरक्की की थी | यह सिफ मशहूर नहीं है बल्कि ऐसा शीराजी जो.गज भर 
के पिजरे की लंबाई-चौडाई को भर ले और ऐसा गुली जो एक बारह बरस 
की लड़की की चूड़ी में से निकल जाये मैंने खुद अपनी आंख से 'देखे है। (यह 
जिक्र अभी खत्म नहीं हुआ बाक़ी आइंदा नंबर मे अज करूगा ।) 
व कपड़ा या बंधी छड़ी जिससे कबूतर उड़ाते है । 





[ ।6 | 


परिदों को लडा-लडाकर दिलचस्पी पंदा करना और मनोरंजन कराना 
लखनऊ के बेफ़िक्रों का बहुत ही आराम शुगल हो गया था । कबूतरों और बटेरों 
के तैयार करने और लड़ने में उन्होंने इस कदर तरकक़ी की कि अरब हिंदुस्तान 
के जिस शहर में और जहां कहीं किसी रईस को इन चीजों का शौक है (ग्रौर 
यह कमबख्त शोक़ श्रदूरदर्शी घनिकों में ज्यादा हुआ करता है) वहां उस्ताद 
लखनऊ ही से बुलाये जाते हैं और इस मद का सारा कारखाना उन्हीं की 
निगरानी मे होता है । 
तोते 

पक्षी लड़ाने के हद से गज़रे हुए शौक़ ने इसमें नवीनता पैदा करना शुरू 
की और बाज णथौक़ीनों का ख़ाल इस तरफ गया कि जो काम कबूतरों से 
लिया जाता है और किन-किन परिदों से लिया जा सकता है। चुनांचे मीर 
मुहम्मद भ्रली नामक एक बुजुर्ग ने तोतों से कबूतरों का काम लेने में खास 
कामयाबी हासिल की । 

तोता स्वभाव से ही बहुत बेवफ़ा जानवर है । जिंदगी भर रखिये और 
पालिये, लेकिन पिजरे से उडा तो फिर उधर का रुख नहीं करता। "तोता 
चढमी' नाम ही बेवफ़ाई का हो गया है। वह बोलता है, बातें करता है, 
जानवरों की बोलियां उड़ा लेता है, जो जुमले याद करा दीजिये उनकी रट 
लगाता है, मगर उड़ाने के काम का नहीं । इसलिए कि पिजरे से छटते ही 
फिर वह किसी के बस का नहीं होता । मगर मीर साहब ने खुदा जाने किस 
तदबीर से उनका स्वभाव बदल दिया था कि दस-बारह तोतों की टुकड़ी 
उडाते और मजाल क्या कि वह सीटी बजाकर “आर करें और वह आसमान 
से उतरकर सीधे पिजरे में न चले आयें । वह उन तोतों को रोज़ हुसेनाबाद 
में लाकर उड़ाते । 

पक्षियों की इन तैयारियों का हाल बयान करके हम यह कहने पर मजबूर 
हैं कि लखनऊ वालों ने जितनी मेहनत पररिद तैयार करने में की है, काश 
खुद भ्रपनी और अपने जिस्म की तंयारी में करते तो यह अंजाम हरगिज न 
होता जो हुआ । 


[44 गुजिशता लखनऊ 


पतंगबाज्ी 

कनकौवे उड़ाने का शौक़ किसी न किसी हद तक सारे हिंदुस्तान में है 
ग्रौर ग्राजकल झ्रामतौर पर लड़कों और नौजवानों का बहुत ही दिलचस्प 
खेल है । इसका इतना आम रिवाज देखकर यह खयाल होता हैँ कि यह 
हिंदुस्तान की बहुत पुरानी चीज़ होगी, मगर ऐसा नहीं हैं | यह कला एक 
सदी पहले की भी नहीं कही जा सकती श्रौर इसकी प्रगति का केंद्र भी 
लखनऊ ही रहा हूँ । 

योरुप में लड़के एक क़िस्म के कपड़े के कनकौवे उड़ाया करते हैं जिनको 
जब तक डोर पकड़ कर भागते रहो उड़ते हैं भौर इधर कदम रुका और 
उधर वे ज़मीन पर ग्रा रहे । इनके बारे में यह भी नहीं कहा जा सकता कि 
कब से हैं और कहां से लिये गये । 

सुना जाता है कि दिल्ली में शाह आलम प्रथम के शासन-काल में यह 
शोक शुरू हुआ । शुरू-शुरू में तो कुछ खास-खास लोग ही पतंग उड़ाया करते 
थे। पतंग बड़े शौक़ ग्रौर दिलचस्पी से बनाया जाता था। उसमें दो तुक्कलें 
थोड़ फ़ासले से आगे-पीछे बराबर खड़ी करके जोड़ दी जाती थीं । तुक्कलों की 
आकृति ऐसी होती थी -कि उसके तीन तरफ गोलाकार कोने निकलते । उसमें 
एक खपाच छीलकर बीच में खड़ी लगायो जाती जो ठटड्ा कहलाती और दो 
खपाचें खूव छीलकर और नम करके ऊपर-नीचे लगायी जातीं जो कांपें कह- 
लातीं । ऊपर की कांप की झाकृति घनुषाकार होती और नीचे की कांप की 
उससे उलटे आकार की । उनके दरम्यान में जगह-जगह ग्राड़ी खपच्चियां लगा 
कर जोड़ दिया जाता और चारों तरफ से भी कागज़ मढ़ कर एक खास 
ग्राकार की नुकीली क़ंदील बना दी जाती । उसके अंदर कपड़े का बना हुग्रा, 
तेल में डूबा हुआ्ना गेंद तार में बांधकर लटका दिया जाता और उसे रोशन 
करके रात को लोग मज़बूत सूती या रेशमी डोर पर उड़ाते । पतंग की शान 
यह थी कि मालूम होता एक लालटेन आसमान पर उड़ रही है और बर- 
खिलाफ़ गुब्बारे के, वह उड़ानेवाले के इख्तियार में है जब चाहे उड़ाये और 
जब चाहे उतार ले वह हवा में लटका रहता, कभी झ्रौंघधा होता तो फिर 
सीघा हो जाता । 

इसी जमाने में बाज़ लोग इसी तरह से इंसान का एक पुतला बनाकर 
उड़ाते बल्कि कुछ विश्वस्त लोगों का कहना है कि सबके पहले वह पुतला 


गुजिश्ता लखनऊ 45 


दिल्‍ली ही में ईजाद हुआ था, फिर उसी से तरक्‍कक़ी करके चंग बनाया गया 
जिसकी लंबाई-चोडाई बरावर होने की वजह से उसे उड़ाना और हवा में 
ठहराना ज्यादा भ्रासान था । इसका शौक़ ज़्यादातर हिंदुग्नों में था भौर 
क्या ताज्जुब कि यह उनकी संस्कृति या धमं से संबद्ध कोइं चीज़ हो और 
ग्राकाशदीप से ही यह निकला हो । फिर इस चंग के काटने के लिए या दिन 
को उड़ाने के खयाल से तुक्कल उड़ने लगी जो दरग्रसल श्राधा चंग या चंग की 
सिर्फ एक तरफ़ की दीवार थो। तुक्क्ल में खबी यह थी कि वह चंग की 
ग्पेक्षा प्रासाती से उड़ सकती थी | उसमें चलत-फिरत थी, आसमान पर हवा! 
में नाचती और दूर होती चली जाती थी । चंग एक जगह क़ायम रहता प्रौर 
तुक्कल इधर-उधर चलती-फिरती थी और उस पर इतना काब्‌ था कि जब 
चाहें उसकी डोर से रगड़ा देकर दूसरे के चंग को काट दें। 

तुक्कल ने दरग्रसल क़ंदील या रोशन पुतला उड़ाने का खयाल भुला दिया 
ग्और लोगों का ध्यान इस ओर ग्राकृष्ट किया कि हवा में कोई ऐसी चीज 
उडायी जाये जो ज़्यादा क़ाबू में हो इधर-उधर ग्रासमान पर दौीड़े और नाचे । 
तुक्कल का शौक़ मुसलमान अमीरों और प्रतिष्ठित हिंदुओं में बढ़ा । उस पर 
घन खर्च होने लगा, ऊचे दर्ज के तुककल का नाम पतंग मशहूर हुआ्ना जिसका 
दुड्डा मुशिदाबादी बांस का होता जिसमें अस्सी रुपये लागत आती | बीस 
रुपयै की भलभल होती, दो रुपये का काग़ज लगता और पांच रुपये बनवाई 
पड़ती । गरज़ एक सौ सात रुपये में एक पतंग तैयार होता । 

बहरहाल दिल्‍ली में तुककल ग्लरौर पतंग ही तक तरकक्‍क़ी हुई थी कि इसके 
कद्रदान दिल्‍ली के दरबार से लखनऊ चले आये ग्रौर उसके साथ ही जमाने के 
शौकीन भी यहां चने आये । अब पतग उड़ाने से पतंग लड़ाने का शौक़ निकला । 
ऐसी जोरदार तुक्कलें बनायी जाने लगी जिनको मामूली ताक़त का शभ्रादमी 
मुश्किल से संभाल सकता । आठ-आ्राठ बल की मज़बूत डोर चख्ियों पर 
चढ़ायी जाती श्रौर उन्हीं चख््रियों के ज़रिये से तुक्कलों का जोर संभाला 
जाता । लड़ाई की यह ज्ञान थी कि दो तुक्कलों की डोर एक-दूसरी में डाल 
कर दोनों तरफ से ढील दी जाती | दोनों उुक्कले चक्‍कर खाती हुई ऊपर 
चढ़तीं और बुलंद होती चली जाती । और दोनों तरफ से च्ियों पर चखियां 
खाली रहती । लखनऊ के शोक़ का इससे अंदाजा हों सकता है कि नवाब 
ग्रासफउदहौला की तुक्कल में पांच रुयग्रे की जुर्केश की कलकल होती जो लूट- 


]46 गुज़िशता लखनऊ 


कर लाता उसे पांच रुपये देकर तुक्कल ले ली जाती और न लाता तो भी 
जहां चाहता पांच रुपये को बेच लेता । 

पतंगबाजी के पुराने नामी उस्ताद लखनऊ में मीर अम्दू, रूवाजा मिट्ठन 
और शेख इमदाद थे | एक जुलाहे ने भी उन दिनों इस कला में कमाल 
हासिल किया था जिसकी वजह से अमीरों की संगति में इसकी बड़ी क्॒द्र 
होती । 

ग्रमजद अली शाह के जमाने में यकबयक गुड्डी ईजाद हुई जिसकी 
आकृति बादाम की-सी होती | वह तुक्कल की बनिस्बत आसानी से बनती । 
तुक्कल में दो कांपें और एक ठडडा होता था । ग्रुड्डी में सिर्फ़ एक ही कांप 
ग्रौर एक ही ठड्डा रह गया । वाजिद अली शाह के ज़माने में डेढ़ गुना कन- 
कौवा बन गया जिसका साइज़ मौजूदा कनकौवे का था। मगर नीचे तुक्कल 
की यादगार में कागज़ का छोटा-सा फुदंना होता। ग्रब नवाब मुहम्मद हुसेन 
खां सालारजंगी, झ्राग़ा अरब तराब खां और दो-एक शौकीन रईसों ने फुंदने की 
जगह नीचे पत्ता लगाकर वह कनकौवा बना दिया जो फ़िलहाल प्रचलन में 
है और जिसमें ग्रभी तक और किसी तरक्की की गूंजाइश नज़र नहीं ग्राती । 
फ़िलहाल सारे हिंदुस्तान में पत्तेदार कनकौवा या फुंदनेदार कनकोवा, जो 
डेढ़ कनना कहलाता है, उड़ता है मगर उसकी ईजाद लखनऊ में ही हुई है । 
यहीं से स+ जगह गया झर लोक प्रिय हुझ्ना । 

कनकौवों के लड़ाने में भी पहले तुक्कल की तरह ढील का रिवाज था। 
बडे-बडे कनकौवे बनते और सेरों डोर पीते चले जाते । शाही शासन के ग्रंत 
और अंग्रेज़ी शासन के श्रारंभ में मशहर उस्ताद विलायत अली थे जो विलायती 
कहलाते थे । इलाहीबरुश टुडे जो मटिया बु्ज में जाकर मशहूर हुए और 
लखनऊ के संकड़ों माहिर उस्ताद थे जिनके नाम मुझे इस वक्त याद नहीं आते 
मगर सच यह है कि लंबडोरे पेच के लड़ाने के बादशाह थे । 

ग्ंग्रेज़ी शासन के आरंभ में खेंच लडाने का रिवाज हुआ ॥ इसकी शुरु- 
ग्रात तो उन लड़कों से हुई जिनके पास थोड़ी-सी डोर होती और दूसरे के 
कनकौवे में पेंच डालकर अपनी छोटी डोर से उसे खेंच जाते और काट देते । 
पुराने उस्ताद उन दिनों उन लोगों को नफ़रत की निगाह से देखते और अपने 
कनकौवों को उनसे अलग रखते । मगर आखिरकार खेंच ही कनकौवेबाज़ी की 
सबसे ऊंची कला मानी जाने लगी जिसमें बड़-बड़े उस्ताद पेदा हुए और आज 


गुज़िशता लखनऊ ]47 


लखनऊ में बीसियों उस्ताद पड़े हुए हैं जो इसी शौक़ में लाखों रुपये उड़ाकर 
उस्ताद बने हैं भोर घर बिगाड़कर इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त की है कि कनकौवे के 
मंदानों में बड़े शौक़ से बुलाये जाते हैं श्रोर बड़े ग्रादर-सम्मान से उन्हें आंखों 
पर बिठाया जाता है । 


[ 9 | 


प्रब हम यह बताना चाहते हैं कि संगीत का और उसी सिलसिले में उन लोगों 
का जो इस कला से संबद्ध हैं लखनऊ में क्या स्थान रहा। 

गाना उन चीज़ों में से है जिनकी मनुष्य की प्रकृति ने सबसे पहले खोज 
की । जिन शब्दों को व्यक्त करने में, जोश जाहिर करने को जी चाहा लोग 
गाने लगे और जिन क्रिया-कलाप और हावभाव में भावना्रों ने उभारा, 
नाचना शुरू कर दिया । चूंकि सबसे ग्रधिक उत्साह और एकाग्रता आराधना 
में होती है भ्रौर सांसारिक मामलों में विवशता का सबसे अधिक असह्य 
उत्साह प्रेम-प्रणय की अ्रभिव्यक्ति में पाया जाता है इसलिए गाने का प्रारंभ 
भी श्रादिकाल में आराधना और प्रेम के ही संदर्भ में हुआ । हिंदुस्तान: में तो 
गाने का प्रारंभ निश्चित रूप से प्राराधना से ही हुग्ला इसलिए कि यहां के 
पहले गायक ब्राह्मण थे जो प्रारंभ में पूजा-पाठ करते श्रौर कराते समय अपने 
ग्राराध्य की स्तुति में भजन गाया करते । कन्हैयाजी के जन्म ने उनके प्रेम को 
पूजा में परिणत करके प्रेम-संगीत को जन्म दिया । 

मुसलमान भ्रपने साथ संगीत छाये थे। उनका संगीत सबसे पहले इब्ने 
मुसह हज ने बनाया था । उसके बा८ जब इराक़ में अब्बासी दरबार कायम 
हुआ तो भरबी और फ़ारसी संगीत से मिलकर एक नया भौर अपने में पूर्ण 
संगीत का प्राविष्कार हुआ जो सारे संसार में फल गया और वही अमत में 
ईरानी संगीत था। मुसलमान इसी कला को हिंदुस्तान में लाये और जो 
गवेये उनके साथ यहां झाये थे उन्हीं की यादगार ग्राजकल क़व्वाल हैं। उनके 
बाच्य सारंगी, सरोद, चंग, शहनाई, बरबत और रबाब हैं । 

हिंदुस्तान में हर चोज़ पर मुसलमानों ने झ्पना ग्रसर डाला। तमाम 
विद्याएं भौर कलाएं तथा संस्कृति की सभी बातों को बदल दिया मगर यहां 


48 गुज़िश्ता लखनऊ 


संगीत पर उनका बहुत कम प्रभाव पड़ा । इसका कारण यह माना जाता है 
कि खुद यहां का संगीत इतना नियमबद्ध और उच्च कोटि का था कि प्रपने 
स्थायित्व के कारण बाहर का प्रभाव ग्रहण कर ही न सका । लेकिन इसका 
वास्तविक कारण यह है कि किसी भी देश या भाषा के संगीत की भोर 
मनुष्य का ध्यान उस समय जाता है जब उस देश का निवासी बन जाये और 
वहां की भाषा और संस्कृति का रंग उस पर चढ़ जाये । लिहाज़ा यहां प्राने 
के बाद हमलावर मुसलमान जब तक अरबी या ईरानी रहे यहां के संगीत 
की शोर उन्होंने ध्यान नहीं दिया और जब उन्होंने ध्यान दिया तो उस समय 
भारतीयता उनके अंदर समा चुकी थी। वे अपने राष्ट्रीय रागों को भूल चुके 
थे झौर यहां के गीतों पर मुग्धघ थे। उस समय वे इस योग्य ही न रहे थे 
कि यहां के संगीत में किसी प्रकार का परिवतंन करते या उसकी कुछ झग्रालो- 
चना करते । 

फिर भी ईरानी क़व्वालों के गीतों ने हिंदुस्तान के संगीत पर थोड़ा 
बहुत असर डाल ही दिया। चुनांचे उनके अनेक राग भारतीय संगीत में 
शामिल हो गये | जंगूला (जंगला), जीफ़, शाहाना, दरबारी, जिला (खमाच ) 
वर्गरा के बारे में कहा जादा है कि ईरानी राग है जो यहां के संगीत में 
ग्राकर मिल गये हैं । 

भ्रमीर खुसरो ने दोनों संगीतों को सीखा और दोनों को मिलाने की बहुत 
कुछ कोशिश की । कहते है कि सितार को उन्हीं ने ईजाद किया और इसमें 
तो शक ही नहीं कि बहुत-सी घु्नें उनकी बनायी हुई हैं लेकिन इसका पता 
लगाना बहुत मुश्किल है कि अमीर खुसरो ने यहां के संगीत में कौन-कौन खास 
चीजे बढ़ायीं । 

मालूम होता है कि मुसलमानों में बादशाहों से पहले शेखों श्रौर सूर्फियों 
ने संगीत की ओर ध्यान दिया और इराक और ईरान के पुराने भक्तों में 
गीत-न॒त्य की जो गोष्ठियां भक्तिभाव की-सी पवित्रता के साथ होती थीं, वही 
हिंदुस्तान में भी होने लगीं और जो गवेये इससे पहले मंदिरों में भजन गाया 
करते थे, मुसलमान भक्तों और सूफ़ियों की संगति में बंठकर मारिफ़त की 
ग़ज़लें गाने लगे । 

बादशाहों के दरबार में भी यहां के गवंय्रे और गाने-नाचने वाली वेश्याएं 
मौजूद रहा करतीं मगर उनका बड़ा अफ़सर कोई ईरानी गायक हुआ करता 


ग्रुज़िइता लखनऊ ]49 


जो उनके संगीत पर अपना कुछ-त-कुछ असर जरूर डालता । मुहम्मद तुगलक 
के शासन-काल में दरबार का सबसे बड़ा गवेया अमीर शम्सउद्दीत तब्रेजी था 
आर संगीत-मंडली के सभी स्त्री-पुर्ष उसके अधीन थे। उन्हीं दिनों देवगढ़ 
यानी दोलताबाद के पास कलाकारों की एक पूरी बस्ती ग्राबाद थी जो 
तरबाबाद कहलाती थी । उसके चौपड़ के बाज़ार के बीचों-बीच एक बु्ज था 
जिसमें रोज़ तोसरे पहर के समय संगीत-मंडली का चौघरी ग्राकर बंठता 
और उसके सामने तमाम गवंयों और रंडियों के सम्‌ृह बारी-बारी आकर 
गाते । उसमें से ज़्यादातर मुसलमान थे और रोजे-नमाज़ के पाबंद । उसो 
बस्ती में जगह-जगह मस्जिदें थीं जिनमें रमजान के मुबारक महीने में 
तरावीह! पढ़ी जाती। बड़े-बड़े राजा यहां आकर गाना सुनते। कई 
मुसलमान बादशाहों ने भी यहां श्राकर गाना सुना था। संगीत-मंडली के 
नायक और चोधरी चूंकि आमतौर पर मुसलमान थे इसलिए जाहिर 
है कि अरबी और ईरानी और हिंदुस्तानी संगीत किस हद तक मिल-जुल 
गये होंगे । 

हिंदू संगीत के केंद्र उत्तर भारत में मथुरा, अयोध्या ग्रोर बनारस थे 
जहां धाभिक तत्व के प्रबल होने के कारण संगीत की कला सदा परवान 
चढ़ती रही । जोनपुर के शर्क़ी सुल्तानों में से सुल्तान हुसेन शर्क़ी को संगीत 
से बहुत प्रेम था । वह खुद एक बड़ा गवेया माना जाता था और चूंकि अयोध्या 
ग्रोर बनारस दोनों उसी के राज्य में थे इसलिए निश्चिय ही उसने हिंदुस्तान 
की इस कला को बड़ा फ़ायदा पहुंचाया होगा। ु 

ग्रकबर ने इस कला को इतना प्रोत्साहन दिया कि उसके समय का सबसे 
बड़ा नामवर गवंया तानसेन उसके नौ रत्नों में शामिल हुआ । एक मुसलमान 
शहंशाह की यह दिलचस्पी और शोक देखकर वह खुद और उसका बेटा 
बिलास खास मुसलमान हो गया । उस खानदान में दरबार के प्रोत्साहन के 
कारण भारतीय संगीत का रोज़ बरोज़ विकास होता गया । बाद के दरबारों 
में भी इसी नस्ल के गवेयों का मान होता रहा । चुनांचे आजकल इस खान- 
दान के गवंये अपने आपको मुगल दरबार ही में शामिल समभते हैं। आम- 
तौर परं यह समभा जाता है कि इसी नस्ल के जरिये से हिंदुओं की यह 

4 रमजान के महीने में रात की नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़ 
जिसमें कुरान पढ़ा जाता है | 


50 गुज़िहता लखनऊ 


कला मुसलमानों में ग्रायी । मगर पीछे हम जो वर्णन कर प्राये हैं उससे साफ 
जाहिर है कि इस खानदान से बहुत पहले मुसलमानों ने इस भारतीय कला 
को सीख लिया था | चुनांचे प्राय: हिंदुस्तानी संगीत के सभी प्रवीण गायक 
मुसलमान हैं । 

दिल्‍ली में इस कला पर सबसे पहली किताब “शम्स-उल प्रसवात' 
शाहजहां के शासन काल में लिखी गयी थी जो प्रब कहीं नहीं मिलती । फिर 
प्रकबर द्वितीय के समय में मिर्जा खान नामक एक बुजूर्ग ने पंडितों भौर 
संस्कृत के विद्वानों की सहायता से (तुहफ़ा-तुल-हिद' नामक पुस्तक लिखों 
जिसकी दो-एक प्रतियां ही कुछ लोगों के पास रह गयीं हैं। इसमें बहुत-सी 
भारतीय कलाओं का ब्यौरा एकत्र किया है जहां ज्योतिष, सरोधा, सामुद्रिक, 
कोक शास्त्र, नायिका भेद, इंद्रजाल, भादि विभिन्‍न विद्याओ्रों पर बहस की गयी 
है वहां भारतीय संगीत के बारे में जानकारी दी है । 

दिल्‍ली में बस इतनी ही प्रगति हो पायी थी कि यह रोचक कला लखनऊ 
के दरबार में पहुंच गयी और नवाब शुजाउद्दोला की गुणग्राहिता श्रौर उदारता 
के कारण सारे हिंदुस्तान के संगीतकार झाकर शभ्रवघ में जमा हो गये । यहां 
अयोध्या और बनारस के संगीत के पुराने सकल क़रायम ही थे | जौनपुर के 
शर्को बादशाहों की क़द्रदानी की कुछ-न-कुछ यादगारें भी बाकी थीं उनमें जब 
दिल्‍ली के माहिर गवंये और यासीन खां के अधिकृत स्कूल के संगीताचाय॑ भी 
ग्राकर मिल गये तो खास शान पैदा हो गयी और संगीत का दर ग्रसल एक 
नया दोर शुरू हो गया । 

शुजाउद्दोला के संबंध में 'तारीख-ए-फ़ेजाबाद' के लेखक का कहना है कि 
उन्हें नाच-गाने का बड़ा शोक़ था | हज़ारों गानेवाली रंडियां भागमतोर से 
दिल्‍ली से और ग्रन्य दूरस्थ प्रदेशों से यहां भ्राकर जमा हो गयी थीं । भाम 
रिवाज पड़ गया था कि प्रधान मंत्री के अलावा झौर तमाम भ्रमीर प्रोर फ़ौजी 
सरदार भी किसी तरफ कूच करते तो नृत्यगान मंडलियां श्रोर रंडियों के डेरे 
उनके साथ-साथ जाते थे । 

इसका नतीजा यह था कि नवाब ग्रासफ़ठद्दौला बहादुर के शासन-काल में. 
फ़ारसी भाषा में 'उसूल-उल-नरमात-उल-भ्रासफ़िया' नामक पुस्तक लिखी गयी। 
भारत की संगीत-कला पर इससे बेहतर कोई किताब श्राज तक नहीं लिखों 
यी । ग्रगर्च इस किताब की भी बहुत ही कम प्रतियां मिलती हैं, मेरे पास 


गुजिश्ता लखनऊ ]5] 


मौजूद है भोर मैंने उसे पढ़ा है। इसके लेखक की दृष्टि प्रौढ़ है और वह एक 
विद्वान हैं, यह भी मालूम होता है कि उन्हें अरबी, फ़ारसी प्रौर संस्कृत तीनों 
भाषाओं पर पूरा अधिकार है। उन्होंने इस बात की बड़ी कामयाब कोशिश 
की है कि भारत की संगीत कला को बड़े स्पष्ट ढंग से हरेक व्यक्ति के सामने 
प्रस्तुत कर दिया जाये ग्रसद उल्लाह खां 'कौकब', जिनका कुछ ही दिन हुए 
देहांत हुआ है, संगीत के घुरंधर पंडित थे और कलकत्ता में भारतीय संगीत 
के प्रोफेसर मशहूर थे | वे इस पुस्तिका के बारे में मुझे एक खत में लिखते 
हैं संगीत की यह फ़ारसी पुस्तक मेरे पास मोजूद है । यह पुस्तिका उन अधि- 
कृत ग्रंथों को, जो शास्त्र का आदिम स्रोत हैं, आधार बनाकर और बडे शोध 
के साथ लिखी गयी है ।' (भश्रफतोस यह लाजवाब किताब आज तक नहीं छपी 
ग्रौर यह इतनी दुलभं है कि भ्रगर यह न छपी तो नष्ट हो जायेगी | अगर कोई 
रईस इस ओर ध्यान दें तो देश और अपने प्राचीन इतिहास पर बड़ा उपकार 
होगा ।) 

इस पुस्तिका से साफ़ जाहिर है कि आासफ़उद्दोला के शासन-काल में संगीत 
का कितना विकास हो चुका था। इसका लेखक एक बड़ा अनुसंधाता मालूम 
होता है जिसने इबनेसीना की चिकित्सा-विषयक पुस्तक से लेकर और फ़ारसी 
संगीत-नियम भी स्पष्ट रूप से बता दिये हैं । 'दिलगुदाज' के इस लेख को पूरा 
करने के लिए हमने स्व० प्रोफ़ेसर 'कौकब' से मदद मांगी थी, उन्होंने जवाब 
में हमें जो कुछ लिखा उसे हम हबह प्रकाशित किये देते हैं। उससे अच्छी 
तरह मालूम हो जायेगा कि लखनऊ में ग्राने के बाद संगीत-कला की क्‍या 
स्थिति रही । अ्रफ़सोस भ्रव वह इस दुनियां में नहीं हैं वरना हमें उनसे बहुत 
ज्यादा मदद मिलती, विशेषकर इसलिए कि अपनी नयी किताब जो संगीत- 
कला से संबंधित है वह हमारे यहां छपवाना चाहते थे । आसफ़उठद्दौला के समय 
में हुई संगीत की प्रगति को मानते हुए वह लिखते है : 

नवाब सआदत ग्रली खां के जमाने में संगीत पर श्रोस पड़ गयी । गाजी- 
उद्दीन हेदर के ज़माने में इस कला का एक बहुत बड़ा आचाय लखनऊ में 
मोजूद था जिसका नाम हैदरी था । यह साहब चुंकि खोये-खोये रहते थे इस- 
लिए इनका नाम 'सिड़े हैदरी खां मशहर हो गया था और वह गोलागंज में 
रहते थे । ग़ाजीउद्दोन हैदर को उनका गाना सुनने का बड़ा शौक़ था मगर 
कभी इसका मौक़ा नहों मिला था । एक रोज़ तीसरे पहर को ग़ाज़ीउद्दीन हैदर 


852 गुजिदता लखनऊ 


हवादार पर सवार दरिया किनारे तफरीह को निकले । रोमी दरवाज़े के नीचे 
लोगों ने देखा कि सिड़े हैदरी खां चले जा रहे हैं । बादशाह से शभज् की कि 
“कबला-ए-भालम ! हैदरी खां यही हैं।” बादशाह तो उत्सुक थे ही, हुक्म 
दिया, “बुलाओो ।”” लोग पकड़ लाये ओर सामने खड़ा कर दिया। बादशाह 
ने कहा, “भरे मियां हैदरी खां, कभी हमें भ्पना गाना नहीं सुनाते ?” बोले, 
“जी हां, क्‍यों न सुनाऊंगा । मगर मुझे ग्रापका मकान नहीं मालूम है ।' बाद- 
शाह यह सुनकर हंस पड़े और कहा, “ग्रच्छा हमारे साथ चलो, हम खुद तुम्हें 
ग्पने मकान पर ले चलेंगे ।'” “बहुत खूब ! ” कहकर बेतकल्लुफ साथ हो लिये। 
छत्तर मंज़िल के क़रीब पहुंचे थे कि हैदरी खां हत्थे पर से उखड़॒ गये श्रौर 
बोले, “मैं चलता तो हूं मगर पूरियां और बालाई खिलवाइयेगा, तो गाऊंगा । 
बादशाह ने वायदा किया और महल में बंठकर गाना सुनने लगे । थोड़ी ही 
देर बा बहुत झ्ानंदित हुए | उनको हाल आने लगा और वे बेसुध हो 
गये / यह हालत देखकर हैदरी खां खामोश हो गये । बादशाह ने फिर गाने 
को कहा तो बोले, “हजूर, यह तंबाकू जो आपके पेचवान में भरा हुझा है बहुत 
ही भ्रच्छा मालूम होता है । श्राप किसकी दुकान से मंगवाते हैं ? ” गाज़ीउद्दीन 
हैदर खुद भी सिड़ी मशहूर थे । इस सवाल पर नाराज़ हुए तो मुसाहिबों ने 
प्रज्॑ की, “क़िब्ला-ए-आलम, यह सिड़ी तो है ही । अभी तक यही नहीं समभा 
है कि किससे बातें कर रहा है 

अब लोग बादशाह के कहने पर हैदरी खां को दूसरे कमरे में ले गये । 
पूरियां बालाई खिलवायीं । हुक्का पिलवाया । श्रापने पाव भर पूरियां, आध- 
पाव बालाई और एक पैसे की शकर मंगवाकर अपनी बीबी को भिजवायीं 
(जो उनका हर जगह का नियम था) | जब तक उन कामों में रहे बादशाह 
ने शराब के जाम पिये और जब नशे का जोर हुआ तो फिर हैदरी खां की 
याद हुई । फ़ौरन बुलवाकर गाने का हुक्म दिया । मगर जंसे ही उन्होंने भ्रपना 
गाना शुरू किया, रोककर कहा, “हैदरी खां सुनते हो ? और अगर मुझे खाली 
खुश किया और रुलाया नहीं तो याद रखो कि गोमती में डुबवा दूंगा।” श्रब 
तो हैदरी खां की अक्ल चक्कर में आयी समभे कि यह बादशाह हैं। कहा, 
“हुजूर अल्लाह मालिक है !” और जी तोड़कर गाने लगे । खुदा की कुदरत, 
या यह कहिये कि हैदरी खां की जिदगी थी कि थोड़ी ही देर में बादशाह पर 
प्रसर हुआ और वे रोने लगे और खुश होकर कहा, “हैदरी खां, मांग क्‍या 


गुज़िदता लखनऊ 853 


मांगता है ? ' भ्रज्ध॑ किया, “जो मांगूंगा दीजियेगा ? ” बादशाह ने वायदा किया 
भौर हैदरी खां ने तीन बार हामी भरवाकर कहा, “हुजूर, यह मांगता हूं कि 
मुझे फिर कभी न बुलवाइयेगा, और न गाना सुनियेगा ।” बादशाह ने ताज्जुब 
से पूछा, “क्यों ?” अ्रज़ किया, “भ्रापका क्‍या है ? मुझे मरवा डालियेगा । फिर 
मुमसा हैदरी खां न पैदा होगा, और आप मर जायेंगे तो फ़ौरन दूसरा बादशाह 
हो जायेगा ।” इस जवाब पर गाजीउद्दीन हैदर ने नाराज होकर मुंह फेर लिया । 
यह मोौक़ा पाते- ही हैदरी खां श्रपनी जान लेकर भागे और अपने घर भाये । 

'गरज़ ग़ाजीउद्दीन हैदर के ज़माने में एक जबरदस्त संगीताचायं लखनऊ 
में था । नसीरउद्दीन हैदर के ज़माने में यों तो हज़ारों गानेवाले थे मगर उस 
पाये का गवेया कोई न था। मुहम्मद भ्रली बादशाह भौर प्रमजद शअ्ंली शाह 
का जमाना बुजुर्गी का ज़माना था इसलिए कि मुहम्मद अश्रली शाह तो बुढ़ापे 
के कारण बेतनाशून्य-से हो गये थे भोर भ्रमजद अली शाह बिना अपने पिता 
से पूछे कोई काम नहीं करते थे। लिहाज़ा उनके जमाने में शहर के बाज 
होक़ोन रईस अगर नृत्य-संगीत के रसिया थे भी तो छिप-छिपाकर गाना सुनते । 
इसलिए भब इस कला को जो प्रोत्साहन मिला वह वाजिद अली शाह की युवा- 
वस्था के समय. मिला जबकि लखनऊ की विलासिता अपनी चरम सीमा पर 
थी पझ्लोर बुभनेवाला चिराग आखिरी बार भड़ककर जला था। 

धगच हम नसीरउद्दीन हैदर शौर उसके परवर्ती शासकों के समय के 
संगीत के बारे में कुछ ओर भी लिखना चाहते हैं, मगर उससे पहले मुनासिब 
मालूम होता है कि अ्रसदउल्लाह खां 'कौकब' के खत का बाक़ी हिस्सा भी 
पाठकों को सुना दें जिससे लखनऊ के संगीत पर एक श्रधिकारी संगीतज्ञ की 
राय मालूम हो जायेगी । 

वे लिखते हैं, 'वाजिद भली शाह के शासन-काल में लखनऊ में संगीता- 
चार्यों का बहुत बड़ा गिरोह जमा हो गया था, लेकिन दरबार से रसूख रखने- 
वाले भोर ऐसे गवये जिन्हें खिताब मिले हुए थे संगीत-कला में पारंगत नहीं 
थे । सिर्फ एक कुतबउद्दौला रामपुर के रहनेवाले भ्रलबत्ता सितार खूब बजाते 
थे झ्ौर भ्रपनी कला में प्रवीण थे। भ्रनीसउद्दौोला, मुसाहबउहोला और रजी- 
उद्ौला अगयचें गवेये थे, मगर ऐसे बाकमाल न थे, हां शाही कृपापात्र होने से 
उनका नाम हो गया था । जो लोग संगीत के श्राचाय॑ थे वे थे--प्यारे खां, 
जाफ़र खां, हेदर खां, शोर बासित खां | ये सब लोग मियां तानसेन के खान- 


854 गुजिल्ता लखनऊ 


दान की यादगार थे । इस खानदान के दो नामी शख्स भ्राजकल भी मौजूद हैं, 
एक वजीर खां जो रियासत रामपुर में हैं, दूसरे मुहम्मद भली खां जो रियासत 
परसंडा में नोकर हैं । मुहम्मद भझली खां के वालिद बासित खां थे जिनका नाम 
ऊपर आ चुका है । 

इस मौक़ पर स्व० कौकब खां फ़रमाते हैं कि, “मेरे वालिद नेमतउल्लाह 
खां ने बासित.खां ही से संगीत की शिक्षा ली थी। नेमतउल्लाह खां लगभग 
ग्यारह साल तक मटिया बुर्ज में वाजिद भली शाह के साथ रहे । फिर उसके 
बाद तीस बरस तक नेपाल के दरबार में रहे ।” 

इसके बाद लिखते हैं, वाजिद अली शाह के जमाने में संगीत को बड़ा 
प्रश्रय मिला । लेकिन संगीतशास्त्र भपने प्रतिष्ठित स्थान से गिरकर छोटी चीज़ों 
पर आ गया था । लखनऊ में कदरपिया ने ठमरियां लिख-लिखकर जनता में 
फलाई और संगीत की घारा को पध्ववरुद्ध कर दिया । चुनांचे भ्रधिकतर संगीत- 
प्रेमी उच्च कोटि की राग-रागिनियों को छोड़कर कदरपिया की ठुमरियां पसंद 
करने लगे । संगीत के स्तर में भ्रवनति मुहम्मद शाह रंगीले के समय से ही 
शुरू हो गयी थी | अब मियां सारंग ने 'खयाल” की रचना की जिससे संगीत- 
कला का स्तर घटिया हो गया । मगर इससे उतना नुक्सान नहीं हुआ जितना 
कदरपिया की ठुमरियों से हुआ । झब तो क्‍या जन-साधारण और कया सामंत 
सभी की यह हालत थी कि अच्छा संगीत ग्रगर सुनते भी थे तो दिलचस्पी 
आर शौक़ से नहीं, बल्कि उसे नापसंद करते थे । 

'वाजिद अभ्रली शाह के मुसाहिब गवंयों में से श्रनीसउद्दोला और मुसाहिब- 
उद्दौला ने प्यारे खां से संगीत की शिक्षा ली थी जो बहुत बड़ा संगीताचाय॑ था 
ग्रौर जो कुछ उसने इन दोनों शिष्यों को बताया, वह निश्चय ही बहुत उच्च 
कोटि का था । लेकिन इसका क्‍या इलाज कि दरबार में ऐसे संगीत को कोई 
पूछता ही न था। क़सरबाग में जो “रहस” होता था और जिसमें वाजिद ग्रली 
दाह खुद कन्हैया बनते थे, बहुत ही निम्न कोटि का संगीत होता था । लेकिन 
इसमें शक़ नहीं कि लगाव न होने पर भी कलाकारों का छ्वाही दरबार में बड़ा 
ग्रादर सम्मान होता था जिसकी असली वजह यह थी कि वाजिद अली शाह ने 
भी बासित खां से संगीत की शिक्षा ली थी और वे उसके पूरे ममंज्ञ थे । श्रपनी 
प्रखर बुद्धि के कारण बादशाह ने अपने ही ढंग से नयी रागिनियां बनायीं जिनके 
नाम अपनी रुचि के अनुकूल जोगी, कन्नड (दयाम) जूही, शाहपसंद वगरा 


गुज़िइता लखनऊ 55 


रखे । वाजिद ग्रली शाह इस कला के आचाय॑े माने जाते थे। लेकिन संगीत- 
ममंज्ञ होने के साथ ही वे इस दोष से न बच सके कि उनकी निम्न कोटि की 
रुचि ने लखनऊ में संगीत को अपने स्तर से गिराकर जनसाघारण के स्तर पर 
लाकर रख दिया । समय की यह रीति देखकर सुरुचि रखनेवाले गवेयों ने भी 
राग-रागिनियों की क्लिष्टता को त्यागकर छोटे-छोटे, सादे, दिलकश झ्रौर झाम 
लोगों के लिए सुगम विषयों पर संगीत रचना आरंभ कर दी । जनता में ग़ज़ल 
ग्रौर ठमरी का प्रचलन हो गया श्लौर ध्रुपद, होरी श्रादि जो बहुत कठिन राग 
हैं उनकी शोर से उपेक्षा की गयी । खम्माच, भिभौटी, भेरबी, सुनिद्रा, तिलक, 
कामोद, पीलू बगरा छोटी-छोटी मज़ेदार रागिनियां संगीतप्रेमियों के लिए चुनी 
गयीं और यही चीज़ें बादशाह को भी पसंद थीं क्‍योंकि वे उनके स्वभाव के 
प्रनुकुल थीं | ये रागिनियां लखनऊ के संगीतप्रेमियों को इतनी पसंद थीं कि 
ग्राज सारे हिंदुस्तान में लखनऊ के सफेद खरबूज़ों की तरह लखनऊ की भैरवी 
भी मशहूर हो गयी । और सच यह है कि भरवी लखनऊ की ही विशेषता है। 
ऐसी भैरवी हिंदुस्तान के किसी हिस्से में नहीं गायी जाती । सोजख्वानों? ने भी 
इन्हीं ग्रामपसंद और झ्राम लोगों की समझ में आनेवाली रागिनियों को ज्यादा 
रिवाज दिया जो घमं के माध्यम से घर में बेठनेवाली औरतों तक के गले में 
उतर गयीं | यहां तक कि उनके मसिये सुनकर बड़े-बड़े घुरंघर गायक भी 
चकित रह जाते हैं। सोज़ख्वानों में से ज्यादातर प्यारें खां श्ौर हैदर खां की 
शागिदं थीं । 

“लय संगीत का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसे दूसरे शब्दों में टाइम या वक्‍त 
कहना ज्यादा मुनासिब है। यह बोघ वाजिद भ्रली शाह में भी बहुत ज़्यादा 
था जिसे प्रकृति की देन कहना चाहिए क्योंकि वेसे तो लय का बोध थोड़ा-बहुत 
हर व्यक्ति में होता है । कवियों ने जो छंद निश्चित किये हैं उनका संबंध भी 
लय से ही है। छंदशास्त्र भी दरग्सल लय पर ही आ्राधारित है । यह बात 
स्पष्ट है कि जिस व्यक्ति में प्राकृतिक रूप से लय का बोध बहुत अधिक होगा 
उसके हर प्रंग-प्रत्यंग से ऐसी ग्रनायास क्रियाएं प्रकट होंगी और लय पर हर 
ग्ंग फडकने लगेगा । भ्राम जनता की दृष्टि में यह क्रिया निरथंक मालूम होगी, 
लेकिन जो वह क्रिया कर रहा है वह मजबूर है । वह जानबूभक कर वह क्रिया 
नहीं करता बल्कि उसके अवयव अपने आप लय पर थिरकने लगते हैं । वाजिद 


।मुहरंम में 'सोज़' (एक प्रकार की कविता ) पढ़ने वाले । 


56 गुजिबता लखनऊ 


प्रली शाह की इसी क्रिया को लोगों ने कह दिया था कि वे नाचते थे, हालांकि 
वे नाचते नहीं थे बल्कि लय के साथ तल्‍लीन होकर उनके प्लंगों से ऐसी क्रियाएं 
होने लगती थीं । जो लोग संगीत के नियमों से परिचित नहीं हैं वे कहने लगे 
बादशाह नाचते हैं, दरश्रसल वाजिद श्रली शाह कभी और किसी ज़माने में नहीं 
नाचते । उनका नाचना बस यही था और उसकी वजह यह थी कि लयदारी 
में कोई ऊंचे से ऊंचा गवेया भी बादशाह का मुक़ाबिला नहीं कर सकता था । 
मैंने उनके साथ बैठनेवाले विश्वस्त गवैयों से सुना है कि बादशाह के पांव का 
प्रंगठा सोते में भी लय पर ही चलता था । 

'नृत्त जिसे भाव बनाना कहते हैं, यह भी संगीत का ही एक महत्वपूर्ण श्रंग 
है। नत्त का उद्देश्य यह है कि भ्रपना मंतव्य हाव-भाव श्रौर संकेतों से व्यक्त 
किया जाये जिसे भ्रंग्रेज़ी में 'भमोशन' कहते हैं। मोशन बड़े-बड़े घ॒रंधर वक्ताश्रों 
श्रौर व्याख्यानदाताप्रों में पाया जाता है लेकिन उनकी कोई निदा नहीं करता, 
लेकिन बेचारे वाजिद श्रली शाह महज़ भ्रपनोी लयदारी के कारण बदनाम किये 
जाते हैं ।' 

यह जो लखनऊ के संगीत श्रौर वाजिद श्रली शाह के बारे में कौकब मर- 
हूम से हमें मालूम हुआ उससे साफ पता चल सकता है कि लखनऊ ने चाहे 
उच्च कोटि के संगीत को रिवाज न दिया हो, मगर उसके सुधारने और उसे 
आामपसंद या लोकप्रिय बनाने का यह शहर बड़ा जबरदस्त स्कूल क़रार पा 
गया था । 

ग़ाज़ीउद्दीन हैदर ही के जमाने में यहां बड़े-बड़े क़व्वाल मशहूर थे । छज्जू 
खां श्रौर गुलाम रसूल खां उस्ताद माने जाते थे | दश्वरी इतना जबरदस्त 
कलाकार था कि पटे का ईजादकर्ता वही माना गया है । बरूशू श्रोर सलारी 
उन दिनों तबला बजाने के उस्ताद माने जाते थे श्रौर उनके सामने किसी को 
तबला छूने की जुरंत न होती थी । 

उस आखिरी ज़माने में सादिक अली खां सारे हिंदुस्तान में बड़े उस्ताद 
माने जाते थे | छोटे भ्रौर बड़े मुन्ने खां के गाने में ऐसा मज़ा था कि बावजूद 
इसके कि वह खद भअ्रपनी कला के पंडित थे ऐसे लोगों को भी श्रपने गानों पर 
मुग्धघ कर लेते थे जो इस कला से भनभिज्ञ थे । 

मटिया बुर्ज में जो साजिदे भोौर गवेये वाजिद भ्रली शाह के दरबार में 
नौकर थे उन सबको मैंने खुद सुना था। एहमद खां, ताज खां झौर गुलाम 


गुजिबता लखनऊ 57 


हुसेन खां उस समय के घुरंघर संगीतकार माने जाते थे । दुल्ली खां जिसने 
सारे कलकत्ता में प्रपनी धूम मचा रखो थी और श्रपने जादूभरे कंठ से हर 
छोटे-बड़े को मोहित कर लिया था, लखनऊ का ही था और लखनऊ की ही 
संगीतशाला में उसने संगीत सीखा था । मर्द गवंयों के ग्रलावा लखनऊ में बाज 
रंडियों ने वह कमाल हासिल किया कि बड़े-बड़े गवंये उनके सामने कान पक- 
ड़ते थे | ज्ोहरा श्रौर मुइतरी जो कवियत्री भी थीं, गाने में ग्रपपा जवाब न 
रखती थीं । चूने वाली हेदरी को वह नामवरी हासिल हुई कि उसके गले से 
'सोज' सुनने के लिए लोग मुहरंम के इंतिज़ार में दिन गिना करते गौर मुहरंम 
में बाहर के सकडों-हजारों शौकीन लखनऊ ग्राकर हैदरी के इमामबाड़ में 
घंटों उम्मीदवार बने बठे रहते कि कब बी हैदरी श्रपना शोक-गीत शुरू 
करंगी। 

तबला बजाने में ग्राखिरी दौर का उस्ताद मुहम्मद जी था जिसकी सारे 
हिंदुस्तान में रूवाति थी | लगभग तीस वर्ष गुजरे होंगे मुझे चौंक में एक जंटल- 
मेन मराठा मिला जो कोट-पतलून पहने था और किसी प्रतिष्ठित पद पर 
नियुक्त था। मुभसे मिलकर उसने कहा, “मैं लखनऊ में सिफ इस शोौक़ में 
आया हूं कि यहां के संगीतकारों का कमाल देखूं ।” मैंने पूछा, “भ्राप कौन हैं ? ' 
कहा, “मैं खानदानी गवेया हूं और मेरे बाप-दादा शिवाजी के दरबार में गवये 
थे। अगचों ग्रब प्मंग्रज़ी शिक्षा प्राप्त करने के बाद मैंने नौकरी करली है । 
मगर अपने .पूृवंजों की कला को भी जानता हूं ।” इत्तिफ़ाक से उस समय एक 
झभोर साहब आ गये जो लखनऊ की मशहूर गानेवाली मुहम्मदी के यहां ग्राते- 
जाते थे । बोले, “चलिये, ग्राप मेरे साथ चलिये ।” वह मराठ साहब मुझे भी 
अपने साथ खींच ले गये और हम सब मुहम्मदी के वहां पहुंचे । संयोग से वहां 
सादिक़ भ्रली खा भी मौजूद थे और सबने अपना कमाल दिखाया । खुद वह 
मराठा भी गाया । उसके बाद हम सब चौधराइन के वहां गये जो घर यहां 
कलाकारों का सबसे बड़ा क्लब सममभा जाता है। वहां दोनों मुन्ने खां बुलाये 
गये । उन्होंने गाकर श्रपना कमाल दिखाया | आखिर में उस मराठे ने कहा, 
“मुझे तो सिर्फ तमन्‍ना यहां लायी है कि मैं एक तराना गारऊं श्रौर मुहम्मद जी 
मेरे साथ तबला बजा दें ।” फ़ौरन मुहम्मदजी बुलवाये गये भ्रौर मराठे जंटलमेन 
के गाने झौर मुहम्मदजी के बजाने में कुल श्रोताश्नों को बड़ा श्रानंद आया, सब 
चकित रह गये और प्रंत में उस मराठे ने स्वीकार कर लिया कि, “मैं सब 


58 गुजिह्ता लखनऊ 


जगह गया हूं मगर मुहम्मदजी से ज़्यादा माहिर तबला बजाने वाला श्राज तक 
नहीं देखा था। 

लखनऊ में संगीत का ऐसा उत्थान हो चुका था कि दूसरे शहरों के रईसों 
और घनिकों की श्रपेक्षा, यहां के घनिकों की रुचि स्वस्थ भश्रौर श्रच्छी है, वे 
कला को भली प्रकार जानते हैं, घुनों, रागों श्रौर रागिनियों को पहचानते हैं 
ग्रोर दो ही एक तानें सुनकर समभ जाते हैं कि यह गवैया किस पाये का है । 
मामूली गानेवाले की यहां की संगीत-सभाओं में कोई पूछ नहीं हो सकती । 
बाज़ारी लोग और ग्रामतौर से लडके जो सड़कों और चौराहों पर गाते फिरते 
हैं वे भी बहुत-सी चीज़ों को ऐसे सच्चे सुरों में अदा करते हैं कि मालूम होता 
है कि रागिनी और लय गले में उतरी हुई है । अक्सर शहरों में ज़्यादातर लोग 
ऐप्ते मिलेंगे जो शेरों को ठीक तरह नहीं पढ़ सकते । इसके विपरीत यहां भ्रापको 
ऐसा जाहिल ढूंढे न मिलेगा जो शेर को वजन में न पढ़ सकता हो । यह बात 
इसका प्रमाण है कि लयदारी यहां के बच्चे-बच्चे के रगो-रेशे में व्याप गयी है । 
कभी-कभी किसी बाज़ारी लड़के को भरवी, सोहनी, बिहाग या किसी भौर 
घुन में ऐसी खूबी से गाते सुना गया है कि सुननेवाले मुग्घ हो गये और बड़े- 
बड़े गवेयों को उनसे ईर्या होने लगी । 

संगीत के सिलसिले में यह भी मुनासिब मालूम होता है कि हम साज्ों 
ओर अन्य वाद्यों का भी जिक्र कर दें। 

संगीत में दो चीज़ें होती हैं--सुर श्रौर लय । इन दोनों चीजों में बिगड़ना 
गाने का अक्षम्य दोष है। लिहाजा इन दोनों की रक्षा के लिए दो ही साज़ों की 
ज़रूरत हुई, सुर पर रहने की मदद के लिए सारंगी और लय पर क़ायम रहने 
की जरूरत से तबला काम में लाये जाते हैं । 

सुरों की सहायता के लिए हिंदुस्तान का पुराना साज़ बीन थी जिसमें 
लकड़ी की एक नली के दोनों सिरों पर दो तूंबियां लगायी जातीं और उस पर 
सातों सुरों के सात तार खींच दिये जाते जिनका गाना नली के ग्रंदर से दोनों 
झर दौड़कर दोनों तूंबियों में गंजता । मुसलमान अपने साथ रबाब, चंग प्रौर 
सरोद लाये । रबाब शायद ग्ररबी बाजा था जिसने अब्बासियों के शासन-काल 
में बहुत तरकक़ी की थी | चंग और सरोद ईरानी वाद्य थे। इनमें से चंग बहुत 
ही पुराता साज़ है जिसका सुराग सीरिया, बाबुल, मित्र और रोम ज॑ंसी तमाम 
जातियों में लगता है । सरोद शुद्धत: फ़ारसी वाद्य था जिसे अब्बासीकाल के 


गुज़्िशता लखनऊ ]59 


गायकों ने भ्रपनाया और उसे बहुत तरकक़ी दी । हिंदुस्तान में श्रेने के बाद 
जब हिंदुश्नों श्रौर मुसलमानों के गीतों में मेलजोल हुआ तो पहले तंबूरा बना 
जो दरअसल बीन का ही लघू रूप ओर सिफं सुरों को बनाये रखने का काम 
देता था और केवल बजाने की ही चीज़ न था। चंद दिन बाद अ्रमीर खुसरो 
ने सितार की ईजाद की जो वास्तव में बीन और तंबूरा दोनों में एक आसान 
प्रौर भ्राम लोगों को पसंद ईजाद थी । लेकिन बीन हो या तंबूरा या सितार, 
गले का पूरा साथ कोई न दे सकता था | इसे देखकर मुहम्मद शाह रंगीले के 
दरबार के जबरदस्त और नामवर गायक मियां सारंग ने सारंगी की ईजाद की 
जो उन्हीं के नाम से मशहर हुई | सारंगी ने बीन, तंबूरे और सितार सबको 
पीछे डाल दिया श्रौर नाच-गाने की मंडलियों में उनका ऐसा नाम हुआ्ना 
कि इन पुराने साज़ों के बजाने वाले भी नष्ट हो गये | इन्हीं पुराने साजों 
में यहां एक क़ानून भी था जिसे मुसलमान निश्चित रूप से सीरिया और 
इराक़ से अपने साथ लाये थे । इसके बजानेवाले' भी अब कहीं इकके दुक्‍्के 
ही नज़र श्राते हैं। ग़रज सारंगी ने गाने बजाने की महफ़िलों से इन सबको 
निकाल दिया और इन पुराने साज़ों की यह शान रह गयी कि ऊंचे-ऊंचे उस्ताद 
गवेयों में कभी-कभी कोई एक गायक नजर था जाता है जिसे बीन या सरोद, 
रबाव या क़ानून के बजाने में कमाल हासिल होता है । सितार नवयुवकों के 
मनोरंजन के लिए रह गया है जिसे वे बिना गायन के बजाते हैं और कभी 
कोई उसके साथ गाने भी लगता है । 

ग्रब रहा तबला । यह अगर्चे लय के लिए बहुत ही जरूरी चीज है, मगर 
इस किस्म की किसी चीज़ का पता दूसरे देशों की पुरानी जातियों में नहीं था। 
लड़ाई में तबला (दुदमि) श्रौर चंग बजता, नौबत में नकक़ारा बजाया जाता। 
मगर नाच-गाने के साथ सिवाये हिंदुस्तान के और कहीं इस प्रकार की कोई चीज 
प्राचीन काल में न थी । सिफे एक दफ़ थी जो ग्ररबों में प्रचलित थी और गाने 
के साथ बजायी जाती थी । यहां भी गान के साथ सबसे पहले दफ का रिवाज 
मालूम होता है जो बीन के साथ बजती और लय को बनाये रखने में मदद 
देती । उसके बाद पुराने जमाने में ही मृदंग निकली जो शायद श्रीकृष्णजी के 
युग में मौजूद थी और उनकी बांसुरी के साथ मृदंग की गमक भी जमना के 
किनारे ब्रज के जंगल में सुनी जाती थी । मृदंग के बाद तरकक़ी यह हुई कि 
परवावज बनी जो उच्च कोटि के संगीत का भली प्रकार साथ दे सकती थी । 


60 गुज़िइता लखनऊ 


ग्रब उसके बाद से ग्राम लोगों में और घर की बेठनेवाली औरतों में ढोल का 
रिवाज हुआ जो मृदंग और परवावज से निकलकर आमपसंद की चीज हो गयी 
और संगीत की विशिष्ट मंडलियों के संगीतकारों के लिए तबला ईजाद हुश्रा 
जिसमें परवावज के दोनों रुख दो अलग-अलग साज़ों में बंट कर दहना और 
बायां के नाम से मशहूर हुए | तबला निश्चय ही मुसलमानों के श्राने के बाद 
की ईजाद है, लेकिन हमें यह नहीं मालूम कि लयदारी के इन साज़ों में ऊपर 
दी गयी तरवेकी कब और किसके हाथ से हुई । 


[2[ ] 


संगीत के साथ नृत्य ने भी लखनऊ में एक प्रमुख कला के रूप में बड़ी प्रगति 
की । नाचने का रिवाज हर जाति में था और प्राचीन से प्राचीन काल में था। 
मिस्र के फ़िरऔनों के सामने बांकी रसीली औरतें खड़ी होकर साज के साथ 
नाचा करती थीं । हजरत मसीह के युग में बप्तिस्मा देनेवाले यूहूना का सिर 
हिरोडिया ने नाचकर ही कटवाया था । मगर हिंदुस्तान में बहुत साफ तौर पर 
मालूम होता है कि गाने की तरह नाचने का भी भक्ति के लिए प्रयोग होता 
था और यहां नृत्य-कला का विकास हमेशा घमं के ही माध्यम से हुआ । चुनांचे 
इस कला के जानने ओर करनेवाले खास ब्राह्मण थे और उनका केंद्र या तो 
अयोध्या और बनारस के कत्थक थे या मथुरा और ब्रज के रहसघारी । यह 
ग्रजीब बात है कि भारत के सभी प्राचीन मंदिरों में ग्रगर्चे सैकड़ों-हज़ारों स्त्रियां 
देवी-देवताओं की मूरतियों के सामने रोज मुजरा किया करती थीं और जहां 
बड़े मंदिर थे वहां प्राचीन काल में नतंकियों का एक बड़ा भारी गिरोह भी 
मौजूद रहा करता था। लेकिन नृत्य-कला के गुरु हमेशा पुरुषों में हुए और वे 
ही युवा स्त्रियों को यह कला सिखाया करते थे । 

नाचना दरअसल शारीरिक क्रियाओं के नियमन का नाम है। यदि शरीर 
की इन क्रिया्नों के नियमन को अनेक लोगों की क्रियाओं के अनुरूप बनाना 
हो तो वह ड्रिल या फ़ौजी क़वायद कहलाती है, या योरुप के म्यूजिक हाल का 
वह नाच है जो बेलड कहलाता है श्लौर अ्रब श्रक्सर हिंदुस्तान के थियेटरों में 
नज र झ्रा जाया करता है और भ्गर शारीरिक क्ियाह्रों के नियमन का संबंध 


गुजिशता लखनऊ 6] 


संगीत की लय श्रौर ग्रावाज के आरोह-ग्रवरोह के अनुरूप बनाने से हो तो वह 
नृत्य कहलाता है । भारत का मूल नृत्य यही है कि शरीर के क्रियाकलाप गीतों 
और शेरों के उतार-चढ़ाव के भ्रनुकुल बना लिये जायें। यह असली नाच है 
जो हिंदुस्तान में एक बहुत वड़ी कला बन गयी है । इसकी सैकडों गतें और 
झनेक तोड़े और टुकड़े ईजाद हो गये । उसके बाद नाच में विचारों और भावों 
को संकेतों के माध्यम से पभ्रभिव्यक्त करना भी शामिल कर लिया गया । इसका 
नतीजा यह हुआझ्ला कि कभी गाना नाचने की व्याख्या बन गया । फिर जब सुंदर 
स्त्रियों का नृत्य लोगों को स्वाभाविक रूप से पसंद आया तो प्रेमिका के से 
हाव-भाव दिखाना और वंसे ही भाव व्यक्त करना भी इस कला का एक अंग बन 
गया । लखनऊ के स्कूल ने इन्हीं बातों का खयाल करके स्त्रियों और पुरुषों 
की नृत्य-मंडली में भेद कर दिया। नजाकत के साथ बताना, माशकों के से 
नाज-अ्ंदाज दिखाना और हर हरकत में प्रेम-प्रणय का भाव प्रकट करना नते- 
कियों की विशेषता रही जो कभी-कभी नोरस होने पर दश्शकों पर बुरा प्रभाव 
डालती है। इसके विपरीत शरीर की क्रियाग्रों को लय के अनुरूप बनाने में 
चलत-फिरत दिखाना और कवियों की-सी झाकषंकता से मनोभाव व्यक्त करना 
पुरुष नतंकों के लिए सीमित हो गया । अगर्चे दोनों गिरोह एक-दूसरे की कला 
का एक हृ॒ृद तक जरूर लिहाज़ रखते है, मगर फिर भी यह भेद बहुत ही 
स्पष्ट है । 

यह हम पहले ही बता चुके हैं कि ग्रवध और लखनऊ में नृत्यगान मंडलियों 
और मुजरा करनेवाली वेश्याओं का ग्राकर एकत्र होना नवाब शुजाउद्दौला ही 
के ज़माने में अपनी चरम सीमा को पहुंच गया था। उनके ग्रलावा अयोध्या 
और बनारस के कत्थक जो यहीं या आसपास मौजूद थे दरबार में होने वाली 
प्रावभगत देखकर उसी ग्रोर ग्राक्ृष्ट होने लगे और दोनों के मेलजोल से नृत्य- 
कला का भरपूर विकास हुम्ना । 

पुरुष नाचनेवालों के यहां दो गिरोह हैं--एक हिंदू कत्थक और रहसधारी 
और दूसरे मुसलमान कश्मीरी भांड | मगर असली नाचनेवाले कत्थक है और 
मालम होता है कश्मीरी मंडलियों ने अपनी नकक़ाली के कमाल में जान डालने 
के लिए अपने गिरोह में एक नाचनेवाला नौजवान लड़का बढ़ा लिया जो बाल 
बढ़ाकर औरतों का-सा जूड़ा बांधता है श्लौर बहुत ही फुर्ती से नाचकर अपनी 
चलतर-फिरत से महफ़िल में जिदादिली और ताज़गी पैदा कर देता है । 


62 गुज़िव्ता लखनऊ 


हिंदू कत्थकों में से कोई-न-कोई उस्ताद हर ज़माने में यहां मौजूद रहा । 
ये लोग अपनी कला के संस्थापक महादेवजी, पावंतीजी श्रौर कन्हैयाजी को 
बताते हैं । शुजाउद्दौला श्लरौर आसफ़उद्दोला के शासन-काल में खुशी महाराज 
नाचने का बड़ा जबरदस्त उस्ताद था | नवाब सआदत अली खां, ग़ाजीउद्दोन 
हैदर श्रौर नसीरउद्दीन हैदर के दोर में हिलालजी, प्रकाशजी भ्रौर दयाल॒जी 
मशहूर नाचनेवाले थे । मुहम्मद अली शाह के ज़माने से वाजिद अली शाह के 
शासन-काल तक प्रकाशजी के बेटों दुर्गाप्रसाद और ठाकुर प्रसाद के नाच की 
ख्याति रही । दुर्गाप्रसाद के बारे में कहा जाता है कि नाच में वाजिद श्रली शाह 
का उस्ताद था । उसके बाद दुर्गाप्रसाद के बेटों कालका और बंदादीन की शोहरत 
हुई और करीब सभी लोगों ने मान लिया कि सारे हिंदुस्तान में नाचने का 
उस्ताद इन दोनों से बढ़कर कोई नही है । पुराने उस्ताद किसी खास बात में 
मशहूर होते थे मगर इन दोनों भाइयों, खासकर बंदादीन ने नृत्य कला के सभी 
पहलुओं में कमाल दिखाकर अपने आपको हर हैसियत से बड़ा उस्ताद साबित 
कर दियां और ग्राजकल के अधिकतर प्रसिद्ध नतेक इन्हीं दोनों भाइयों के शिष्य 
है और इनका घर नृत्य का हिंदुस्तान भर का सबसे बड़ा स्कूल है । 
कुछ दिन हुए कालकः का देहांत हो गया और सच यह है कि उसके मरने 
से बंदादीन के नाच का मज़ा जाता रहा । बंदादीन की उम्र इस समय 77 
वर्ष की है और अब भी नाच के शौक़ीन उसका मुजरा देखने को अपनी जिंदगी 
की एक यादगार खुशी समभते हैं। उसका गत पर नाचना, नाच के उस्तादी 
तोड़े और टुकड़े असली सूरत मे दिखाना, घुंघरू बजाने में ऐसा अधिकार प्रकट 
करना कि जो घुंघऋर चाहे बजाए और उसके बाद हर-हर शब्द और हर-हर 
चीज़ को बताना ऐसी चीजें है जो बंदादीन ही पर खत्म हो गयी हैं। वह एक- 
एक चीज़ को सौ-सौ अदाओं, शैलियों, नज़ाकतों और चिक्ताकषंक संकेतों के 
माध्यम से प्रकट करता है और उसमें ऐसी नाजुकखयाली श्रौर नवीनता होती 
है कि भ्रगर दर्शक जानता न हो तो समझ भी नहीं सकता | आ्रामतौर पर 
होता यह था कि बंदादीन नृत्य करता श्रौर कालका पास खड़े होकर उसको 
व्याख्या करता जाता । उसकी व्याख्या से ही लोगों को पता चलता कि बंदा- 
दीन अपनी कला में कंसा चमत्कार दिखा रहा है । नाचते समय उसके पांव 
जमीन पर इस नज्ाकत से पड़ते कि मशहूर है कभी-कभी वह तलवार की बाढ़ 
पर नाचा और मजाल कया जो तलवे में घाव श्राया हो । 


[22 ] 


पुरुष नतेकों का दूसरा गिरोह भांडों का है। उनके मुजरे की शान यह है कि 
एक तरुण और संंदर लड़का जिसके बाल स्त्रियों की तरह लंबे होते है, रंगीन 
ग्रौर तड़क-भड़क के कपड़े पहनकर और पांव में घुंघरू बांधकर नाचता-गाता 
है । उसके साथ का साज़ लय में डूबा हुआ झौर दिलों को उभारनेवाला होता 
है । उसके नाच में असाधारण चलत-फिरत और शोखी होती है और उसका 
गाना भी इसी रंग झ्रौर रुचि के अनुरूप होता है । साज़ बजाने वालों के अलावा 
सात-ग्राठ या इससे ज़्यादा भांड रहते हैं जो उसके नाच-गाने पर वाहवाह के 
नारे बुलंद करते, प्रभावित होकर ताल देते और ग्क्सर असभ्यता के साथ 
उसके हाव-भाव और मुद्राओ्ों पर हंसानेवाले रिमा्क कसते रहते हैं। और जहां 
वह लड़का थोड़ी देर गा चुका वे सामने आकर उसकी नक़लें करते ग्रौर चुट- 
कुलेबाजी और नक़क़ाली का कमाल दिखाते हैं । 

लखनऊ में इन लोगों के दो गिरोह हैं--एक कझ्मी री जो कश्मीर से आये 
हैं और दूसरे खास यहां के जिनका पेशा शुरू में तो कुछ और था मगर ग्रव 
नकक्‍क़ाली ही उनकी एक विशिष्ट कला बन गयी है । 

नकक़ाली और खासकर नृत्य-गान के साथ नवक़ाली भारत की बहुत ही 
प्राचीन कला है जो राजा विक्रमादित्य के दरबार में यानी हज़रत मसीह से 
पहले बहुत उन्‍नत थी । लेकिन उस समय उसमें उच्च कोटि के ड्रामे दिखाये 
जाते थे और सच यह है कि वह बहुत ही सम्य और शिष्ट नकक़ाली थी । 
भारत की नीची जातियों के उत्सवों में आज तक यह नियम है कि जब वे लोग 
खुद ही याच्ते-गाते हैं तो उन्हीं के साथ हास्यास्पद नक़लें भी करते हैं । 

मुसलमानों के ज़माने में मुगल शासन से पहले भाडों श्लौर नक्क़ालों का 
पता नहीं लगता ! मुमकिन है कि हों श्रौर उस दौर के इतिहासकारों ने उनको 
इस योग्य न समझा हो कि उनका उल्लेख किया जाये मगर मुग़लों के शासन- 
काल में भांडों ने विशेष ख्याति प्राप्त कर ली थी | उनका पता औरंगजेब के 
बाद से मिलता है । जब दिल्‍ली के झमीरों और सुल्तानों को दूसरे के राज्यों 
पर झ्राक़्मण करने और उन पर विजय पाने के भंभटों से छुट्टी मिल गयी थी 
ग्रौर वे सिफ़ दरबार सजाने और भोगविलास में जीवन बिताना ही श्रपना 


864 गुजिश्ता लखनऊ 


पेतृक अधिकार समभने लगे थे। मगर दरश्रसल इन भांडों ने यहां के समाज 
में अजीब-प्रजीब काम किये । यही यहां के नेशनल सटायसे हैं और उन्होंने 
क़रीब-क़रीब वही काम किये जो इंगलेंड में 'स्पेक्टेटर' और 'टाइटलर' ने किये 
थे । दिल्‍ली का सबसे पहला भांड करेला मशहूर है जो मुहम्मद शाह के जमाने 
में था । किसी बात पर नाराज होकर मुहम्मद शाह ने हुक्म दिया कि भांडों 
को हमारे मुल्क से निकाल दो । दूसरे दिन बादशाह की सवारी निकली तो 
ऊपर से ढोल बजने और भांडों के गाने की आवाज़ श्रायी । ताज्जुब से सिर 
उठाकर देखा तो करेला और चंद भांड खजूर के एक पेड़ पर चढ़े हुए ढोल 
बजा-बजाकर गा रहे थे। सवारी रुकवाकर पूछा, “यह क्या गुस्ताखी है ? 
हमारे हुक्म की तामील क्‍यों नहीं हुई ?” अर्ज़ किया, “क्रिब्ला-ए-प्रालम ! 
सारी दुनिया तो जहांपनाह के कब्ज में है, जायें तो कहां ? इसलिए ऊपर जाने 
का इरादा किया, और यही पहली मंजिल है ।” इस जवाब पर बादशाह और 
सारे मुसाहिब हंस पड़े श्रौर उनका क़्सूर माफ़ किया गया । 

लखनऊ में ग्राने के बाद उन लोगों की कुछ ऐसी क़द्र हुई कि इन मंड- 
लियों का केंद्र लखनऊ ही हो गया । जहां तक मुझे मालूम है (लहाल दिल्ली 
में भांड नहीं हैं, और हैं तो बहुत कम और गुमनाम है । हां बरेली में पुराने 
जमाने से भांडों की मंडलियां मौजूद हैं ग्रौर लखनऊ के अधिकतर डोम-ढाड़ी 
भी बरेली से झ्ाये हैं जिससे मालूम होता है कि रुहेलखंड के पठान भी संगीत 
और अन्य ललित कलागझ्रों की क़द्र करते थे जिनकी दानशीलता के कारण इन 
लोगों ने बरेली और मुराद।बाद में अच्छी प्रगति की और वहां से भी ढाड़ी 
ग्रौर नकक़ाल जो इस कला में प्रवीण थे लखनऊ ग्राये और श्रब लखनऊ ही 
उनका प्रमुख केंद्र बन गया है । 

उनके लतीफ़े, नोक-ोंक के वाक्य और नकक्‍क़ाली के कमाल लखनऊ में 
मशहूर हैं। नवाब सआदत अली खां के इशारे से उस वक्‍त के सबसे बड़े बांके 
के सामने जो चोट करता हुआ वाक्य एक भांड ने कहा था वह हम इससे पहले 
ही भ्रपने पाठकों को सुना चुके हैं। उस ज़माने की एक यह घटना भी याद- 
गार है कि किसी रईस ने इनाम में दुशाला दिया, मगर वह दुशाला फटा-पुराना 
था । एक नकक़ाल ने हाथ में लेकर उसे गौर से देखना शुरू किया और उस 
पर बहुत ही गहरी नजरें जमा दीं । दूसरे ने पूछा, “देखते क्या हो ?” कहा, 
“देखता यह हूं कि इस पर कुछ लिखा हुग्ना है ।” पूछा, “अ्राखिर क्या लिखा 


गुज़िशइता लखनऊ 65 


है ? ” ऐनक निकालकर लगाई और अ्रटक-प्रटकक र बड़ी मुश्किल से पढ़ा, “लाइ- 
लाहा इल्लल्लाह” ।” पूछा, “बस इतना ही ? मुहम्मद-उर-रसूललिल्लाह? नहीं 
लिखा ?” जवाब दिया, “मुहम्मद-उर-रसूललिल्लाह क॑से लिखा हो यह तो 
हमारे हज़रत से पहले का है ।' 

लखनऊ के एक नवाब साहब “गढ़ेया वाले नवाब' मशहूर थे, इसलिए कि 
उनके मकान के क़रीब एक गढ़या थी । उन्हीं के यहां किसी समारोह में नृत्य- 
गान भी हो रहा था । एक भांड घबराया हुआ निकलकर सामने आया और 
सब साथियों से कहा, “उठो, उठो सम्मान करो।” सबने कहा, “किसका सम्मान 
करें ? कोई है भी ?” बोला, “नवाब साहब ग्राते हैं ।'' श्रौर यह कहकर एक 
हांडी जो खोली तो एक बड़ा-सा मेंढक उछलकर बीच महफ़िल में बैठ गया 
भ्रौर सबसे कहना शुरू किया, “जल्दी उठो, जल्दी उठो।” साथियों ने कहा, 
“तुमने पहचाना नहीं ? ग्राप गढ़ेया के नवाब है ।' 

इन लोगों के बारे में मशहूर था कि जिसके यहां जाकर नाचते उसकी 
नक़ल जरूर करते और मुमकिन न था कि उस पर चोट न करें । यह भी सच 
है कि जिस खूबसूरती से उन लोगों ने ग्रमीरों और रईसों को सबक़ दिये हैं 
और उनकी गलतियों पर उन्हें ग्रागाह किया है, वह और किसी तरह मुमकिन 
. ही नहीं था । इसी तरह नकक्‍क़ाली में जिसकी नक़ल करते उसका ऐसा मुकम्मल 
बहरूप भरते और ऐसा सच्चा करेक्टर दिखाते कि लोग दंग रह जाते । ग्राज- 
कल अंग्रेजों की सोहबत में जिस तरह बाबूज़ इंग्लिश' का मज़ाक़ उड़ा करता 
है, उन दिनों कायस्थों की फ़ारसीनिष्ठ उदू का उपहास किया जाता था | 
उनकी नक़ल और <दीवानजी का करेकक्‍्टर' ये भांड ऐसा बढ़िया दिखाया करते 
थे कि लोग चकित रह जाते | यहां दूसरा करेला भांड नसीरउद्दीन हैदर के 
जमाने तक मोजूद था । उसके बाद सजन, कायम दायम, रजबी, नौशाह, बीबी 
क॒द्र बगेरा मशहूर हुए। अली नक़ी खां मय अपनी बीवी के, जिनका बहुत 
कुछ दोर-दोरा था, क़ायम की सबील० देखने श्राये जिसे वह खूब सजाता और 
शबंत पिलाया करता था । उन प्रतिष्ठित अ्रतिथियों को देखते ही क्रायम सामने 
श्रा गया और हाथ जोड़कर बोला, “खुदा नवाब साहब को सलामत और बेगम 

। कोई नहीं है श्रल्लाह के सिवा । 

“ मुहम्मद अल्लाह के रसूल (पंगंबर) हैं। 

४ मुहरंम में शबंत पिलाने का स्थान । 


66 गुज़ितता लखनऊ 


.. साहिबा को कायम रखे ।” इतनी सख्त बात थी, मगर नवाब और बेगम दोनों को 
इनाम ही देते बनी । कायम का कमाल यह था कि एक बार साढ़े तीन घंटे 
तक सिफ़ तरह-तरह के मुंह बनाता रहा ! 

झ्राखिर ज़माने में फ़ज्ले हुसंन, खिलौना, बादशाहपसंद आदि मंडलियां 
बहुत मशहुर थीं | ग्रब॒ भी अलीजान बहुत ग़नीमत है । ये उन मंडलियों के 
नतंकों के नाम हैं जिन्होंने नाचने में बड़ी नामवरी हासिल की थी श्रौर जवाब 
न रखते थे । 

मगर लखनऊ की सोसाइटी पर इन सब लोगों से ज़्यादा असर डोमनियों 
का पड गया था । सारे क़स्बों और शहरों में शादियों में गानेवाली मी रासनें 
और गायनें मुहत से होती आयी हैं जिनका हुलिया डफ़ालियों की तरह हमेशा 
एकसा रहा | मगर डोमनियों ने लखनऊ में बहुत तरकक़ी की । ढोल को छोड़- 
कर उन्होंने रंडियों और मर्दानी मंडलियों की तरह तबला, सारंगी और मजीरे 
ग्रपनाये । सिर्फ गाने को हद से तरक्की करके नाचना शुरू किया श्रौर उसी पर 
संतोष न किया बल्कि भांडों की तरह ज़नानी महफ़िलों में नकलें भी करने 
लगीं । शादी की तमाम रस्मों का वे सबसे बड़ा अंग बन गयीं और दौलतमंद 
घरानों की बेगमों को ऐसा मोहित कर लिया कि कोई महल और कोई ड्योढ़ी 
न थी जिसमें डोमनियों का कोई गिरोह नौकर न हो । उनमें से भ्रधिकतर 
नाचने-गाने में अपना जवाब नहीं रखती थीं और उन्होंने ऐसे गले पाये थे कि 
जनानी महफिलें मर्दाना महफ़िलों से ज़्यादा शानदार और हृददर्जा दिलकश 
ग्रौर आानंदप्रद हो गयीं । खासकर महफ़िलों में उनकी शोखियां और नयी-नयी 
बातें ऐसी दिलफरेब होती थीं कि मर्दों को अक्सर तमन्ना रहती थी कि किसी 
तरह डोमनियों का मुजरा देखने का मोक़ा मिले, इसलिए कि डोमनियां मर्दाना 
सोहबतों में गाना-नाचना किसी तरह पसंद न करती थीं। श्रब भी डोमनियां 
बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं श्लौर उसी शान पर हैं । मगर उनमें वह कमाल 
बाक़ी नहीं रहा । जैसी-जेसी नामी लयदार ग्रौर गलेबाज़ डोमनियां लखनऊ 
में गुज़र गयीं बसे गवेये भी कहीं पैदा न हुए होंगे । 


[ 23 ] 


हालांकि नाचने की कला के उस्ताद मर्द ही विशेष रूप से रहे, मगर कुल 
मिलाकर जितनी तरक्की इसे गाने वाली रडियो ने दी वह मर्दों स मुमकिन 
नहीं थी । नाचने की कला श्रौरतों के लिए अधिक अनुकूल भी है। यह कला 
कुछ ह॒द तक हिंदुस्तान के हर शहर मे नज़र आयेगी लेकिन जैसी नाचन-गाने 
वाली वैदयाएं लखनऊ में पेंदा हुई शायद किसी शहर मे न हुई होगी । ग्राज 
से चालोस साल पहले लखनऊ की एक मशहूर रंडी 'मुंसन्मि वाली गौहर' न 
कलकत्ता जाकर शोहरत हासिल की थी। मैने एक महफिल में उसका यट रंग 
देखा कि पूर तीन घंटे तक एक ही चीज़ को एसी ख़ूबी से बताती रही कि 
दर्शकगण (जिनमें मटिया बुर्ज के सभी ढ़ाड़ी और प्रतिष्ठित लोग उपस्थित 
थे) शुरू से आखिर तक स्तंभित बैठे रहे और काई बच्चा भी न था जो उसमे 
पूरी तरह तल्‍लीन न हो | जोहरा और मुश्तरी कवियत्रिया और गायिकाएं ही 
नहीं उच्छ कोटि की नतेकिया भी थी। जदन ने एक मुहत तक जमाने भर को 
अपने नृत्य और गायन पर मोहित रखा है । 

यहां की वेब्याएं आश्तौर पर तीन जातियों को श्री : एक तो कंचनिया 
जो प्रसली रंडियां थीं और उनका पेशा भी आमतौर पर सतीत्व बेचना था। 
दिल्‍ली और पंजाब उनके मूल स्थान थे जहां स वे शुजाउहौला के समय से ही 
ग्रानी शुरू हो गयीं । शहर को नामी वेश्याए अधिकतर इसी जाति की है । 
दूसरी चूनेवालिया थीं जिनका गअ्रसली पेशा चना बेचना था मगर बाद मे 
बाजारी औरतों के गिरोह मे शामिल हो गयी और ग्रत में जाकर उन्हें बड़ी 
ख्याति मिली । चूुनेवाली हैदर जिसका गला मशहूर था और समभा जाता था 
कि उसका-सा गला किसी ने पाया ही नहीं, इसी जाति की थी और अपनी 
बिरादरी। की रंडियों का बडा गिराह रखती थी । तीसरी नागरानिया थीं । 
तीनों वे बाज़ारी स्त्रियां है जिन्होंने श्रपने गिरोह क्रायम कर लिये हु और 
बिरादरी रखती है वरना बहुत-सी ओर क़ौमो की औरते भी झावा रगी में पड़न 
के बाद इसी गिरोह म शामिल हो जाती है । 

गवंयों श्लौर नाचने वालों के बाद यहा इसी प्रकार का एक और गिरोह 
भी है जिसका विकास लखनऊ में बहुत हुआझआ और यदि इस लखनऊ को ही 


68 गुज़िशता लखनऊ 


विशेषता कहा जाये तो शायद ग़लत न होगा । वे रहसवाले हैं। रहस खास 
मथुरा और ब्रज की कला है। वहीं के रहसघारियों ने श्रा-प्रकर लखनऊ को 
इसका शौक़ दिलाया । 

वाजिद अली शाह को जब रहस पसंद आया तो उन्होंने श्रपनी रुचि श्रौर 
अपने काल्पनिक प्लाट का एक नया रहस तैयार किया । उसे देखते ही जनता 
में इस बात का खास शौक़ पैदा हुआ कि प्रेमाख्यान जो उन दिनों परियों के 
प्रेम और सौंदय से संबद्ध थे व्यावहारिक रूप में दिखाये जायें। पब्लिक का 
यह रुझान देखकर मियां अ्रमानत' ने, जो शब्दालंकार के प्रयोग में एक प्रसिद्ध 
कवि थे, ग्रपती इंदर सभा' की रचना की जिसमें हिंदू पौराणिक कथाओं में 
मुसलमान की फ़ारसी रुचि के समन्वय का पहला नमूना नजर आया । 

यह (इंदर सभा' जंसे ही शहर में दिखाई गयी हर शख्स उसका दीवाना हो 
गया । यकायक बीसियों सभाएं शहर में रची गयीं ग्रौर देखते-ही-देखते उनका 
ऐसा रिवाज हुआ कि गवंयों झ्लौर नाचने वाली वेश्यात्रों का बाज़ार कुछ दिन 
के लिए ठंडा पड़ गया। अब “अमानत” के सिवाय श्रौर बहुत से लोगों ने नयी 
सभाएं रचनी शुरू कीं जिनमें उदू शाइरी चाहे बिगड़ती हो, मगर ज़बान 
मंज़ती और पूरब की देहाती और शिल्पियों की आबादी में फेलती थी। इस 
रुचि ने ड्रामे और थियेटर की मज़बूत बुनियाद डाल दी थी और अगर कुछ 
दिन और शाही का दोर रहता तो हिंदुस्तानी नाटक एक खास रूप घारण कर 
लेता जो बिल्कुल ग्रछृता और एक खास रंग में डूबा हुआ होता । 

मगर यकायक सम्य समाज को, जिसमें पुराना संगीत जड़ जमा चुका था, 
इन खेलों में अहलीलता नज़र आयी । संगीत-कला के शौक़ ने सहृदयों को फिर 
गवंयों और मुजरा करने वाली मंडलियों की ओर आआक्ृष्ट कर दिया झ्रौर ये 
चीजें जो नाटक की शान रखती थीं ग्राभ जनता श्रौर बाज़ारी लोगों तक ही 
सीमित होकर रह गयीं। मगर पुरानी रुचि ने शहर में इस रुचि को व्याव- 
हारिक रूप में दिखानेवाला एक खास गिरोह पैदा कर दिया जिन्हें श्राज की 
शब्दावली में ऐक्टर कहा जाये तो ज़्यादा मुनासिब होगा । हमारे ये ऐक्टर 
पहले तो समय समाज की सहृदयता के कारण उर्द भाषा का विकास करते 
जाते थे, लेकिन ग्रब चूंकि उनकी गिनती निम्न वर्ग के बाज़ारी लोगों में की 
जाती है इसलिए वह शिष्ट भाषा छूट गयी । बाज़ारी भाषा में झ्राज भी ये 
लोग बीसियों तरह के पफ़मिंस दिखाते हैं । 


गुजिइता लखनऊ 69 


हमारे इन ऐक्टरों के भ्रडइ्लील हो जाने का सबसे बड़ा कारण यह था कि 
बंबई के पारसियों ने श्रंग्रेज़ी ढंग के थियेटर खड़े किये जिनमें सच यह है कि न 
तो संगीत-कला ही थी गौर न सही ऐक्टिगं ही, मगर उनकी सफ़ाई, व्यवस्था, 
तिलिस्म-प्रदर्शन भौर उनके तड़क-भड़क वाले पर्दो ने हमारे राष्ट्रीय नाटक का, 
जो श्रभी बच्चे की तरह पालने में ही था, गला घोंट दिया । उच्च वगं के लोग 
शानदार नाटकों पर मोहित होकर स्वस्थ रुचि को भूल गये । 

सच यह है कि बंबई के थियेटरों ने भारतीय ललित कलाश्रों में नृत्य और 
गायन को बहुत नुक्सान पहुंचाया | सबसे पहले संगीत को तबाह किया और 
ऐसे-ऐसे झ्ननियमित गानों को भ्रपनाकर बाज़ारों में फैला दिया जिनसे बढ़कर 
बकवास कोई चीज़ हो ही नहीं सकती । उसके बाद उसने हमारी नृत्यकला 
को जो बहुत ही उच्च कोटि की कला थी, मिटाना चाहा श्रौर श्रपनी स्टेज 
पर नाच के नाम से योरुप के ड्रिल को रिवाज दिया जिससे चंद लड़के अपना 
क्रम शौर वेशभूषा बदलकर दिलचस्पी पैदा कर दिया करते हैं। लेकिन रहस 
वालों का संगीत और ऐक्ट ग्रगर्चे दोनों निम्न कोटि के हैं मगर देशी रंग में 
डबे हैं श्रोर उनकी रुचि राष्ट्रीय है। उन्हें तो छोड़ने की नहीं बल्कि उनमें 
सुधार की शभ्रावश्यकता है । 


[ 24 ] 


संगीत के ही संदर्भ में 'सोज़र्वानी' का उल्लेख भी ज़रूरी है। हालांकि 
इस नयी धामिक कला को संगीत के नियमों के अनुसार कला में शामिल करना 
प्रनुचित है, लेकिन मुश्किल यह है कि सोज़ख्वानी एक विशेष प्रकार का संगीत 
ही है। मुहरंम में हज़रत इमाम हुसेन की याद ताज़ा करना हिंदुस्तान में 
खासकर शीझों से शुरू हुआ, विशेषतः उस समय से जबकि इसना अशरी मज- 
हब ईरानी का राष्ट्रीय. धमं बना और वहां के लोग अा-प्राकर हिंदुस्तानी 
दरबार से संपर्क स्थापित करने लगे। फिर भी दिल्ली में चंकि शाही खानदान 
का मज़ह॒ब सुन्‍्नी था इसलिए वे खास चीज़ें जिनका संबंध विशेषकर शीभ्रों की 
संस्कृति से था, यहां विकसित न हो सकीं । इसलिए इन कलाओं को प्रश्रय 
लखनऊ शहर शोर यहां के पुराने शीभ्रा दरबार में ही मिला । 


70 गुज़िदता लखनऊ 


जिस तरह धामिक हस्तक्षेप के कारण शाइरी में मसियागोई भौर बिना 
गाये कविता पढ़ने की परिपाटी चल पड़ी उसी तरह संगीत में सोज्जख्वानी का 
जन्म हुआ । फिर इन दोनों कलाझ्रों का ऐसा विकास हुआ कि ये भी निश्चित 
कलाएं बन गयीं श्रोर ऐसी कलाएं जो शुरू से ग्राखिर तक लखनऊ में ही 
विशेष रूप से प्रचलित रहीं । तहतुललफ्ज़सख्वानी (बिना गाये पढ़ना) मर्सियों 
का गंभीर स्वर में श्रौर सहज भाव से इस तरह पढ़ना और बता-बता के 
सुनाना है जिस तरह शाइर मुशाइरे में अभ्रपनी ग़ज़ल सुनाता है और सोज़ख्वां 
उनको पुरसोज गीत के साथ सुनाता है । 

पसली और पुरानी मसियाख्वानी सोज़रूवानी ही थी। यानी मसिये मज- 
लिसों में हमेशा गानों के साथ सुनाये जाते थे श्रोर उनका रिवाज दिल्‍ली ही 
नहीं, हिंदुस्तान के उन तमाम शहरों में था जिनमें शीआआ लोग ग्राबाद थे । 
मद्रास और दक्‍खन तक में ज़ोर-शोर से इस क़िस्म की मर्सियाख्वांनी होती थी 
झ्योर डेढ़ सौ बरस के लिखे हुए मसिये आज तक मोजूद हैं। मसियों को दाइरी 
के शेर पढ़ने के लहजे में ग्रदा करना खास लखनऊ की ईजाद है और उसमें मीर 
अनीस और मि््>रा दबीर वर्गरा ने कमाल दिखाये उनका ज़िक्र हम शाइरी के 
सिलसिले में कर चुके हैं । 

सोज़खू्वानी अग्चें पहले से थी और हर जगह थी मगर उसमें भी लखनऊ 
के सोजख्वानों ने ऐसे-ऐसे कमाल दिखाये कि इस कला को भी अपनी ही 
विशेषता बना लिया । सारे हिंदुस्तान की पुरानी सोज़ख्वानी को इतना 
उन्नत कर दिया कि पेशेवर गवंयों का बाज़ार भी सोज़ख्वानों के भ्रागे ठंडा 
पड़ गया । 

लखनऊ में सोजख्वां दूसरे कलाकारों की तरह नवाब शुजाउद्दोला के साथ 
या. उनके शासन-काल में श्राये । फैज़ाबाद के इतिहास में लिखा है कि दछुजा- 
उदहोला की बीबी बहू बेगम साहिबा के महल में मजलिसें होतीं और जवाहर: 
ग्रली खां ख्वाजासरा जो उनकी ड्यौढ़ी और सारे इलाक़ का मुख्तार था 
मसियाख्वानों के मसिये सुना करता । मगर उस वक्‍त तक यहां की सोज़ख्वानी 
वही. थी जो हर जगह ग्राम थी । 

बाज लोग कहते हैं कि ख्वाजा हसन मोौदृूदी से “इस कला का 
प्रारंभ हुआ । वह “नरमात-उल-श्रासफ़िया' के लेखक के उस्ताद थे भौर 
ग्रगर्चं पेशेवर संगीत-कार न थे लेकिन फिर भी संगीत कला में ऐसा 


गुजिहता लखनऊ ध7] 


कमाल”! रखते थे कि दूर-दूर तक कहीं उनका जवाब न था । 
ग्रगचें वह मज़हब से सुनन्‍्नी थे, मगर उन्होंने संगीत की खास-खसा 
घुनें बनाकर अपने शागिदों को बतायीं और इस कला ने एक 
नियमित रूप घारण कर लिया । उसके बाद जब सिड़े हैदरी खां का 
जमाना श्राया तो उनका यह नियम था कि मुहरंम में अपनी रुचि के 
ग्रनुसार घ॒ुनों में मसियाख्वानी किया करते | चूंकि वह बहुत बड़े और 
नामी गवैये थे और दरबार क़द्रदान था, इसलिए उन्हें इस कोशिश 
में खास कामयाबी हासिल हुई और पता लग गया कि अगर तरक्की 
दी जाये तो यह कला ग्रलग से और एक खास शान पैदा कर सकती है। संगीत 
की हज़ारों घुनों में से वे घु्नें चुनी गयीं जो शोक-संताप की अभिव्यक्ति और 
बन के लिए मुनासित्र हों और फिर उन्हें सैकड़ों सोज्ों के साथ क़ायम किया 
गया। आखिर में हैदरी खां ने अपनी सोजख्वानी सेयद मीर ग्नली साहब को 
सिखा दी जो एक शरीफ़ सैयद थे और उन्होंने मजहबी जोश मे इस कला का 
बहुत अधिक विकास किया और अपने जमाने मे इतने बड़े गवंये मशहूर हुए 
कि नवाब सग्रादत अली खा के ज़माने में उन्‍होंने किसी बात पर नाराज़ होकर 
लखनऊ से चले जाने का इरादा किया तो इंशा अल्लाह खां ने अपने विशिष्ट 
और प्रभावशाली कवि-स्वर और उपहास के रूप में सिफ़ारिश की श्रौर नवाब 
ने तसलल्‍ली देकर क़द्रदानी के साथ उन्हें रोका । 

उसके बाद तानसेन के खानदान का एक गवेया नासिर खां लखनऊ में 
ग्राया और चमका । यहां सोजरूवानी की तरफ लोगों की दिलचस्पी देखी तो 
उसने भी ग्रपने संगीत की दक्षता मसियाख्वानी में लगाकर लोकप्रियता और 


। संगीत में उनकी दक्षता का अंदाज़ा इससे हो सकता है कि मराठों को 
लूटमार के ज़माने में वह पालकी में सवार लखनऊ से इटावे की तरफ जा 
रहे थे । रास्ते मे किसी गांव में गुज़र हुआ और सुना गया कि उस गांव पर 
मराठ हमला करने वाले हैं। कहारों ने जो बहुत दूर से उन्हें लिये चले ग्राते 
थे यक्रायक पालकी रख दी और कहा हममें ग्रब भ्रागे चलने की ताक़त नहीं 
है । हज़ार कहा गया कि यह मुक़ाम खतरनाक है, मगर उन्होंने एक न सुनी । 
ख्वाजा साहब ने जिंदगी से मायूस होकर वजू किया और शअ्रस्र की नमाज पढ़ी 
ग्रौर बेठे-बेठे कुछ अलापना शुरू किया और उसका कहारों पर ऐसा भ्रसर 
पड़ा कि ताज़ादम हो गये और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दिया। 


]72 गुज़िइता लखनऊ 


ख्याति प्राप्त की और अपने पड़ोस की एक ग़रीब और विधवा सँदानी (सैयद 
बंश की स्त्री) पर तरस खाकर उसके दो बच्चों--मीर अली हसन और मीर 
बंदा हसन--को सोजख्वानी की तालीम दी। उन दोनों का कमाल तमाम 
पुराने उस्तादों से बढ़ गया और वे सोजख्वानी में बेमिसाल साबित हुए । 
उन्होंने सोज़र्वानी को एक ऊंचे दर्ज का राग बना दिया है, यहां तक कि 
संगीत के असली रागों के बोल तो अक्सर गवंयों तक को याद नहीं । मगर 
ऐसे सोज़ ग्रक्सर सोजख्वानों को याद हैं जो रागों के बोल हैं जिनको सुनकर 
झसली राग और सच्ची घुर्नें स्पष्ट रूप से समकी जा सकती हैं। 

इन्हीं बुजुर्गों की वजह से लखनऊ में सोजख्वानी की कला गवयों से 
निकल कर शरीफ़ों में ग्रा गपी और बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग पैदा होने 
लगे जो डोम-ढाड़ी नहीं बल्कि शरीफ़ लोग हैं, मगर सोज़ख्वानी में ऐसा 
कमाल रखते हैं कि गवंयों का बाजार उनके सामने ठंडा पड़ गया है। 

फ़िलहाल मंभू साहब और दो-एक और बुजुर्ग सोज़ख्वानी में ऐसा कमाल 
श्रौर ऐसी शोहरत रखते हैं कि हिंदुस्तान भर में हर जगह उनके स्वागत में 
शौक़ की आ्रांखें बिछाई जाती हैं और दूसरे क़स्बों के लोगों की क़द्रदानी मुहरंम 
के महीने औ्रौर मातम के खास दिनों में हमेशा लखनऊ के इन्हीं शौक़ीनों के 
हाथ से छीन लिया करती है । 

इस रुचि का सबसे ज़्यादा असर लखनऊ की औरतों पर पड़ा । सोज़ों 
की प्रभावशाली और दिल को टुक-ट्क कर देने वाली घुर्नें मीर भ्लली हसन 
ग्रौर मीर बंदा हसन के गले से निकलते ही संकड़ों शरीफ़ मर्दों के गले में 
उतरीं और उनके ज़रिये से हज़ारों शरीफ शीघ्रा खानदानों की औरतों के 
मधुर गलों में उतर गयीं । औरतों को स्वभावतः गाने-बजाने का ज्यादा शौक़ 
होता है श्रौर उनके गले गीतों के लिए आमतौर पर ज़्यादा मुनासिब हुग्रा 
करते हे । यह नियमबद्ध मसियाख्वानी औरतों में पहुंची तो उसमें बड़ी चित्ता- 
कर्षकता भ्रा गयी श्रोर चंद रोज़ में शीमग्रा ही नहीं निचले वर्ग की सुन्‍्नी औरतों 
में भी मसियाख्वानी का शौक पैदा हो गया श्रौर यह हालत -हो गयी कि 
: मुहरंम में श्रोर अधिकतर मज़हबी इबादत के समय लखनऊ के गलीकाूचों में 
तमाम घरों से पुरसोज़ तानों और दिलकश गीतों की श्रावाजें उठती हैं और 
कोई जगह नहीं होती जहां यह समा न बंधा हो । श्राप जूस गली में खड़े 
होकर सुनने लगिये ऐसी दिलकश आवाजें और ऐसा बेसुध करने वाला गीत 


गुजिश्ता लखनऊ ]73 


सुनने में श्रा जायेगा जिसे श्राप जिंदगी भर नहीं भूल सकते । हिंदुओं और बाज 
खास-खास सुन्नियों के मकानों में तो खामोशी होती है बाक़ी जिधर कान लगाइये 
मसियाख्वानी के जोर-शोर वाले गीतों की ही आवाजें आ्राती होती हैं । 
ताज़ियादारी चूंकि मसियाख्वानी का बहाना है, इसलिए सुन्नी और 
शीआ दोनों गिरोहों के घरों में मसियाख्वानी के शौक़ में ताज़ियादारी होने 
लगी और सुन्‍नी मुसलमान ही नहीं हज़ारों हिंदू भी ताजियादारी अपना कर 
मसियाख्वानी करने लगे । इससे मालूम होता है कि लखनऊ में ताजियादारी 
के बहुत ज़्यादा बढ़ने और विकसित होने का मुख्य कारण मसियाख्वानी है । 
लखनऊ में कूछ दशरीफ़, शिष्ट और सुशिक्षित महिलाएं ऐसी अच्छी 

सोजख्वां हैं कि श्रगर पद की रोक न होती तो मर्द सोज़ख्वां उनके मुक़ाबिले 
पर हरगिज़ न बढ़ सकते । इस बात को बहुत मुहृत हुई कि एक साल चेहलुम! 
के मोक़ पर चंद दोस्तों के साथ मैं तालकटोरा की कबंला में गया था और 
वहीं एक शिविर में मैंने रात बिताई थी । दो बजे रात को यकायक आंख 
खुली तो एक ऐसे मनोहर गीत की ग्रावाज़ कानों में आयी जिसने सब दोस्तों 
को जगाकर बेचेन कर दिया। हम सब उस आवाज़ को सुनकर उत्सु- 
कतावश शिविर से बाहर निकले और देखा कि रात का सन्नाटा है, चांदनी खेत 
किए हुए है और उसमें औरतों का एक भुंड ताजिया लिये हुए गा रहा है। 
सबके बाल खुले हुए और सिर नंगे हैं । बीच में एक ग्रौरत हाथ में शमा लिये 
है । उसकी रौशनी में एक लंबे क़द की खूबसूरत औरत कुछ पन्नों में से पढ़- 
पढ़कर मसियाख्वानी कर रही है और दूसरी कई औरतें उसके साथ गलेबाज़ी 
कर रही हैं। उस सनन्‍्ताटे उस वक्‍त, उस चांदनी, उन नंगेसिर सुंदरियों और 
उस पुरसोज़ गीत ने जो समां पंदा कर रखा था उसे मैं बयान नहीं कर 
सकता । नाजुक ग्रदाओओं का यह समृह जेंसे ही कबंला के फाटक में दाखिल 
हुआ उस लंबीं हसीन औरत .-ने परज की धुन में यह मसिया शुरू क्या: 

जब कारवान-ए-शहर मदीना लुटा हुग्ना 

पहुंचा क़रीब शाम के क़ंदी बना हुआ 

नेजे पे सर हुसेन का भागे धरा हुम्ना 

ओर पीछे पीछे बीसियों का सर खुला हुआा 
इस मसिये ने, जो स्थिति के सर्वथा ग्रनुकुल था, यकायक ऐसा समां बांध 
.._] कबंला के शहीदों का चालीसवां । 


74 गुज़िइता लखनऊ 


दिया कि शुब्हा होता था कि इन शेरों के ज़रिये से वह महिला कबंला की 
घटना का चित्रण कर रही है या खुद अपने उस मातमी जुलूस ग्रौर कबंला 
में दाखिले का वर्णन कर रही है । 

असल यह है कि लखनऊ की औरतों और उनके साथ मर्दों पर भी 
सोज़रूवानी और ताजियादारी ने जो प्रभाव डाला है श्रौर किसी चोज़ ने नही 
डाला । इसकी पहली बरकत तो यह है कि तमाम औरतें बहुत अच्छी गलेबाज़ 
हो गयीं और संगीत के नियमों के अनुसार मर्सियाख्वानी करने लगीं, दूसरी 
बरकत यह है कि सारे शहरवालों को चाहे मर्द हों या औरत संगीत के साभ्य 
दिलचस्पी हो गयो । यह जो लखनऊ के गली-कचों में देखा जाता है कि 
निचले वर्ग के लड़के और बाज़ारी लोग अ्रक्सर चलते-चलते गाने लगते है 
श्रौर गाने मे ऐसी गलेबाज़ी करते श्रौर मुश्किल से मुइकल धुनों को इस 
श्रासानी से उड़ा लेते हैं कि बाहर के लोगों को आाइचर्य होता है, इसका 
प्रसल कारण मसियाख्वानी और सोज़ख्वानी की रुचि है और तारीफ़ की बात 
यह है कि सोज़ख्वानी का विकास अगर्चो ग्राम जनता और निचले वर्ग के 
जाहिलों में हुआ फिर भी वह नियमबद्ध रही और संगीत के उचित स्तर से 
कभी नीचे नहीं गिरने पायी । जबकि दूसरी अनेक कलाएं जनता में पहुंचते ही 
नियमविहीन और ख़राब हो जाया करती हैं । 

सोज़ख्वानी को गो कि शीआ्रा लोग सवाब (पुण्य) का कारण समभते हे, 
मगर शीओआ विद्वानों ने इस वक्‍त तक इसके जायज होने का फ़तवा नहीं दिया 
है | वे शरञ्म (धर्मशास्त्र) की पाबदी में सख्ती करते हैं । श्रब तक विद्वानों 
और शिष्ट समुदाय की मजलिसों में सिर्फ हृदीसख्वानी या तहतुललफ्ज़ख्वानी 
होती है और ग्राम जनता की जिन मजलिसों में धमंशास्त्री शरीक होते है 
उनमें भी उनके सामने सोज़ख्वानी नहीं होती । लेकिन इससे इकार नहीं 
किया जा सकता कि सोज़ख्वानी ने अपनी लोकप्रियता के कारण विद्वानों के 
फ़तवों पर पूरी तरह विजय पा ली है । मुश्किल यह है कि सुन्नियों के हृदीस 
के विद्वानों और सूफ़ो लोगों के लिए तो संगीत जायज़ है मगर इसना अशरी 
के धमंशास्त्र में इसकी इतनी गुंजाइश नहीं वरना इस कला को भ्रव तक घ॒र्म 
की दृष्टि से भी जायज क़रार दे दिया गया होता । 


[ 25 ] 


कलाका रों, संगीतशास्त्र और उससे निकली हुई कलाओं के बारे में हम 
बहुत कुछ लिख चुके हैं । लेकिन इसी सिलसिले में बाज़ारी बाजों का हाल 
बयान करना बाक़ी है | लिहाज़ा ग्राज हम यह बताते हैं कि इन बाजों का 
लखनऊ पर क्या असर पडा और इसी पर हम संगीत की बहस समाप्त करेंगे। 
बाजों के जोड़ जो शादी वगैरा के जुलूसों के साथ जाते हैं छह तरह के हैं : 
() ढोल-ताशे, (2) रोशन चौकी, (3) नौबत, (4) तुरही और क़रना 
(शंख), (5) डंके और बिगुल, (6) अंग्रेज़ी बाजा जो आगंन बाजा कहलाता 
है और रोज़-बरोज़ ज़्यादा रिवाज पाता जाता है । 

पहला यानी ढोल-ताशा भारत का प्राचीन राष्ट्रीय वाद्य है जिसका 
ग्रग्रेज इंडियन “टाम टाम” नाम रखकर श्रपने अज्ञान के कारण उसका उपहास 
करते है। 896 ई० में जब इंग्लैंड के प्रदर्शनी स्थल “ग्रल्सं कोर्ट' में भारतीय 
संस्क्ृति श्रौर यहां की कलाग्रों तथा शिल्‍पों के सेकड़ों नमूने दिखाये गये थे 
तं। वहां इस बाज का नमूना मैंने खुद श्रपनी आंखों से यह देखा कि एक खहुत 
ही काले रंग का व्यक्ति जिसके पिंदे पर सिवा एक म॑ले लंगोटे के कुछ न था, 
ग्राम लोगों में नंगा आकर खडा हो जाता, उसके गले में एक ढोल होता 
ग्रौर वह बहुत ही भ्रसम्य ढंग से बिना किसी लय या क्रम के पागलों को तरह 
सर हिला-हिला कर जोर-जोर से ढोल को लकड़ी से पीटने लगता और कहा 
जाता कि यही हिंदुस्तान का बाजा “टाम टाम' है । मगर यह उन लोगों की 
ग्रजानता और बुद्धिहीनता हैं । यह बहुत ही मूकम्मल बाजा हैं और इसका 
बजाना एक निश्चित कला ह जिसमें उच्च कोटि की लय रखी गयी है। 

इस में लखनऊ में ग्रामतौर पर दो ग्रौर कभी तीन-तीन चार-चार बड़े 
ढोल होते है और कम-से-कम एक वरना दो-तीन ताशे वाले होते हैं और कम 
से कम एक भांभवाला होता है। भांक का पता ईरान वगरा में भी चलता 
है ओर ताशे मिस्र वगेरा मे भी प्रचलित हैं। मगर ढोल शुद्ध रूप से भारत 
का बाजा है । लखनऊ में यह बाजा फ़ौजों और बेफिक्रों के साथ दिल्‍ली से 
ग्राया । मगर दिल्ली में इसके जोड़ में सिर्फ ढोल और भमांमे थीं, ताशे लखनऊ 
में बढ़ाये गये श्रौर रिवाज पाते ही इतने ज़रूरी और महत्वपूर्ण नज्ञर आये 


76 गुजिइता लखनऊ 


कि मालूम हुआ जंसे उनसे इस बाजे में जान पड़ गयी ।अगर्चे ज़्यादातर शहरों 
में सिफे ढोल और भांभें ही होती हैं मगर लखनऊ में ताशे अभिन्‍न श्रंग बन 
गये हैं श्रौर बिना उनके ढोल कहीं बजते ही नहीं हैं । इससे स्पष्ट है कि इस 
बाजे में सबसे ज़्यादा कमाल वही शख्स दिखाता है जो ताशा बजाता है । 
वही लय क़ायम करता है और लय में उसका अनुसरण ढोलवाले करते हैं । 
ताशा बजाने की यह सिफ़त है कि इतनी जल्दी-जल्दी चोटें पड़ें कि एक चेट 
और दूसरी चोट में फ़ न किया जा सके | और इन लगातार चोटों से 
ग्रोर उतार-चढ़ाव और उनसे लय और गीत पैदा हो । लखनऊ में इस बाजे 
के बजाने वाले ऐसे-ऐसे पड़े हैं कि उनके सामने किसी शहर के ढोल बजाने 
वाले नहीं टिक सकते । 

लखनऊ में चेहलुम के बाद एक ताजिया उठता है जो बरूश्‌ का ताजिया 
कहलाता है । अब तो उसके जुलूस ने शीप्रों-सुन्नियों के झगड़े की वजह से 
दूसरी सूरत इख्तियार कर ली है, मगर दस-बारह बरस पहले इसकी यह शान 
थी की चंकि यह शाही खानदान के एक पुराने प्रेमी की यादगार था और श्रब 
इसके उठाने वाले ग़रीब लोग थे इसलिए हर क़िस्म के बाजों के बेनज़ीर 
उस्ताद सवाब समभकर इसमें शरीक होते ग्रौर सवाब के बहाने अपनी-अपनी 
कलाओं का चमत्कार शहरवालों को दिखाते और इसी वज़ह से उनका नियम 
था कि जहां खड़े हो गये क़द्रदानों ने घेर लिया और वे घंटों उसी जगह खड़े 
इस बात का दावा कर रहे हैं कि कोई है जो हमारे सामने ग्राकर बजाए ? 
बड़-बड़े उस्ताद गवेये उनकी दाद देते और वे जोश में झ्रा-ग्राकर और ज़्यादा 
खूबी से बजाते । खासतौर से ये ताशे बजाने वाले बड़े उस्ताद ढाड़ी होते जो 
संगीत में प्रवीण होते और गतों में नवीनता लाते थे । 

ढोल-ताशा बजाने की कला कितनी महत्वपूर्ण और नियमबद्ध थी इसका 
सबूत इससे बढ़कर कया होगा कि अ्रवध के आखिरी शासक वाजिद भश्रली शाह 
को जो संगीत के माने हुए ग्राचाय थे, मैंने कलकत्ता में श्रपनी भ्रांख से देखा 
कि मृहरंसम की सातवीं तारीख़ को जब मेहंदी का जुलूस उनकी आसमानी 
कोठी पे. रबाना हरेदर हरे दे खूद गले में त्ताशा डालकर बजाते ( बड़े-बहे 
गवंयों के गलों में बड़ो-बड़ी ढोलके होतीं, दरबार के सम्मानित जोग झास- 
पास खड़े होते और बे ऐसी खूबी से ताशा बजाते कि अनजान सुनने वाले भी 
दंग रह जाते । श्रौर गवंयों की वाह-वाह तो हमारे मुशाइरों के हगांमों को 


गुजिश्ता लखनऊ ]77 


भी मात कर देती । इसी तरह मैंने उन्हें कई बार ढोल बजाते भी देखा । 

बहरहाल हिंदुस्तान के इस सबसे पुराने बाजे में भी लखनऊ की सोसा- 
इटी ने कुछ परिवर्तेन किया श्रौर ऐसा परिवतंन किया जो बहुत ही लोकप्रिय 
भी हुआ भ्रोर ज़रूरी भी था। मगर कोई शख्स आकर यहां के ताशे बजाने 
वालों का कमाल देखे तो उसे मालूम होगा कि वह परिवतंन कितना मुनासिब 
है भश्रौर उसने ढोल और भांभ को कितना महत्व! प्रदान किया है । 

दूसरा जोड़ रोशन चौकी का है। रोशन चोकी बहुत पुराना बाजा है श्रौर 
प्रगर सारे नहीं तो उसके प्रमुख अंगों कौ मुसलमान श्रपने साथ लाये क्‍योंकि 
शहनाई उसका एक महत्वपूर्ण अंग है और उसके बारे में मशहूर है कि शेख- 
उरंईस इब्ने-सीना की ईजाद है। यह बिल्कुल इंसान के गले की तरह है । 
जितने सच्चे सुर गले-बाजी के ऊंचे कमाल के साथ शहनाई से निकलते हैं और 
किसी बाजे से नहीं निकल सकते । रोशन चौकी में कम-से-कम दो शहनाई- 
वादक होते हैं और एक तबलची जिसकी कमर में छोटे-छोटे दो तबले बंधे होते 
हैं। तबले लय को क़ायम रखते हैं। एक शहनाईवादक श्रसली सुर क़ायम 
रखने के लिए सुर देता है श्रौर एक श्रावाज़् की चलत-फिरत और गलेबाज़ी 
का भ्रम्यास दिखाता है और यही श्रसली शख्स होता है जो ग़ज्जलों या ठुमरियों 
वगरा को भ्रजब दिलकश सुरों में श्रदा करता है । 

रौशन चौकी हिंदुस्तान का खास दरबारी बाजा था जो बादशाहों श्रौर 
बड़े-बड़े अमीरों के खाने के वक्‍त बजा करती थी । रात को श्राराम के वक्‍त 
रौशन चौकी शाही महल के गि्दं गइत किया करती श्रौर उसका गाना दूर से 
बहुत ही भ्रानंद देता था। मुगल शासन में यह बहुत ही महत्वपूर्ण और श्रानंद- 
प्रद बाजा समझी जाती थी और दिल्‍ली में तो खुदा जाने कब से इसका रिवाज 
था। निश्चय ही लखनऊ में रोशन चौकी बजाने वाले दिल्‍ली से आये होंगे 
मगर इस कला में प्रवीण लखनऊ के श्रासपास के इलाके में भी बहुत समय से 
मौजूद थे । बनारस के अधिकतर मंदिरों में प्राज तक सुबह के समय रोशन 
चौकी बजा करती है और तड़के मुंह-ग्रंधेरे कहों करीब से जाकर सुनिये तो 
बचुच्द हू आनंद अस्त है । 

लखनऊ में आमतौर पर श्षादों के जुलूसों में रौश्नन चौकी बजाने वाले 
दूल्हा के क़रीब रहते हैं। खासकर हिंदुओं की बरातों में रास्ते भर क़दम-क़दम 
पर उन्हें इनाम दिया जाता है। रोशन चौकी बजाने वाले मेरे खयाल श्ौर 


78 । गुज़िइ्ता लखनऊ 


तजुरब में लखनऊ से भ्रच्छे भ्राजकल कहीं न मिलेंगे । जितनी लयदारी श्रौर 
हर चीज़ को दिलकश घुनों में सच्चे सुरों के साथ लखनऊ वाले अ्रदा कर लेते 
हैं और किसी जगह के रोशन चौकी बजाने वाले नहीं श्रदा कर सकते । उनके 
कमाल श्रौर कला में दक्षता का भ्रनुमान उस समय हो सकता हैं जब कोई 
शोक़ से सुने और दाद देता जाये । इसी बरुश्‌ के ताजिये में, जिसका ज़िक़ भा 
चुका है, रोशन चौकी बजाने वाले भी भ्रपना कमाल दिखाते और इस तरह 
जान तोड़कर कोशिश करते थे कि फिर उनके बाद और किसी की शहनाई में 
मजा न आता। 

तीसरा जोड़ नौबत का है। यह हमारे पुराने वाद्यों में सबसे ज़्यादा शान- 
दार बैंड है। इसमें दो-तीन शहनाईवादक होते हैं, एक नक्क़ारा बजाने वाला 
होता है जो दो बहुत बड़े-बड़े शानदार नक्क़ारों को अपने आगे भुकाये रखकर 
दोनों को एक साथ लकड़ी से बजाता है। इन नकक्‍क़ारों की ग्रावाज़ बहुत बड़ी 
होती है और आसपास के वातावरण में दूर तक गूंजती है और साथ ही एक 
भांभ वाला भी रहता है । 

नौबत भी ऐतिहासिक बाजा है श्रौर वेभव-प्रदशन के लिए मुद्दतों काम में 
लाया जाता रहा है। इस्लाम के इतिहास में हमें दमिइक़, बग़दाद और मित्र 
के दरबारों में भी इसका पता लगता है। बग्दाद में श्रब्बासी शासन के मध्य- 
काल में हर सामंत की ड्यौढ़ी पर नौबत बजा करती थी और प्रादर-सम्मान 
का प्रतीक समझी जाती थी | ऐसा मालूम होता है कि मुसलमानों के साथ ही 
यह हिंदुस्तान में आयी । यह भी मुमकिन है कि हिंदुस्तान में पहले से मोजूद 
हो भर गो कि शहनाई न थी मगर खाली नकक़ारा और भांभ, बजते हों । 
लेकिन इसका वतंमान रूप वही है जो ईरान श्रौर इराक़ में बनने के बाद यहां 
ग्राया । 

बादशाहों और प्रतिष्ठित सामंतों के जुलूस और लश्कर के साथ नौबत 
बहुत ही अनिवाये बाजा थी। पराक्रमी सम्राटों के जुलूस के आगे-प्रागे हाथियों 
पर नौबत बजती जाती थी । लड़ाइयों में विजेता पक्ष भ्रपनी विजय प्रकट 
करने के लिए जोर-जोर से नौबत बजवाया करता था । शंहशाह औरंगजेब ने 
हैदराबाद को जीतकर उसके क़रीब एक पहाड़ी पर नौबत बजवायी थी जो 
आज तक 'नौबत पहाड़" कहलातो है। मुग़ल शासन में दरबार के उच्चतम 
वर्गों के घनिकों और अ्रधिकारियों को बादशाह की तरफ से नौबत का हक़ 


गुजिइ्ता लखनऊ ]79 


दिया जाता जो अपनी ड्योढ़ियों श्रोर श्रपनी सवारी में नौबत बजवाया करते । 
नौबत बजानेवालों के लिए कोई ऊंचा बुर्ज चुना जाता । चुनांचे अक्सर शाही 
महलों के फाटकों के ऊपर नौबतखाना बनवा दिया जाता है जिसके नमूने हर 
बड़े शहर में जहां कोई बड़ा दरबार रह चुका हो नजर श्राते हैं । 

इसी पुराने रिवाज के श्रनुसरण में लखनऊ में आ्राज तक यह ग्राम है कि 
जिस घनी व्यक्ति के यहां शादी या कोई ओर उत्सव होता है तो उसके दरवाजे 
पर लंबी-लंबी बल्लियां खड़ी करके और सुख कपड़े और पन्‍नी वगरा से मढ़कर 
एक अस्थायी नौबतखाना बनवा दिया जाता है । 


दिम भर ठहरकर अलग-प्रलग समय में बार-बार नौबत बजाया करते हैं। 
इसी तरह जब बरातें या ताजियों के जुलूस चलते हैं इसी प्रकार के कृत्रिम 
नौबतखाने जो तख्तों पर बनाये जाते हैं, कहारों के कंधों पर सबके श्रागे-प्रागे 
चला करते हैं श्रौर रास्ते भर उन पर नौबत बजती जाती है । 

यही नौबत पुराने जमाने में खासतौर से लखनऊ के दरबार में वक्‍त 
पहचानने का जरिया मान ली गयी थी। उन दिनों समय का विभाजन चौबीस 
घंटों में नहीं किया जाता था जो अब अंग्रेजी घड़ियों के रिवाज से हमारे यहां 
प्रचलित है । उन दिनों वक्‍त के बंटवारे का यह हिसाब था कि दिन श्रौर रात 
के आठ पहर होते थे--चार पहर दिन के और चार रात के और हर पहर 
की आ्राठ घड़ियां होती थीं । हर नौबतखाने में एक पतीले या नांद में पानी 
भरा रहता था। उसमें कटोरा, जिसके पेंदे में एक बारीक-सा सूराख होता था, 
खाली करके डाल दिया जाता जो पानी पर तरता रहता था। उस सूराख से 
गआहिस्ता-अहिस्ता पानी आता रहता था। वह सूराख ऐसा अंदाज़ा करके 
बनाया जाता था कि एक घड़ी भर में पानी से भरते-भरते डूब जाये । फिर 
शुरू होने के बाद जब पहली बार कटोरा डूबता तो एक घड़ी बजायी जाती । 
जब दुबारा डूबता तो दो घड़ियां बजायी जातीं और आठवीं घडी के साथ गजर 
बजाया जाता, यानी पहले विशिष्ट ढंग से झ्राठ आघात करके घडियाल पर 
एक साथ बहुत-सी चोटे जल्दी-जल्दी की जातीं जिसमें यह इशारा था कि 
पहर पूरा हो गया श्रौर घड़ियों का सिलसिला फिर एक से शुरू हो जाता । 

जिन ड्यौढ़ियों पर नौबत होती वहां हर पहर के खत्म होने पर करीब 
एक घड़ी तक नोबत बजती रहती । इस तरीके से रात-दिन के श्राठ पहर दिन 
की आठ नौबतें हुईं। मगर होता यह था कि सिर्फ़ सात नोबतें ही बजा करतीं | 


80 गुज़िश्ता लखनऊ 


पहली नौबत तड़के नमाज़ के वक्‍त यानी पहले पहर की शुरूआत पर बजतोी 
झर सुबह की नौबत कहलाती | दूसरी उस समय जब एक पहर दिन आा 
जाता । यह पहरों चढ़े की नौबत कहलाती । तीसरी जब सूरज मध्याह्ल पर 
होता यानी ठोक बाहर बजे । यह दोपहर की नौबत कहलाती । उसके बाद 
जब आठ घड़ियां पूरी हो जातीं तो तीसरी बजती और यह तीसरे पहर की 
नौबत कहलाती । इसके बाद चौथा पहर खत्म होने पर मग़रिब (सूर्यास्त) के 
वक्‍त नौबत बजती और यह शाम की नौबत कहलाती । इसके बाद जब पांचवां 
पहर पूरा हो जाता तो पांचवी नौबत बजती जो पहर रात गये की नौबत 
कहलाती फिर जब छठी नौबत बजती जो ग्राघीरात या दोपहर की नौबत कह- 
लाती । इसके बाद जब सातवां पहर पूरा हो जाता और रात के तीन पहर गुजर 
जाते तो उस वक्‍त लोगों के ग्ाराम में बाधा न पड़ने के खयाल से नौबत न 
बजायी जाती, सिर्फ गजर बजा दिया जाता | फिर इसके बाद आठवें पहर की 
समाप्ति पर सुबह की नौबत बजती । 

घंटों का यह हिसाब था जो मुगल दरबार में और लखनऊ में सल्तनत के 
खात्मे तक प्रचलित रहा और कलकत्ता में जब तक वाजिट अली शाह जिदा 
रहे इसी हिसाब से पहर और घड़ियां बजती रहीं मगर इतने ही दिनों में वह 
हिसाब इतना आसान हो गया कि अब विरला कोई व्यक्ति होगा जो पहरों 
गौर घड़ियों का हिसाब न जानता हो । मगर खराबी यह है कि दिन-रात के 
घंटों के बंटवारे के बदल जाने के बावजूद पुराना तरीक़ा आ्राज भी हमारी रग- 
रग में समाया हुग्ना है। हम कहते हैं, “घड़ी भर में आऊंगा, दोपहर को 
सोऊंगा, पहर दिन चढ़े खाना खाऊंगा |” मगर हम नहीं जानते कि पहर कितना 
होता है और घड़ी किसे कहते हैं। हम आामतोर पर सुना करते हैं कि 'पहरा 
बेठ गया' और 'पहरे के सिपाही” मगर नहीं जानते कि पहरा शब्द इसी पहर 
से निकला है। इसलिए कि इन दिनों पहर-पहर भर की नौकरी हर एक को 
देनी पड़ती थी। 

समय-विभाजन का यह पुराना हिसाब हिंदुओं का है, मगर ईरान में भी 
पुराने जमाने में यही हिसाब प्रचलित था और इसी हिसाब से नौबत बजा करती 
थी । हमारे वतंमान हिसाब से एक पहर तीन घंटों का हुआ करता था ॥£ 

नौबत बजाने वाले भी लखनऊ में ऐसे उच्च कोटि के थे कि हर जगह और 
हर शहर में यहीं से जाया करते थे या यहां के उस्तादों के शागिदं होते थे, लेकिन 


गुज़िइ्ता लखनऊ 8] 


नौबत में कोई तरकक़ी नहीं हुई । बजाने वालों की संख्या वही रही, बाजे वही रहे 
ग्रौर बजाने का तरीक़ा वही रहा । फिर भी इतना ज़रूर हुआ कि लखनऊ के 
म्यूजिक सकल ने जिन चीज़ों श्रौर जिन घुनों को चुनकर आम समाज में लोक- 
प्रिय कर दिया था वही घु्नें और चीज़ें नकक़ारखाने में भी सुनी जाने लगीं । 
लेकिन इसके बावजूद कि नौबत बजाने का जो पुराना तरीका था वह भी अ्रपनी 
हद पर क़ायम रहा | अ्रमोीर खुसरो ने अपने ज़माने के नौबतवादन का जो 
चित्रण अभ्रपनी कविता में किया है उससे उस समय के नौबतवादन के ढंग का 
भ्रनुमान हो सकता है । वही शैली आ्राजकल प्रैचलित है श्लौर उसमें बहुत कम 
फक़ आया है, लेकिन उस पर भी शहनाई से जो घुर्नें ग्रौर गीत बजाते हैं उन पर 
लखनऊ के संगीत का जो कुछ असर पड़ा है वह सुनते ही नज़र झा जाता है । 

तुरही श्रौर करना हिंदुस्तान के बहुत पुराने राष्ट्रीय वाद्य हैं जिनका प्रयोग 
विशेषकर सेना के साथ होता था । तुरही की सूरत से मालूम होता है कि यह 
अंग्रेजों के साथ हिंदुस्तान में आयी . और उनके आ्रागमन के आरंभिक काल में 
प्रचलित हो गयी । मगर करना (शंख) खास ईरानी बाजा है। उसकी 
ग्रावाज़ में कुछ ऐसा रोब-दाब है कि युद्धभूमि में रोब बिठाने के लिए वह 
बहुत उपयुक्त है। इन दोनों बाजों का भी लखनऊ के जुलूसों में रिवाज है, 
लेकिन स्थायी वाद्य के रूप में नहीं बल्कि फ़ौजी दस्तों या पलटनों के साथ एक 
तुरहीवादक या क़रना बजाने वाला रहा करता है जो थोड़े-थोड़े अवकाश के 
बाद अपना बाजा बजाकर अपने गिरोह की उपस्थिति की सूचना दे दिया करता 
है । इन दोनों बाजों की टक्कर का हिंदुओं का पुराना बाजा नरसिघा है जो 
ग्रधिकतर हिंदुओं के मजहबी जुलूसों के साथ बजा करता है। ये बाजे दिल्‍ली 
से आये और जंसे थे वैसे ही रहे शोर शायद उनमें तरकक़ी की गुंजाइश भी 
नहीं है । 

बिगुल और डंका जो झ्राजकल लखनऊ के शादी के जुलूसों में नज़र श्राया 
करता है वह दरग्रसल नये-पुराने बाजों का एक निकृष्ट कोटि का समन्वय है । 
डंके से तात्पयं वह नक्क़ारा है जो प्राचीन काल में सेना तथा विजेताओ्रों के 
साथ घोड़े पर रहा करता था और उस पर चोट पड़ते ही लोगों पर ऐसा रौब 
पड़ता कि बड़ों-बड़ों के कलेजे दहल जाया करते । बिगुल या ब्युगल अंग्रेजी फ़ौज 
का वह बाजा है जिसके ज़रिये से फ़ौज को आवश्यकतानुसार चलने और दूसरे 
कामों का हुक्म दिया जाता था। लिहाज़ा अरब डंके के साथ बिग्रुल को शामिल 


82 गुज़िशता लखनऊ 


करके एक नया जोड़ बना लिया गया जो शादी के जुलूसों के साथ नज़र आया 
करता है। मगर चूंकि यह किराये के और बहुत हलके दर्ज के लोग होते हैं 
इसलिए उनका लिबास, उनके घोड़े श्र खुद उनकी सूरतें ऐसी हेय होती हैं 
कि उनसे बजाये रोनक़ के और एक घुणास्पद दृश्य उपस्थित हो जाता है । 

ग्रब सबके आखिर में और सबसे ज़्यादा प्रगतिशील वाद्य भ्रंग्रेजी वाद्य है। 
यह शुद्ध रूप से अंग्रेजों का लाया हुआ है जो उनसे पहले यहां कभी नहीं देखा 
गया । लखनऊ में न जाने क्‍यों, मगर इसके बजाने वाले सिफ़ मेहतर ही हैं जो 
टट्टी साफ़ करने के अलावा इस्र काम को भी करते हैं। संभवत: इसका कारण 
यह हो कि शुरू-शुरू में हिंदु-मुसलमान दोनों गिरोहों को ईसाइयों से ऐसी नफ़- 
रत थी कि वे अगर किसी बतंन को हाथ लगा देते तो हमेशा के लिए छूत हो 
जाता। श्रौर इस बाजे को श्रंग्रेजों से सीखना ग्रौर उसे मुंह लगाना पड़ता इस- 
लिए सिवाय मेहतरों के शौर किसी को इसे अपनाने का साहस न हुआा । 
बहरहाल अब यह मेहतरों का करोब-क़रीब लाजमी पेशा हो गया है । 

चंंकि इस काम को यहां एक ऐसे गिरोह ने अपनाया जो सबसे भ्रधिक 
तिरस्कृत है और जिसे संगीत-कला से दूर का भी वास्ता नहीं, इसलिए उम्मीद 
न थी कि इस कला में यहां ज़रा भी तरकक़ी हो सकेगी। मगर ऐसा नहीं 
हुआ । मेहतरों में ही तरकक़ी का शौक़ पैदा हुआ और चूंकि शहर की सोसा- 
इटियों में संगीत की घुन्नें फैलीं और उनकी रुचि का एक अंग बन गयी थीं इस- 
लिए मेहतरों को मजबूर होना पड़ा कि इन पाश्चात्य अरगनों में अपनी धुनों 
को अदा करें | अंग्रेजों या अंग्रेजी बाजे बजाने वाले फ़ौजियों से उन्होंने सिफ़ यह 
हासिल किया था कि अंग्रेज़ी बाजों का बजाना श्राजाये या दो-चार पाइचात्य 
संगीत की घु्नें सीख ली होंगी। लेकिन श्रब उन्होंने हिंदुस्तानी घुनों में 
प्रचलित चीज़ों को बजाना शुरू किया तो रोज़-ब-रोज़ उसमें तरकक़ी ही 
करते गये । 

अंग्रेजी बाजा मैंने हर जगह सुना है भ्रौर सब जगह वही अंग्रेजी की चीजें 
बजायी जाती हैं जिनको उन्होंने अपने अंग्रेज़ी बेंड मास्टरों से सीख लिया है । 
यह कहीं न नज़र आया कि बाजे को बजाने वालों ने भारतीय संगीत के सांचे 
में ढाल लिया हो । यह बात अगर गौर से देखिये तो लखनऊ में नज़र आ्लायेगी 
कि जिन ग़ज़लों या ठुमरियों को रौशन चौकीवाले शहनाई से अदा कर रहे हैं 
उन्हीं चीज़ों को अंग्रेजी बाजे वाले भ्रपने बाजों से श्रदा कर रहे हैं, भौर 


गुज़िइता लखनऊ 83 


ऐसी खूबी से कि ख्वाहमख्वाह सुनने को जी चाहता है। 

अंग्रेजी बाजे के बेंड लखनऊ में मेहतरों के कारण सैकड़ों क्रायम हो गये 
हैं जिनमें से कुछ ऐसे हैं कि उनमें पच्चीस-पच्चीस, तीस-तीस बजाने वाले होते 
हैं श्रौर कुछ में छह-सात या चार-पांच ही । उन्होंने गोरों की वर्दियों में भार- 
तीय रुचि के अनुरूप परिवतंन करके अपने लिए रंग-मंच की वर्दियां बना ली 
हैं और अगर वे वरदियां साफ और नयी हों तो उनको पहनकर जब वे बरात के 
साथ अरगन बाजा बजाते हुए चलते हैं तो बहुत अच्छे श्रौर शानदार मालूम 
होते हैं । 

वर्दी की यह विशेषता इन्हीं लोगों में है बाक़ी दूसरे बाजेवालों को कभी 
इसका खयाल नहीं झ्राया कि अपने लिए कोई वर्दी बना लें । वे बहुत ही गंदे 
ग्रौर भददे कपड़े पहने हुए होते हैं । मगर अंग्रेजी बेड वाले मेहतरों ने अपने 
लिए तरह-तरह की वर्दियां बनाकर अपनी शान बढ़ाली है और भारतीय संगीत 
को अंग्रेजी अरगनों में शामिल करके लोगों में श्रपनी क़द्र भी ज़्यादा कर ली है । 


| 26 ] 


मानव समाज में सबसे ज्यादा ज़रूरी और सबसे महत्वपूर्ण खाना-पीना है । 
किसी भी वें या जाति की उन्नति की प्रक्रिया में वह सबसे पहले अपनी रुचि, 
अ्रपने शिष्टाचार और ग्रपनी नवीनता को गरभिव्यक्ति खाने की मेज पर या 
दस्तरख्वान पर करता है । इसीलिए अग्रव हम यह बताना चाहते हैं कि बावर- 
चीखाने और दस्तरख्वान के बारे में लखनऊ के पूर्वी दरबार ने क्‍या रंग 
दिखाया और क्या-क्या आविष्कार किये और इस कला में यहां के लोगों ने 
किस हद तक तरकक़ी की । 

ग्रवध की संस्कृति का इतिहास शुजाउद्दोला से और उसके भी अंतिम 
काल से प्रारंभ होता है। यानी उस वक्‍त से जबकि वह बक्सर की लड़ाई में 
हारकर और अंग्रेजों से नया करार करके खामोश बैठे और संनिक गतिविधि 
की ओर से उपेक्षा बरती गयी । उस जमाने में उनके बावरचीखाने के मुंतजिम 
हसन रजा खां उफे मिर्जा हसन्‌ थे जो दिल्‍ली से आये हुए थे और एक प्रति- 
ष्ठित घराने से संबंध रखते थे । सफ़ीपुर, जिला उन्नाव, के एक शेखज़ादं 


84 गुजिइ्ता लखनऊ 


मौलवी फ़ज्ले अजीम जो लखनऊ में तालीम हासिल करने श्राये थे खुशक़िस्मती 
से मिर्जा हसनू के घर तक पहुंच गये और उनके साथ ही मिलकर ओर खेल- 
कदकर बड़े हुए थे । उनको उन्होंने अपनी ओर से बावरचोख़ाने का नायब मुंत- 
जिम मुक़रंर करा दिया था और उनका नियम था कि खासे! के ख्वानों 
(धथाल) को ठीक से सजाकर और उन पर अ्रपनी मुहर लगाकर नवाबी ड्यौढ़ी 
मे लेजाते और बहू बेगम साहिबा की ड्योढ़ी की खास मेहरियां धनिया, पनिया 
ग्रौर मीना के हवाले कर देते। इसका मात्र कारण यह था कि ये मेहरियां उनके 
खिलाफ़ कोई कारंवाई न होने दें । मौलाना ने इन मेहरियों से भाईचारा कर 
लिया था । चुनांचे ये मेहरियां बहुत ही नाजुक मौक़ों पर उनके काम आयी । 

नवाब शुजाउद्दौला का यह नियम था कि महल के अंदर अपनी बीवी बहू 
बेगम साहिबा के साथ खाना खाते । मेहरियां ख्वानों को बेगम साहिबा के 
सामने लेजाकर खोलतीं श्रौर दस्तरख्वान पर खाना चुना जाता। 

नवाब और बेगम के लिए हर रोज़ छह बावरच्रीखानों से खाना झ्राया 
करता : पहले तो, ऊपर लिखे नवाबी बावरचीखाने से, जिसके प्रबंधक मिर्जा 
हसन्‌ थे, मौलवी फज्ले अजीम खासे के ख्वान खुद लेकर डयौढ़ी में हाजिर 
होते । उस वावरचीखाने मे दो हज़ार रुपये रोज़ की पकाई होती जिसका 
यह मतलब हुआ कि बावरचियों और दोगर नौकरों की तनख्वाहों के श्रलावा 
साठ हज़ार रुपये माहवार या सात लाख बीस हज़ार रुपये सालाना की रक़म 
सिर्फ खाने-पीने की चीज़ों श्रौर गिज्ञाओं की कीमत में खर्च होती थी; दूसरे, 
सरकारी छोटे बावरचीखाने से जिसके प्रबंधक पहले तो मिर्जा हसन ग्रली, 
तोशाखाने के प्रबंधक, थे लेकिन बाद में अंबर अली खां ख्वाजासरा के सुपुर्द 
हो गया था । उसमें तीन सौ रुपये रोज़ यानी एक लाख झाठ हजार रुपये 
साल खानों की तैयारी मे खच्च होते थे; तीसरे, खुद बहू बेगम साहिबा के 
महल के ग्रंदर का बावरचीखाना जिसका प्रबंधक बहार अली खां ख्वाजासरा 
था; चौथे, नवाब, बेगम साहिबा यानी शुजाउद्ौला की वाल्दा के बावरची- 
खान से; पांचवे, मिर्जा अली खां के बावरचीखाने से और छठे, नवाब 
सालारजंग के बावरचीखाने से । आखिर में उल्लिखित दोनों रईस बहू 
बेगम साहिबा के भाई और शुजाउद्दौला बहादुर के साले थे । 

इस दौर के ये छह बावरचीखाने शाही बावरचीखाने के बराबर थे और 


। बादशाहों का खाना । 


गुजिश्ता लखनऊ 85 


जिनमें रोज़ पुरतक़ल्लुफ भ्रौर स्वादिष्ट खाने नवाब के ख़ासे के लिए तैयार 
किये जाते थे । एक दिन किसी खाने में जो बड़े सरकारी बावरचीखाने से 
ग्राया था, ख़ास नवाब साहब के सामने एक मकवी निकल श्रायी । नवाब ने 
क्रढ्व होकर मालूम किया कि यह खाना कहां से आया है ? घनिया ने खयाल 
किया कि ग्रगर सरकारी बावरचीखाने का नाम लेती हूं तो मौलाना भाई की 
मुसीबत आरा जायेगी । बोली, “हुजूर, यह खाना नवाब सालारजंग बहादुर के 
वहां से आया है | 

नवाब शुजाऊद्दौला के बाद दरबार फ़ंजाबाद से लखनऊ चला गया ओर 
नवाब आसफ़उद्दोला ने मिर्जा हसन रज़ा खां को 'सरफ़राजउद्दौला' का खिताब 
देकर वजारत का खिलग्नत दिया तो बावरचीखाने के प्रबंधक के पद को ग्रपनी 
शान के खिलाफ़ समभकर उन्होंने मौलवी फ़ज्ले ग्रजीम साहब को सरकारी 
बावरचीखाने का स्थायी प्रबंधक नियुक्त कर दिया। मगर मौलवी फ़ज्ले अजीम 

हब पहले जिस तरह खासे के ख्वान लेकर बह बेगम साहिबा की डयोढ़ी 

पर हाजिर हुआ करते थे, उसी तरह ग्रब॒ लखनऊ में भी नवाब आसफ़उद्दौला 
बहादुर की ड्यौढी पर हाजिर होने लगे और अपने दूसरे रिश्तेदारों को भी 
बुला लिया और अपने काम में शरीक कर लिया। रिश्तेदारों में उनके सगे 
भाई मौलवी फ़ायक अली और चचेरे भाई गुलाम अजीम और गलाम मख्दूम 
ज़्यादा श्रागे-आगे थे और बारी-बारी चारों भाई डयोौढी पर खासा ले जाया 
करते थे । 

ग्रासफ़ठद्दोला बहादुर के बाद वजीर गली खां के अल्प कालीन शासन- 
काल में तफ़्ज्जुल हसन खां वज़ीर हुए तो उन्होंने उन सफ़ीपुर के भाइयों को 
हटाकर अपने लाये हुए गुलाम मुहम्मद उर्फ बड़े मिर्जा को बावरचोख़ाने का 
प्रबंधक नियुक्त कर दिया । 

इन घटनाग्रों से मालूम होता है कि लखनऊ को अपने प्रारंभिक काल ही 
में ऐसे बड़े-बड़े जबरदस्त और शोौक़ीनी के बावरचीखाने मिले जिनका लाज़िमी 
नतीजा यह था कि बहुत ही बढ़िया क़िस्म के बावरची तैयार हों । खानों की 
तैयारी में विविधता बढ़े, नये-नय खाने ईजाद किये जायें और जो भी प्रवीण 
रसोइया दिल्‍ली और दूसरे स्थानों से आये वह यहां की खराद पर चढ़कर 
श्रपने हुनर में ख़ास किस्म का कमाल और अपने तेयार किये हुए खानों में नयी 
तरह की नफ़ासत प्रौर खास क़िस्म का स्वाद पैदा करे । 


86 गुजिज्ता लखनऊ 


यह एक श्राम बात है कि जो शख्स जो काम करता है उसमें कुछ-न-कुछ 
तरक्क़ी जरूर करता है और उसका झोौक़ीन बन जाता है । चुनांचे लखनऊ में 
खाने के शुरू के शौकीन भी वही रईस माने जाते हैं जिनके बावरचीखानों का 
ऊपर ज़िक्र आरा चुका है । लोग कहते हैं कि खुद हसन रज़ा खां सरफराजउद्दौला 
का दस्तरख्वान बहुत विशाल था । खाना खिलाने के वह बहुत शौक़ीन थे और 
जब उनकी यह रुचि देखकर सबसे बड़ा सरकारी बावरचीखाना उनके सुपुर्द हो 
गया तो उन्हें अपने हुनर में नवीनता पंदा करने और आविष्कार करने का 
कहां तक मौक़ा न मिला होगा ? 

और इसीका नतीजा यह भी था कि यों तो इस दुनिया में खाने के शौक़ीन 
सैकड़ों रईस पैदा हो गये, मगर नवाब सालारजंग के खानदान को आखिर तक 
नेमतखाने की ईजाद और तरकक्‍क़ी में खास शोहरत हुई । 

जानकार सूत्रों से मालूम हुआ है कि खुद नवाब सालारजंग का बावरची 
जो सिर्फ उनके लिए खाना तैयार किया करता था, बारह सौ रूपये माहवार 
तनख्वाह पाता था जो तनख्वाह आज भी किसी बड़ें-से-बड़े हिंदुस्तानी दरबार 
में किसी बावरची को नहीं मिलती । खास उनके लिए वह ऐसा भारी पुलाव 
पकाता कि सिवाय उनके श्रौर कोई उसे हज्म न कर सकता था। यहां तक कि 
एक दिन नवाब शुजाउद्दौला ने उनसे कहा, “तुमने कभी हमें वह पुलाव न 
खिलाया जो खास अपने लिए पकवाया करते हो ?” गज किया, “बेहतर है, 
आज हाजिर करूंगा ।” बावरची से कहा, “जितना पुलाव रोज़ पकाते हो, 
प्राज उसका दूना पकाग्रो ।/” उसने कहा, “मैं तो भ्रापके खासे के लिए नौकर 
हूं, किसी और के लिए नहीं पका सकता । कहा, “ये नवाब साहब ने फ़रमाइश 
की है । मुमकिन है मैं उनके लिए न ले जाऊं ?” उसने कहा, “कोई हो, मैं तो 
और किसी के लिए नहीं पका सकता ।” जब सालारजंग ने ज्यादा ज़ोर दिया 
तो उसने कहा, “बेहतर, मगर शर्त यह है कि हुजूर खुद लेजाकर ग्रपने सामने 
खिलायें श्रोर कुछ लुक्‍मों (ग्रास) से ज्यादा न खाने दें और एहतियातन श्ाब- 
दारखाने (पानी के घड़ों आदि) का इंतजाम भी करके अपने साथ ले जायें ।" 
साला रजंग ने ये शर्ते मान लीं । आखिर बावरची ने पुलाब तेयार किया और 
सालारजंग खुद लेकर पहुंचे और दस्तरख्वान पर पेश किया । शुजाउद्दोला ने 
खाते ही बहुत तारीफ़ की और बड़े शौक़ से खाने लगे, मगर दो-चार ही लुक्मे 
खाये थे कि सालारजंग ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया और कहा, “बस इससे 


गुजिश्ता लखनऊ 87 


ज़्यादा न खाइये ।”' शुजाउद्दोलः ने हैरत से उनकी सूरत देखी और कहा, “इन 
चार लुक्‍्मों में क्या होता है ” और यह कहंकर जबरदस्ती दो-एक लुक्मे और 
खा ही लिये । श्रब प्यास लगी । सालारजंग ने अपने आबदारखाने से जो साथ 
गया था पानी मंगवा-मंगवाकर पिलाना शुरू किया । बड़ी देर के बाद खुदा- 
खुदा करके प्यास बुझी और सालारजंग अपने घर आये । 

प्राजकल की रुचि को देखते हुए यह बात किसी पौष्टिक पदार्थ की विशे- 
षता नहीं समझी जा सकती, मगर उस जमाने में और पुरानी रुचि के खाने वालों 
के लिए भी अब पौष्टिक पदार्थ का असल यही स्तर है कि वे पदार्थ स्वादिष्ट हों 
मगर असर में इतने पौष्टिक श्रौर गरिष्ट हों कि हर मेदा उन्हें सहन न कर सके । 

दूसरा कमाल यह था कि किसी एक चीज को अनेक प्रकार से दिखाकर 
ऐसा बना दिया जाये कि दस्तरख्वान पर जाहिर में तो यह नज़र ग्राये कि 
बीसियों क्रिस्म के खाने मौजूद हैं मगर चखिये ओर गौर दीजिये तो वे सब 
एक ही चीज हैं। मसलन विश्वस्तसूत्रों से सुना जाता है कि दिल्ली के शाह- 
जादों में से मिर्जा आसमान क़द्र, मिर्जा खुरंम बख्त के बेटे, जो लखनऊ में 
आकर शीभ्रा हुए और चंद रोज़ यहां ठहरने के बाद बनारस में जाकर रहने 
लगे, लखनऊ में अपने प्रवास के समय वाजिद अली शाह ने उनकी दावत की 
तो दस्तरख्वान पर एक मुरब्बा लाकर रखा गया जो देखने में बहुत ही नफ़ीस, 
स्वादिष्ट और अच्छा मालूम होता था। मिर्जा आसमान क़॒द्र ने उसका ग्रास 
खाया तो चकराये इसलिए कि वह मुरब्बा न था बल्कि गोइत का नमकीन 
को रमा था जिसकी सूरत रकाबदार (बेरा) ने बिल्कुल मुरब्बे की-सी बना दी 
थी । यों घोखा खा जाने पर उन्हें शमिदगी हुई और वाजिद अली शाह खुश 
हुए कि दिल्ली के एक प्रतिष्ठित राजकुमार को घोखा दे दिया । 

दो-चार रोज बाद मिर्जा आसमान क़॒द्व ने वाजिद श्ली शाह की दावत 
की श्रौर वाजिद अली शाह यह खयाल करके आ्राये थे कि मुझे जरूर घोखा 
दिया जायेगा । मगर उस होशियारी पर भी घोखा खा गये इसलिए कि आस- 
मान क़द्र के बावरची शेख हुसेन अली ने यह कमाल किया था कि गो दस्तर- 
ख्वान पर सैकड़ों क़िस्म के खाने चुने हुए थे : पुलाव' था, जर्दा- था, बिर- 
यानी5 थी, क़ोरमाः था, कबाब थे, तरकारियां थीं, चटनियां थीं, अचार थे, 
ाउज्लावल और गोइत से बना एक खाद्य पदार्थ; * मीठे चावल; * चावल 
आगर गोइत का बना मसालेदार पदार्थ; * गोइत की बनी तरकारी । 


88 गुज़िशता लखनऊ 


रोटियां थीं, परांठे थे, शीरमालें थीं, गरज़ कि हर नेमत मौजूद थी | मगर 
जिस चीज को चखा शकर की बनी हुई थी--सालन था तो शकर का, चावल 
थे तो शकर के, अचार था तो शकर का और रोटियां थीं तो शकर की, यहां 
तक कि कहते हैं तमाम बतेन, दस्तरख्यान, श्रौर सिलफ़्ची, लोटा तक शकर 
के थे । वाजिद ग्रली शाह घबरा-घबराकर एक-एक चीज पर हाथ डालते थे 
ग्रौर घोखे पर धोखा खाते थे । 

हम बयान कर आये हैं कि नवाब शुजाउद्ौला बहादुर के खासे पर छह 
जगहों से खाने के ख्वान आया करते थे । मगर यह उन्हीं तक सीमित न था, 
उनके बाद भी यह तरीका जारी रहा कि ग्क्सर अमीर खासकर शाही खान- 
दान के लोगों को यह इज्जत दी जाती थी कि वे खासे के लिए खास-खास 
किस्म के खाने रोज़ाना भेजा करते थे । 

चुनांचे हमारे दोस्त नवाब मुहम्मद शफ़ी खां साहब बहादुर नेशापुरी का 
बयान है कि उनके नाना नवाब आागा अली हसन खां साहब के घर से, जो 
नेशापुरियों में सबसे ज़्यादा नामवर और प्रतिष्ठित थे, बादशाह के लिए रौगनी 
रोटी और घी जाया करता था। रौग़नी रोटियां इतनी बारीक और सफ़ाई से 
पकायी जातीं कि मोटे काग़ज़ से ज़्यादा मोटी न होतीं । और फिर यह मुम- 
किन न था कि चिकत्तियां पडें और न यह मजाल थी कि किसी जगह पर 
कच्ची रह जायें। मीठा घी भी एक खास चीज़ था जो बड़ी देखभाल से त॑यार 
कराया जाता था । 

दिल्‍ली में बिरयानी का ज़्यादा रिवाज है और था। मगर लखनऊ की 
सफ़ाई-सुथराई ने पुलाव को उस पर तरजीह दी । ग्राम लोगों की नजर में 
दोनों लगभग एक ही हैं, मगर बिरयानी में मसाले की ज़्यादती से सालन मिले 
हुए चावलों की शान पंदा हो जाती है और पुलाव में इतना स्वाद और इतनी 
सफ़ाई-सुथराई थी कि बिरयानी उसके सामने मलग्रोबा-सी मालूम होती है । 
इसमें शक नहीं कि मामूली क़िस्म के पुलाव से बिरयानी अच्छी मालूम होती 
है। वह पुलाव खुश्का! मालूम होता है जो खराबी बिरयानी में नहीं होती । 
मगर बढ़िया क़िस्म के पुलाव के मुक़/बिले बिरयानी नफ़ासतपसंद लोगों की 
नज़र में बहुत ही लद्धड और बदनुमा खाना है। बस यही फ़क था जिसने 
लखनऊ में पुलाव को ज़्यादा प्रचलित कर दिया । 

 उबाले हुए चावल । 


गुज़ित्ता लखनऊ ]89 


पुलाव वहां कहने को तो सात तरह के मशहूर हैं, इनमें से भी ग्रुलजार 
पुलाव, नूर पुलाव, कोको पुलाव, मोती पुलाव और चंबेली पुलाव के नाम हमें 
इस वक्‍त याद हैं । मगर सच्चाई यह है कि यहां के ऊंचे लोगों के दस्तरख्वान 
पर बीसियों तरह के पुलाव हुआ करते थे । मुहम्मद प्रली शाह के बेटे मिर्जा 
ग्रजी मउइशान ने एक शादी के मौक़ पर 'समघी मिलाप' की दावत की थी 
जिसमें खुद नवाब वाजिद अली शाह भी शरीक थे। उस दावत में दस्तरख्वान 
पर नमकीन और मीठे कुल सत्तर क़िस्म के चावल थे । ह 

गाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह के शासन-काल में नवाब सालारजंग के खानदान 
से एक रईस थे--नवाब हुसेन श्रली खां, उन्हें खाने का बड़ा शौक़ था ख़ास 
तौर से पुलाव । उनके दस्तरख्वान पर बीसियों तरह के पुलाव हुआ करते श्रौर 
वे ऐसी नफ़ासत के साथ तंयार किये जाते कि शहर भर में उनकी शोहरत हो 
गयी । यहां तक कि रईसों और अमीरों में से कोई उनके मुक़ाबिले की जुरंत 
न कर सका । खुद बादशाह उनसे ईर्ष्या करते थे श्रौर खाने के शौक़ीनों में वह 
“चावल वाले” मशहूर हो गये थे । 

नसीरउद्दीन हैदर के शासन-काल में बाहर का एक बावरची आया जो 
पिसते और बादाम की खिचड़ी पकाता, बादाम के सुडोल और साफ़-सुथरे 
चावल बनाता, पिस्ते की दाल तैयार करता और इस नफ़ासत से पकाता कि 
मालूम होता कि बहुत ही उम्दा, नफ़ोस और फरेरी माश की खिचड़ी है मगर 
खाइये तो और ही लज्जत थी श्रौर ऐसा जायका जिसका मज़ा ज़बान को 
जिंदगी भर न भूलता । 

नवाब सश्नादत ग्रली खां के ज़माने में एक बाकमाल बावरची सिर्फ चावलों 
की गुलत्थी पकाता, मगर ऐसी गुलत्थी जो शाही दस्तरख्वान की रोनक और 
तत्कालीन नवाब को बहुत ही पसंद थी | शहर के सारे रईस इसी तमन्ना में 
रहते थे कि उसका एक प्रास खाने को मिल जाये । मशहूर है कि नवाब 
प्रासफ़ड्हौला के सामने एक नया बावरची पेश हुझ्ना, पूछा गया, “क्या पकाते 
हो ? कहा, “सिर्फ माश (उड़द ) पकाता हूं।' पूछा, “तनख्वाह क्‍या लोगे ? ” 
कहा, “पांच सौ रुपये ।”” नवाब ने नौकर रख लिया | मगर उसने कहा, “मैं चंद 
शर्तों पर नौकरी करूंगा ।”” पूछा, “वो शर्ते क्‍या हैं ?” कहा, “जब हुजूर को मेरे 
हाथ की दाल का शौक़ हो एक रोज़ पहले से हुक्म हो जाये और जब इत्तला 
दूं कि तैयार है तो हुजूर उसी वक्‍त खालें।” नवाब ने शर्तें भी मंजूर कर लीं। 


[90 गुज़िशता लखनऊ 


चंद माह के बाद उसे दाल पकाने का हुक्म हुआ। उसने तेयार की और नवाब 
को. खबर की । उन्होंने कहा, “अच्छा दस्तरख्वान बिछा ।” मगर नवाब बातों 
में लगे रहे । उसने जाकर फिर इत्तला दी कि “खासा तैयार है |” नवाब को 
फिर आने में देर हुई। उसने तीसरी बार ख़बर की और इस पर भी नवाब 
साहब न आये तो उसने दाल की हांडी उठाकर एक सूखे पेड़ की जड़ में उंडेल 
दी और इस्तीफ़ा देकर चला गया । नवाब को अफ़सोस हुआ, ढुंढवाया मगर 
उसका पता न लगा । मगर चंद रोज़ बाद देखा तो जिस दरख्त के नीचे दाल 
फेंकी गयी थी वह हरा-भरा हो गया था ॥ इसमें शक नहीं कि इस घटना में 
अ्त्युक्ति है जिसने इसे असंभाव्य की श्रेणी में पहुंचा दिया है, मगर इससे इतना 
भ्रंदाज़ा ज़रूर हो जाता है कि दरबार में बावरचियों की कसी क़द्र होती थी 
ग्रौर कोई बाकमाल बावरची आ जाता तो उसे किस उदारता के साथ रोक 
लिया जाता था । 

ग्रमी रों का यह शौक देखकर बावरचियों